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गुरुवार, 7 अगस्त 2025

रक्षाबंधन, कई रिश्ते गुथे हैं इसमें

रक्षाबंधन, एक जुड़ाव जिसका उपयोग अपनी सुरक्षा या किसी चीज की अपेक्षा करने वाले का, अपने सहायक को, अपनी याद दिलाते रहने के लिए एक प्रतीक चिन्ह के रूप में किया जाता रहा है। अनादिकाल से चले आ रहे इस मासूम से त्यौहार पर भी, आज के आधुनिकरण  के इस युग में अन्य भारतीय त्योहारों की तरह बाजार की कुदृष्टि पड़ चुकी है ! जो सक्षम लोगों को मंहगे-मंहगे उपहार, खरीदने को उकसा कर इस पुनीत पर्व की गरिमा और पवित्रता को ख़त्म करने पर उतारू है..........!!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 

क्षाबंधन, आज भले ही यह त्यौहार भाई-बहन के पवित्र रिश्ते तक सिमट कर रह गया है, पर हमारे पौराणिक ग्रंथों और ऐतिहासिक कथाओं व लेखों में इस कच्चे सूत के बंधन का विवरण उपलब्ध है। जिनमें इस रक्षा-सूत्र का उपयोग अन्य परिस्थितियों में भी किए जाने का उल्लेख मिलता है। जहां अपनी सुरक्षा या किसी चीज की अपेक्षा करने वाले का, सहायता करने वाले को, अपनी याद दिलाते रहने के लिए एक प्रतीक चिन्ह प्रदान किया जाता रहा है। अनादिकाल से चले आ रहे इस रिवाज ने धीरे-धीरे अब एक पर्व का रूप ले लिया है ।  
देवी लक्ष्मी और दैत्यराज बलि 
पौराणिक काल पर नजर डालें तो राजा बलि की कथा में इसका विवरण मिलता है, जो शायद इसका सबसे पहला उल्लेख है। जब राजा बलि को वरदान स्वरूप भगवान विष्णु उसकी रक्षार्थ स्वर्ग छोड़ पाताल में रहने लगे थे, तब लक्ष्मी जी ने राजा बलि की कलाई पर सूत का धागा बांध उससे उपहार स्वरूप अपने पति को वापस मांग लिया था।
भाई-बहन का स्नेह 
पुराणों के अनुसार देवासुर संग्राम में देवताओं के पक्ष को कुछ कमजोर देख इन्द्राणी ने इंद्र की सुरक्षा के लिए उसकी कलाई पर एक मंत्र पूरित धागा बांधा था। जो रक्षा बंधन ही था।

रक्षासूत्र 
एक बहुचर्चित कथा श्रीकृष्ण और द्रौपदी की है जब द्रौपदी ने अपनी साड़ी के टुकड़े से श्रीकृष्ण की घायल उंगली पर पट्टी बांधी थी, जिसके फलस्वरूप भरी सभा में चीरहरण के समय उसकी रक्षा हो पाई थी।
श्रीकृष्ण, द्रौपदी  
एक अप्रचलित कथा श्री गणेश के साथ जुडी हुई है। इसके अनुसार जब गणेश के पुत्रों शुभ और लाभ ने मनसा माता को गणेश जी को राखी बांधते देखा तो उन्होंने भी खुद को राखी बंधवाने के लिए बहन की मांग की तो श्री गणेश ने अग्नि की सहायता से एक कन्या को उत्पन्न किया, जिसे संतोषी माता का नाम मिला।
पर्व 
तिहास के दर्पण में झांकें तो राणा सांगा के देहावसान के बाद गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला किया तो रानी कर्णावती ने  हुमायूँ को अपनी सुरक्षा की गुहार के साथ राखी भिजवाई थी। यह अलग बात है कि हुमायूँ की सेना के देर से पहुंचने के कारण उन्हें जौहर करना पड़ गया था।
रक्षा बंधन 
आज भी ब्राह्मण पुरोहित इस दिन अपने यजमानों को मौली बांध कर दक्षिणा प्राप्त करते हैं। जो एक तरह से उन्हें मिलने वाली सुरक्षा का ही एक रूप है। जनेऊ धारण करने वाले लोग भी इसी दिन अपना पुराना जनेऊ त्याग नया धारण करते हैं।   
यज्ञोपवीत धारण 
जो भी हो सावन की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस त्यौहार का भाई-बहनों को साल भर इन्तजार रहता है। जो दूर-दराज रहने वालों को इसी बहाने मिलने का अवसर मुहैय्या करवा रिश्तों में फिर गर्माहट भर देता है। पर आज कहां बच पा रहा है "ये राखी धागों का त्यौहार'',  आधुनिकीकरण के इस युग में बाजार की कुदृष्टि हर भारतीय त्यौहार की तरह इस पर भी पड़ चुकी है जो सक्षम लोगों को मंहगे-मंहगे उपहार, जिनकी कीमत करोड़ों रुपये लांघ जाती है, खरीदने को उकसा कर इस पुनीत पर्व की गरिमा और पवित्रता को खत्म करने पर उतारू है। जरुरत है जागरूक होने की, इन विसंगतियों को रोकने की !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏  

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

वैलेंटाइन दिवस, दो तबकों की रंजिश का प्रतीक तो नहीं.......?

वैलेंटाइन दिवस, जिसे प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित किया गया था,  वह अब मुख्य रूप से प्रेमी जोड़ों के प्यार के त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा है। इसमें भी एक कटु सत्य यह है कि इसको मनाने वाले अधिकांश, या कहिए मुट्ठी भर लोगों को छोड़, शायद ही कोई वैलेंटाइन को याद भी करता होगा या उसके बारे में कुछ जानता भी होगा ! ऐसे लोगों के लिए यह दिन सिर्फ सारी वर्जनाओं को ताक पर रखने या उन्हें तोड़ने का मौका होता है ! यही कारण है कि शुरुआत के दिनों की उस एक दिनी फिल्म ने आज हफ्ते भर के सीरियल का रूप ले लिया है...........!!
 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
 
अपने देश के एक खास तबके को पश्चिम सदा से आकर्षित करता रहा है ! वहां की हर अच्छी-बुरी बात को अपनाने की ललक सदा से इसवर्ग में रही है ! हो सकता है कि सैकड़ों सालों की परवशता और उससे उपजी हीन मानसिकता या फिर वहां  की चकाचौंध इसका कारण  हो,  पर यह सच्चाई है !  इसी मनोवृत्ति के कारण वसंतोत्सव,  करवा चौथ,  भाई दूज जैसे अपने परंपरागत मासूम त्योहारों का मजाक बना कर, उन्हें आयातित उत्सवों के सामने कमतर साबित करने की कुत्सित कोशिश की जाती रही,  पर जनमानस का साथ ना मिलने पर उन पर आधुनिकता का मुल्लमा चढ़ा कर, बाजार की सुरसा भूख के हवाले कर दिया गया ! आज उसका परिणाम सबके सबके सामने है !
 
