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गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

असली चेहरा सामने आया, फितरत को भी सामने लाया

दरअसल ऐसे लोग राजनेता हैं ही नहीं ! उन्हें देश, धर्म, जाति, देशवासियों, किसी से भी कुछ लेना-देना नहीं है ! उन्हें मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से ! और इसके लिए वे कुछ भी करने को आतुर रहते हैं ! वे सिर्फ विदेशी ताकतों के मोहरे हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करवा दी गई है और वे अपने आकाओं की बिछाई बिसात पर सिर्फ उनके आदेशानुसार हरकतें करते हैं....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वि देशी ताकतों द्वारा भारत में अपनी कठपुतलियों की असलियत को अब तक ढक-छुपा कर उनकी आड़ में खुद को सत्ता में सुपर पॉवर बनाए रखने का जो षड्यंत्र सालों से किया जाता रहा था, वह खुल कर सामने आ गया है ! आज के माहौल में उन्हें भी यह बात समझ में आ गई है कि अब भारत में इन प्यादों के बल पर अपने मनोनुकूल सरकार बनाना कतई मुमकिन नहीं है ! तो अब खुला खेल फर्रुखाबादी ! 
प्यादे 
पि छले दसेक वर्षों से कुछ तथाकथित राजनितिक लोग सनातन विरोधी, हिंदू विरोधी, धर्म विरोधी ब्यान पर ब्यान दिए जा रहे हैं, कोई कहता है हिन्दू धर्म ग्रंथ जला दो ! कोई देवी-देवताओं को काल्पनिक बताता है ! कोई लोकप्रिय त्योहारों को खतरनाक बता लोगों को भ्रमित करने की कुचेष्टा करता है ! कोई किसी उत्सव पर सवाल खड़े करने की हिमाकत कर देता है ! कोई देवी-देवताओं के बारे में अभद्र टिप्पणियां कर देता है! कोई अपने पर्वों पर होने वाले खर्च को धन की बर्बादी बता, विदेशी धर्मों से सीख लेने की बात करता है ! वह भी तब जब देश की बहुसंख्यक आबादी सनातन की आस्था से जुड़ी हुई है ! यह सब अकारण नहीं हो रहा, सब सोची-समझी साजिशों के तहत क्रियान्वित किया जा रहा है !
बकैती 

आम इंसान को यह सब वर्षों से सत्ता से दूर विपक्षी दलों की छटपटाहट या आक्रोश लग सकता है ! पर सच्चाई किसी और ही दिशा-दशा की ओर इशारा करती है ! आज के देश के माहौल को देखते हुए कोई भी व्यक्ति जो राजनीती से जुड़ा हो और उसे जरा सी भी राजनितिक समझ होगी तो वह कभी भी ऐसे ब्यान दे कर अपने कैरियर को खत्म नहीं करना चाहेगा ! दरअसल ऐसे लोग राजनेता हैं ही नहीं ! उन्हें देश, धर्म, जाति, देशवासियों किसी से भी कुछ लेना-देना नहीं है ! उन्हें मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से ! और इसके लिए वे कुछ भी करने को आतुर रहते हैं ! वे सिर्फ विदेशी ताकतों के मोहरे हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करवा दी गई है और वे अपने आकाओं की बिछाई बिसात पर सिर्फ उनके आदेश के अनुसार ही हरकतें करते हैं ! 
बिसाती मोहरे 
ऐसा नहीं है कि शतरंज की बिसात बिछा उस पर सिर्फ प्यादों की परेड करवा दी जाती हो ! अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिए पूरा ताम-झाम किया जाता है ! अकूत धनराशि खर्च की जाती है ! तरह-तरह के आख्यान-व्याख्यानों का जाल बिछाया जाता है ! प्रचार-प्रसार हेतु सोशल मीडिया का उपयोग-दुरूपयोग किया जाता है ! हर ऐसी शह जो इंसान के ईमान को डगमगा दे उसका उपयोग किया जाता है ! जिस किसी व्यक्ति का जरा सा भी रसूख या पहुँच होती है उसे खरीद कर अपनी दुरभिसंधि का सदस्य बना लिया जाता है ! पैसे का लालच दे कुछ भी बुलवा-लिखवा लिया जाता है ! पैसे को ही सर्वशक्तिमान बना दिया गया है !
सोशल मिडिया 
खरीदफरोख्त 
धन की शक्ति अपरंपार है ! दुनिया का कोई भी कोना उससे सुरक्षित नहीं है ! उसी के बल पर झूठ को सच की शेरवानी पहनवा, सजा-संवार कर उसकी बारात निकाल दी जाती है ! यह तो जग जाहिर है कि जब तक सच अपनी चप्पलें पहनता है, झूठ दुनिया के दस चक्कर लगा आता है और ऐसे लोग तो अपने धन-बल पर झूठ के लिए रॉकेट तक उपलब्ध करवा देते हैं ! लोग बहकावे में आ जाते हैं ! उधर विडंबना यह है कि सच को अपना सच बताने के लिए भी धन की शरण लेनी पड़ती है ! पर समय ने बदलना शुरू कर दिया है !

