शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

उन्हें जननी जन्मभूमिश्च....नहीं , वसुधैव कुटुम्बकम् का ख्याल भाया, क्योंकि..

वे ''जननी जन्मभूमिश्च....'' को तो सिरे से नकार गए, पर उन्हें ''वसुधैव कुटुम्बकम्'' का ख्याल बहुत भाया ! उन्हें लगा कि जब सारी दुनिया ही हमारा परिवार है, तो हमें काम करने की क्या जरुरत है ! परिवार के सदस्य के नाते उन सबकी कमाई पर हमारा भी हक़ है ! ऐसे खुदगर्ज लोगों को ना अपने देश से लगाव था, नाहीं अपने देशवासियों से, नाहीं ही उनकी परेशानियों या तकलीफों से ! इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने हित की फ़िक्र थी। जिसके लिए वे अपने देश को भी दांव पर लगा सकते थे ...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग  

प्रकृति की विकास यात्रा के दौरान जानवर परिष्कृत होते हुए इंसान बन गए ! उनकी सोच में भी फर्क आया ! जहां जानवर सिर्फ अपने लिए जीते हैं वहीं इंसान में इंसानियत जैसी खूबी भी पनप गई। इसी इंसानियत या मानवता के तहत वह अपने साथ-साथ अपने हमजीवों का भी ख्याल रखने लगा। धीरे-धीरे विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग देशों का निर्माण हो गया। पर सब में भाईचारा, सहयोग, स्नेह इत्यादि बना रहे इसलिए हमारे विज्ञ-जनों ने, जो पहले जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी जैसा उपदेश दे चुके थे, एक और ख्याल वसुधैव कुटुम्बकम् को जन्म दे डाला, ताकि समस्त मानव जाति मिल-जुल कर सहयोगी बन एक परिवार की तरह सुख-चैन से रह सके ! 

इंसान आकार-प्रकार में तो जानवरों से बेहतर हो गया था ! पर इस प्रक्रिया के दौरान कायनात कुछ लोगों की बुद्धि और विचारों को नहीं बदल पाई ! ऐसे लोगों को दूसरों से कुछ लेना-देना नहीं था ! उन्हें सिर्फ अपनी सोच, अपने विचार, अपनी कार्य प्रणाली ही सर्वोत्तम लगती रही ! वे ''जननी जन्मभूमिश्च....'' को तो सिरे से नकार गए पर उन्हें वसुधैव कुटुंबकम का ख्याल बहुत भाया ! उन्हें लगा कि इतना बड़ा परिवार है तो हमें काम करने की क्या जरुरत है ! परिवार के सदस्य के नाते उन सबकी कमाई पर हमारा भी हक़ है ! ऐसे खुदगर्ज लोगों को ना अपने देश से लगाव था, नाहीं अपने देशवासियों से, नाहीं ही उनकी परेशानियों या तकलीफों से ! इन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने हित की फ़िक्र थी। जिसके लिए वे अपने देश को भी दांव पर लगा सकते थे ! शुरुआत में तो ऐसे लोगों की गिरफ्त में आधी से ज्यादा दुनिया आ गई, पर धीरे-धीरे जैसे ही इस हलाहल का दुष्परिणाम लोगों की समझ में आया तो इसका अंत होना आरंभ हो गया। 

जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है 

सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि दुनिया में ऊँच-नीच नहीं  होनी चाहिए ! सब इंसान बराबर हैं ! हर इंसान का हक़ है कि उसे भरपेट भोजन और छत मिले ! जिसके पास कुछ अतिरिक्त है, उसे सर्वहारा की सहायता करनी चाहिए ! वैसे यह विचार बाहर का था, क्योंकि अपने देश में तो जानवरों की भूख तक का ख्याल रखा जाता रहा है, पर फिर भी चल गया !  युवावस्था में कालेज के जमाने में ऐसे विचार खूब भाते थे। पर समय के साथ असलियत ने सामने आ कर दिलो-दिमाग को झिंझोड़ कर रख दिया ! 