वसंत
किसी की अच्छाई अपनाने में कोई बुराई नहीं है, पर उस बात का अपने परिप्रेक्ष्य, माहौल, परिस्थियों के अनुसार उनके औचित्य का आकलन जरूर होना चाहिए, जो कभी नहीं किया गया ! ऐसे ही 1992 के दशक के आस-पास हमारे किशोरों, युवक-युवतियों को निशाना बना, जिस एक-दिनी वैलेंटाइन दिवस जैसे जलसे का बीजारोपण किया गया था, वह आज एक विशाल वृक्ष बन चुका है ! उसी की छांव में आज का मौकापरस्त बाजार अपना तमाशा शुरू कर, युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता ! यही कारण है कि शुरुआत के दिनों की उस एक दिनी फिल्म ने आज हफ्ते भर के सीरियल का रूप ले लिया है!

14 फरवरी, वैलेंटाइन दिवस, जिसे योजनाबद्ध तरीके से सदियों पहले रोम में समाज के लोगों के बीच आपसी प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित कर एक विशेष दिन का रूप दिया गया, क्या वह उस समय के वहां के दो शक्तिशाली गुट, राजपरिवार और धर्मगुरुओं की सत्ता लालसा का कारण तो नहीं था ! क्योंकि उस समय रोम में ये दोनों धड़े अपनी-अपनी जगह काफी शक्तिशाली थे और समाज पर दोनों का ही अच्छा-खासा दबदबा हुआ करता था !
 
रोम में तीसरी सदी में राजा क्लॉडियस का शासन था। एस समय किसी बिमारी से काफी लोगों के मारे जाने के कारण रोमन सेना में सैनिकों की भारी कमी हो गई ! उधर शादी के बाद ज्यादातर सैनिक सेना से विमुख हो जाते थे ! सो क्लॉडियस ने सैनिकों के परम्परागत विवाह पर रोक लगा दी। उसका मानना था कि अविवाहित पुरुष ही सेना में अच्छी तरह से अपना कर्त्तव्य निभा सकते हैं ! क्योंकि उन पर परिवार की अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं होती, उनका ध्यान नहीं भटकता ! यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो राजा द्वारा बनाया गया वह कानून गलत भी नहीं था, उसने तो देशहित के लिए वैसा कदम उठाया था ! जिससे रोम की सेना शक्तिशाली और देश की सुरक्षा सुदृढ़ बनी रह सके !  

वैसे तो वैलेंटाइन नाम के बहुत से संत हुए हैं पर यह वाकया उस वक्त के रोम के इसी नाम के एक पादरी संत वैलेंटाइन से जुड़ा हुआ है, जिन्हें जनता का अपार स्नेह तथा वहां के धर्म गुरुओं का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। दोनों धड़ों की आपसी रंजिश को राजा के उस कानून ने और हवा दे दी ! धर्म गुरुओं को प्रजा को अपनी तरफ करने का मौका मिल गया ! उन्होंने  वैलेंटाइन को आगे कर राजा क्लैडियस के आदेश की खिलाफत करनी शुरू कर दी ! वैलेंटाइन ने गुप्त रूप से सैनिकों का विवाह करवाना शुरू कर दिया। इस बात की जानकारी जब राजा को हुई तो उसने उनको मौत की सजा सुना दी ! 14 फरवरी 269 को संत वैलेंटाइन को मौत के घाट उतार दिया गया। फिर 496 ई. में पोप ग्लेसियस ने इस दिन को उस संत के नाम पर "सेंट वैलेंटाइन्स डे" घोषित कर दिया।

वैलेंटाइन दिवस, जिसे समाज के लोगों के बीच आपसी प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित कर, संत वैलेंटाइन को दी गई मौत की सजा वाली तारीख, 14 फरवरी के दिन से  शुरू किया गया था, वह अब दुनिया भर में अपना रूप बदल, मुख्य रूप से प्रेमी जोड़ों के प्यार के त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा है। इसमें भी एक कटु सत्य यह है कि इसको मनाने वाले अधिकांश, या कहिए मुट्ठी भर लोगों को छोड़, शायद ही कोई वैलेंटाइन को याद भी करता होगा या उसके बारे में कुछ जानता भी होगा ! ऐसे लोगों के लिए यह दिन सिर्फ सारी वर्जनाओं को ताक पर रखने या उन्हें तोड़ने का मौका होता है ! 
 
सेंट वैलेंटाइन का होना एक सच्चाई है ! उनको मारा गया, यह भी सच्चाई है ! कई चर्चों में  उनकी निशानियां या अवशेष भी हैं, यह भी सच्चाई है ! पर जो कथाएं, किवदंतियां, दंतकथाएं उनको ले कर जनमानस में चल रही हैं, उनमें कितनी सच्चाई है, यह नहीं कहा जा सकता ! क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें मृत्युदंड राजद्रोह के लिए नहीं बल्कि धर्मद्रोह के लिए दिया गया था ! तो असलियत क्या है ? कहा नहीं जा सकता ! अब जो है वो तो हइए है 😌

शनिवार, 22 जुलाई 2023

नाड़े वाली पायजामानुमा पैंट

तो लुब्ब-ए-लुबाब यह रहा कि उस नाड़े वाली, पायजामेनुमा पैंट या पैंटनुमा पायजामे ने पता नहीं मुझे कैसे, क्यों और इतना लुभा लिया कि उसे तो मैंने लिया ही साथ में उसके दो साथी और ले आया ! समय काटने गए थे, जेब कटा कर आ गए ! इसी लिए कहता हूँ, ''विंडो ब्राऊज़िंग नहीं आसां, इतना समझ लीजे,  ये मायाजाल का फरेब है, और बच कर आना है.............!'' 

       

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कल बेटे की तरफ से फिर ऑफर आया कि चलिए, कुछ कपड़े-लत्ते ले आए जाएं ! अक्सर ऐसे प्रस्ताव मैं ख़ारिज कर देता हूँ ! अब पहले जैसी आमद-ओ-रफ्त तो रही नहीं ! कभी-कभार ही कहीं निकलना होता है, तो उसके लिए इंतजाम है ही ! फिर भी सभी का साथ देने के लिए चल दिया कि चलो विंडो ब्राऊज़िंग ही सही ! अब आदमी गया है तो इतने बड़े मॉल में ठूंसे पड़े माल को तो देखेगा ही ! इसी देखा-देखी में वहां के खरीदारी सहायक ने मुझसे पूछा, सर; क्या दिखाऊं ! मैंने कहा, कुछ नहीं, बस; ऐसे ही देख रहा हूँ ! अब वह विक्रेता ही क्या, जो इतने से निराश हो जाए ! युवक कहीं से एक ट्राउज़र निकाल, मेरे पास लाया और बोला, यह नया आईटम है, बिलकुल हल्का और स्ट्रेचेबल ! इसमें ट्राउज़र कॉर्ड भी है !   