सच्चाई 
इसी सब के बीच अचानक देश की आजादी से भी पहले से रचा जा रहा, पर अब तक दबा-ढका, एक ऐसा कुचक्र सामने आया है जिससे सभी अचंभित से हो गए हैं ! कोई खुद पाक-साफ रह कर, वर्षों से किसी को किसी और के विरुद्ध बरगला कर, किसी और से मतभेद करवा कर, किसी और  मुद्दे को भड़का कर लोगों को भ्रमित कर, उनका ध्यान कहीं और भटकवा कर, अपना उल्लू सीधा करता रहा ! उसका तरीका इतना प्रेममय,  दोस्ताना,  सौहार्दपूर्ण और स्नेहयुक्त था कि लोग  उसके इरादों  को कभी  भांप ही नहीं पाए ! परंतु वक्त सब का हिसाब करता और रखता है, उसका भी हुआ और उसके क्रियाकलापों की नग्नता सामने आ ही गई और जब आ ही गई तो वह भी खुल कर अब तक छुपे अपने गुर्गों, गणों के साथ सामने आ गया ! उसका नतीजा सबके सामने है और अब हमारी बारी है कि हमें किससे कैसे निपटना है !  
वन्देमातरम।। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 13 अगस्त 2025

गैसलाइटिंग, समझदारी अवाम को ही दिखानी होगी

राजनीति में जनोन्माद का भाव पैदा करना स्वाभाविक है। कोई अगर किसी पार्टी पर हमला कर राजनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश करता है तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है। परंतु सोशल मीडिया के युग में, बार-बार फैलाए गए झूठ, आम जनता के लिए सच का रूप ले लेते हैं, यह खतरनाक है ! वर्तमान में झूठ, बल्कि खुले झूठ, का राजनीति में एक गैसलाइटिंग हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाना शुरू हो चुका है ! विपक्षी पर सार्वजनिक मंच से बेशर्मी से झूठ बोल, असंसदीय शब्द या मिथ्या घृणित आरोप लगा कर यह दावा करना कि मेरा कथन ही सच है, यही है गैसलाइटिंग..............!         

#हिन्दी_ब्लागिंग 

गैसलाइटिंग ! क्या होती है गैसलाइटिंग, जिसकी वेबसाइटों पर हुई बेपनाह खोज के कारण अमेरिका के जाने-माने पब्लिशर मेरियम बेवस्टर ने वर्ड ऑफ द ईयर चुना है ? उनके अनुसार इस शब्द का अर्थ है, किसी के द्वारा किसी के आत्म-संदेह को बढ़ावा देना ! किसी को उसकी सोच और विचारों पर संदेह दिला उनको नकारने के लिए प्रेरित करना। इससे पीड़ित व्यक्ति को अपनी ही समझ पर संदेह होने लगता है ! जिससे वह चिंता, अवसाद, भटकाव जैसी भावनाओं से ग्रस्त हो जाता है और इसका असर उसके मानसिक स्वास्थ्य पर भी हानिकारक रूप से पड़ने लगता है !

प्रभाव 
पैट्रिक हैमिल्टन के एक नाटक "गैस लाइट" का 1938 में मंचन हुआ था। बाद में 1944 में उस नाटक पर बनी फिल्म के कथानक में एक व्यक्ति धोखे से अपनी पत्नी को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करता है कि वह पागल हो रही है, जबकि ऐसा था नहीं ! सबसे पहले गैसलाइटिंग शब्द का प्रयोग उसी फिल्म में किया गया था ! 

मय के साथ-साथ मुहावरों, शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं ! वर्तमान में गैसलाइटिंग का रूप और अर्थ बदल गया है ! आज छल, फरेब, दगाबाजी और खुले झूठ के जरिए सामाजिक मनोविज्ञान की हेराफेरी को भी "गैसलाइटिंग" कहा जा सकता है। वह साजिश के सिद्धांतों के तहत डीपफेक, ट्विटर, फेक न्यूज और ट्रोलिंग द्वारा सच को झूठ और झूठ को सच में बदलने का हथियार बन गया है ! आजकल, किसी राजनेता या राजनीतिक संगठन के लिये सार्वजनिक बातचीत को विषय से भटकाने और किसी विशेष दृष्टिकोण के पक्ष में या उसके खिलाफ राय में हेरफेर करने की रणनीति के रूप में गैसलाइटिंग का उपयोग करना सामान्य बात है।

प्रक्रिया 
ज इस अस्त्र का इस्तेमाल, देश-विदेश में अपने ही देश, उसकी व्यवस्था, उसकी संस्थाओं की आलोचना करने और उन सब को व्यवस्थित तथा सुधारने के लिए खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए हो रहा है ! हालांकि ऐसी हरकतों और बयानों के पीछे अपने कारण हो सकते हैं। लेकिन तथ्यों से खिलवाड़ और झूठ को सच की तरह पेश करने की हिमाकत, बेशर्मी, छल-कपट और मक्कारी की इंतहा है ! भले ही लानत-मलानत होती हो, शर्मसार होना पड़ता हो, पर निर्लज्जता की कोई सीमा नहीं है !

नेता ??
राजनीति में जनोन्माद का भाव पैदा करना स्वाभाविक है। कोई अगर किसी पार्टी पर हमला कर राजनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश करता है तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है। परंतु सोशल मीडिया के युग में, बार-बार फैलाए गए झूठ, आम जनता के लिए सच का रूप ले लेते हैं, यह खतरनाक है ! वर्तमान में झूठ, बल्कि खुले झूठ, का राजनीति में एक गैसलाइटिंग हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाना शुरू हो चुका है ! विपक्षी पर सार्वजनिक मंच से बेशर्मी से झूठ बोल, असंसदीय शब्द या मिथ्या घृणित आरोप लगा कर यह दावा करना कि मेरा कथन ही सच है, यही है वह बला, जिसे गैसलाइटिंग कहा जाता है 
गैसलाइटिंग ग्रसित 
से झूठ के पुलिंदों की सच्चाई को उजागर करने के लिए जनता यानी पब्लिक को ही गैस लाइटिंग के धुंए से फैले धुंधलके को दूर हटा, उसी गैस की रौशनी का उपयोग कर, सार्वजनिक रूप से, सरे आम, मक्कारों के चेहरों से  मुखौटे उतार, उनकी असलियत को देश-दुनिया के सामने लाना होगा ! तभी देश को शांति और सुरक्षा मिल पाएगी !

