pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: जीवन शैली
जीवन शैली लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जीवन शैली लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

सरकारी सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो क्यों ना खर्च भी उसी से वसूला जाए

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है तो उस पर होने वाला खर्च भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा...............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग     

है ना विडंबना ! देश के तकरीबन 21 हजार वीआईपी लोगों की सुरक्षा के लिए करीब 57 हजार जवान तैनात हैं। जबकि आम इंसान जो अपनी गाढ़ी कमाई के एक हिस्से से इन महानुभावों की रक्षा का खर्च उठाता है, उस जैसे साढ़े छह सौ से भी ज्यादा लोगों की देख-भाल की जिम्मेदारी के लिए सिर्फ एक पुलिस वाला उपलब्ध होता है !

रोजमर्रा की जिंदगी का दवाब, परिवार की परवरिश, दो जून की रोटी, बच्चों का भविष्य, बुजुर्गों की दवा-दारु, खुद की हारी-बिमारी के उधड़ते तानों-बानों को सरियाने में उलझा होने के बावजूद उस आम इंसान के मन में तब और भी क्षोभ और आश्चर्य उत्पन्न हो जाता है, जब वह ऐसे-वैसे, कैसे-कैसे इंसानों को सुरक्षा के घेरे में चलते देखता है ! उनमें से कई ऐसे होते हैं जिनसे दूसरों को सुरक्षा की जरुरत होती है ! कुछ ऐसे धनाढ्य होते हैं, जिनके पालतू पशु भी इंसानों से बेहतर जिंदगी जीते हैं ! उनके कारवां को गुजरते देख यह भला आदमी किनारे खड़ा सोचता है कि इनको किससे सुरक्षा चाहिए और क्यूँ  ! और चाहिए तो सक्षम होते हुए भी अपने को सुरक्षित रखने का उपाय खुद ही क्यों नहीं करते ! देश पर, समाज पर, सरकार पर क्यों बोझ बने हुए हैं ! और फिर सरकार ही, जो इन्हें सुरक्षा मुहैय्या करवाती है, वह इनसे इन्हें सुरक्षित रखने की कीमत क्यों नहीं वसूल करती ! यह सही है कि देश हित में जुटे लोगों को सही मायने में सुरक्षा की जरुरत होती है ! उन्हें मिलनी भी चाहिए ! वैसे समर्पित लोगों लिए तो पूरा देश अपना सब कुछ समर्पण कर सकता है। पर किसी को भी, कभी भी, किसी भी बात पर सुरक्षा दे देना तो हर किसी को नागवार गुजरता है और गुजरना चाहिए भी !  

                         ********************************************************************** 

आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है

                         ************************************************************************ 

हालांकि सुरक्षा किसे दी जाए या किसे मिलनी चाहिए, इसके लिए केंद्र और राज्यो में कमेटियां बनाई गई हैं, पर वहां भी रसूख और राजनीति की गहरी दखलंदाजी पैठी हुई है। वैसे ही हमारे देश में पुलिस बल बहुत कम है और ऐसे कामों से संख्या में और क़तर-ब्योंत हो जाती है ! जरुरी  कामों और जगहों में पुलिस बल की कमी आम आदमी द्वारा भी वर्षों से महसूस की जाती रही है ! ऐसे में किसी को भी सुरक्षा प्रदान कर देने वाली ख़बरें सवाल खड़े करने लगी हैं। 

करीब तीन साल पहले संसद में वीआईपी की परिभाषा पूछे जाने पर तात्कालिक गृहराज्य मंत्री ने जवाब दिया था कि ऐसी कोई आधिकारिक नामावली नहीं है। इसके बावजूद इस गरीब देश में वीआईपी संस्कृति या कहिए ख़ास लोग और उनका दबदबा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उसी हिसाब से उनकी सुरक्षा भी बढ़ रही है। धीरे-धीरे यह सुरक्षा कम, स्टेटस सिम्बल यानी प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता चला जाने लगा है ! इसीलिए इस सुविधा के हटाए जाने पर बवाल भी मचने लगे हैं ! जिन जवानों ने देश के हित, सेवा और सुरक्षा की चाह में अपना खून-पसीना एक कर, कठोर प्रशिक्षण और हाड़-तोड़ मेहनत के बल पर जो लियाकत और उपलब्धि हासिल की, पता नहीं उनके दिलों पर क्या बीतती होगी जब वे अपना समय किसी की कार का दरवाजा खोलने और उनका सामान उठा उनके पीछे चलने में जाया होता देखते होंगे। वह भी तब जब उस आदमी की हकीकत भी उन्हें मालुम हो ! 

आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है। 

मारे देश में किसी को सुरक्षा प्रदान करने की पांच श्रेणियां हैं। सबसे ऊँची श्रेणी SPG है। फिर Z+ की श्रेणी आती है। उसके बाद Z, फिर Y, और फिर X कैटेगरी का नंबर आता है। इन्हें खुफिया विभाग की सूचना और सलाह पर गृह मंत्रालय द्वारा मुहैय्या करवाया जाता है। इसकी समय-समय पर सुरक्षा समीक्षा भी की जाती है। अलग-अलग श्रेणी के हिसाब से इनमें जवानों की संख्‍या तय होती है। खतरे का आकलन कर इन श्रेणियों को पाने वाले लोगों में राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद, वर्तमान और पूर्व जज, वर्तमान और सेवा निवृत सरकारी अफसर, व्यापारी, खिलाड़ी, फ़िल्मी कलाकार और धार्मिक गुरु, कोई भी हो सकता है।  

SPG, स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप, यह सर्वोच्च सुरक्षा श्रेणी है। इसमें पैरामिलिट्री फ़ोर्स के जवान होते हैं। फिलहाल यह सुरक्षा अभी सिर्फ प्रधान मंत्री को ही उपलब्ध है। इसकी रोज की लागत लगभग डेढ़ करोड़ रूपए से भी ऊपर आती है। परन्तु यदि इसकी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा पर की जाने वाली राशि से की जाए तो यह राशि उसके आस-पास भी नहीं पहुंचती, जो तकरीबन 36.5 करोड़ डॉलर यानी करीब 2500 करोड़ रूपए, रोज की है।

Z+, इस श्रेणी में 10 एनएसजी कमांडो सहित 36 जवान होते हैं। इसके अलावा पुलिस ऑफिसर भी सुरक्षा व्यवस्था में शामिल होते हैं। परंतु पहला सुरक्षा घेरा एनएसजी कमांडो ही बनाते हैं। ये जवान मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित होते है और बिना किसी हथियार के भी दुश्मन से लड़ने में सक्षम होते हैं। यह सुरक्षा वीवीआईपी को उपलब्ध करवाई जाती है। परन्तु जब वह व्यक्ति राज्य से बाहर जाता है तो कुछ ही जवान उसके साथ रहते हैं, बाकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उस राज्य की होती है, जहाँ वह व्यक्ति जा रहा होता है। इसके लिए दौरे की पूर्व सूचना राज्य को देनी होती है। इसका खर्च करीब एक करोड़ रूपए प्रति माह प्रति व्यक्ति का है !

