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बुधवार, 18 जून 2025

गुरूजी, छतरपुर वाले

छतरपुर के मंदिर में गुरूजी का समाधिस्थल आज भी लोगों को सम्बल प्रदान कर रहा है ! वहां भक्तों की एक परिवार के रूप में रोज ही भीड़ लगी रहती है, जिसका मानना है कि उनके जीवन में कोई भी कठिनाई या संकट आए, गुरुजी की दया और आशीर्वाद हमेशा उन्हें सही रास्ता दिखाएंगे। मंदिर के भव्य परिसर में लगने वाले रोजाना के लंगर में लोगों का आपसी सौहार्द्र और सभी का एक ही परिवार का सदस्य होने का भाव साफ परिलक्षित होता है............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

अपने देश में समय-समय पर महान विभूतियों का जन्म होता रहा है। जिन्होंने समाज में पसरी बुराइयों को दूर करने और आम इंसान में चेतना जगाने, उनमें ज्ञान का बीजारोपण करने और जीवन का सही मार्ग दिखाने काम किया है। समय के साथ उनमें से कुछ विलक्षण हस्तियों को उनके अनुयायिओं ने अपना गुरु मान ईश्वर स्वरूप सम्मानित पद पर आसीन कर दिया ! ऐसे ही संतों में एक आध्यात्मिक, सम्मानित तथा अपने भक्तों में अत्यंत लोकप्रिय संत थे, छतरपुर वाले गुरूजी ! जिन्हें डुगरी वाले गुरुजी और शुक्राना गुरुजी के नाम से भी जाना जाता है। उनके अनुयायी तो उन्हें शिव जी का अंश मानते हैं !  

गुरु जी 
गुरु जी का असली नाम निर्मल सिंह था। उनका जन्म 7 जुलाई 1954 को पंजाब के मलेरकोटला जिले के डुगरी गांव में हुआ था। बचपन से ही उनका रुझान आध्यात्मिकता की ओर था, वे साधु-संतों के सान्निध्य में ही अपना समय व्यतीत किया करते थे। पर उनके पिता जी की प्रबल इच्छा थी कि वे खूब पढ़ें, उनकी कामना की कद्र करते हुए गुरु जी ने दो उपाधियां अर्जित कीं। पर उनका ध्येय और लक्ष्य तो कुछ और ही था और उसी के चलते उन्होंने 1975 में गृहत्याग कर खुद को पूर्णतया गहरी आध्यात्मिकता में रमा दिया !

आश्रम, छतरपुर 
दे शाटन पर निकले गुरूजी को उनके आत्मज्ञान और धार्मिक विश्वास ने उन्हें जल्द ही एक महत्वपूर्ण और सम्मानित मार्गदर्शक बना दिया। 1990 के दशक में उन्होंने दिल्ली के छतरपुर के भट्टी माइंस इलाके में एक भव्य शिव मंदिर की स्थापना की ! जिसे आज उनके भक्त बड़ा मंदिर के नाम से जानते हैं। यह मंदिर लाखों लोगों के लिए आस्था और भक्ति का केंद्र बना हुआ है। भक्त यहां प्रार्थना करने आते हैं, अप्रत्यक्ष रूप में उनका आशीर्वाद प्राप्त कर, उनके उपदेशों पर अमल करते हैं।
शिव जी की भव्य प्रतिमा 
गुरु जी ने हमेशा अपने अनुयायियों को, जिनमें देश-विदेश की कई जानी-मानी हस्तियां भी शामिल हैं, प्रेमदया, और करुणा का संदेश दिया। उनका मानना था कि सभी धर्म समान हैं और ईश्वर एक ही है। उन्होंने यह सिखाया कि आध्यात्मिकता का असली अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांडों में नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के दिल में होता है। उनका कहना था कि हमें अपनी आत्मा के साथ गहरे संबंध बनाने के लिए एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए और दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
समाधी 
गुरु जी ने 31 मई 2007 को शरीर त्याग दिया, पर उनके उपदेश आज भी उनके अनुयायियों का सकारात्मक मार्गदर्शन कर उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में सहायक हो रहे हैं ! छतरपुर के मंदिर में गुरूजी का समाधिस्थल आज भी लोगों को सम्बल प्रदान कर रहा है ! वहां भक्तों की एक परिवार के रूप में रोज ही भीड़ लगी रहती है, जिसका मानना है कि उनके जीवन में कोई भी कठिनाई या संकट आए, गुरुजी की दया और आशीर्वाद हमेशा उन्हें सही रास्ता दिखाएंगे। मंदिर के भव्य परिसर में लगने वाले रोजाना के लंगर में लोगों का आपसी सौहार्द्र और सभी का एक ही परिवार का सदस्य होने का भाव साफ परिलक्षित होता है। मंदिर के अंदर-बाहर सैंकड़ों स्वयंसेवक, बिना किसी अपेक्षा के खुशी-खुशी, समर्पित भाव से वहां रोज आने वाले हजारों लोगों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं !  
भीतरी कक्ष 
किसी को भी गुरु, नायक या मार्गदर्शक का दर्जा देने में आम जनता की श्रद्धा-विश्वास तथा आस्था का बड़ा हाथ होता है ! जीवन की आपा-धापी की प्रचंड लपटों में जरा सी ठंडी बयार भी अत्यधिक सकून दे जाती है, भले ही वह प्रकृतिप्रदत्त हो ! पर हताश-निराश सर्वहारा को जब किसी के माध्यम से जरा सी भी राहत का एहसास होता है तो वह आँख मूँद कर उसे ही ईश्वर मान बैठता है ! एक सच्चे मार्गदर्शक, रहबर या समर्पित रहनुमा का मिलना सहरा में जल की उपलब्धि जैसा ही है ! आज के युग में जब कदम-कदम पर छल-कपट-फरेब अपना डेरा डाले बैठे हों तब इंसान को खुद के विवेक का सहारा ले, हंस जैसा होना चाहिए जिससे नीर-क्षीर की पहचान हो सके और प्रभु के सच्चे बंदे का सानिध्य मिल सके !