https://youtube.com/@gagansharma8554?si=70eu3nbJkp0Lti1W?view_as=subscribe?sub_confirmation=1 

सभी चित्रों के लिए अंतर्जाल का आभार  

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

"माले मुफ्त का" ऐंटी रिएक्शन

नासूर बनते इस घाव का उपचार बहुत सोच-समझ कर, बड़ी सूझ-बूझ और सतर्कता से तुरंत करना बेहद जरुरी है नहीं तो जाति, धर्म, आरक्षण के कारण बंटते देश-समाज की सिरदर्दी बढ़ाने के लिए एक और जमात सदा के लिए आ खड़ी होगी ! जिसके मुंह में मुफ्तखोरी का खून लग चुका होगा ! आज देश की हालत और समय का तकाजा है कि मुफ्त में मछली देने के बजाय मछली पकड़ना सिखाया जाए, ताकि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सके ! आबादी के परमाणु बम पर बैठे देश को मुफ्तखोरों, निठठ्लों, परजीवियों की नहीं कर्म-वीरों की जरुरत है..................!     
#हिन्दी_ब्लागिंग 
दृश्य एक :- आठ एकड़ की खेती लायक जमीन के मालिक श्री अमर सिंह जी अपनी सेहत ठीक न होने के कारण, खेत में काम करने के लिए किसी सहायक के न मिलने से परेशान थे।  एक दिन उन्हें अपना पुराना कामदार दिखाई पड़ा तो उन्होंने उसे फिर काम पर रखना चाहा तो उसने साफ मना कर कहा कि वह अब बेगार नहीं करता। एक ही गांव के होने के कारण साहू जी जानते थे कि वह दिन भर निठ्ठला घूमता है, नशे का भी आदी है. पर कर क्या सकते थे. एक दो साल के बाद तंग आकर मजबूरी में उन्होंने दुखी मन से अपनी आधी जमीन एक बिल्डर को बेच डाली। अब वहां गेहूं की जगह कंक्रीट की फसल उगेगी !                 

दृश्य दो :- शहर के करीब रहने वाले श्री गोविंद पटेल जी को अपने घर में बरसात का पानी इकट्ठा होने के कारण उसकी निकासी के लिए एक पांच-सात फुट की छोटी नाली निकलवानी थी। पर इस छोटे से काम  को करने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था। किसी तरह एक पलम्बर राजी हुआ, उतने से काम के लिए उसने हजार रुपयों की मांग की, ले-दे कर नौ सौ रुपये पर राजी हुआ, जबकि सारा काम बेढंगे तरीके से उसके सहयोगी एक किशोर ने किया। सिमित आय वाले पटेल जी कसमसा कर रह गए !  

तीसरा दृश्य :- शर्मा जी के फ्लैट के बाहर के पाइप में दीवाल में उगे एक पौधे ने किसी तरह पाइप के अंदर जगह बना उसे पूरी तरह  "चोक"  कर दिया। नतीजतन ऊपर के फ्लैट के साथ-साथ अपना पानी भी घर के अंदर बहने लगा ! दस फुट की ऊंचाई पर के पाइप के जोड़ को खोल कर साफ करने के लिएन कोई पलम्बर मिल रहा था ना हीं कोई सफाई कर्मचारी ! बड़ी मुश्किल से पांच सौ रुपये दे कर तथा साथ लग कर यह 15 - 20 मिनट का काम करवाया जा सका ! मजबूरी जो थी !  

चौथा दृश्य :- मिश्रा जी को दूध-दही का शौक है।  सो घर पर सदा एक-दो दुधारू पशु बंधे रहते थे। अब मजबूरन सबको हटा, बाजार का मिश्रित दूध लेना पड़ रहा है ! कारण पशुओं के रख-रखाव, दाना-पानी, साफ-सफाई के लिए किसी सहायक का उपलब्ध न हो पाना था ! मजबूरन ऐसे लोगों को या तो ब्रांडेड कंपनियों के उत्पाद खरीदने होंगे या फिर डेयरी वालों के रहमो-करम पर अपना स्वास्थ्य गिरवी रखना होगा !  

पांचवां दृश्य :-  एक गांव में एक कौतुक दिखाने वाला आया ! खेल दिखाने के बाद जब उसे कुछ लोग धान देने लगे तो वह ऐसे बिदका जैसे सांड को लहराता लाल कपड़ा दिखा दिया हो ! कुछ नाराज सा हो बोला, मुझे सिर्फ पैसे चाहिए !  धान कितना चाहिए मुझसे ले लो ! धान की उसको क्या कमी, सरकार भर-भर तसले हर महीने घर जो पहुंचा रही है !

इन सारे दृश्यों में एक वजह कॉमन है ! वह है, काम करने वालों की कमी और दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाने की प्रवृत्ति और यह बिमारी हमारे नेता-गण ही लाए हैं ! जिन्होंने अपना वोट बैंक पुख्ता करने की लालसा में तरह-तरह के स्वाद की रेवड़ियां जगह-जगह बांटी हैं ! ये सरकारों द्वारा लाई जा रही खुशहाली की तस्वीर नहीं है, यह है मुफ्तखोरी के कारण उपजी जहालत और काम न करने की प्रवृत्ति की ! कुछ लोगों को ये बातें गरीब विरोधी लगेंगी, पर कड़वी सच्चाई है कि मुफ्तखोरी ने आज समाज में निष्क्रिय लोगों का एक अलग तबका बना दिया है ! ! इससे भी भयावह सच्चाई यह है कि अब चाह कर भी ऐसी स्कीमों को तुरंत बंद नहीं किया जा सकता ! क्योंकि जैसे ही ऐसा कोई कदम उठेगा, देश को अस्थिर करने की ताक में बैठी देसी-विदेशी ताकतें, उसका जबरदस्त विरोध करवा अराजकता फैलाने की कोशिश शुरू करवा देंगी !    