Z, इसमें 22 जवान, स्थानीय पुलिस के कुछ लोग चार-पांच कमांडो होते हैं। इस पर हर माह करीब 20 लाख रूपए प्रति व्यक्ति खर्च होते हैं। 

Y, इस श्रेणी में 11 जवान, स्वचालित हथियारों के साथ निजी सुरक्षा कर्मी, आवास पर पांच गार्ड के अलावा एक एस्कॉर्ट वाहन भी उपलब्ध करवाया जाता है। इन सब पर प्रति व्यक्ति करीब 12 लाख रूपए प्रति माह का खर्च आता है।  

X, इस कैटेगरी में दो सुरक्षा कर्मी और एक पीएसओ उपलब्ध करवाया जाता है। इसमें कोई कमांडो नहीं होता। ऐसी व्यवस्था पर  प्रति माह करीब डेढ़ लाख रूपए खर्च होते हैं।  

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो उस पर होने वाला खर्च  भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदहारण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा।   

सोमवार, 14 सितंबर 2020

कोरोना ने समझाया परिवार का महत्व

एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 10-15 साल पहले से, अमेरिकन लोगों की सोच में बदलाव और संयुक्त परिवार की ओर रुझान  शुरू हो गया था। जो इस कोरोना संकट की घडी में और पुख्ता हुआ और लोगों ने पुरानी जीवन शैली व रहन-सहन को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। अब तो यह भी सामने आने लगा है कि वहां ऐसे परिवार बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके पीढ़ियों से आपसी संबंध अटूट रहे हों। लोग उनसे जुड़ने, उनसे संबंध बनाने में गौरव महसूस करने लगे हैं। उसके उलट, उनकी हर बात का अनुसरण कर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने की चेष्टा करने वाले हम, जिनका सदियों से संयुक्त परिवारों में रहने का चलन रहा है, इतिहास रहा है, आज अपनी छांवनी अलग डाल, खुद को स्वतंत्र मान -दिखा अत्याधुनिक होने का भ्रम पाले बैठे हैं......................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

जगत में घटने वाली हर बात में अच्छाई और बुराई, दोनों ही निहित रहती हैं। अब जैसे इस कोरोना आपदा को ही लें जो मानवमात्र के अस्तित्व के लिए अभूतपूर्व संकट के रूप में जाना जाता तो रहेगा, परंतु इसके भी कुछ परोक्ष और अपरोक्ष फायदे तो मिले ही हैं। जैसे जल-थल-वायु का साफ़ होना ! पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार ! इंसान का संयमित होना ! कम संसाधन वाले देशों के प्रति सक्षम देशों का मैत्रीपूर्ण व्यवहार इत्यादि ! परन्तु सबसे बड़ी बात है कि इसी बीच इंसानों की सोच-आचार-व्यवहार में भी बदलाव दिखाई पड़ने लगा है। अमेरिका की, जिसके तौर-तरीके और जीवन शैली अपनाने के लिए हम लालायित रहते हैं, खबर है कि वहां के लोग अब अपने माता-पिता या अभिवाककों के पास जा कर रहने लगे हैं। एकल के बनिस्पत संयुक्त परिवारों में रहना लोग पसंद करने लगे हैं। उनको समझ में आ गया है कि उसकी सुरक्षा, प्रेम, अपनापन अन्यत्र हासिल नहीं हो सकता। बच्चों को बेहतर, नेक और भला इंसान बनाने में भी संयुक्त परिवार और उसके बुजुर्ग सदस्यों का बहुत बड़ा योगदान रहता है। 

कोरोना के कारण लागू लॉकडाउन के तहत भागती-दौड़ती ज़िंदगी में अचानक आए ठहराव, बीमार होने के डर, अकेलेपन के तनाव ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। इससे उत्पन्न चिंता, डर, अकेलेपन और अनिश्चितता के माहौल से दिन-रात जूझते लोगो को परिवार की याद सताने लगी ! उन युवाओं के अलावा, जो किसी भी तरह की खलल से दूर रह कर अपनी जिंदगी जीना चाहते थे ! वे दम्पत्ति जो पहले अपनी स्वतंत्र्ता में किसी की टोका-टाकी ना चाहते हुए अकेले रहना चाहते थे, या जो किसी भी कारणवश सिर्फ अपने लिए जीने का ख्वाब पाले बैठे थे ! ऐसे लोगों को इस विपदा ने परिवार की अहमियत समझा दी। वे अब अपने माँ-बाप, यहां तक की बुजुर्ग दादा-दादी के पास जा कर रहने में सकून पाने लगे हैं ! एक मोटे अनुमान के अनुसार इस साल के मार्च से मई तक के समय में करीब 29 से 30 लाख लोगों ने संयुक्त परिवार  को फिर से अपना लिया है। ये रुझान दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। इसमें पढ़ाई करने वाले युवाओं की संख्या शामिल नहीं है जो मजबूरी में परिवार से दूर रह रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो संयुक्त परिवार का माहौल उन्हें फिर मुआफ़िक लगने लगा है।  

वैसे यह बदलाव कोरोना संकट के पहले से ही आकार लेने लगा था। एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 10-15 साल पहले से, अमेरिकन लोगों की सोच में बदलाव और संयुक्त परिवार की ओर रुझान शुरू हो गया था। जो इस संकट की घडी में और पुख्ता हुआ और लोगों ने पुरानी जीवन शैली व रहन-सहन को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। अब तो यह भी सामने आने लगा है कि वहां ऐसे परिवार बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके पीढ़ियों से आपसी संबंध अटूट रहे हों। लोग उनसे जुड़ने, उनसे संबंध बनाने में गौरव महसूस करने लगे हैं।उसके उलट, उनकी हर बात का अनुसरण कर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने की चेष्टा करने वाले हम, जिनका सदियों से संयुक्त परिवारों में रहने का चलन रहा है, इतिहास रहा है, आज अपनी छांवनी अलग डाल, खुद को स्वतंत्र मान-दिखा अत्याधुनिक होने का भ्रम पाले बैठे हैं। 

हमारी इस मनोवृत्ति की आंच को हवा दे, अपनी रोटी सेकने में बाजार भी पीछे नहीं रह रहा ! आए दिन ऐसे विज्ञापन परदे पर दिखाई देते रहते हैं जो ढके-छिपे, द्विअर्थी शब्दों के जाल फैला, एकल परिवार की वकालत करने से बाज नहीं आते ! जितना लोग अलग और अकेले रहेंगे, उतनी ही इनकी खपत बढ़ेगी ! इन पर ध्यान और लगाम कसना जरुरी है ! पर हमारा चलन है कि जब तक पानी सर से ऊपर नहीं हो जाता तब तक हम और हमारी सरकार नशे में गाफिल ही रहते हैं। कुछ दिनों पहले एक बैंक भी ऐसा ही कुछ एकल परिवार के फायदों के बारे में समझा रहा था ! आजकल एक बाहरी कंपनी Disney+hotstar  का विज्ञापन आ रहा है। जिसमें पता नहीं किस मध्यम वर्गीय परिवार की अजीबोगरीब तस्वीर दिखा कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! #सरकार_तक_बात_पहुंचाने_की_कोशिश_के_बावजूद_धड़ल्ले_से_यह_विज्ञापन_प्रसारित_हो_रहा_है। 

विडंबना ही तो है कि दुनिया में परिवार एकजुट होने की ओर तत्पर हैं और हम टूटन में अच्छाई खोज रहे हैं !