@संदर्भ व चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 8 जून 2025

नीब करौरी बाबा, कैंची धाम

एक बार अनजाने में बाबा जी को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीम करौली गांव के पास ट्रेन से उतार दिए जाने के बाद काफी कोशिशों और जद्दोजहद के बावजूद रेल गाड़ी एक इंच भी चल नहीं पाई थी ! उसके बाद उनसे विनम्रता पूर्वक क्षमा याचना कर, गाड़ी में सवार करवाने के पश्चात ही वह अपनी जगह से हिली थी ! तबसे उस अलौकिक घटनास्थल के नाम पर बाबा जी को नीम करौली बाबा कहा जाने लगा.......! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कैंची धाम उत्तराखंड राज्य के नैनीताल शहर से 17 की.मी. की दूरी पर अल्मोड़ा-नैनीताल मार्ग पर भवाली नामक स्थान के पास स्थित है। इसकी स्थापना हनुमान जी के परम भक्त, नीब करौरी बाबा, जिनका असली नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था, द्वारा 1964 के दशक में 15 जून को एक छोटी सी पहाड़ी नदी शिप्रा के पास करवाई गई थी। वे अक्सर इस नदी के किनारे अपनी धुन में बैठे रहा करते थे। उस समय यहां दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी, पर ऐसे दो अनोखे घुमावदार मोड़ थे, जो कैंची जैसा आकार बनाते हैं, इसलिए जगह की पहचान के लिए इस आश्रम को कैंचीधाम का नाम दे दिया गया ! 

कैंची धाम 

नीब करौरी बाबा या महाराज जी की गणना बीसवीं सदी के महान संतों में होती है। अपने जीवन काल में उन्होंने जगह-जगह भ्रमण करते हुए कई आश्रम तथा मंदिर बनवाए थे, जिनमें वृंदावन और कैंची धाम आश्रम प्रमुख हैं। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध का काफी समय उन्होंने कैंची धाम में ही बिताया था। इस जगह पर आश्रम और हनुमान जी के मंदिर का निर्माण उन्होंने अपने दो स्थानीय शिष्यों, प्रेमी बाबा और सोमवारी महाराज की पूजा-अर्चना की सुविधा के लिए करवाया था। 

