बुधवार, 1 जुलाई 2020

कुछ तो विवेक होना ही चाहिए

समय बदलेगा तो हर जगह शुचिता आएगी ! तब शायद शासक को सही दिशा दिखाने के लिए ही विरोध हो ! देश के अवरोध के लिए नहीं ! विरोध हो गलत नीतियों का ! गलत फैसलों का ! गलत व्यक्ति का ! तब शायद सम्मानीय पद की प्रतिष्ठा बनी रहे ! देश की मर्यादा, उसकी गरिमा, उसकी अखंडता अक्षुण्ण रहे ! उस पर आक्षेप करने वाला दस बार सोच कर भी हिम्मत ना जुटा पाए कुछ अनर्गल बोलने की ! निरपेक्ष संस्थाओं को आदर मिले ! जवानों को भारत रत्न माना जाए ! शायद वह सुबह आ ही जाए.........!

#हिन्दी_ ब्लागिंग  
यदि मुझे जीवन में सफल होना है, अपना लक्ष्य प्राप्त करना है, अपने आप को साबित करना है, परंतु इसके साथ ही मुझे अपने पुराने कारनामे, हरकतें, करतूतों का कच्चा चिठ्ठा भी याद और मालूम हो; तो मैं यही कोशिश करूंगा कि वह मेरी और लोगों की यादों में ही दफ़न रहे। बचूंगा ऐसे कारगुजारियों से जिनसे मेरा विगत फिर लोगों के जेहन में सर उठा, मेरी परेशानी का सबब बने। पहचानूंगा और दूरी बना कर रखूंगा ऐसे लोगों से जो मेरे कंधों का इस्तेमाल कर अपना हित साधना चाहते हों ! नाहक दूसरों की बखिया उधेड़ने से पहले अपने खटिए के नीचे सोटी जरूर घुमा लूंगा। पर यह सब तो तभी संभव है जब प्रकृति-प्रदत मेरी समझदानी खाली ना हो ! मेरा विवेक मेरे साथ हो ! मुझे अच्छे-बुरे की पहचान हो ! मेरा मन द्वेष, ईर्ष्या, अहम, लालसा, कुंठा, पूर्वाग्रहों आदि व्याधियों से मुक्त हो !   
 
आज हो ठीक इसका उल्टा रहा है। लोगों ने अपने चारों ओर खुदगर्जों, चारणों, पिछलग्गुओं  की चारदीवारी घिरवा खुद को सुरक्षित, पाक-साफ़ मान लिया है। हकीकत से दूर घेरे के अंदर वे वही देखते-सुनते हैं जो दिखलाया, सुनाया, समझाया जा रहा है ! जो कर्णप्रिय हो, सुहाता हो, मन लायक हो ! उसी के अनुसार बिना परिणाम जाने ये लोग आकाश की तरफ मुंह उठा थूके जा रहे हैं ! कीचड़ में पत्थर मारे जा रहे हैं ! लियाकत नहीं, चेहरे-मोहरे, पहरावे, चाल-ढाल की बदौलत खुद को अपने पूर्वजों के समकक्ष लाने की व्यर्थ कोशिश कर मजाक के पात्र बने जा रहे हैं। पूर्वजों की उपलब्धियों को गिना कर खुद को महान कहलवाने की जुगत हो रही है। उपलब्धियां भी कैसी जो समय के साथ अब ''ब्लंडर्स'' सिद्ध होने लगी हैं। 

अब सीधी व सच्ची बात ! देश के तीन सर्वोच्च नेताओं की अकाल मृत्यु को सदा देश के लिए दी गई कुर्बानी के तौर पर प्रचारित कर भुनाया गया ! हालांकि हम सब उनकी बहुत इज्जत करते हैं। देश के लिए उनके योगदान को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता। पर ऐसा लगता है कि तीनों मौतें, अदूरदर्शिता, अति-आत्मविश्वास और दूसरों के आकलन में हुई भयंकर भूलों का परिणाम थीं। पर आखिर थे तो वे भी इंसान और इंसान से भूल होती ही है ! पर उसको अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अस्त्र बनाना कतई उचित नहीं है। हमारी प्रथा है कि दिवंगतों का सदा आदर ही किया जाता है ! उन के लिए ऐसा लिखना बिलकुल अच्छी बात नहीं है ! पर जब संबंधित जिम्मेदार लोग ही रोज खुद अपना ही तमाशा बनवाने पर उतारू हों तो ना चाहते हुए भी...............!    