उस ''नए आइटम'' को अपने हाथ में लेते ही मेरी हंसी निकल गई ! युवक मेरे मुंह की तरफ देख रहा था ! तभी श्रीमती जी भी वहां आ गईं ! मैंने उनको इंगित करते हुए उस युवक से कहा, पैंतालीस साल पहले, तुम्हारे इसी नए आइटम के किसी पूर्वज को पहन मैं इनके घर गया था ! तब इसे ''स्ट्रेचलॉन'' कहा जाता था ! पर जब इसमें बेल्ट के लिए लूप लगे हैं तो इसमें यह ''नाड़ा'' क्यों डाल दिया है, बेचारा न पैंट रह गया ना हीं पायजामा ! पहनने वाले को एक और अतिरिक्त क्रिया को अंजाम देने के लिए समय निकालना होगा ! अब वह बेचारा क्या बोलता, उसने तो बनाया नहीं था, यह सब ! 

हम में से बहुतों ने इस ''चीज'' को देखा होगा, पर मैंने पहली बार दीदार किए थे ! बाजार अपनी सुरसाई भूख की जरुरत के लिए जो ना कर दे या बना दे कम है ! तो लुब्ब-ए-लुबाब यह रहा कि उस नाड़े वाली पायजामेनुमा पैंट या पैंटनुमा पायजामे ने पता नहीं मुझे कैसे, क्यों और इतना लुभा लिया कि उसे तो मैंने लिया ही साथ में उसके दो साथी और ले आया ! समय काटने गए थे, जेब कटा कर आ गए ! इसी लिए कहता हूँ, ''विंडो ब्राऊज़िंग नहीं आसां, इतना समझ लीजे, ये मायाजाल का इक फरेब है और बच कर आना है !''    

बुधवार, 18 जनवरी 2023

पासोवर, पीला ढक्कन, कुलेखारा, बाजार की तनिक प्रशंसा तो बनती है

सुबह आँख खोलने के बाद से रात सोने के वक्त तक बाजार, चिराग के जिन्न की तरह आपके दरवाजे पर हाथ बांधे आपके हुक्म के इंतजार में खड़ा रहता है ! कुछ भी, कहीं से भी ला कर आपको सौंपने के लिए ! उदाहरण के लिए, एक औषधीय पौधा होता है, "कुलेखारा", इसकी पत्तियों का रस होमोग्लोबिन बढ़ाने में बहुत सहायक होता है ! अधिकाँश लोगों को तो इसकी जानकारी तो क्या इसका नाम तक भी ज्ञात नहीं होगा ! यह सब जगह उपलब्ध भी नहीं है ! ऐसे ही कोका कोला के पीले ढक्कन के पेय को भी लिया जा सकता है ! पर बाजार का जिन्न इन सबको देश के किसी भी कोने तक पहुँचाने में सक्षम है...........!

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आज पल-पल बदलते फैशन, पसंद और जरुरत के जमाने मे भले ही बाजार की नीतियों, उसकी मंशा, उसकी व्यूह-रचना, उसके मायाजाल में सिर्फ उसकी खुदगर्जी और धन अर्जन की प्रमुखता हो, पर एक बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वह दिन-रात, 24x7, लगातार जी तोड़ मेहनत भी करता है ! उसकी नजर, अपने उपभोक्ताओं की हर जरुरत को, गुंजाईश चाहे कितनी भी छोटी से छोटी क्यों ना हो, भांपने और आंकने से नहीं चूकती ! इसके लिए उसकी ''मशीनरी'' बिना विराम के लगातार शोध करती रहती है ! अक्सर हमें लगता है कि हम बाजार के काले पहलू के षड्यंत्र में उलझते जा रहे हैं, पर उसका एक उजला पहलू भी है, भले ही उसका दायरा छोटा हो, पर अशक्त, उम्रदराज, घर से बाहर ना जा पाने को मजबूर, महिलाएं, काम में अत्यधिक व्यस्त लोगों के लिए वह किसी वरदान से कम भी नहीं है ! 


आज कोई भी चीज, यानी कोई भी चीज चाहिए हो तो वह एक कॉल पर घर बैठे उपलब्ध हो सकती है ! फिर वह चाहे खाना हो, दवा हो, रोजमर्रा की जरुरत की वस्तुएं हों, यात्रा का टिकट हो, होटल की बुकिंग हो, स्टेशन-एयरपोर्ट तक जाने के लिए वाहन हो, कपडे हों, जूते हों .... क्या-क्या गिनाया जाए, शायद ही कोई चीज ऐसी हो जो घर बैठे उपलब्ध न हो सकती हो ! उसके ऊपर पसंद ना आने पर वापसी की भी सुविधा ! सुबह आँख खोलने के बाद से रात सोने के वक्त तक बाजार, चिराग के जिन्न की तरह आपके दरवाजे पर हाथ बांधे आपके हुक्म के इंतजार में खड़ा रहता है ! कुछ भी, कहीं से भी ला कर आपको सौंपने के लिए ! उदाहरण स्वरुप, एक औषधीय पौधा होता है, "कुलेखारा", इसकी पत्तियों का रस होमोग्लोबिन बढ़ाने में बहुत सहायक होता है ! अधिकाँश लोगों को तो इसकी जानकारी तो क्या इसका नाम तक भी ज्ञात नहीं होगा ! यह सब जगह उपलब्ध भी नहीं है ! पर बाजार का जिन्न इसे भी देश के किसी भी कोने तक पहुँचाने में सक्षम है ! अजूबा ही तो है यह !

कुलेखारा की पत्तियां 


कुछ साल पहले तक हमारे कट्टर जैन भाइयों को यात्रा या पर्यटन के दौरान खाने-पीने के मामले में बहुत दिक्क्तों का सामना करना पड़ता था ! आज देश के किसी भी हिस्से में अच्छे होटल जैन फूड परोसने में सक्षम हैं ! तीज-त्योहारों के अनुरूप हर तरह की खाद्य सामग्री या जरुरत की वस्तुएं देश के हर कोने में उपलब्ध हैं ! बाजार तो जैसे संसार के हर इंसान की छोटी से छोटी जरुरत पूरी करने के लिए कमर कसे बैठा है ! इसका छोटा सा उदाहरण कोका कोला कंपनी है जो साल में एक बार, बसंत के महीने में अपनी परंपरागत बोतलों के साथ ही यहूदियों के धार्मिक त्यौहार (Passover) को ध्यान में रख एक पीले ढक्कन वाली बोतल भी बाजार में उतारती है। इस त्यौहार में यहूदी लोगों को गेहूं, जई, राई, जौ, मक्का, चावल, बीन्स इत्यादि का सेवन वर्जित होता है और चूंकि कोका कोला में मक्के के रस का प्रयोग किया जाता है इसलिए वे इसे पीने से बचते हैं। इस बात को भांप कर कोका कोला इन दिनों के लिए अपने मुख्य उत्पाद के साथ एक और पेय भी तैयार करता है जिसमें कॉर्न सिरप की जगह चीनी मिलाई जाती है, इसे Kosher Coke कहा जाता है और इसकी पहचान के लिए इसे पीले ढक्कन की बोतलों में भर कर रखा जाता है जिससे इसकी आसानी से पहचान हो सके ! यह बताता है कि बाजार की नजर कितनी पैनी है ! तो लब्बोलुआब यही रहा कि हर चीज के दो पहलू होते हैं ! बाजार से भी अच्छाई और बुराई दोनों जुडी हैं ! हंस तो हमें ही बनना होगा !       