हालांकि कुछ ऐसी योजनाओं और उन्हें लागू करने वालों की मंशा समाज के निचले वर्ग की बेहतरी चाहने की ही रही होगी, जैसे कोरोना के दौरान मुफ्त का राशन ! पर महामारी के बाद उसे बंद कर देना चाहिए था ! क्योंकि उसका बोझ भी तो समाज का एक वर्ग ही उठा रहा है ! उस पर सचमुच के गरीब और बने या बनाए हुए ग़रीबों में जमीन-आसमान का फर्क होता है और ऐसी योजनाओं का सर्वाधिक लाभ उन्हीं बने हुए ग़रीबों द्वारा उठाया जाता है, जिन्हें बिना हाथ-पैर हिलाए हराम की खाने की आदत पड़ चुकी होती है ! समाज के ऐसे ही परजीवियों और उनके आकाओं के कारण अच्छी योजनाएं भी अपने लक्ष्य तक न पहुंच आलोचनाओं का शिकार हो अप्रियता को प्राप्त हो जाती हैं।  

नासूर बनते इस घाव का उपचार बहुत सोच-समझ कर, बड़ी सूझ-बूझ और सतर्कता से तुरंत करना बेहद जरुरी है नहीं तो जाति, धर्म, आरक्षण के कारण बंटते देश-समाज की सिरदर्दी बढ़ाने के लिए एक और जमात सदा के लिए आ खड़ी होगी ! जिसके मुंह में मुफ्तखोरी का खून लग चुका होगा ! आज देश की हालत और समय का तकाजा है कि मुफ्त में मछली देने के बजाय मछली पकड़ना सिखाया जाए, ताकि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सके ! आबादी के परमाणु बम पर बैठे देश को मुफ्तखोरों, परजीवियों की नहीं कर्म-वीरों की जरुरत है !

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

विडंबना या समय का फेर

भइया जी एक अउर गजबे का बात निमाई, जो बंगाली है और आप पाटी में है, ऊ बोल रहा था कि किसी को हराने, अलोकप्रिय करने या अप्रभावी करने का बहुत सा रास्ता है। ऐसा कि करे एक और दुसरा समझता रहे कि उसका नुक्सान किसी तीसरे ने किया है.... ! आक्रांत जब तक समझे कि दुश्मन कउन है, तब तक खेला खत्म ! भइया जी उसका बात हमारे पल्ले नहीं पड़ा ! हमको कुच्छो समझे नहीं आया ! इसका का मतलब हो सकता है ?मैं चुप रहा ! सोच रहा था निमाई बहुत आगे जाएगा.................!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कल शाम बालकनी में खड़ा था तभी देखा सामने से बिनोद जा रहा है।  बहुत दिन हो गए थे उसका आता-पता नहीं था, सो आवाज दे डाली। उसने घूम कर देखा, नमस्ते की और घर आ गया। उसके अंदर आते ही मैंने पूछा कि क्या बात है, बहुत दिनों से दिखे नहीं ! उसने कहा ऐसे ही कुछ काम में फंसा था ! मैंने यूंही पूछ लिया कि क्या चुनावों के काम में ?  

''अरे नहीं भइया, ई सब से हम दूरे रहते हैं ! बस थोड़ा-बहुत खोज-खबर रखते हैं ! वइसे इस बार तो सब कुछ बहुते ही गजबे का हो रहा है !

'' क्या ! कैसा गजब ?    

''अरे भइया, आपको तो सब्बे खबर पहले ही मिल जाता है ! वह हंस दिया। 

''अरे फिर भी ! मैंने कुरेदा। 

''भइया जी ! हम चार ठो बचपन का दोस्त हैं ! अभिहें हम सब सुदामा का चा का गुमटी पर बइठे थे। ऊ तीनों निठल्ला हैं। कोई काम-काज नहीं है पर अभी चुनाव में तीनों को अलग-अलग पाटी में काम मिल गया है। थोड़ा पइसा मिला तो चा पाटी कर रहे थे। उनमें एक भगत बन गया है, एक चमचा और एक आपिया............

वह कुछ और बोले उसके पहले ही मैंने टोक दिया, ''कैसी भाषा बोल रहे हो ! सभ्य और समझदार लोग ऐसे शब्दों में बात नहीं करते ! 

मेरी आवाज से बिनोद अपनी गलती समझ तो गया फिर भी सफाई में बोला ''ऊ लोग ऐसे ही बतियाता है !

''कोई गलती करेगा तो तुम भी करोगे ? गलत बात है ! नाम ले कर बात किया करो ! उनको भी समझाओ !

''जी, भइया !

तभी अंदर से चाय आ गई ! माहौल सामान्य हुआ ! मैं अपनी जिज्ञासा रोक नहीं पा रहा था ! पूछ ही लिया !

''इस बार कौन सा गजब का बात देख रहे हो ?