@संदर्भ, दैनिक भास्कर 

शनिवार, 5 सितंबर 2020

बहुत हो गया परिवार

आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी  नकेल विदेशी  हाथों में है,  ऐसे ही ऊल - जलूल,  तर्कहीन, अतिरेक  से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन O.T.T. का शुरू हो गया है,  जिस पर किसी का  भी नियंत्रण नहीं है और  कुछ  भी दिखाने की आजादी है !  जिसके फलस्वरूप  मौकापरस्त  अपने लाभ  के लिए  कुछ  भी बना  कर यहां रिलीज  कर छोटे - छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आजकल टीवी पर  Disney+hotstar  का एक विज्ञापन आ रहा है।  जिसमें पता नहीं कैसी-कैसी  कल्पना कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! विज्ञापन के  अनुसार अगर आप परिवार में रह कर क्रिकेट का मैच देखेंगे तो घर के सदस्यों की भदेस हरकतों और गतिविधियों (अतिरेक) की वजह से बेहाल हो जाएंगे ! यदि अकेले देखेंगे तो सुकून से सब कुछ देख पाएंगे ! विज्ञापन दाताओं ने  बड़ी चालाकी और कुटिलता से क्रिकेट के खेल की लोकप्रियता को  भुनाते हुए उसके कंधे  पर रख दो निशानों पर गोली चलाई है !  पहला अभीष्ट तो अपने सीरियल वगैरह के लिए भीड़ जुटाना है ! दूसरा परिवार का विघटन करना !  जिससे काम  से लौटे इंसान को मनोरंजन के लिए उन्हीं पर निर्भर रहना पड़े बजाए, परिवार के ''झमेलों'' के ! 

आज जब पहले ही पारिवारिक मूल्य तार-तार हो रहे हों ! देश में परिवारों का विघटन हो रहा हो ! एकल परिवारों का ''फैशन'' जोर पकड़ रहा हो ! रिश्ते-नाते सब ताक पर धरे जा रहे हों ! बच्चों को बुआ-फूफा, मौसा-मौसी, काका-ताऊ जैसे शब्द अजूबा लगने लगे हों ! छोटे-छोटे शहरों में वृद्धाश्रमो की बाढ़ सी आ गई हो ! शादी-ब्याह जैसी रस्मों को भूल युवा, यूज एंड थ्रो जैसी सुगम पर अनैतिक लीव इन रिलेशन जैसा चलन अपना रहे हों ! तब इस तरह के विज्ञापन तो उत्प्रेरक का ही काम करेंगें ! सबसे नागवार बात तो यह है कि विदेशी आका और उसकी स्थानीय कठपुतलियों ने पता नहीं किस घर की तस्वीर पेश की है ! क्या भारत के मध्यम वर्ग के घर ऐसे होते हैं ! 

आज बाहरी शक्तियां अपने स्वार्थ के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही हैं, देश में अस्थिरता लाने की ! यह विज्ञापन भी उन्हीं के षड्यंत्र का एक हिस्सा लगता है ! पहले इंसान फिर समाज, फिर उसकी आस्था-मान्यता-रीति-रिवाज को तोड़ो, अस्थिरता अपने आप आ जाएगी ! आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी नकेल विदेशी हाथों में है, ऐसे ही ऊल-जलूल, तर्कहीन, अतिरेक से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन OTT का शुरू हो गया है, जिस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है और कुछ भी दिखाने की आजादी है ! जिसके फलस्वरूप मौकापरस्त अपने लाभ के लिए कुछ भी बना कर यहां रिलीज कर छोटे-छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे !

आशा तो यही है कि #सरकार, #सूचना_तथा_संचार_मंत्रालय इस तरफ ध्यान देंगें और इस तरह के, अवाम, समाज, देशहित विरोधी चलन पर सख्ती से रोक लगाएंगे। 

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

हमीं ने दर्द दिया, हमें ही दवा देनी है

कुछ वर्षों पहले तक बाजार में हर तरह का सामान तक़रीबन खुला मिलता था। चाहे घर के किराने का सामान हो, चाहे सब्जियां-फल वगैरह हों, बेकरी की चीजें हों या अन्य घरेलू जरुरत का सामान ! दूध और पानी की पैकिंग तो शायद ही कोई सोचता हो। आज साफ़-सफाई या शुद्धता का हवाला दे कर हर चीज को प्लास्टिक में लपेटा जाने लगा है। पहले लोग सामान वगैरह लाने के लिए थैला वगैरह ले कर ही घर से चलते थे ! उधर दुकानदार सामान देने के लिए कागज़ के ठोंगों या लिफाफों को काम में लाते थे। पर पॉलीथिन के चलन में आते ही वे सब बीते दिनों की बात हो गए। अब छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी चीज यहां तक कि झाड़ू-झाड़न जैसी  चीजें भी रैपर में लिपटी मिलने लगी हैं। बाजार ने हमें अच्छी तरह समझा दिया है कि सस्ती खुली मिलने वाली वस्तुएं हमारे और हमारे परिवार के लिए कितनी हानिकारक हैं ! अब साफ़-सफाई या शुद्धता का तो पता नहीं पर इस चलन से पलास्टिक या पॉलीथिन का कचरा बेलगाम-बेहिसाब बढ़ना ही था सो बढ़ता चला जा रहा है...................! 


#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ साल पहले तक हमारे कृषि प्रधान देश को भरपूर उपज, खुशहाली, समृद्धि व जलीय आपूर्ति के लिए जीवन दायिनी पावस ऋतु का बड़ी बेसब्री से इन्तजार रहा करता था। पर अब इसकी जरुरत तो है, इन्तजार भी रहता है, पर साथ ही इसकी भयावहता को देख-सुन-याद कर एक डर, एक खौफ भी बना रहता है। अब हर साल बरसात के साथ आने वाला जलप्लावन हमारी नियति ही बन गया है। पता ही नहीं चला कब यह जीवन दायिनी ऋतू, प्राण हरिणी के रूप में बदल गई ! ऐसा भी नहीं है कि यह सबअचानक हो गया हो ! कायनात वर्षों से हमें चेताती आ रही थी पर हम अपने लालच, अपनी महत्वकांक्षाओं, अपनी लिप्सा में अंधे हो उसका शोषण करने से बाज ही नहीं आ रहे थे। विकास की अंधी दौड़ में ऐसी-ऐसी चीजों का आविष्कार कर डाला गया जो प्रकृति को नुक्सान पहुंचाने में अव्वल थीं। इन्हीं चीजों में एक है प्लास्टिक ! जिससे सारा विश्व त्रस्त हो चुका है। दुनिया भर के सागर-नदी-तालाबों में टनों के हिसाब से इस ना गलने-सड़ने-नष्ट होने वाले दानव का जमावड़ा पृथ्वी के अस्तित्व के लिए भी ख़तरा बनता जा रहा है ! इस विश्वव्यापी संकट से हमारा देश भी अछूता नहीं है ! आज जगह-जगह जलभराव होने का यह एक प्रमुख कारण है। 