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

बाजार के चक्रव्यूह में अभिमन्यु बनता उपभोक्ता

एक ऐसे ही बाल बढ़ाऊ और केश निखारू उत्पाद ने प्याज को ही अपना ब्रांड एम्बेस्डर बना डाला है ! चतुराई इतनी कि अपनी साख जमाने के लिए उसने प्याज के दो रंग के बीजों लाल और काले से एक का शैंपू और दूसरे का तेल बना बाजार में धकेल दिया ! जितनी बारीकी से उसने केश विहीनों के मनोविज्ञान पर काम किया उतना शोध तो सिर्फ रॉकेट साइंस में ही होता होगा ! कीमत ज्यादा ना लगे इस आशंका में नीचे लिख दिया 1ml सिर्फ तीन रूपए का............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

जबसे बाबा रामदेव ने बाजार के समर में आयुर्वेद का परचम थामा है, तबसे जाने-माने नामों यथा तुलसी, आंवला, हल्दी, अदरक के साथ-साथ अन्य नामालूम से साग-सब्जियों-लता-गुल्मों-पौधे-पत्तियों के दिन भी फिर गए हैं ! हर कॉस्मेटिक ब्रांड अपने उत्पाद में किसी भी वनस्पति का नाम थोप खुद को प्रकृति का सगा सिद्ध करने पर तुला हुआ है साथ ही लोगों के रुझान और मौके को ताड़ते और आयुर्वेद के नाम को भुनाते हुए अपने उत्पाद की कीमत तिगुनी-चौगुनी कर दी है ! एक ऐसे ही बाल बढ़ाऊ और केश निखारू उत्पाद ने प्याज को ही अपना ब्रांड एम्बेस्डर बना डाला है ! चतुराई इतनी कि अपनी साख जमाने के लिए उसने प्याज के दो रंग के बीजों लाल और काले से एक का शैंपू और दूसरे का तेल बना बाजार में धकेल दिया ! जितनी बारीकी से उसने केश विहीनों के मनोविज्ञान पर शोध किया उतना तो सिर्फ रॉकेट साइंस में ही होता होगा ! लोगों की इस धारणा को भुनाते हुए कि अच्छी और खास चीज मंहगी ही होती है, कंपनी ने अपने 200ml तेल की कीमत रख दी 600/- रूपए ! कीमत ज्यादा ना लगे इस आशंका में नीचे लिख दिया 1ml सिर्फ तीन रूपए का ! यही हथकंडा शैंपू के लिए भी अपनाया गया ! जिससे उपभोक्ता को लगे कि बस इतनी सी कीमत ! इंसान की कमजोरियों का फायदा उठा उसे अपने काबू की  ''जकड़'' में कैसे बनाए रखना है, यह इसका ताजा उदाहरण है !    

बहुत से लोगों को याद होगा एक जमाने में, सस्ती के समय कम कीमत में ढेर सा सामान आ जाता था, इसलिए चार सेर की धड़ी या पांच सेर की पनसेरी का चलन था ! समय गुजरा, मन-सेर-छटांक को किनारे कर किलोग्राम का चलन शुरू हो गया ! फिर मंहगाई बढ़ी तो इंसान के मनोविज्ञान को समझते हुए बाजार ने जिंसों की कीमत को कम दर्शाने के लिए एक किलो की पैकिंग 900 ग्राम और 500 ग्राम की जगह 400 ग्राम कर सामान बेचना शुरू कर दिया ! एक किलो की कीमत की जगह कब एक पाव या 250 ग्राम के रेट बता ग्राहक को भुलावे में रखा जाने लगा, पता ही नहीं चला ! किसी चीज की कीमत चुपचाप दुगनी कर, उसके साथ एक-दो चीजें मुफ्त देने या उस चीज की कीमत में 50-60 प्रतिशत की छूट दिखा, आम इंसान को गुमराह कर उसे लूटने की ऐसी प्रथा शुरू हो गई, जिसमें लुटने वाला भी ख़ुशी महसूस करने लगा ! इंसान के दिमाग को जितनी खूबी से बाजार ने समझा है उतना तो शायद ही कोई समझ पाया हो ! कब, कहां, कैसे इसे अपने हिसाब से चलाना-समझाना है, इसे क्या दिखा-बता कर अपना मतलब निकल सकता है, इसमें बाजार की ताकतों को महारत हासिल है और इसमें सहायक होती हैं नामी-गिरामी, सामाजिक हस्तियां जो अपनी शख्शियत का लाभ उठा, पैसे लेकर आम इंसान को सच-झूठ कुछ भी समझा कर कंपनियों को लाभ पहुंचाती रहती हैं, भले ही उनका ड्राइवर भी उस वस्तु का इस्तेमाल ना करता हो ! 

डॉक्टर आर्थो से अनुबंध ख़त्म हो गया लगता है 

बाजार की भूख ने तो सुरसा को भी मात दे दी ! इससे पार पाने के लिए तरह-तरह की तरकीबें बेचने वाले करोड़पति बन गए ! पहले एक तरह के शैंपू-तेल-परफ्यूम आते थे ! फिर पुरुषों-महिलाओं-बच्चों के लिए क्यों अलग-अलग होने चाहिए यह समझा कर उत्पाद बढ़ाए ! आज आप क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे, किससे नहाएंगे, किससे सेहत बनाएंगें, सब बाजार ने अपने अधिकार में ले लिया है ! यह अलग बात है कि देश-विदेश में पदक जीतने वाले शायद ही हार्लिक्स-कॉम्पलान या बोर्नविटा जैसे उत्पादों से लाभान्वित हुए हों ! पर जो दिखता है वही बिकता है का सिद्धांत बदस्तूर जारी है ! यह भी सही है कि जब तक लोग भुलावे में आते रहेंगे तब तक गंजों को कंघी और पहाड़ों पर बर्फ बेची जाती रहेगी !     

