रविवार, 17 जनवरी 2021

आसान नहीं होगा, माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट सिकदर करना

आजकल माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जब चाहें, जो चाहें रख लें ! ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल होगा ....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

आजकल एक न्यूज़ चैनल पर माउंट एवरेस्ट के नाम को बदलने को ले कर चर्चा चल रही है। उनके अनुसार जब इसकी ऊँचाई की सटीक गणना राधानाथ सिकदर नाम के भारतीय ने की थी, तो क्यों ना दुनिया के इस सर्वोच्च शिखर का नाम उनके नाम पर रखा जाए ! यदि ऐसा हो जाता है तो यह हम सारे भारतीयों के लिए बड़े ही गर्व की बात होगी। पर क्या यह जटिल कार्य इतना आसान है !

1831 में भारत के सर्वेयर जनरल जॉर्ज एवरेस्ट ने राधानाथ सिकदर की अप्रतिम, बहुमुखी प्रतिभा को पहचान उन्हें भारतीय सर्वेक्षण विभाग में बाबू यानी क्लर्क के रूप में काम दिलाया था। एवरेस्ट, राधानाथ सिकदर के काम से इतने प्रभावित थे कि जब सिकदर को डिप्टी कलेक्टर बनने का मौका मिला तो एवरेस्ट ने हस्तक्षेप कर उन्हें अपने विभाग से जाने की अनुमति ही नहीं दी ! 1843 में जॉर्ज एवरेस्ट भारत के सर्वेयर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हो गए और कर्नल एंड्रयू स्कॉट वॉ को उनके स्थान पर नियुक्त किया गया। इधर सिकदर को भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अलावा कलकत्ता के मौसम विज्ञान विभाग का भी अधीक्षक बना दिया गया।

कर्नल वॉ ने सार्वजनिक रूप से शिखर 15 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के रूप में मान्यता देने के साथ-साथ उसका नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखने का अनुमोदन भी कर दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया 

उन्हीं दिनों कर्नल एंड्रयू स्कॉट वॉ के आदेश पर सिकदर ने दार्जिलिंग के पास बर्फ से ढके हुए पहाड़ों को मापने का काम शुरू किया। उस समय तक सभी चोटियों का नामकरण नहीं हुआ था। सुविधा के लिए चोटियों के स्थानीय नामों को ही मान लिया जाता था। ऐसे में शिखर 15 की ऊंचाई नापने के दौरान छह अलग-अलग स्थानों से तरह-तरह से इकठ्ठा किए गए आंकड़ों से सिकदर ने यह निष्कर्ष निकाला कि हिमालय तथा दुनिया की सबसे ऊँची चोटी 15 है। यह एक क्रांतिकारी खोज थी। उस समय तक इसे नेपाल में सगरमाथा और तिब्बत में चोमोलंगमा के नाम से जाना जाता था। 

राधानाथ सिकदर
सिकदर की रिपोर्ट पर कुछ वर्षों तक शोध होता रहा ! गहन निरिक्षण, परिक्षण, बारीक जांच-पड़ताल के उपरान्त, पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद कर्नल वॉ ने सार्वजनिक रूप से शिखर 15 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के रूप में मान्यता देने के साथ-साथ उसका नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखने का अनुमोदन भी कर दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया ! इस प्रकार दुनिया की सबसे ऊंची इस चोटी का नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर माउंट एवरेस्ट रख दिया गया पर साथ ही राधानाथ सिकदर के अमूल्य योगदान को भी भूला दिया गया। 

आज वर्षों बाद उनके काम को ले कर जागरूकता फैलाई जा रही है। उनको श्रेय दिलवाने की बात उठ रही है ! उनके नाम पर माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जो चाहें रख लें ! इसलिए ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी ! लिए सबसे पहले भारत सरकार को कूटनीतिक शुरुआत करनी होगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल है ! यह जानते-समझते हुए ही कोई नेता, लोक-लुभावन प्रस्ताव होने के बावजूद इससे जुड़ता हुआ नहीं लगता ! 

जॉर्ज एवरेस्ट
नाम बदलने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल है। एक तो यह शिखर अपने देश में नहीं है ! दूसरे दुनिया में ऐसी कोई एजेंसी भी नहीं है कि वहां अपनी बात रख आवेदन कर दें और सही पाए जाने पर नाम बदल जाए ! भले ही हिमालय से हमारा भावनात्मक जुड़ाव सदियों से है पर उसकी यह चोटी नेपाल में स्थित है। इसका एक हिस्सा चीन में पड़ता है ! सो इन दोनों की सहमति सबसे जरुरी है। पर दुखद स्थिति यह है कि इन दोनों के साथ ही हमारे संबंध उतने मधुर नहीं हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों यथा पकिस्तान, बांग्ला देश और म्यांमार की रजामंदी की भी जरुरत पड़ेगी। जिसमें पकिस्तान से आशा रखना गलत ही होगा ! इनके अलावा यूनेस्को की भी इजाजत की जरुरत पड़ेगी, क्योंकि यह एक World Heritage Site है ! फिर ब्रिटेन ही क्यों राजी होगा, विश्व प्रसिद्ध जगह से जुड़े, अपने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, जुड़े नाम को हटाने के लिए ! सो अड़चनें तो बेशुमार हैं ! पर यदि उन पर पार पाया जा सके तो फिर क्या कहने !