आज प्लास्टिक हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा है। हमारे जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां इसका दखल नहीं है ! इस बेहद लचीले और मजबूत पदार्थ ने हमें सुविधाएं तो बहुत दीं, पर अब अपनी सैंकड़ों खूबियों और उपयोगिताओं के नावजूद यह हमारी जिंदगी, हमारे वातावरण, हमारे पर्यावरण यहां तक की हमारी पृथ्वी के लिए भी विनाशकारी सिद्ध हो रहा है। इसमें भी इसका दोष उतना नहीं है जितनी हमारी इस पर निर्भर होते चले जाने की विवेकहीन, अदूरदर्शी निर्भरता ! सुबह टूथ ब्रश करने से लेकर रात बिस्तर पर सोने तक हम सैकड़ों तरह की प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं का, बिना उनका दुष्परिणाम जाने, उपयोग करते रहते हैं। इसीलिए घरों से निकलने वाले कचरे में साल-दर-साल प्लास्टिक की वस्तुओं की मात्रा बढ़ती जा रही है। जागरूकता की कमी के चलते इसके अंधाधुंध इस्तेमाल के बाद फेंक दिये जाने वाले प्लास्टिक के रैपर, बोतलें, पॉलीबैग्स, पैकेट्स, डिब्बे और ना जाने कौन-कौन सी चीजों के कचरे से हमारी धरती, हवा, पानी, सागर, नदियां, तालाब सब कुछ प्रदूषित हो गए हैं। जिससे मानव तो मानव, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के जीवन को भी भयानक खतरे का सामना करना पड़ रहा है

**********************************************************************************************************

प्लास्टिक को लेकर बहुत गुल-गपाड़ा मचता रहता है ! पर जब हम सुबह टूथब्रश करने से लेकर रात बिस्तर पर सोने तक सैकड़ों तरह की प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं का, बिना उनका दुष्परिणाम जाने, उपयोग करते रहेंगें, बाजार से पॉलीथिन में लिपटी चीजें लेते रहेंगें तो इसकी खपत कम कैसे होगी ! इसीलिए घरों से  निकलने वाले कचरे में दिन-प्रति-दिन प्लास्टिक की वस्तुओं की मात्रा बढ़ती जा रही है

**********************************************************************************************************

कुछ वर्षों पहले तक बाजार में हर तरह का सामान तक़रीबन खुला मिलता था। चाहे घर के किराने का सामान हो, चाहे सब्जियां-फल वगैरह हों, बेकरी की चीजें हों या अन्य घरेलू जरुरत का सामान ! दूध और पानी की पैकिंग तो शायद ही कोई सोचता हो। आज साफ़-सफाई या शुद्धता का हवाला दे कर हर चीज को प्लास्टिक में लपेटा जाने लगा है। पहले लोग सामान वगैरह लाने के लिए थैला वगैरह ले कर ही घर से चलते थे ! उधर दुकानदार सामान देने के लिए कागज़ के ठोंगों या लिफाफों को काम में लाते थे। जो कुछ ही समय में अपने को प्रकृति के समरूप कर लेते थे। पर पॉलीथिन के चलन में आते ही वह सब बीते दिनों की बात हो गए। अब छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी रोजमर्रा की चीजों के साथ-साथ अनाज, फल, सब्जियां, बेकरी उत्पाद यहां तक कि झाड़ू-झाड़न जैसी चीजें भी रैपर में लिपटी आने लगी हैं। ड्राइक्लीन करने वाले भी अब कपड़ों को पॉलीथिन के लिफ़ाफ़े में रख देने लगे हैं। बाजार ने हमें अच्छी तरह समझा दिया है कि खुली मिलने वाली वस्तुएं हमारे और हमारे परिवार के लिए कितनी हानिकारक हैं !! बिना पैकिंग की चीज यानी घटिया स्तर की !! अब जब हर चीज को प्लास्टिक या पॉलीथिन में सजा कर पेश किया जाएगा तो उसका उपयोग तो बढ़ेगा ही ! जितना उपयोग बढ़ेगा उतनी मात्रा में उसका कचरा भी बढ़ना तय है। ध्यान इस ओर देने की भी आवश्यकता है ! सिर्फ रेहड़ी-ढेले वालों पर जोर डालने से तो यह संक्रमण रुकने से रहा !! 


आज इस भयानक समस्या की ओर सभी का ध्यान जरूर गया है पर हमारी लापरवाही, गैर जिम्मेदाराना हरकतों, जागरूकता की कमी और सिर्फ अपने परिवेश का ध्यान, इसका हल नहीं निकलने दे रहे ! आज भी, हमारा घर साफ़ रहे, बाहर का हमें क्या, वाली मानसिकता के तहत अधिकांश घरों से रसोई का कचरा पॉलीथिन में भर आसपास किसी खुले स्थान या सड़क किनारे फेंक देना आम बात है। रास्ते चलते खाली हुए नमकीन के पैकेट, पानी की बोतलें या छोटे-मोटे रैपर को इधर-उधर फेंक देना असभ्यता नहीं माना जाता ! किसी पार्क में या सैर-सपाटे के दौरान अल्पाहार का मजा ले उस जगह को साफ़ कर भी दिया तो उस कूड़े को पास की झाडी इत्यादि के हवाले कर अपने फर्ज की इतिश्री मान ली जाती है ! जबकि अधिकांश जगहों पर कूड़ा पेटी लगी रहती है पर उस तक जाना भी कई लोग गवारा नहीं करते ! ऐसे ही कचरे को जानवर इत्यादि पॉलीथिन समेत निगल रोग ग्रस्त हो जाते हैं ! कई तो अकाल मृत्यु को भी प्राप्त हो जाते हैं। यही लावारिस कचरा बरसात के दौरान पानी के साथ गलबहियां डाल नालियों और सीवर में पहुँच जाता है। फिर जो होता है, वह तो होना ही होता है। 

जब मुसीबत गले पड़ती है तब हमें यह ज़रा भी ध्यान नहीं आता कि इसका कारण कमो-बेस हम ही हैं ! हमारी लापरवाही हमारे शहर की साफ-सफाई में बाधा डाल, कर्मचारियों पर बोझ तो बढ़ाती ही है साथ ही पर्यावरण को हानि पहुंचाने में भी उसका योगदान कम नहीं होता। इधर बरसात हुई, उधर नाली-सीवर में कचरा फंसा। पानी का दम घुटा ! वह सांस लेने पलटा और बाहर आ कर हमारे साथ-साथ सारे नगर और नगरवासियों का हवा-पानी-खाना-सोना सब हराम कर दिया ! पर इंसान ठहरा इंसान ! उसको कहां अपनी भूल-गलतियों का एहसास रहता है ! वह तो सर झुकाए लग पड़ता है आन पड़ी विपदा से येन-केन पिंड छुड़ाने, उससे किसी तरह पार पाने की जुगत में ! क्योंकि वह एक तरह से मान चुका है कि ऐसा तो होता ही रहता है !