मुफ्तखोरी ऐसा दीमक है, जो पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाता। ये उस अमर बेल की तरह होती है जिसकी अपनी जड़ नहीं होती ! ये परजीवी पौधा दूसरे पेड़ों पर आश्रित होता है, पर समय के साथ अपने आश्रयदाता का रस चूस-चूस कर उसे ही निष्प्राण कर देता है ! मानव समाज में भी उस पौधे जैसे लोगों के बारे में आम धारणा है कि इनका जमावड़ा जिस संस्थान पर हो जाता है वहां तब तक रहता है जब तक कि उसकी चिमनी से धुंआ निकलना बंद ना हो जाए ! इसका जीता-जगता उदहारण, हमारा कभी सोने के रंग सा चमकता बंगाल आज पीलियाग्रस्त नज़र आने लगा है। इसी  बिमारी का एक नया संस्करण आज दिल्ली को घेरे बैठा है।              

सदा से ही सारा देश चाहता रहा है कि सदियों से पीड़ित किसानों को खुशहाली मिले ! कम से कम उनके हक़ का पैसा उन तक पहुंचे। पर आजादी के दसियों साल बाद तक उनकी कोई सुनवाई नहीं हो पाई। फिर भी बेकाबू रूप से बढ़ती हुई जन संख्या के लिए उन्होंने हाड-तोड़ मेहनत की ! सबके लिए अन्न मुहैया करवाया, पर उनकी स्थिति जस की तस रही ! अब यदि उनकी हालत को बेहतर करने का भरोसा दिया जा रहा है, तो क्यों नहीं उस को एक बार आजमा लिया जाता ! जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है ! पछताने से तो बेहतर है, एक बार आजमा कर देखना ! इस में कोई हर्ज नहीं है ! क्यों पिछली स्थितियों से चिपके रहना बेहतर लगता है, एक काल्पनिक डर के तहत !  

पर तटस्त अवाम की हार्दिक इच्छा तथा चाहने के बावजूद लगता नहीं कि किसान आंदोलन जल्द ख़त्म होने दिया जाएगा ! क्योंकि अफवाहें सच होती नज़र आ रही हैं ! ख़बरों में है कि भोले-भाले किसानों के हित को पीछे धकेल अब उस पर कोई और ही हावी हो गया है ! कोर्ट द्वारा चार सदस्यों की समिति का गठन होते ही यह कह कर विरोध हो गया कि ये चारों सदस्य कृषि कानून के हिमायती हैं ! चलो ठीक है मान लेते हैं ! पर विरोध करनेवालों में कौन प्रमुख हैं - दर्शन पाल सिंह, जोगेन्दर सिंह ओगराहा, सुरजीत सिंह फुल, सुखदेव सिंह, अजमेर संघ लोखोवाल, बूटा सिंह गिल, निर्भय सिंह कीर्ति, सतनाम सिंह अजनाला, जिन सबका सीपीएम, सीपीआई, माले इत्यादि वामपंथी पार्टियों से गहरे ताल्लुकात हैं। इनके अलावा कविता कुरुगांती, ग्रीन पीस इंडिया से 27 साल का नाता, जिस पर भारत सरकार ने बैन लगाया हुआ है, अक्षय कुमार, मेधा पाटेकर के करीबी, जैसे बीसियों लोगों के अलावा और ''जो'' हैं उनका तो सभी को पता है ! तो हल कौन निकलने देगा !!