''बहुते है ! पर सबसे बड़का अचरज तो अपना दिल्ली में ही है ! चा का टपरी पर उसी का बात हो रहा था ! देखिए, देश का सबसे बलशाली कुनबा ! जहां का तीन-तीन, चार-चार परधान मंत्री बना ! देश का दूसरा सबसे बड़ा पाटी ! अभी भी सबसे जोरावर परिवार ! पर दिल्ली का जउन सा निर्वाचन छेत्र का सीट का लिस्ट में इन लोगन का नाम है, जहां इ लोग वोट देगा, ऊ छेत्र का वोटिंग मशीन पर इनका पाटी का निशाने ही नहीं है ! तो ई लोग कउन चिन्ह का बटन दबाएगा ? इसी पर सब बहिसिया रहे थे ! 

''पर भइया जी एक अउर गजबे का बात निमाई, जो बंगाली है और आप पाटी में है, ऊ बोल रहा था कि किसी को हराने, अलोकप्रिय करने या अप्रभावी करने का बहुत सा रास्ता है। ऐसा कि करे एक और दुसरा समझता रहे कि उसका नुक्सान किसी तीसरे ने किया है.... ! आक्रांत जब तक समझे कि दुश्मन कउन है, तब तक खेला खत्म ! भइया जी उसका बात हमारे पल्ले नहीं पड़ा ! हमको कुच्छो समझे नहीं आया ! इसका का मतलब हो सकता है ?

मैं चुप रहा ! सोच रहा था निमाई राजनीति में बहुत आगे जाएगा। 

बुधवार, 13 मार्च 2024

अवमानना संविधान की

आज CAA के नियमों को लेकर जैसा बवाल मचा हुआ है, उसका मुख्य कारण उसके नियम नहीं हैं बल्कि हिन्दू विरोधी नेताओं की शंका है, जिसके तहत उन्हें लगता है कि गैर मुस्लिम लोगों को नागरिकता मिल जाने से उनका वोट बैंक कमजोर पड़ जाएगा ! उन्हें अपने मतलब के अंधकार में उन लाखों लोगों का दर्द नहीं दिखलाई पड़ता जो वर्षों-वर्ष से बिना किसी पहचान के निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हैं ! ये लोग सीधे-सीधे तो कह नहीं सकते तो उसी संविधान की आड़ ले कर इस कानून का विरोध कर रहे हैं जो उन्हें ऐसा करने का अधिकार ही नहीं देता ! पर वे ऐसा अभी भी आम जनता को बौड़म समझने वाली सोच की तहत किए जा रहे हैं..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक होता है संविधान, जिसके अनुसार देश चलता है ! एक होता है न्यायालय, जिस पर देश की कानून व न्याय व्यवस्था की जिम्मेवारी होती है। न्यायालय का शिखर है सर्वोच्च न्यायालय ! यही सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक होता है ! अब देखने की बात यह है कि जब न्यायालयों के संचालकों, महामहिमों की बात की जरा सी अवहेलना पर किसी पर भी मानहानि का मुकदमा चल सकता है तो उनके संरक्षण में रहने वाले संविधान, के विरुद्ध आचरण करने वालों पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की जाती ! क्यों उसका मजाक बनाया जाता है ? उसकी गलत आड़ लेकर अपना मतलब सिद्ध करने वालों को कोर्ट क्यों नहीं तुरंत बेनकाब करता ? जबकि संविधान सर्वोपरि है, गुरुग्रंथ है, उसकी कसमें खाई जाती हैं !

ज्यादातर राजनीति करने वालों का मुख्य लक्ष्य सत्ता हासिल करने का ही होता है ! उसके लिए वे किसी भी हथकंडे को काम में लाने में नहीं हिचकते ! इसमें कोई भी दल दूध का धुला नहीं होता ! वर्षों से मौकापरस्त, सत्ता पिपासु लोग समयानुसार संविधान की दुहाई दे कर जनता को गुमराह करते रहे हैं ! जबकि जनता ज्यादातर अनपढ़ होती थी ! आज भी अनपढ़ को तो छोड़िए, लाखों पढ़े-लिखे लोगों को भी संविधान के "स'' का पता नहीं है ! पर अब जिस तरह से देश में जागरूकता दस्तक दे रही है,  हर तरफ बदलाव दिख रहा है, खासकर शिक्षा के क्षेत्र में ! बच्चे भी पहले से ज्यादा समझदार और जानकार हो गए हैं, तो अब होना यह चाहिए कि संविधान की मुख्य बातें स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दी जाएं ! जिससे वे जब बड़े हो कर जिम्मेदार नागरिक बनें तो कोई भी ऐरा-गैरा उन्हें बेवकूफ ना बना सके ! हालांकि अभी भी हमारी आँखों पर धर्म, जाति, भाषा, सम्प्रदाय की पट्टी बंधी हुई है। अभी भी चुनावों में यह मुख्य कारक होते हैं फिर भी कोशिश तो जारी रहनी ही चाहिए ! इसके लिए सबसे अहम है जागरूकता और उसके लिए जरुरी है शिक्षा और यही वह अस्त्र है जिसके द्वारा हर तरह की कुटिलता का नाश संभव हो सकता है। सत्य की सदा जय हो सकती है। 

आज नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के नियमों को लेकर जैसा बवाल मचा हुआ है, उसका मुख्य कारण उसके नियम नहीं हैं बल्कि हिन्दू विरोधी नेताओं की शंका है, जिसके तहत उन्हें लगता है कि गैर मुस्लिम लोगों को नागरिकता मिल जाने से उनका वोट बैंक कमजोर पड़ जाएगा ! उन्हें अपने मतलब के अंधकार में उन लाखों लोगों का दर्द नहीं दिखलाई पड़ता जो वर्षों-वर्ष से बिना किसी पहचान के निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हैं ! ये लोग सीधे-सीधे तो कह नहीं सकते तो उसी संविधान की आड़ ले कर इस कानून का विरोध कर रहे हैं जो उन्हें ऐसा करने का अधिकार ही नहीं देता ! पर वे ऐसा अभी भी आम जनता को बौड़म समझने वाली सोच की तहत किए जा रहे हैं ! विडंबना है कि वे उसी संविधान का गलत सहारा लेने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी शपथ ले वे सत्ता की कुर्सी पर काबिज हुए हैं ! 