इधर ऐसा सुनहरा सुअवसर पा विपक्ष पिल पड़ता है सरकार पर ! निगम पर ! कर्मचारियों पर ! आरोप-प्रतिरोप का दौर शुरू ! आम आदमी की परेशानियों को दरकिनार कर बात जा पहुंचती है राजनीति के अखाड़े में ! वहां विपक्ष, यह भूल कि चंद दिनों पहले वह भी सत्ता सुख में लिप्त था, को मौका मिल जाता है दुसरों पर आरोपों की बौछार करने का ! वादों के सपने दिखाने का ! अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने का !  पर मूल समस्या से ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं की जाती ! उसे तकरीबन जस का तस रहने दिया जाता है कभी आगे आने वाले समय में सदुपयोग के लिए ! 

इसलिए और किसी पर भरोसा ना कर अवाम को खुद ही समझदार, जागरूक और विवेकशील होने की जरुरत है। हम सब को समझना होगा कि नगर, शहर, परिवेश को साफ रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। इधर -उधर, खाली जगहों में, सड़कों पर कचरा फेंकने के बजाय अगर सभी लोग डस्टबीन में कचरा डालने की आदत बना लें तो सफाई कर्मचारियों को भी अपने काम करने में आसानी होगी। हमें भी बेहतर सेवा मिल पाएगी। इसके साथ ही अब यह कोशिश भी होनी चाहिए कि पॉलीथिन के बजाए कपड़े या जूट के थैलों का इस्तेमाल किया जाए। ऐसा नहीं है कि इस समस्या से पार नहीं पाया जा सकता ! बस थोड़ी सी इच्छाशक्ति को मजबूत करने की जरुरत है। एक बार आदत पड़ गई तो फिर शहरों के आस-पास से कुतुबमीनार जितने ऊँचे कचरे के पहाड़ रूपी दानवों से मुक्ति मिलते देर नहीं लगेगी। 

बुधवार, 22 जुलाई 2020

व्यवसाय, डर व भय का

अलग-अलग समय या आयु में डर भी तरह-तरह का होता है। बचपन में शरारत, हठ या कहना ना मानने पर ''आने दो पापा को'' कह कर अनजाने में पहली बार रोपित किया गया ! किशोरावस्था में कुछ खो जाने, पिछड़ जाने, माँ-बाप से बिछुड़ने का या अवचेतन में दफ़न किसी बात का ! युवावस्था में अनिश्चितता का, रोज़गार का, परिवार की खुशहाली का, माँ-बाप की सेहत का, अंधविश्वासों का ! और फिर प्रौढ़ा या वृद्धावस्था में तो जैसे भय, खौफ, आशंकाओं की बाढ़ सी ही आ जाती है, जिसमें मृत्यु की अवधारणा सबसे बड़ा डर होता  है  ..................! 
 
#हिन्दी_ब्लागिंग       
डर ! एक भावना है। किसी संभावित खतरे की उपस्थिति या आभास की वजह से दिलो-दिमाग व शरीर पर भी असर डालने वाले ख्यालों या विचारों की श्रृंखला को डर कहा जा सकता है। जो अन्य भावनाओं की तरह जन्म के साथ प्राणियों को नहीं मिलती, उसका रोपण समय के साथ-साथ होता या करवाया जाता है ! जो जन्म भर किसी संभावित खतरे की आशंका के रूप में सभी प्राणियों में स्थाई रूप से दिलो-दिमाग में स्थापित हो जाता है और अधिकतर जीवन इस पर पार पाने में ही गुजर जाता है। इंसान डरता ही रहता है कभी अनहोनी से, कभी परिवार के अनिष्ट से, कभी आर्थिक संकट से पर मृत्यु की अवधारणा उसका सबसे बड़ा डर होता है।

इंसान को जब किसी चीज से जोखिम महसूस होता है तो डर की भावना बढ़ जाती है ! जोखिम की आशंका किसी भी रूप में हो सकती है, चाहे वह स्वास्थ्य हो, धन हो या अपनी या परिवार की सुरक्षा हो ! वैसे अलग-अलग समय या आयु में डर भी तरह-तरह का होता है। बचपन में शरारत, हठ या कहना ना मानने पर ''आने दो पापा को'' कह कर अनजाने में पहली बार रोपित किया गया ! किशोरावस्था में कुछ खो जाने, पिछड़ जाने, माँ-बाप से बिछुड़ने का या अवचेतन में दफ़न किसी बात का ! युवावस्था में अनिश्चितता का, रोज़गार का, परिवार की खुशहाली का, माँ-बाप की सेहत का, अंधविश्वासों का ! और फिर प्रौढ़ा या वृद्धावस्था में तो जैसे भय, खौफ, आशंकाओं की बाढ़ सी ही आ जाती है ! 

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा शूरवीर हो जो किसी भी चीज से ना डरता हो। पर ऐसे लोग बेशुमार हैं जो अपने डर को दरकिनार कर दूसरों की इस कमजोरी का भरपूर लाभ उठाते हैं। आज के समय में समाज के हर तबके में भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बना ऐसे लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं। बच्चों को फेल होने का भय दिखला, कोचिंग जैसे व्यापार में लगे ''गुरु'' ! मौत का डर दिखा अपनी जिंदगी संवारते ''डॉक्टर'' ! भगवान का, काल्पनिक सुख का या यंत्रणाओं का खौफ दिखा भोले-भाले लोगों को बरगलाते, धार्मिकता का चोला पहने, अपने को ऊपरवाले का प्रतिनिधि बताते ''ढोंगी'' ! मानव की कमजोरियों का फ़ायदा उठा उल्टे-सीधे-गैर जरुरी उत्पाद बेचते मौकापरस्त-अवसरवादी व्यापारी ! सभी तो लगे हुए हैं डरे हुओं को और डराने में ! मनुष्य की एक छोटी सी कमजोरी ''डर'' दुनिया में अरबों-खरबों का व्यवसाय बन चुकी है ! आम इंसान डर-डर के इतना डर गया है कि अपने को लूटने वालों की असलियत जानने में भी डरने लगा है ! उसके डर को भुना चंट लोग उसे ही डराने में लगे हुए हैं। डरना एक आम इंसान की फितरत बन चुकी है ! अभी तो राजनीती और न्याय व्यवस्था वाला डर अलग ही खड़ा हुआ है, उसकी तो बात ही नहीं की गई !