पहला देहावसान, खुद को जगत्प्रिय, शांतिदूत, महान समझने की गलतफहमी और आत्मसम्मोहन का दुखद परिणाम था ! जो पड़ोसी की कुटिलता, उसकी दगाबाजी के सदमे और युद्ध में करारी हार के कारण आवाम के बीच अपनी छवि बुरी तरह ध्वस्त होने के कारण हुआ था ! दूसरा हादसा, व्याघ्र को पाल-पोस कर पनपाने और फिर उसको पालतू और वफादार समझने की भयंकर भूल का परिणाम रहा ! सारा देश पहली ऐसी घटना का साक्ष्य बन स्तब्ध रह शोकसागर में डूब गया था ! चेतावनी के बावजूद यहां भी अति-आत्मविश्वास जिंदगी के आड़े आ गया था। जिसकी प्रतिक्रिया को भुलाने में समय को भी समय लग जाएगा ! तीसरी बार खुद के प्रवासी देशवासियों की मुसीबतों को नजरंदाज कर पड़ोसी के घाव पर मरहम लगाने का प्रयास, वह भी विशेषज्ञों की सलाह के बगैर, जानलेवा सिद्ध हुआ।  

उस समय तक आपस में इतनी वितृष्णा नहीं हुआ करती थी ! हालांकि तीनों बार देश संकटग्रस्त हुआ, उस पर विपदा के बादल छाए और प्रगति थम सी गई। आम इंसान सच में दुखी हुआ ! सभी को लगा जैसे गमी उसके घर में ही हुई हो ! पर इसको भी सदा के लिए ब्रह्मास्त्र बना के रख लिया गया। दल के ''रामु काकाओं' ने आवाम को भरमा, इन हादसों को गर्व का विषय बनाने में कोई कसर ना छोड़ रखी। कसर तो तब भी नहीं छूटी थी, जब इस दल की नेता ने, दस पार्टियों की सहायता से बन रही सरकार को ना संभाल पाने का ख़तरा भांप, सर्वोच्च पद स्वीकार नहीं किया था और उसे चमचों ने त्याग का चोला पहना एक अलग छवि गढ़ने की नाकाम कोशिश कर दी थी ! 

आजादी  के बाद से अब तक दुनियावी मंच पर नौ रसों, चारों विधियों, सोलह कलाओं सहित ऐसा और कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसमें इन्हें विशेषता हासिल ना हो ! तब से आज तक ऐसा कुछ भी नहीं घट पाया, जिसमें अपना मतलब ना सिद्ध कर लिया गया हो ! देश में घटी हर आडी-टेढ़ी बात में इनकी मौजूदगी दर्ज है। पर वह सब भूल, यह समझने की गलतफहमी पाल, कि किसी को सच्चाई का क्या पता ! अपने आप को अभी भी सामयिक या देश की जरुरत बताने के लिए, बिना किसी संकोच के, कुछ भी बोल दिया जाता है चाहे वह निरा झूठ ही क्यों ना हो ! आज बढ़ते वैमनस्य, घटती सहिष्णुता और व्यक्ति पूजन के कारण छुटभैय्यों तक को बोलने की खुली छूट दे दी गई है ! आज चुप रहना अपनी हेठी और बोलना शेखी समझा जाने लगा है ! अब विषय, समय या स्थान नहीं देखा जाता ! अब बोलना मुख्य उद्देश्य हो गया है ! कभी भी, कहीं भी, कुछ भी बोलो ! झूठ बोलो ! बार-बार बोलो ! पर दृढ़ता के साथ बोलो ! विश्वास करने वाले हजारों मिल जाएंगे ! क्योंकि आवाम यह नहीं देखती कि क्या बोला जा रहा है, वह यह देखती है कि कौन बोल रहा है !    

आज हालांकि व्यक्तिगत हित, अपने स्वार्थ, अपनी महत्वकांक्षाओं के सामने सब कुछ....सब कुछ गौण  हो गया है, पर कहते हैं ना, कि कोई भी चीज स्थाई नहीं होती ! हर चीज का अंत होता है ! इतिहास अपने को दोहराता है ! अच्छा परिवेश, माहौल नहीं रहा, तो बुरा भी नहीं रहेगा ! समय बदलेगा तो हर जगह शुचिता आएगी ! तब शायद शासक को सही दिशा दिखाने के लिए ही विरोध हो ! देश के अवरोध के लिए नहीं ! विरोध हो गलत नीतियों का ! गलत फैसलों का ! गलत व्यक्ति का ! तब शायद सम्मानीय पद की प्रतिष्ठा बनी रहे ! देश की मर्यादा, उसकी गरिमा, उसकी अखंडता अक्षुण्ण रहे ! उस पर आक्षेप करने वाला दस बार सोच कर भी हिम्मत ना जुटा पाए कुछ अनर्गल बोलने की ! निरपेक्ष संस्थाओं को आदर मिले ! जवानों को सर्वोपरि व भारत रत्न माना जाए ! शायद वह सुबह आ ही जाए !

8 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 01 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

यशोदा जी
सम्मान देने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

समय परिवर्तनशील है।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी
हम लोगों के देखते-देखते ही कितना कुछ बदल गया है

सदा ने कहा…

बेहद सशक्त और सटीक लिखा आपने

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

@सदा
स्वागत है¡पर बहुत दिनों बाद आना हुआ

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन एवं विचारणीय आलेख।। साधुवाद!!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

समीर जी
हार्दिक आभार¡बहुत दिनों बाद आना हुआ

विशिष्ट पोस्ट

गांव से माँ का आना

अधिकतर  संतान द्वारा बूढ़े माँ-बाप की बेकद्री, अवहेलना, बेइज्जती इत्यादि को मुद्दा बना कर कथाएं गढ़ी जाती रही हैं !  होते होंगे ऐसे नाशुक्रे ल...