जो भी दल सत्ता में होता है वह चुनावों में अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिए हर दांव चलता है, हर पैंतरा आजमाता है ! ऐसे में विरोधी दलों के नेता, जो खुद उसी खेल के खिलाड़ी हैं, ऐसे दांव-पेंच वे खुद भी बखूबी आजमाते रहते हैं, उनको अपनी अलग मजबूत रणनीति बना मुकाबला करना चाहिए नाकि सिर्फ सत्ता पक्ष को गरियाते हुए चिल्ल्पों मचा के अपना ही जुलुस निकलवाना चाहिए ! जनता तो इनका तमाशा देख ही रही है पर आश्चर्य है कि संविधान के संरक्षक क्यों चुप हैं.........!

बुधवार, 15 जुलाई 2020

जहां ना-लायक भी लायक सिद्ध हो जाते हैं

राजनीति हमारे देश में एक ऐसा व्यवसाय बन गई है, जहां ना-लायक को भी लायक सिद्ध कर उसका जीवन सुरक्षित और संवारा जा सकता है ! नैतिकता, मर्यादा, विवेकता, सहिष्णुता, गरिमा, आदर-भाव सब सिर्फ संविधान की पुस्तक के लिए छोड़ दिए गए हैं, ऐसे अनेकों उदहारण हैं ! इन सब से अवाम ने झटका तो खाया, पर दिलो-दिमाग पर वर्षों से काबिज सम्मोहन का कोहरा फिर भी पूरी तरह छंट नहीं पाया ! इसीलिए वह परिवारों के झूठे-सच्चे इतिहास, कुर्बानियों की कपोल कल्पित कथाओं, नेताओं के थोथे वादों और उनके छद्म प्रभामंडलों के आलोक में अपना भविष्य टटोलने में लगा ही रहा ! पर फिर साक्षरता से कुछ समझ, समझ से कुछ जागरूकता आई ! धर्म, जाति, भाषा, इतिहास के नाम पर बिछाए गए इंद्रजाल छिन्न-भिन्न हुए ! सच्चाई का सूरज तपा तो कुछ जर्जर छत्रप भी ढहे ! लोगों को भी समझ आया कि देश है तभी हम हैं, देश नहीं तो कुछ भी नहीं....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
एक वह भी समय था, जब अदना सा कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी के प्रति पूरी तरह समर्पित और अपने नेता के लिए निष्ठावान हुआ करता था। यह स्वस्फूर्त भावना होती थी। जो अपने नेता के त्याग, समर्पण, निस्वार्थ और सच्चरित्रता जैसे गुणों को देख स्वत: उत्पन्न होती थी। दल बदलने का तो सपने में भी ख्याल नहीं आ पाता था। आम जन को जब लगता था कि अमुक इंसान देश और समाज की भलाई के लिए कुछ भी कर सकता है तो वह उसका मुरीद हो जाता था। उसकी गलतियों, उसकी कमियों को नजरंदाज कर दिया जाता था। सारी जिम्मेवारी उसे सौंप निश्चिन्त हो लिया जाता था। पर कोई भी चीज स्थाई कहां होती है ! समय भी बदला, लोग भी बदले, तो सोच बदलनी ही थी !  

राजनीति हमारे देश में एक ऐसा व्यवसाय बन गया है, जहां ना-लायक को भी लायक बना उसका जीवन सुरक्षित और संवारा जा सकता है ! इसलिए सत्ता देश की भलाई के बदले परिवारों के उसरने का, पीढ़ियों को तारने का जरिया बन गई ! येन-केन-प्रकारेण उसे हथियाया जाने लगा। तरह-तरह के लोग नेता बन गए ! नैतिकता, मर्यादा, विवेकता, सहिष्णुता, गरिमा, आदर-भाव सब संविधान की पुस्तक के पन्नों में जा दुबके ! अवाम को झटका तो लगा पर वर्षों से दिलो दिमाग पर काबिज सम्मोहन पूरी तरह छंट नहीं पाया ! बार-बार हताशा, निराशा, धोखा पाने के बावजूद वह, परिवारों के झूठे-सच्चे इतिहास, कुर्बानियों की कपोल कल्पित कथाओं, नेताओं के थोथे वादों और उनके छद्म प्रभामंडलों के आलोक में अपना भविष्य टटोलने में लगी रही ! पर कब तक !     

समय के साथ पीढ़ीयां बदलीं। साक्षरता से समझ, समझ से जागरूकता आई ! लोगों को अपने भले-बुरे का ज्ञान होने लगा ! धर्म, जाति, भाषा, इतिहास के नाम पर रोटियां सेकने वालों के ढाबे बंद होने लगे ! कई-कई इंद्रजाल छिन्न-भिन्न हो गए ! अच्छाई का सूरज तपा तो जर्जर छत्रप ढहने शुरू हो गए ! लोगों को भी समझ आ गया कि देश है तो हम हैं, देश नहीं तो कुछ भी नहीं ! 