ज्यादातर किसी भय का कारण बीते समय में हुई किसी अप्रिय घटना का ही परिणाम होता है, इसी लिए बच्चों में इसका अभाव रहता है। पर डर सिर्फ अप्रिय या नकारात्मक भावना ही नहीं है। इसकी अच्छाई भी है। इसी के कारण व्यक्ति या अन्य प्राणी समय-समय पर अपनी रक्षा भी कर पाते हैं।इसीलिए जीवन के बहुमुखी विकास के लिए व्यक्तित्व में आटे में नमक बराबर डर का होना भी जरूरी है। पर समस्या तब शुरू हो जाती है जब इंसान बिना किसी वजह के डरने लगता है। तब उसकी इस कमजोरी से उसका सारा परिवेश ही प्रभावित हो जाता है। अति तो हर चीज की खराब ही होती है ! फिर चाहे वह आक्सीजन ही क्यूँ ना हो !

डर से छुटकारा पाने या बचने के उपाय तो अनुभवी चिकित्सक, योगगुरु या चिंतक बताते ही रहते हैं। उन्हीं में से किसी एक की सलाह मान अपने ''अतिरिक्त भय'' से छुटकारा पाया जा सकता है। पर सबसे अच्छा उपाय इससे भागना नहीं बल्कि सामना करना ही है। क्योंकि अधिकतर डर बेबुनियाद ही होते हैं। 

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

सब का अपना चेहरा है और अपनी नजर है ! सानूं की !!

इसी कड़ी में अगला नाम आता है, राहुल गांधी का  ! राजनीति को परे कर बात की जाए तो इनके मुख पर भी मासूमियत की छाप थी। अच्छा-खासा हसमुख चेहरा। आकर्षक व्यक्तित्व। उम्र की कलम भी कोई ख़ास असर नहीं डाल पा रही थी। कैमरे के सामने एक जिंदादिल व खुशगवार उपस्थिति दर्ज करवाने वाले इंसान ने अचानक पता नहीं किस ''हितैषी'' की सलाह पर अपने पर बदलाव का प्रयोग कर डाला। अजीब सा केश-विन्यास, ओढ़ी हुई सी गंभीरता, अलग सी पोषाक, उदास सा मुखमंडल, परिपक्वता कम अस्वस्थ होने का आभास ज्यादा देता है...........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
पुराने किस्से कहानियों में वर्णित ''गैजेट्स'', ''ट्रिक्स'', ''अजूबे'', ''कलाऐं'' जैसी रहस्यमयी, अज्ञान की चिलमन से ढकी हैरतंगेज बातों को विज्ञान ने काले परदे के पीछे से उठा-उठा कर सामने ला एक साधारण सी आम जानकारी बना कर रख दिया है। उसी विधाओं में एक है, भेष या रूप-रंग बदलना। आज की जुबान में इसे प्लास्टिक सर्जरी या मेकओवर कहा जा सकता है। जो ईश्वर प्रदत्त रूप-रंग, बनावट आदि को बदलने के लिए किया जाता है। वर्तमान में यह शो बिजनेस या अवाम से नजदीकियां रखने वालों में ज्यादा प्रचलित है। प्लास्टिक सर्जरी खतरनाक, दुष्प्रणामित व मंहगी होने के बावजूद महिलाओं में खासी लोकप्रिय है। पुरुष भी इसे अपनाने में बहुत पीछे नहीं हैं, पर ज्यादातर अपने चेहरे का मेक-ओवर करवा संतुष्ट हो जाते हैं। वैसे तो अपने को बेहतर दिखाने के लिए हजारों लोगों ने इसे अपनाया है पर आज सिर्फ तीन-चार लोगों की बात। 
शेखर सुमन - का नाम सबसे पहले इस क्रम में लिया जा सकता है। जिन्होंने अपनी उम्र को वास्तव में कम ''दिखलवाने'' में काफी सफलता पाई। प्रयोग सफल भी रहा और अच्छा भी लगा। ऐसा करवाने वाली पहली बीस हस्तियों में शायद वे अकेले पुरुष हैं। पर अगले तीन प्राणी पता नहीं क्या सोच कर क्या बन गए !

शाहिद कपूर - भोला-भाला, मासूमियत भरा प्यारा सा चेहरा ! सिने-दर्शकों को पसंद भी था ! फ़िल्में सफल भी हो रही थीं। पर पता नहीं बंदे को क्या सूझी ! ''ही मैन'' रफ-टफ दिखने के चक्कर में अपना व्यक्तित्व ऐसा बदलवाया कि मरीज सा दिखने लगा। अरे भई ! ज्यादा पीछे न जा कर, अशोक कुमार से ले कर अभी तक के आयुष्मान जैसे सफल कलाकारों को ही देख लेते ! सैकड़ों या कहो, तक़रीबन सारे नायक ऐसे ही हुए हैं जिन्होंने बिना कुदरत की रचना में फेर-बदल कर अपनी मेहनत के दम पर अपार सफलता पाई। उनकी बिना मार-कुटाई वाली फ़िल्में भी बहुत सफल रहीं।
ऋतिक रौशन -  सुंदर, स्मार्ट, हर दृष्टि से कसौटी पर खरा ! पुरुषोचित सुंदरता के चलते ग्रीक गॉड कहलवाने वाले इस अभिनेता ने भी अपना कुछ ऐसा काया-कल्प करवाया, जो रफ-टफ भले ही लगे सुंदर तो कतई नहीं लगता ! अब सुंदरता की परिभाषा अलग-अलग हो सकती है। हो सकता हो विदेशी फिल्मों की चाह और वहां के उम्रदराज नायकों की तर्ज पर इन्होंने ऐसा बदलाव करवा लिया हो ! पर वहां और यहां में फर्क भी तो है ! फिर भी औरों से ठीक है, उम्र का भी तो असर पड़ता ही है। 

राहुल गांधी - इस कड़ी में अगला नाम ! राजनीति को परे कर बात की जाए तो इनके मुख पर भी मासूमियत की छाप थी। अच्छा-खासा हसमुख चेहरा। आकर्षक व्यक्तित्व। उम्र की कलम भी कोई ख़ास असर नहीं डाल पा रही थी। कैमरे के सामने एक जिंदादिल व खुशगवार उपस्थिति दर्ज करवाने वाले इंसान ने अचानक पता नहीं किस ''हितैषी'' की सलाह पर अपने पर बदलाव का प्रयोग कर डाला। अजीब सा केश-विन्यास, ओढ़ी हुई सी गंभीरता, अलग सी पोषाक, उदास सा मुखमंडल, परिपक्वता कम अस्वस्थ होने का आभास ज्यादा देता है।  
अब जब हम जैसे आम इंसानों को यह बदलाव कुछ अजीब से लगते हैं तो सोचने की बात है कि जिन पर यह सब प्रयोग किए गए उनको क्यों नहीं इस बात का एहसास होता। अवाम के सामने आना है ! उस पर अपना प्रभाव डालना है ! उसको आकर्षित करना है ! लुभाना है तो अपना रूप-रंग भी तो लुभावना होना चाहिए ! इस मामले में राजीव गांधी जी का उदाहरण आदर्श है। खैर सबका अपना-अपना ख्याल है ! अपना-अपना नजरिया है ! अपना-अपना ख्वाब है ! अपना ही चेहरा है और अपनी ही नजर है ! सानूं की !!