नीब करौरी बाबा 
बाबा जी के पानी को घी में बदलने, बच्चे की जान बचाने, अपने भक्त को धूप से बचाने के लिए बादलों की छतरी बनाने जैसे अनगिनत चमत्कारों की कहानियां हैं ! जिनमें सबसे प्रमुख वह घटना है जब बाबा जी को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीम करौली गांव के पास ट्रेन से उतार दिए जाने के बाद काफी कोशिशों और जद्दोजहद के बावजूद रेल गाड़ी एक इंच भी चल नहीं पाई थी और फिर उनसे विनम्रता पूर्वक क्षमा याचना कर, गाड़ी में सवार करवाने के पश्चात ही वह अपनी जगह से हिली थी ! तबसे उस अलौकिक घटनास्थल के नाम पर बाबा जी को नीम करौली बाबा कहा जाने लगा। 
हनुमान प्रतिमा  
हमेशा एक कंबल ओढ़े रहने वाले बाबा के आर्शीवाद के लिए भारतीयों के साथ-साथ बड़ी-बड़ी विदेशी हस्तियां भी उनके आश्रम पर आती रही हैं। पं. गोविंद वल्लभ पंत, डॉ. सम्पूर्णानन्द, राष्ट्रपति वीवी गिरि, उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरुप पाठक, जवाहर लाल नेहरू, जुगल किशोर बिड़ला, महाकवि सुमित्रानन्दन पंत, जैसी महान हस्तियों के साथ-साथ कई विदेशी जाने-माने नाम यहां आकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते रहे हैं ! जिनमें फेसबुक और एप्पल जैसी कंपनियों के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग और स्टीव जॉब भी शामिल हैं ! 
आश्रम में प्रतिष्ठित बाबा जी की प्रतिमा 
वैसे तो सुरम्य, मनोरम, हरियाली से घिरे आश्रम में, जुलाई अगस्त को छोड़, साल भर कभी भी जाया जा सकता है। पर मार्च से जून और सितम्बर से नवंबर का समय सबसे उपयुक्त होता है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम और हवाई मार्ग के लिए पंतनगर हवाई अड्डा है, जहां से सड़क मार्ग से आगे जाया जा सकता है। 
कृतार्थी 
कैंची धाम में साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, जो यहां पहुंच कर भक्तिभाव व श्रद्धा से बाबा का दर्शन कर कृतार्थ होते हैं। प्रतिवर्ष 15 जून को आश्रम के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य पर यहां एक विशाल मेले व भंडारे का आयोजन किया जाता है। ऐसी दृढ आस्था और मान्यता है कि यहां पर श्रद्धा एवं विनयपूर्वक की गई प्रार्थना कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। यहां पर हर मनोकामना हमेशा पूर्ण होती है। 

@एक के अलावा, सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

वैलेंटाइन दिवस, दो तबकों की रंजिश का प्रतीक तो नहीं.......?

वैलेंटाइन दिवस, जिसे प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित किया गया था,  वह अब मुख्य रूप से प्रेमी जोड़ों के प्यार के त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा है। इसमें भी एक कटु सत्य यह है कि इसको मनाने वाले अधिकांश, या कहिए मुट्ठी भर लोगों को छोड़, शायद ही कोई वैलेंटाइन को याद भी करता होगा या उसके बारे में कुछ जानता भी होगा ! ऐसे लोगों के लिए यह दिन सिर्फ सारी वर्जनाओं को ताक पर रखने या उन्हें तोड़ने का मौका होता है ! यही कारण है कि शुरुआत के दिनों की उस एक दिनी फिल्म ने आज हफ्ते भर के सीरियल का रूप ले लिया है...........!!
 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
 
अपने देश के एक खास तबके को पश्चिम सदा से आकर्षित करता रहा है ! वहां की हर अच्छी-बुरी बात को अपनाने की ललक सदा से इसवर्ग में रही है ! हो सकता है कि सैकड़ों सालों की परवशता और उससे उपजी हीन मानसिकता या फिर वहां  की चकाचौंध इसका कारण  हो,  पर यह सच्चाई है !  इसी मनोवृत्ति के कारण वसंतोत्सव,  करवा चौथ,  भाई दूज जैसे अपने परंपरागत मासूम त्योहारों का मजाक बना कर, उन्हें आयातित उत्सवों के सामने कमतर साबित करने की कुत्सित कोशिश की जाती रही,  पर जनमानस का साथ ना मिलने पर उन पर आधुनिकता का मुल्लमा चढ़ा कर, बाजार की सुरसा भूख के हवाले कर दिया गया ! आज उसका परिणाम सबके सबके सामने है !
 
वसंत
किसी की अच्छाई अपनाने में कोई बुराई नहीं है, पर उस बात का अपने परिप्रेक्ष्य, माहौल, परिस्थियों के अनुसार उनके औचित्य का आकलन जरूर होना चाहिए, जो कभी नहीं किया गया ! ऐसे ही 1992 के दशक के आस-पास हमारे किशोरों, युवक-युवतियों को निशाना बना, जिस एक-दिनी वैलेंटाइन दिवस जैसे जलसे का बीजारोपण किया गया था, वह आज एक विशाल वृक्ष बन चुका है ! उसी की छांव में आज का मौकापरस्त बाजार अपना तमाशा शुरू कर, युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता ! यही कारण है कि शुरुआत के दिनों की उस एक दिनी फिल्म ने आज हफ्ते भर के सीरियल का रूप ले लिया है!