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

कहीं बहुत देर ना हो जाए

अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की ऐसी कुशाग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है..................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्तमान ! हारी-बिमारी को छोड़ दें, वह तो अल्प कालीन है ! उसके अलावा समय बड़ा कठिन या कहें तो अराजक चल रहा है ! हर जगह असंतोष, दिशा हीनता, अज्ञानता, लिप्सा, अमानवीयता का बोलबाला होता चला जा रहा है ! चली आ रही मान्यताओं, परंपराओं, आस्थाओं को बिना उनकी उपयोगिता समझे-जाने दर किनार किया जा रहा है ! विज्ञों, चिंतकों, विद्वानों को देश के भविष्य की चिंता सताने लगी है ! वर्षों पहले की छेड़-छाड़ के बीजारोपण का असर अब सामने आने लगा है !  

संस्कार ! इसका मतलब हैशरीर, मन और मस्तिष्क की शुद्धि और उनको मजबूत करना ! जिससे मनुष्य  संसार में अपनी भूमिका आदर्श रूप मे निभा सके। हमारे देश-समाज में संस्कार का बहुत महत्व हुआ करता था ! संस्कार सिर्फ धार्मिक कृत्य ही नहीं होते थे ! इनमें वह सब कुछ समाहित होता था जो मनुष्य को मानव बना, उससे सारे संसार के कल्याण की कामना करवाता था ! पीढ़ी दर पीढ़ी ये परिवारों में धरोहर की तरह आगे बढ़ते-बढ़ाए जाते रहते थे ! घर के बड़ों-बुजुर्गों द्वारा बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई के अलावा इनसे भी परिचित करवाया जाता रहा था ! जहां कहीं मौज-मस्ती के कारण कुछ लोगों ने गलत आचरण किया, उसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना भी पड़ा ! जैसा कि एक प्रदेश के नशे की चपेट में बर्बाद होने का उदाहरण हम सबके सामने है ! हालांकि सभी लोग बुरे नहीं होते पर एक मछली या खटाई की एक बूँद सारे पानी या दुध को नष्ट कर धर देती है !

फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी का नाम घर-घर लिया जाने लगा ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी से अलग हो गए, पता ही नहीं चला

बाजार ! बच्चे तो, प्रतिमा बनाई जाने वाली मिट्टी की तरह होते हैं ! उन्हें जैसा ''मोल्ड'' यानी ढाला जाएगा, वे वैसे ही बन जाएंगे ! आज जब एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है तो बच्चों को सही रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी तो उनके अभिभावकों यानी उनके माता-पिता की ही बनती है ! पर यदि घर वाले अपने कार्यभार के कारण उन्हें सही ढंग से मोल्ड नहीं करेंगे तो बच्चे आसानी से बाहरी ताकतों यानी बाजार का शिकार बन विकृत रूप में ढल जाएंगे और विडंबना यही है कि ज्यादातर ऐसा ही हो रहा है ! शोध और खोज खबर के नतीजे बता रहे हैं कि कुछ समय पहले तक बाजार और उसका व्यापार 90% महिलाओं का आश्रित था ! पर आज बच्चों के सहारे उनकी 50% की आमदनी होने लगी है ! टीवी पर आने वाले विज्ञापन इस बात की पुष्टि कर ही रहे हैं ! बाजार ने अपने मतलब के लिए महिलाओं को प्रदर्शन की "चीज" और फल से होते हुए ऋषि (अ से अनार, ऋ से ऋषि) तक जाने वाले मासूमों को फल से  होते हुए जानवर (A for Apple से Z for Zebra) तक पहुंचा कर उन्हें अपना खिलौना बना डाला है ! यदि परिवार से सही मार्गदर्शन नहीं मिला तो बाजार तो बैठा ही है, उन्हें अमानुष बनाने हेतु ! 

विडंबना ! यदि बच्चों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिला और वे बाजार के हत्थे चढ़ गए तो हमारा-समाज का भविष्य और भी भयावह रूप ले लेगा ! पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बच्चों को संस्कार देगा कौन ? टूटते, मैं-तुम-हमारे तक सिमटते हुए परिवारों के ज्यादातर सदस्य पहले ही बाजार के षड्यंत्रों का शिकार हो उसी की बोली बोलने लगे हैं ! अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की इस कुशग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है ! अब इस पर आगे क्या कहा जाए ! यह तो मात्र एक झलक है, हमारी तथाकथित मॉडर्न पीढ़ी की !  

पराभव ! कुछ सालों पहले तक ज्यादातर घरों में बच्चों को दो-तीन श्लोक रटवाने की प्रथा सी थी ! दादी-नानी द्वारा जाने-अनजाने वीरों, शहीदों, नायकों की कथा-कहानी सुना बच्चों को सद्गुणी बनाने का उपक्रम होता रहता था ! फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी ने घर-घर में प्रवेश कर लिया ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने मासूम खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी जैसे साथियों से अलग हो गए, पता ही नहीं चला ! इन सब के साथ ही हमारे संस्कार भी तिरोहित होते चले गए !  

आशा ! पर कहते हैं ना कि कभी भी हताश-निराश नहीं होना चाहिए ! हर चीज का अंत निश्चित है ! जब अच्छा दौर नहीं रहा तो बुरा कैसे रह पाएगा ! घोर अँधेरी रात के बाद ही भोर की लालिमा उभरती है ! हमें बिना निराश हुए उसी का इंतजार करना है। हाँ ! इस अँधेरे के छटने तक अपना हौसला और विश्वास बनाए रखने के लिए हमें अपने स्तर पर हर संभव प्रयास भी करते रहना है !  

मंगलवार, 15 जून 2021

मेरी शेव को तो आपकी भाभी तक नोटिस नहीं करतीं

हमें लगता है कि मुझे देख लोग क्या कहेंगे ! अरे कौन से लोग ? दुनिया में कौन है जो पूरी तरह से देवता का रूप ले कर पैदा हुआ है ? हरेक इंसान में कोई ना कोई कमी होती है ! यह जो निर्माता से पैसा लेकर, मीडिया पर अवतरित हो, हमें उल्टी-सीधी चीजें बेचने की कोशिश करते हैं, वे खुद तरह-तरह की पच्चीसों बिमारियों-व्याधियों से घिरे हुए हैं। दुनिया में गोरों की संख्या से कहीं ज्यादा काले, पीले, गेहुएं रंग वालों की आबादी है। एक अच्छी खासी तादाद नाटे लोगों की है। करोंड़ों लोगों का वजन जिंदगी भर पचास का आंकड़ा नहीं छू पाता ! लाखों लोग मोटापे की वजह से ढंग से हिल-ड़ुल नहीं पाते ! गंजेपन से तंग-हार कर उसे फैशन ही बना दिया गया है ........................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग      