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कुछ तो विवेक होना ही चाहिए

समय बदलेगा तो हर जगह शुचिता आएगी ! तब शायद शासक को सही दिशा दिखाने के लिए ही विरोध हो ! देश के अवरोध के लिए नहीं ! विरोध हो गलत नीतियों का ! गलत फैसलों का ! गलत व्यक्ति का ! तब शायद सम्मानीय पद की प्रतिष्ठा बनी रहे ! देश की मर्यादा, उसकी गरिमा, उसकी अखंडता अक्षुण्ण रहे ! उस पर आक्षेप करने वाला दस बार सोच कर भी हिम्मत ना जुटा पाए कुछ अनर्गल बोलने की ! निरपेक्ष संस्थाओं को आदर मिले ! जवानों को भारत रत्न माना जाए ! शायद वह सुबह आ ही जाए.........!

#हिन्दी_ ब्लागिंग  
यदि मुझे जीवन में सफल होना है, अपना लक्ष्य प्राप्त करना है, अपने आप को साबित करना है, परंतु इसके साथ ही मुझे अपने पुराने कारनामे, हरकतें, करतूतों का कच्चा चिठ्ठा भी याद और मालूम हो; तो मैं यही कोशिश करूंगा कि वह मेरी और लोगों की यादों में ही दफ़न रहे। बचूंगा ऐसे कारगुजारियों से जिनसे मेरा विगत फिर लोगों के जेहन में सर उठा, मेरी परेशानी का सबब बने। पहचानूंगा और दूरी बना कर रखूंगा ऐसे लोगों से जो मेरे कंधों का इस्तेमाल कर अपना हित साधना चाहते हों ! नाहक दूसरों की बखिया उधेड़ने से पहले अपने खटिए के नीचे सोटी जरूर घुमा लूंगा। पर यह सब तो तभी संभव है जब प्रकृति-प्रदत मेरी समझदानी खाली ना हो ! मेरा विवेक मेरे साथ हो ! मुझे अच्छे-बुरे की पहचान हो ! मेरा मन द्वेष, ईर्ष्या, अहम, लालसा, कुंठा, पूर्वाग्रहों आदि व्याधियों से मुक्त हो !   
 
आज हो ठीक इसका उल्टा रहा है। लोगों ने अपने चारों ओर खुदगर्जों, चारणों, पिछलग्गुओं  की चारदीवारी घिरवा खुद को सुरक्षित, पाक-साफ़ मान लिया है। हकीकत से दूर घेरे के अंदर वे वही देखते-सुनते हैं जो दिखलाया, सुनाया, समझाया जा रहा है ! जो कर्णप्रिय हो, सुहाता हो, मन लायक हो ! उसी के अनुसार बिना परिणाम जाने ये लोग आकाश की तरफ मुंह उठा थूके जा रहे हैं ! कीचड़ में पत्थर मारे जा रहे हैं ! लियाकत नहीं, चेहरे-मोहरे, पहरावे, चाल-ढाल की बदौलत खुद को अपने पूर्वजों के समकक्ष लाने की व्यर्थ कोशिश कर मजाक के पात्र बने जा रहे हैं। पूर्वजों की उपलब्धियों को गिना कर खुद को महान कहलवाने की जुगत हो रही है। उपलब्धियां भी कैसी जो समय के साथ अब ''ब्लंडर्स'' सिद्ध होने लगी हैं। 

अब सीधी व सच्ची बात ! देश के तीन सर्वोच्च नेताओं की अकाल मृत्यु को सदा देश के लिए दी गई कुर्बानी के तौर पर प्रचारित कर भुनाया गया ! हालांकि हम सब उनकी बहुत इज्जत करते हैं। देश के लिए उनके योगदान को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता। पर ऐसा लगता है कि तीनों मौतें, अदूरदर्शिता, अति-आत्मविश्वास और दूसरों के आकलन में हुई भयंकर भूलों का परिणाम थीं। पर आखिर थे तो वे भी इंसान और इंसान से भूल होती ही है ! पर उसको अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अस्त्र बनाना कतई उचित नहीं है। हमारी प्रथा है कि दिवंगतों का सदा आदर ही किया जाता है ! उन के लिए ऐसा लिखना बिलकुल अच्छी बात नहीं है ! पर जब संबंधित जिम्मेदार लोग ही रोज खुद अपना ही तमाशा बनवाने पर उतारू हों तो ना चाहते हुए भी...............!    

पहला देहावसान, खुद को जगत्प्रिय, शांतिदूत, महान समझने की गलतफहमी और आत्मसम्मोहन का दुखद परिणाम था ! जो पड़ोसी की कुटिलता, उसकी दगाबाजी के सदमे और युद्ध में करारी हार के कारण आवाम के बीच अपनी छवि बुरी तरह ध्वस्त होने के कारण हुआ था ! दूसरा हादसा, व्याघ्र को पाल-पोस कर पनपाने और फिर उसको पालतू और वफादार समझने की भयंकर भूल का परिणाम रहा ! सारा देश पहली ऐसी घटना का साक्ष्य बन स्तब्ध रह शोकसागर में डूब गया था ! चेतावनी के बावजूद यहां भी अति-आत्मविश्वास जिंदगी के आड़े आ गया था। जिसकी प्रतिक्रिया को भुलाने में समय को भी समय लग जाएगा ! तीसरी बार खुद के प्रवासी देशवासियों की मुसीबतों को नजरंदाज कर पड़ोसी के घाव पर मरहम लगाने का प्रयास, वह भी विशेषज्ञों की सलाह के बगैर, जानलेवा सिद्ध हुआ।  

उस समय तक आपस में इतनी वितृष्णा नहीं हुआ करती थी ! हालांकि तीनों बार देश संकटग्रस्त हुआ, उस पर विपदा के बादल छाए और प्रगति थम सी गई। आम इंसान सच में दुखी हुआ ! सभी को लगा जैसे गमी उसके घर में ही हुई हो ! पर इसको भी सदा के लिए ब्रह्मास्त्र बना के रख लिया गया। दल के ''रामु काकाओं' ने आवाम को भरमा, इन हादसों को गर्व का विषय बनाने में कोई कसर ना छोड़ रखी। कसर तो तब भी नहीं छूटी थी, जब इस दल की नेता ने, दस पार्टियों की सहायता से बन रही सरकार को ना संभाल पाने का ख़तरा भांप, सर्वोच्च पद स्वीकार नहीं किया था और उसे चमचों ने त्याग का चोला पहना एक अलग छवि गढ़ने की नाकाम कोशिश कर दी थी ! 