फिर भी सबकी दिली तमन्ना है कि जो भी धरने पर बैठे हैं, आवेश में आए हुए लोग-महिलाएं-बच्चे-युवा, हैं तो इंसान ही, हमारे भाई-बंधु ही ! क्यों इतनी विपरीत परिस्थितियों में उन्हें कष्ट सहना पड़ रहा है। क्यों नहीं उनको उनका भला पचास दिनों बाद भी समझाया जा सक रहा है ! यदि बरगलाए ही जा रहे हैं तो क्यों नहीं वैसे लोगों पर शिकंजा कैसा जा रहा ! क्या समझाने वाले बरगलाने वालों से किसी तरह कमतर हैं, जो अपनी बात ठीक से नहीं रख पा रहे ! जो भी हो यह मामला अब सिमटना चाहिए, पर दोषियों को, देश के विरुद्ध षडयंत्र करने वालों को सबक सिखाते हुए ! क्योंकि देश के आगे कुछ नहीं..कोई भी नहीं !!!  

25 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

सारगर्भित आलेख।
मकर संक्रान्ति का हार्दिक शुभकामनाएँ।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर देश के आगे कुछ नहीं लिखने सुनने समझने तक ही ना रहे।

Sweta sinha ने कहा…

किसी भी समस्या का हल बातचीत के द्वारा समझौता करके किया जा सकता है परंतु ज़िद और अकड़ जैसे लक्षण स्वस्थ नहीं किसी भी सूरत में देश के लिए।
सार्थक लेख सर।
सादर।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी
आपको और आपके पूरे परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुशील जी
अपने-अपने स्तर पर हर किसी को कोशिश करनी ही चाहिए

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

श्वेता जी
हठधर्मिता का इलाज होना भी जरूरी है

सधु चन्द्र ने कहा…

सारगर्भित, सार्थक लेख।
सादर।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सधु जी
हार्दिक आभार

Meena Bhardwaj ने कहा…

सारगर्भित लेख ।

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(१६-०१-२०२१) को 'ख़्वाहिश'(चर्चा अंक- ३९४८) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी
अनेकानेक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनीता जी
सम्मिलित करने हेतु हार्दिक आभार

Anuradha chauhan ने कहा…

सारगर्भित लेख

Jigyasa Singh ने कहा…

जिस जमीन को खोने का डर दिखा उनको बरगलाया जा रहा है, यदि वैसा होता भी है तब उस समय भी तो आंदोलन कर विरोध किया जा सकता है ! तब तो जनता भी पूरी तरह साथ देगी और तब तत्कालीन सरकार को भगवान भी नहीं बचा सकेंगे ! पर यदि आज का भरोसा सच निकला तो...! उसकी सुखद कल्पना ही कितनी सुखद है ! पछताने से तो बेहतर है, एक बार आजमा कर देखना ! इस में कोई हर्ज नहीं है... बिल्कुल सही कहा है आपने गगन जी.यथार्थ पूर्ण एवं समसामयिक विषयों को सन्दर्भित करते हुए, समय की मांग को लेकर लिखे गए सारगर्भित लेख के लिए आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं एवं सादर नमन..

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनुराधा जी
हार्दिक आभार ! पावन पर्व की शुभकामनाएं

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जिज्ञासा जी
कुछ लोग कहीं भी, कभी भी, कैसे भी अपनी स्वार्थपूर्ति नहीं आते

Amrita Tanmay ने कहा…

प्रभावी छिद्रान्वेषण ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अमृता जी
आपका सदा स्वागत है

MANOJ KAYAL ने कहा…

सुन्दर सार्थक रचना

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मनोज जी
हार्दिक आभार

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल ने कहा…

बहुत ही महत्वपूर्ण व सामयिक आलेख, कृषक आंदोलन पर गहरा आलोकपात करती हुई, प्रभावशाली सृजन - - साधुवाद आदरणीय।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शांतनु जी
बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

कदम शर्मा ने कहा…

सही विश्लेषण, नमस्कार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कदम जी
मतलब परस्त लोग कुछ भी करने को आमदा रहते हैं

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

पता नहीं अपने देश में पल, बढ, खा-पी कर कैसे कोई दूसरे देश का वफादार हो जाता है

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