मेरे  मित्र त्यागराजनजी बहुत सीधे, दुनियादारी से परे एक सरल ह्रदय और खुशदिल इंसान हैं। किसी पर भी शक, शुबहा, अविश्वास करना तो उन्होंने जैसे सीखा ही नहीं है। अक्सर अपने-अपने काम से लौटने के बाद हम संध्या समय चाय-बिस्कुट के साथ अपने सुख-दुख बांटते हुए दुनिया जहान को समेटते रहते हैं। पर कल जब वह आए तो कुछ अनमने से लग रहे थे ! जैसे कुछ बोलना चाहते हों पर झिझक रहे हों ! मैंने पूछा कि क्या बात है ? कुछ परेशान से लग रहे हैं ! वे बोले, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ! मैंने कहा, कुछ तो है, जो आप मूड़ में नहीं हैं। वे धीरे से मुस्कुराए और बोले, कोई गंभीर बात नहीं है, बस ऐसे ही कुछ उल्टे-सीधे, बेतुके से विचार बेवजह भरमाए हुए हैं। सुनोगे तो आप बोलोगे कि पता नहीं आज कैसी बच्चों जैसी बातें कर रहा हूं ! मैंने कहा, अरे, त्यागराजन जी हमारे बीच ऐसी औपचारिकता कहां से आ गई ! जो भी है खुल कर कहिए ! क्या बात है। 

थोड़ा सा प्रकृतिस्ठ हो वे बोले, टी.वी. में दिन भर इतने सारे विज्ञापन आते रहते हैं, तरह-तरह के दावों के साथ ! जिनमें से अधिकतर गले से नहीं उतरते ! जबकि उनमें से अधिकांश को कोई सेलेब्रिटी या समाज के शिखर पर बैठी बड़ी-बड़ी हस्तियां पेश करती हैं। अपने दावों का सच तो प्रस्तुत करने वाले भी जानते ही होंगे ! फिर उनकी क्या मजबूरी है जो आम आदमी को गलत संदेश दे उसे भ्रमित करते रहते हैं ! ना उन्हें पैसे की कमी है, ना हीं शोहरत की ! फिर क्यूं वे ऐसा करते हैं ? अब जैसे मैं एक क्रीम शाहरूख के समझाने से वर्षों से लगा रहा हूँ ! पर मेरा रंग वैसे का वैसा ही सांवला है। मुझे लगा कि इतना बड़ा हीरो है, झूठ थोड़े ही बोलेगा मेरी स्किन में ही कोई गड़बड़ी होगी ! 

क्या कभी आपने परफ्यूम लगाए किसी ऐंड़-बैंड़ छोकरे के पीछे बदहवास सी कन्याओं को दौड़ते देखा है ? अरे, महिलाएं बेवकूफ नहीं होतीं, उनमें पुरुषों से ज्यादा शऊर, सलीका व मर्यादा होती है ! अच्छे-बुरे की पहचान युवकों से ज्यादा होती है  

मैं अपनी हंसी दबा कर बोला, क्या महाराज, आप भी किसकी बातों में आ गए ! अरे, वहां सब पैसों का खेल है ! उनकी कीमत चुकाओ और कुछ भी करवा या बुलवा लो ! उसकी बातों में सच्चाई होती तो उस क्रीम के निर्माता अपनी फैक्टरी अफ्रीका में लगाए बैठे होते, जहां चौबिसों घंटे बारहों महीने लगातार उत्पादन कर भी वे वहां की जरूरत पूरी नहीं कर पाते, पर करोंड़ों कमा रहे होते। 

त्यागराजन जी कुछ उत्साहित हो बोले, वही तो ! मैं समझ तो रहा था, पर ड़ाउट क्लियर करना चाहता था। जैसे मैं एक बहु-विज्ञापित ब्लेड़ से दाढी बनाते आ रहा हूं ! शेव करने के बाद बाहर किसी कन्या की तो बात ही छोड़िए, आपकी भाभी तक ने भी कभी नोटिस नहीं किया कि मैंने शेव बनाई भी है कि नहीं ! पर उधर इस ब्लेड के विज्ञापन में शेव बनने की देर है, कन्या हाजिर। वैसे आप तो मुझे जानते ही हैं कि यदि ऐसा कोई हादसा मेरे शेव करने पर होता तो मैं तो शेव बनाना ही बंद कर देता।  

मैं बोला, यह सब बाजार की तिकड़में हैं ! जिनमें रत्ती भर भी सच्चाई नहीं होने पर भी लोग बेवकूफ बनते रहते हैं। इनका निशाना खासकर युवा वर्ग होता है। आप ही एक बात बताईए, आप अपने काम के सिलसिले में इतना घूमते हैं ! हर छोटे-बड़े शहर में आपका आना-जाना होता है, पर क्या कभी आपने परफ्यूम लगाए किसी ऐंड़-बैंड़ छोकरे के पीछे बदहवास सी कन्याओं को दौड़ते देखा है ? अरे, महिलाएं बेवकूफ नहीं होतीं, उनमें पुरुषों से ज्यादा शऊर, सलीका व मर्यादा होती है ! अच्छे-बुरे की पहचान भी युवकों से कहीं ज्यादा होती है ! मुझे तो आश्चर्य है कि महिलाओं की प्रगति की बात करने वाले किसी भी संगठन ने ऐसे घटिया विज्ञापनों और उनके बनाने वालों पर तुरंत कार्यवाही क्यों नहीं की ! 

अच्छा एक बात बताईए ! आप भाभीजी के साथ साड़ी वगैरह तो लेने गये होंगे ? कभी किसी भी दुकान में विक्रेता को इन विज्ञापनों की तरह लटके-झटकों के साथ साड़ी बेचते देखा है ? कभी किसी बीमा एंजेंट को बस या ट्रेन में बीमा पालिसी बेचते देखा है ? किसी भी पैथी की दवा खा कर कोई शतायू हो सका है ? किसी पेय को पी कर किसी बच्चे को ताड़ सा लंबा, बलवान या कुशाग्र बनते देखा है ? किसी भी डिटर्जेंट से नए कपडे जैसी सफाई हो पाती है ? सारे कीट नाशक, साबुन, हैण्ड वाश अपने 99.9 वाले दावे से कानून से क्यूँ और कैसे बचे रह जाते हैं ? यह सब सिर्फ बाजार के इंसान के दिलो-दिमाग में घर किए बैठे किसी अनहोनी के डर का फायदा उठा अपने अस्तित्व को बचाए रखने की तिकड़में भर हैं !  