आजादी  के बाद से अब तक दुनियावी मंच पर नौ रसों, चारों विधियों, सोलह कलाओं सहित ऐसा और कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसमें इन्हें विशेषता हासिल ना हो ! तब से आज तक ऐसा कुछ भी नहीं घट पाया, जिसमें अपना मतलब ना सिद्ध कर लिया गया हो ! देश में घटी हर आडी-टेढ़ी बात में इनकी मौजूदगी दर्ज है। पर वह सब भूल, यह समझने की गलतफहमी पाल, कि किसी को सच्चाई का क्या पता ! अपने आप को अभी भी सामयिक या देश की जरुरत बताने के लिए, बिना किसी संकोच के, कुछ भी बोल दिया जाता है चाहे वह निरा झूठ ही क्यों ना हो ! आज बढ़ते वैमनस्य, घटती सहिष्णुता और व्यक्ति पूजन के कारण छुटभैय्यों तक को बोलने की खुली छूट दे दी गई है ! आज चुप रहना अपनी हेठी और बोलना शेखी समझा जाने लगा है ! अब विषय, समय या स्थान नहीं देखा जाता ! अब बोलना मुख्य उद्देश्य हो गया है ! कभी भी, कहीं भी, कुछ भी बोलो ! झूठ बोलो ! बार-बार बोलो ! पर दृढ़ता के साथ बोलो ! विश्वास करने वाले हजारों मिल जाएंगे ! क्योंकि आवाम यह नहीं देखती कि क्या बोला जा रहा है, वह यह देखती है कि कौन बोल रहा है !    

आज हालांकि व्यक्तिगत हित, अपने स्वार्थ, अपनी महत्वकांक्षाओं के सामने सब कुछ....सब कुछ गौण  हो गया है, पर कहते हैं ना, कि कोई भी चीज स्थाई नहीं होती ! हर चीज का अंत होता है ! इतिहास अपने को दोहराता है ! अच्छा परिवेश, माहौल नहीं रहा, तो बुरा भी नहीं रहेगा ! समय बदलेगा तो हर जगह शुचिता आएगी ! तब शायद शासक को सही दिशा दिखाने के लिए ही विरोध हो ! देश के अवरोध के लिए नहीं ! विरोध हो गलत नीतियों का ! गलत फैसलों का ! गलत व्यक्ति का ! तब शायद सम्मानीय पद की प्रतिष्ठा बनी रहे ! देश की मर्यादा, उसकी गरिमा, उसकी अखंडता अक्षुण्ण रहे ! उस पर आक्षेप करने वाला दस बार सोच कर भी हिम्मत ना जुटा पाए कुछ अनर्गल बोलने की ! निरपेक्ष संस्थाओं को आदर मिले ! जवानों को सर्वोपरि व भारत रत्न माना जाए ! शायद वह सुबह आ ही जाए !

मंगलवार, 9 जून 2020

उम्र, संख्या पर भले ही नहीं पर उसके तकाजे पर जरूर ध्यान रखें

अगली बॉल को बॉलर ने अपनी तर्जनी और मध्यमा में फंसा कर जबरदस्त फिरकी डाली ! बॉल ने तेज घूर्णित अवस्था में जा बैट के बाहरी किनारे को छूआ और उछाल खा हवा में जा टंगी ! दोनों तरफ की सांसें थमी और निगाहें बॉल पर जमी हुईं ! सामने वाला खिलाड़ी फर्श को भूल अर्श को ताकता हुआ बॉल की ओर तेजी से लपका ! बॉल के नजदीक पहुंच, उँगलियों और हथेली को कटोरे का रूप दे उसे लपकने ही वाला था कि........


#हिन्दी_ब्लागिंग 
इस कोरोना कालखंड में हमारी छत पर अक्सर संध्या समय करीब आधे घंटे का, टेनिस गेंदी, दर्शक विहीन, एक सदस्यी, त्रिकोणी क्रिकेट मुकाबले का आयोजन हो जाता है। इसकी पॉपुलर्टी इतनी है कि घरवाले ही ध्यान नहीं देते। फिर भी कभी-कभी घर की वरिष्ठ महिला सदस्य अनुग्रहित करने हेतु आ तो जाती हैं पर उनकी रुचि खेल में नहीं, अपने फोन पर प्रसारित होते पचासवें और साठवें दशक के गानों में ही ज्यादा रहती है। खैर !
बात है, पिछले रविवार की! इस दिन मुकाबला द्विपक्षीय ही था। आखिरी मैच के अंतिम ओवर में एक टीम  को तीन बॉलों  में सिर्फ एक रन  की जरुरत थी। तभी चौथी बॉल खाली गयी। अगली  बॉल को  बॉलर ने  अपनी तर्जनी और  मध्यमा में  फंसा कर एक जबरदस्त  फिरकी डाली ! बॉल ने तेज घूर्णित अवस्था में जा बैट के बाहरी  किनारे को छूआ और उछाल खा हवा में जा टंगी ! दोनों तरफ की सांसें थमी और निगाहें बॉल पर जमी हुईं ! सामने  वाला  खिलाड़ी  फर्श को भूल अर्श को ताकता हुआ बॉल की ओर तेजी से लपका ! बॉल के नजदीक पहुंच, उँगलियों और हथेली  को कटोरे  का रूप दे उसे लपकने ही वाला था कि........धम्म......थड्ड.....!

ठीक चार सेकेंड बाद छत की मुंडेर से टकराया खिलाड़ी उठता है और पूछता है कि बॉल कहां है ? बॉल कहां है ? तभी दर्शक दीर्घा से तेज आवाज आती है, ''बॉल छड्डो, देक्खो खून बै रेया ऐ ! लग्ग गई ?'' यह सुनने पर खिलाड़ी का ध्यान अपने हाथ पर जाता है, जहां दो छिद्रों से रक्त बाहर आ रहा था। नीचे जा धो-पौंछ कर डेटॉल-क्रीम वगैरह लगा निवृति पाई गई ! पर कुछ देर बाद ही कुछ अस्वाभाविक सा लगने पर जब मुआयना हुआ तो पाया गया कि दाएं पैर की तीसरी और चौथी उंगलियां कालिमा युक्त नीले रंग में रंग गई हैं ! दोनों घुटनों ने पुरानी चमड़ी को त्याग नई पाने का उपक्रम कर लिया है। दोनों हथेलियों में सूजन आ गई है ! अंगूठों के जोड़ पीड़ाग्रस्त हो चुके हैं ! ठुड्डी के टकराने से जबड़े में कुछ दर्द तो है ही उस टकराहट से उठी तरंगों ने पीठ और कमर के बीच रीढ़ की हड्डी को भी बगावत के लिए उकसा दिया है !

इन सब के साथ ही रात गहराती गई पर नींद ने भी विद्रोह कर दिया ! पूरी रात जागते ही बीती। दूसरे दिन भी उठा नहीं गया। शाम को दर्द तो था पर कुछ हिम्मत कर हिलने-डुलने, चलने-फिरने की हिम्मत जुटाई जा सकी ! इसीलिए कहता हूँ जो लोग कहते हैं ना कि उम्र सिर्फ एक संख्या है; ये वे लोग होते हैं जो अभी चोटग्रस्त या बीमार नहीं हुए होते ! उनकी बात मान जो अति उत्साही ''वरिष्ठ युवा'' नंबर-नंबर खेलने लग जाते हैं, वे समझ लें कि खुदा ना खास्ता कभी कुछ ऐंड-बैंड हो जाता है तो वह संख्या उतने ही किलोग्राम में बदल सिर पर सवार हो जाती है .............सुन रहे हैं ना !!

विशिष्ट पोस्ट

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...