पर अभी भी सपूर्ण क्रान्ति नहीं हुई थी ! कुछ जरासीम समूल नष्ट नहीं हुए थे ! उनके थके-हारे, लुटे-पिटे, हाशिए पर धकेल दिए गए मठाधीश पूरा जोर लगा रहे हैं, अवाम को बरगलाने के लिए ! उधर वर्षों की राजशाही का खुमार उतारे नहीं उतर रहा ! अभी भी अवाम और अपने कार्यकर्ताओं को निजी सम्पत्ति ही माना जा रहा है। किसी का ज़रा सा भी विरोध या महत्वाकांक्षा उसको नेस्तनाबूद करवाने का जरिया बन गया है। धीरे-धीरे हर अच्छे-बुरे कर्मों के राजदार, खुर्राट, मौकापरस्त, मतलबी, अवसरवादी, उम्रदराज दरबारी हावी होते चले जा रहे हैं ! कर्मठ, समर्पित, निष्ठावान लोगों को अपमानित-प्रताड़ित कर बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा है ! क्योंकि ऐसे कर्मशील लोग ही आगे जा कर इन लोगों की असलियत का पर्दा फाश कर जनता के प्रिय बन सकते थे। इनके सरपरस्त भी इन जैसे खुदगर्जों, चारणों, पिछलग्गुओं की चारदीवारी में खुद को घिरवा अपने को सुरक्षित, पाक-साफ़ मान बैठे हैं ! हकीकत से दूर घेरे के अंदर वे वही देखते-सुनते हैं जो दिखलाया, सुनाया, समझाया जा रहा है ! जो कर्णप्रिय हो, सुहाता हो, मन लायक हो ! इतिहास गवाह है कि यह स्थिति सदा विनाश करवा कर ही हटी है।  

समय को अपना गुलाम समझ ऐसा करने वाले इस तरह के खुर्राट लोग यह भी जानते हैं कि यह सब ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है, सो अपनी आने वाली नसलों के लिए जितना लाभ उठाया जा सकता है उठाए जा रहे हैं ! पर यह भूल जाते हैं इनके पहले भी जब ऊपर वाले की लाठी पड़ी थी तो उसमें भी आवाज नहीं आई थी ! पर यदि कोई सबक लेना ही ना चाहे तो..............!! 

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कुछ तो विवेक होना ही चाहिए

समय बदलेगा तो हर जगह शुचिता आएगी ! तब शायद शासक को सही दिशा दिखाने के लिए ही विरोध हो ! देश के अवरोध के लिए नहीं ! विरोध हो गलत नीतियों का ! गलत फैसलों का ! गलत व्यक्ति का ! तब शायद सम्मानीय पद की प्रतिष्ठा बनी रहे ! देश की मर्यादा, उसकी गरिमा, उसकी अखंडता अक्षुण्ण रहे ! उस पर आक्षेप करने वाला दस बार सोच कर भी हिम्मत ना जुटा पाए कुछ अनर्गल बोलने की ! निरपेक्ष संस्थाओं को आदर मिले ! जवानों को भारत रत्न माना जाए ! शायद वह सुबह आ ही जाए.........!

#हिन्दी_ ब्लागिंग  
यदि मुझे जीवन में सफल होना है, अपना लक्ष्य प्राप्त करना है, अपने आप को साबित करना है, परंतु इसके साथ ही मुझे अपने पुराने कारनामे, हरकतें, करतूतों का कच्चा चिठ्ठा भी याद और मालूम हो; तो मैं यही कोशिश करूंगा कि वह मेरी और लोगों की यादों में ही दफ़न रहे। बचूंगा ऐसे कारगुजारियों से जिनसे मेरा विगत फिर लोगों के जेहन में सर उठा, मेरी परेशानी का सबब बने। पहचानूंगा और दूरी बना कर रखूंगा ऐसे लोगों से जो मेरे कंधों का इस्तेमाल कर अपना हित साधना चाहते हों ! नाहक दूसरों की बखिया उधेड़ने से पहले अपने खटिए के नीचे सोटी जरूर घुमा लूंगा। पर यह सब तो तभी संभव है जब प्रकृति-प्रदत मेरी समझदानी खाली ना हो ! मेरा विवेक मेरे साथ हो ! मुझे अच्छे-बुरे की पहचान हो ! मेरा मन द्वेष, ईर्ष्या, अहम, लालसा, कुंठा, पूर्वाग्रहों आदि व्याधियों से मुक्त हो !   
 
आज हो ठीक इसका उल्टा रहा है। लोगों ने अपने चारों ओर खुदगर्जों, चारणों, पिछलग्गुओं  की चारदीवारी घिरवा खुद को सुरक्षित, पाक-साफ़ मान लिया है। हकीकत से दूर घेरे के अंदर वे वही देखते-सुनते हैं जो दिखलाया, सुनाया, समझाया जा रहा है ! जो कर्णप्रिय हो, सुहाता हो, मन लायक हो ! उसी के अनुसार बिना परिणाम जाने ये लोग आकाश की तरफ मुंह उठा थूके जा रहे हैं ! कीचड़ में पत्थर मारे जा रहे हैं ! लियाकत नहीं, चेहरे-मोहरे, पहरावे, चाल-ढाल की बदौलत खुद को अपने पूर्वजों के समकक्ष लाने की व्यर्थ कोशिश कर मजाक के पात्र बने जा रहे हैं। पूर्वजों की उपलब्धियों को गिना कर खुद को महान कहलवाने की जुगत हो रही है। उपलब्धियां भी कैसी जो समय के साथ अब ''ब्लंडर्स'' सिद्ध होने लगी हैं। 

अब सीधी व सच्ची बात ! देश के तीन सर्वोच्च नेताओं की अकाल मृत्यु को सदा देश के लिए दी गई कुर्बानी के तौर पर प्रचारित कर भुनाया गया ! हालांकि हम सब उनकी बहुत इज्जत करते हैं। देश के लिए उनके योगदान को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता। पर ऐसा लगता है कि तीनों मौतें, अदूरदर्शिता, अति-आत्मविश्वास और दूसरों के आकलन में हुई भयंकर भूलों का परिणाम थीं। पर आखिर थे तो वे भी इंसान और इंसान से भूल होती ही है ! पर उसको अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अस्त्र बनाना कतई उचित नहीं है। हमारी प्रथा है कि दिवंगतों का सदा आदर ही किया जाता है ! उन के लिए ऐसा लिखना बिलकुल अच्छी बात नहीं है ! पर जब संबंधित जिम्मेदार लोग ही रोज खुद अपना ही तमाशा बनवाने पर उतारू हों तो ना चाहते हुए भी...............!    