हमें सदा अपनी कमजोरियां दिखती हैं ! इसीलिए हम अपनी खूबियों को नजरंदाज करते रहते हैं। हमें लगता है कि मैं ऐसा हूं तो लोग क्या कहेंगे ! अरे कौन से लोग ? किसे फुरसत है किसी को देखने, आंकने की ! वैसे भी दुनिया में कौन ऐसा है जो पूरी तरह से देवता का रूप ले कर पैदा हुआ हो बिना किसी खामी के ? हरेक इंसान में कोई ना कोई कमी होती ही है ! यह जो निर्माता से पैसा लेकर, मीडिया पर अवतरित हो, उल्टी-सीधी चीजें हमें बेचने की कोशिश करते हैं, वे खुद तरह-तरह की पच्चीसों बिमारियों-व्याधियों से घिरे हुए हैं ! दुनिया में गोरों की संख्या से कहीं ज्यादा काले, पीले, गेहुएं रंग वालों की तादाद है। एक अच्छी खासी तादाद नाटे लोगों की है। करोंड़ों लोगों का वजन जिंदगी भर पचास का आंकड़ा नहीं छू पाता। लाखों लोग मोटापे की वजह से ढंग से हिल-ड़ुल नहीं पाते ! गंजेपन से तंग-हार कर उसे फैशन ही बना दिया गया है........! 

अब आप जरा अपनी ओर देखिए ! इस उम्र में आज भी आप पांच-सात कि.मी. चलने के बावजूद थकान महसूस नहीं करते ! किसी शारीरिक व्याधि से कोसों दूर हैं। छूट-पुट समस्या को छोड़ दें तो दवा-दारु और उसके खर्चों से बचे हुए हैं ! अपने सारे काम बिना सहायक के पूरे करने में सक्षम हैं ! यह भी तो भगवान की अनमोल देन है आपको ! आप जो हैं खुद में एक मिसाल हैं, अपने लिए ! इन टंटों में ना पड़ मस्त रहिए ! खुश और बिंदास होकर प्रभू द्वारा दी गई जिंदगी का आनंद लीजिए। 

मेरे इतने लंबे भाषण से त्यागराजनजी को कुछ-कुछ रिलैक्स होता देख मैंने अंदर की ओर आवाज लगाई कि क्या हुआ भाई, आज चाय अभी तक नहीं आई ? तभी श्रीमतीजी चाय की ट्रे लिए नमूदार हो गयीं। चाय का पहला घूंट लेते ही त्यागराजनजी बोल पड़े, भाभीजी यह टीवी पर दिखने वाली वही ताजगी वाली चाय है ना, जिसमें पांच-पांच जड़ी-बूटियां पड़ी होती हैं ?

बहुत रोकते, रोकते भी मेरा ठहाका निकल ही गया ! 


@करीब ग्यारह साल पुरानी रचना, आज भी सामयिक 

बुधवार, 4 नवंबर 2020

करवा चौथ, सोच बदलने की जरुरत है

आज कल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से  महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं। उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं 


#हिन्दी_ब्लागिंग 

करवाचौथ, हिंदू विवाहित महिलाओं का  एक महत्वपूर्ण त्यौहार।  जिसमें पत्नियां अपने  पति की  लंबी उम्र के लिए दिन भर  कठोर उपवास  रखती हैं। यह  खासकर उत्तर  भारत में  खासा लोकप्रिय पर्व है, वर्षों से मनता और मनाया जाता हुआ पति-पत्नी के रिश्तों के प्रेम का प्रतीक ! सीधे-साधे तरीके से बिना किसी ताम-झाम के, बिना कुछ या जरा सा खर्च किए, सादगी से मिल-जुल कर आपस मनाया जाने वाला एक छोटा, प्यारा, मासूम सा उत्सव। 
व्रत से जुडे हर कथानक में एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु,  सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है
इसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। जिसकी कुछ कथाएं बहुत प्रचलित हैं। जिसमें सबसे लोकप्रिय रानी वीरांवती की कथा है। जिसे पंडित लोग व्रती स्त्रियों को सुनवा, संध्या समय  जल ग्रहण करवाते हैं। इस गल्प में सात भाइयों की लाडली बहन वीरांवती का उल्लेख है जिसको कठोर व्रत से कष्ट होता देख भाई उसे धोखे से भोजन करवा देते हैं जिससे उसके पति पर विपत्ति आ जाती है और वह माता गौरी की कृपा से फिर उसे सकुशल वापस पा लेती है।
महाभारत में भी इस व्रत का उल्लेख मिलता है जब द्रौपदी पांडवों की मुसीबत दूर करने के लिए शिव-पार्वती के मार्ग-दर्शन में इस व्रत को कर पांडवों को मुश्किल से निकाल चिंता मुक्त करवाती है। 
कहीं-कहीं सत्यवान और सावित्री की कथा में भी इस व्रत को सावित्री द्वारा संपंन्न होते कहा गया है जिससे प्रभावित हो यमराज सत्यवान को प्राणदान करते हैं।
ऐसी ही एक और कथा करवा नामक स्त्री की  भी है जिसका पति नहाते वक्त नदी में घड़ियाल का शिकार हो जाता है और बहादुर करवा घड़ियाल को यमराज के द्वार में ले जाकर दंड दिलवाती है और अपनें पति को वापस पाती है।
 
करवाचौथ के व्रत से जुडी कहानी चाहे जब की हो और जैसी भी हो हर कथानक में एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी तरह-तरह के अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है। हाँ ! इस बात को कुछ अतिरेक के साथ जरूर बयान किया गया है। वैसे भी यह व्रत - त्योहार  प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी। पर आज इसे  कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा अपने आप को प्रगतिशील दिखाने के कुप्रयास में इसे पिछडे तथा दकियानूसी त्योहार की संज्ञा दी जा रही है। 
आजकल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। यह तो  इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं। उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को पाटने के बजाए और गहरा करने में सहायक होते हैं। 
वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है ! आज समय बदल गया है, पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गयी हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव ख़त्म नहीं हुए हैं।
आज एक तरफ हमारे हर त्योहार, उत्सव, प्रथा को रूढ़िवादी, अंधविश्वास, पुरातनपंथी, दकियानूसी कह कर ख़त्म करने की कोशिशें हो रही हैं। दूसरी तरफ "बाजार" उतारू है, इस जैसे मासूम से त्यौहारों को फैशन के रूप में ढालने को ! आस्था को खिलवाड का रूप दे दिया गया है। मिट्टी के बने कसोरों का स्थान मंहगी धातुओं ने ले लिया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह चाकलेट आ गया है। देखते-देखते साधारण सी चूडी, बिंदी, टिकली, धागे सब "डिजायनर" होते चले गये। दो-तीन-पांच रुपये की चीजों की कीमत 100-150-200 रुपये हो गयी। अब सीधी-सादी प्लेट या थाली से काम नहीं चलता उसे सजाने की अच्छी खासी कीमत वसूली जाती है, कुछ घरानों में छननी से चांद को देखने की प्रथा घर में उपलब्ध छननी से पूरी कर ली जाती थी पर अब उसे भी बाज़ार ने साज-संवार, दस गुनी कीमत कर, आधुनिक रूप दे महिलाओं के लिए आवश्यक बना डाला है। पावन रूप को विकृत करने की शुरुआत हुई फिल्मों से जिसने रफ्तार पकडी टी.वी. सीरियलों के माध्यम से !
अब तो सोची समझी साजिश के तहत हमारी शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों, उत्सव-त्योहारों, रस्मों-रिवाजों, परंपराओं सब पर इस गिद्ध रूपी बाज़ार को हावी करवाया जा रहा है ! समय की जरुरत है कि हम अपने ऋषि-मुनियों, गुणी जनों द्वारा दी गयी सीखों उपदेशों का सिर्फ शाब्दिक अर्थ ही न जाने उसमें छिपे गूढार्थ को समझने की कोशिश भी करें। उसमें छिपे गुणों, नसीहतों, उपदेशों को अपनाएं !