32 टिप्‍पणियां:

दिव्या अग्रवाल ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 18 जनवरी 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

दिव्या जी
सम्मिलित कर मान देने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

Virendra Singh ने कहा…

बहुत बढ़िया और नई जानकारी है मेरे लिए तो। इस पोस्ट को तैयार करने में जो मेहनत लगी है उसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। इन दुर्लभ चित्रों का संकलन भी आसान नहीं रहा होगा। आपके प्रयासों के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएँ।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह बहुत खूब

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

विरेन्द्र जी
आपका सदा स्वागत है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुशील जी
प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

शिवम् कुमार पाण्डेय ने कहा…

बहुत सही लिखा है आपने।

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 18 जनवरी 2021 को 'यह सरसराती चलती हाड़ कँपाती शीत-लहर' (चर्चा अंक-3950) पर भी होगी।--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

#रवीन्द्र_सिंह_यादव

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शिवम जी
टीआरपी के चक्कर में कई बार अजीबोगरीब किस्से ले लोगों की भावनाओं को छेड बैठते हैं ये लोग

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

रवीन्द्र जी
आपका और चर्चा मंच का हार्दिक आभार

Onkar ने कहा…

बहुत बढ़िया

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

आभार, ओंकार जी

Anuradha chauhan ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

उपयोगी जानकारी और अच्छा सुझाव है।

कविता रावत ने कहा…

बहुत ही अच्छी ऐतिहासिक जानकारी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हार्दिक आभार, अनुराधा जी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी
हार्दिक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कविता जी
सदा स्वागत है आपका

कदम शर्मा ने कहा…

बाहर का तो पता नहीं पर अपने ही लोग सवाल उठाने से बाज नहीं आऐंगे

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने

Meena Bhardwaj ने कहा…

वाह!बहुत खूब ..रोचक जानकारी ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी
हार्दिक आभार, आपका

दिगम्बर नासवा ने कहा…

माउंट सिकदर ... बुरा नहीं लग रहा वैसे ...
रोचक जानकारी है ये ...

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

नासवा जी
वैसा हो जाए तो उससे अच्छी बात और क्या हो सकती है, पर इफ्स और बट्स बेशुमार हैं

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

माउंट एवरेस्ट का नाम बदलने का ख़याल अच्छा है...

एक अच्छे जानकारीपूर्ण लेख के लिए आपको बधाई।

लेकिन, मन में प्रश्न उठता है कि ‘भारत’ का ‘इंडिया’ नाम से कब पीछा छूटेगा ? मैंने अपने काॅलम ‘चर्चा प्लस’ में 31 अगस्त 2018 को - ‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ? - शीर्षक से इस मुद्दे को उठाया भी था जिसे आप मेरे ब्लाॅग ‘‘शरदाक्षरा’’ में इस लिंक पर पढ़ सकते हैं- https://sharadakshara.blogspot.com/2018/08/blog-post_31.html

- डाॅ शरद सिंह

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शरद जी
"कुछ अलग सा" पर सदा स्वागत है आपका

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल ने कहा…

जानकारीपूर्ण आलेख - - अंग्रेजों ने अनेक भारतियों के प्रतिभाओं को सत्ता के ज़ोर पर अपने नाम किया - - राधानाथ सिकदार उन्हीं में से एक महान गणितज्ञ थे लेकिन उन्हें उनके प्रतिभा का मूल्य स्वाधीन भारत में भी नहीं मिला, उनकी आख़री वक़्त की ज़िन्दगी भी कष्टों व गुमनामी में ही गुज़र गई हालांकि सम्प्रति कुछ दिनों से लोग एवरेस्ट के नामांतरण की मुहीम चला रहे हैं, सफलता की आशा में सभी भारतीय हैं, जिसने एवरेस्ट पर्वत की ऊंचाई नापी वही आज क़ब्र के पत्थर में आ कर सिमट गया - -

मन की वीणा ने कहा…

गगन जी आपका ये श्रमसाध्य आलेख सिर्फ ज्ञानवर्धक ही नहीं सटीक विमर्श है,आपने बहुत ही उपयुक्त दमदार पहलू रखें हैं।
इस शानदार फीचर्स के लिए बधाई एवं साधुवाद।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शांतनु जी
ऐसे हजारों कर्मवीर गुमनामी के अंधेरे में खो कर रह गए!यश सभी के भाग्य में नहीं होता, विडंबना ही तो है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कुसुम जी
प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

एक कठोर सच्चाई भी है ! किसी भी क्षेत्र को देख लें, नाम सदा ही टीम के मुखिया का ही होता है ! देश को स्वतंत्र करवाने में हजारों-लाखों लोगों ने प्राणाहुति दी पर नाम तो गांधी -नहरू का ही हुआ ! सेना जीतती है पर श्रेय तो सेनानायक को हो जाता है ! अभी वर्षों के बाद आस्ट्रेलिया को उसी के घर में टेस्ट में करारी शिकस्त देने में पंत और सिराज का सबसे बड़ा हाथ रहा पर इतिहास में इसे रहाणे के नेतृत्व में हुई जीत ही माना जाएगा ! ऐसे ही हिमालय की ऊंचाई नापने का फरमान एवरेस्ट ने ही राधानाथ जी को दिया था ! उनके प्रयास की जितनी बड़ाई की जाए कम है पर उनके बॉस के खाते में ही जाएगी ! अब शिखर का नाम बदले या ना बदले, हमें राधानाथ जी के इस भगीरथ प्रयास के बारे में आज और आने वाली पीढ़ियों को जरूर बताना चाहिए !

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