पहला देहावसान, खुद को जगत्प्रिय, शांतिदूत, महान समझने की गलतफहमी और आत्मसम्मोहन का दुखद परिणाम था ! जो पड़ोसी की कुटिलता, उसकी दगाबाजी के सदमे और युद्ध में करारी हार के कारण आवाम के बीच अपनी छवि बुरी तरह ध्वस्त होने के कारण हुआ था ! दूसरा हादसा, व्याघ्र को पाल-पोस कर पनपाने और फिर उसको पालतू और वफादार समझने की भयंकर भूल का परिणाम रहा ! सारा देश पहली ऐसी घटना का साक्ष्य बन स्तब्ध रह शोकसागर में डूब गया था ! चेतावनी के बावजूद यहां भी अति-आत्मविश्वास जिंदगी के आड़े आ गया था। जिसकी प्रतिक्रिया को भुलाने में समय को भी समय लग जाएगा ! तीसरी बार खुद के प्रवासी देशवासियों की मुसीबतों को नजरंदाज कर पड़ोसी के घाव पर मरहम लगाने का प्रयास, वह भी विशेषज्ञों की सलाह के बगैर, जानलेवा सिद्ध हुआ।  

उस समय तक आपस में इतनी वितृष्णा नहीं हुआ करती थी ! हालांकि तीनों बार देश संकटग्रस्त हुआ, उस पर विपदा के बादल छाए और प्रगति थम सी गई। आम इंसान सच में दुखी हुआ ! सभी को लगा जैसे गमी उसके घर में ही हुई हो ! पर इसको भी सदा के लिए ब्रह्मास्त्र बना के रख लिया गया। दल के ''रामु काकाओं' ने आवाम को भरमा, इन हादसों को गर्व का विषय बनाने में कोई कसर ना छोड़ रखी। कसर तो तब भी नहीं छूटी थी, जब इस दल की नेता ने, दस पार्टियों की सहायता से बन रही सरकार को ना संभाल पाने का ख़तरा भांप, सर्वोच्च पद स्वीकार नहीं किया था और उसे चमचों ने त्याग का चोला पहना एक अलग छवि गढ़ने की नाकाम कोशिश कर दी थी ! 

आजादी  के बाद से अब तक दुनियावी मंच पर नौ रसों, चारों विधियों, सोलह कलाओं सहित ऐसा और कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसमें इन्हें विशेषता हासिल ना हो ! तब से आज तक ऐसा कुछ भी नहीं घट पाया, जिसमें अपना मतलब ना सिद्ध कर लिया गया हो ! देश में घटी हर आडी-टेढ़ी बात में इनकी मौजूदगी दर्ज है। पर वह सब भूल, यह समझने की गलतफहमी पाल, कि किसी को सच्चाई का क्या पता ! अपने आप को अभी भी सामयिक या देश की जरुरत बताने के लिए, बिना किसी संकोच के, कुछ भी बोल दिया जाता है चाहे वह निरा झूठ ही क्यों ना हो ! आज बढ़ते वैमनस्य, घटती सहिष्णुता और व्यक्ति पूजन के कारण छुटभैय्यों तक को बोलने की खुली छूट दे दी गई है ! आज चुप रहना अपनी हेठी और बोलना शेखी समझा जाने लगा है ! अब विषय, समय या स्थान नहीं देखा जाता ! अब बोलना मुख्य उद्देश्य हो गया है ! कभी भी, कहीं भी, कुछ भी बोलो ! झूठ बोलो ! बार-बार बोलो ! पर दृढ़ता के साथ बोलो ! विश्वास करने वाले हजारों मिल जाएंगे ! क्योंकि आवाम यह नहीं देखती कि क्या बोला जा रहा है, वह यह देखती है कि कौन बोल रहा है !    

आज हालांकि व्यक्तिगत हित, अपने स्वार्थ, अपनी महत्वकांक्षाओं के सामने सब कुछ....सब कुछ गौण  हो गया है, पर कहते हैं ना, कि कोई भी चीज स्थाई नहीं होती ! हर चीज का अंत होता है ! इतिहास अपने को दोहराता है ! अच्छा परिवेश, माहौल नहीं रहा, तो बुरा भी नहीं रहेगा ! समय बदलेगा तो हर जगह शुचिता आएगी ! तब शायद शासक को सही दिशा दिखाने के लिए ही विरोध हो ! देश के अवरोध के लिए नहीं ! विरोध हो गलत नीतियों का ! गलत फैसलों का ! गलत व्यक्ति का ! तब शायद सम्मानीय पद की प्रतिष्ठा बनी रहे ! देश की मर्यादा, उसकी गरिमा, उसकी अखंडता अक्षुण्ण रहे ! उस पर आक्षेप करने वाला दस बार सोच कर भी हिम्मत ना जुटा पाए कुछ अनर्गल बोलने की ! निरपेक्ष संस्थाओं को आदर मिले ! जवानों को सर्वोपरि व भारत रत्न माना जाए ! शायद वह सुबह आ ही जाए !

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अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...