बुधवार, 22 जुलाई 2020

व्यवसाय, डर व भय का

अलग-अलग समय या आयु में डर भी तरह-तरह का होता है। बचपन में शरारत, हठ या कहना ना मानने पर ''आने दो पापा को'' कह कर अनजाने में पहली बार रोपित किया गया ! किशोरावस्था में कुछ खो जाने, पिछड़ जाने, माँ-बाप से बिछुड़ने का या अवचेतन में दफ़न किसी बात का ! युवावस्था में अनिश्चितता का, रोज़गार का, परिवार की खुशहाली का, माँ-बाप की सेहत का, अंधविश्वासों का ! और फिर प्रौढ़ा या वृद्धावस्था में तो जैसे भय, खौफ, आशंकाओं की बाढ़ सी ही आ जाती है, जिसमें मृत्यु की अवधारणा सबसे बड़ा डर होता  है  ..................! 
 
#हिन्दी_ब्लागिंग       
डर ! एक भावना है। किसी संभावित खतरे की उपस्थिति या आभास की वजह से दिलो-दिमाग व शरीर पर भी असर डालने वाले ख्यालों या विचारों की श्रृंखला को डर कहा जा सकता है। जो अन्य भावनाओं की तरह जन्म के साथ प्राणियों को नहीं मिलती, उसका रोपण समय के साथ-साथ होता या करवाया जाता है ! जो जन्म भर किसी संभावित खतरे की आशंका के रूप में सभी प्राणियों में स्थाई रूप से दिलो-दिमाग में स्थापित हो जाता है और अधिकतर जीवन इस पर पार पाने में ही गुजर जाता है। इंसान डरता ही रहता है कभी अनहोनी से, कभी परिवार के अनिष्ट से, कभी आर्थिक संकट से पर मृत्यु की अवधारणा उसका सबसे बड़ा डर होता है।

इंसान को जब किसी चीज से जोखिम महसूस होता है तो डर की भावना बढ़ जाती है ! जोखिम की आशंका किसी भी रूप में हो सकती है, चाहे वह स्वास्थ्य हो, धन हो या अपनी या परिवार की सुरक्षा हो ! वैसे अलग-अलग समय या आयु में डर भी तरह-तरह का होता है। बचपन में शरारत, हठ या कहना ना मानने पर ''आने दो पापा को'' कह कर अनजाने में पहली बार रोपित किया गया ! किशोरावस्था में कुछ खो जाने, पिछड़ जाने, माँ-बाप से बिछुड़ने का या अवचेतन में दफ़न किसी बात का ! युवावस्था में अनिश्चितता का, रोज़गार का, परिवार की खुशहाली का, माँ-बाप की सेहत का, अंधविश्वासों का ! और फिर प्रौढ़ा या वृद्धावस्था में तो जैसे भय, खौफ, आशंकाओं की बाढ़ सी ही आ जाती है ! 

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा शूरवीर हो जो किसी भी चीज से ना डरता हो। पर ऐसे लोग बेशुमार हैं जो अपने डर को दरकिनार कर दूसरों की इस कमजोरी का भरपूर लाभ उठाते हैं। आज के समय में समाज के हर तबके में भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बना ऐसे लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं। बच्चों को फेल होने का भय दिखला, कोचिंग जैसे व्यापार में लगे ''गुरु'' ! मौत का डर दिखा अपनी जिंदगी संवारते ''डॉक्टर'' ! भगवान का, काल्पनिक सुख का या यंत्रणाओं का खौफ दिखा भोले-भाले लोगों को बरगलाते, धार्मिकता का चोला पहने, अपने को ऊपरवाले का प्रतिनिधि बताते ''ढोंगी'' ! मानव की कमजोरियों का फ़ायदा उठा उल्टे-सीधे-गैर जरुरी उत्पाद बेचते मौकापरस्त-अवसरवादी व्यापारी ! सभी तो लगे हुए हैं डरे हुओं को और डराने में ! मनुष्य की एक छोटी सी कमजोरी ''डर'' दुनिया में अरबों-खरबों का व्यवसाय बन चुकी है ! आम इंसान डर-डर के इतना डर गया है कि अपने को लूटने वालों की असलियत जानने में भी डरने लगा है ! उसके डर को भुना चंट लोग उसे ही डराने में लगे हुए हैं। डरना एक आम इंसान की फितरत बन चुकी है ! अभी तो राजनीती और न्याय व्यवस्था वाला डर अलग ही खड़ा हुआ है, उसकी तो बात ही नहीं की गई !

ज्यादातर किसी भय का कारण बीते समय में हुई किसी अप्रिय घटना का ही परिणाम होता है, इसी लिए बच्चों में इसका अभाव रहता है। पर डर सिर्फ अप्रिय या नकारात्मक भावना ही नहीं है। इसकी अच्छाई भी है। इसी के कारण व्यक्ति या अन्य प्राणी समय-समय पर अपनी रक्षा भी कर पाते हैं।इसीलिए जीवन के बहुमुखी विकास के लिए व्यक्तित्व में आटे में नमक बराबर डर का होना भी जरूरी है। पर समस्या तब शुरू हो जाती है जब इंसान बिना किसी वजह के डरने लगता है। तब उसकी इस कमजोरी से उसका सारा परिवेश ही प्रभावित हो जाता है। अति तो हर चीज की खराब ही होती है ! फिर चाहे वह आक्सीजन ही क्यूँ ना हो !

डर से छुटकारा पाने या बचने के उपाय तो अनुभवी चिकित्सक, योगगुरु या चिंतक बताते ही रहते हैं। उन्हीं में से किसी एक की सलाह मान अपने ''अतिरिक्त भय'' से छुटकारा पाया जा सकता है। पर सबसे अच्छा उपाय इससे भागना नहीं बल्कि सामना करना ही है। क्योंकि अधिकतर डर बेबुनियाद ही होते हैं। 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...