14 फरवरी, वैलेंटाइन दिवस, जिसे योजनाबद्ध तरीके से सदियों पहले रोम में समाज के लोगों के बीच आपसी प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित कर एक विशेष दिन का रूप दिया गया, क्या वह उस समय के वहां के दो शक्तिशाली गुट, राजपरिवार और धर्मगुरुओं की सत्ता लालसा का कारण तो नहीं था ! क्योंकि उस समय रोम में ये दोनों धड़े अपनी-अपनी जगह काफी शक्तिशाली थे और समाज पर दोनों का ही अच्छा-खासा दबदबा हुआ करता था !
 
रोम में तीसरी सदी में राजा क्लॉडियस का शासन था। एस समय किसी बिमारी से काफी लोगों के मारे जाने के कारण रोमन सेना में सैनिकों की भारी कमी हो गई ! उधर शादी के बाद ज्यादातर सैनिक सेना से विमुख हो जाते थे ! सो क्लॉडियस ने सैनिकों के परम्परागत विवाह पर रोक लगा दी। उसका मानना था कि अविवाहित पुरुष ही सेना में अच्छी तरह से अपना कर्त्तव्य निभा सकते हैं ! क्योंकि उन पर परिवार की अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं होती, उनका ध्यान नहीं भटकता ! यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो राजा द्वारा बनाया गया वह कानून गलत भी नहीं था, उसने तो देशहित के लिए वैसा कदम उठाया था ! जिससे रोम की सेना शक्तिशाली और देश की सुरक्षा सुदृढ़ बनी रह सके !  

वैसे तो वैलेंटाइन नाम के बहुत से संत हुए हैं पर यह वाकया उस वक्त के रोम के इसी नाम के एक पादरी संत वैलेंटाइन से जुड़ा हुआ है, जिन्हें जनता का अपार स्नेह तथा वहां के धर्म गुरुओं का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। दोनों धड़ों की आपसी रंजिश को राजा के उस कानून ने और हवा दे दी ! धर्म गुरुओं को प्रजा को अपनी तरफ करने का मौका मिल गया ! उन्होंने  वैलेंटाइन को आगे कर राजा क्लैडियस के आदेश की खिलाफत करनी शुरू कर दी ! वैलेंटाइन ने गुप्त रूप से सैनिकों का विवाह करवाना शुरू कर दिया। इस बात की जानकारी जब राजा को हुई तो उसने उनको मौत की सजा सुना दी ! 14 फरवरी 269 को संत वैलेंटाइन को मौत के घाट उतार दिया गया। फिर 496 ई. में पोप ग्लेसियस ने इस दिन को उस संत के नाम पर "सेंट वैलेंटाइन्स डे" घोषित कर दिया।

वैलेंटाइन दिवस, जिसे समाज के लोगों के बीच आपसी प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित कर, संत वैलेंटाइन को दी गई मौत की सजा वाली तारीख, 14 फरवरी के दिन से  शुरू किया गया था, वह अब दुनिया भर में अपना रूप बदल, मुख्य रूप से प्रेमी जोड़ों के प्यार के त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा है। इसमें भी एक कटु सत्य यह है कि इसको मनाने वाले अधिकांश, या कहिए मुट्ठी भर लोगों को छोड़, शायद ही कोई वैलेंटाइन को याद भी करता होगा या उसके बारे में कुछ जानता भी होगा ! ऐसे लोगों के लिए यह दिन सिर्फ सारी वर्जनाओं को ताक पर रखने या उन्हें तोड़ने का मौका होता है ! 
 
सेंट वैलेंटाइन का होना एक सच्चाई है ! उनको मारा गया, यह भी सच्चाई है ! कई चर्चों में  उनकी निशानियां या अवशेष भी हैं, यह भी सच्चाई है ! पर जो कथाएं, किवदंतियां, दंतकथाएं उनको ले कर जनमानस में चल रही हैं, उनमें कितनी सच्चाई है, यह नहीं कहा जा सकता ! क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें मृत्युदंड राजद्रोह के लिए नहीं बल्कि धर्मद्रोह के लिए दिया गया था ! तो असलियत क्या है ? कहा नहीं जा सकता ! अब जो है वो तो हइए है 😌

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अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...