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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

अनोखी समाधि, एक महावृक्ष की

पुरोला देवता रेंज के चीड़ के पेड़ों में एक ऐसा वृक्ष भी था, जिसकी बढ़त आम पेड़ों से अलग थी। समय के साथ 2.70 मीटर की मोटाई वाले तने के इस पेड़ की ऊंचाई 60.65 मीटर तक पहुँच गई थी ! इस खूबी के कारण वह एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा चीड़ का पेड़ बन गया था ! जब यह खबर पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंची तो 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने एशिया के इस सबसे बड़े और ऊँचे चीड़ के पेड़ को सम्मानित करते हुए इसे ''महावृक्ष'' की उपाधि से नवाज, सम्मानित किया................!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 
माधि ! वैसे तो यह योग की अंतिम अवस्था है, जब साधक ध्येय वस्तु के ध्यान मे पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का भी ज्ञान नहीं रहता ! योग और समाधि एक दूसरे के पूरक शब्द हैं ! परंतु साधारण बोलचाल में इसे चलायमान प्राणियों के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है ! जब किसी मृत व्यक्ति या प्राणी का जिस जगह अंतिम संस्कार होता है और उस जगह पर उसकी स्मृति में कोई स्मारक बना दिया जाता है तो उस जगह को उस व्यक्ति या प्राणी की समाधि कहते हैं। पर क्या किसी पेड़ की भी समाधी हो सकती है ?
समाधि स्थल 
जी हाँ ! उत्तराखंड के उत्तरकाशी से 160 किमी की दूरी पर टौंस वन प्रभाग, पुरोला देवता रेंज के अंतर्गत मोरी-त्यूणी सड़क मार्ग पर टौंस नदी के किनारे स्थित है एक अनोखी समाधि ! जिसका एशिया के सबसे बड़े चीड़ के वृक्ष, जिसे पर्यावरण मंत्रालय ने ''महावृक्ष'' की उपाधि प्रदान की थी, की याद को बनाए रखने के लिए वन विभाग द्वारा निर्माण किया गया है ! इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है ! पर जिन्हें इस अनोखी और सुरम्य जगह का पता है, वह यहां मौका मिलते ही जरूर आते हैं !

अनोखी जगह 
त्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के पुरोला देवता रेंज में चीड़ के पेड़ों का एक जंगल है जिसका रखरखाव पर्यावरण मंत्रालय के वन-विभाग द्वारा किया जाता है। वहीं 220 साल की आयु का एक ऐसा वृक्ष भी था, जिसकी बढ़त आम पेड़ों से अलग थी। समय के साथ 2.70 मीटर की मोटाई वाले तने के इस पेड़ की ऊंचाई 60.65 मीटर तक पहुँच गई थी ! इस खूबी के कारण वह एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा चीड़ का पेड़ बन गया था ! जब यह खबर पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंची तो 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने एशिया के इस सबसे बड़े और ऊँचे चीड़ के पेड़ को सम्मानित करते हुए इसे ''महावृक्ष'' की उपाधि से नवाज, सम्मानित किया ! 

पर्यटकों का आकर्षण 
पर इस धरा पर जो भी आया है उसे जाना ही पड़ता है ! हर एक का समय निश्चित है ! यह महावृक्ष भी कवक रोग से ग्रसित हो गया ! कोई उपचार काम नहीं आया ! धीरे-धीरे यह अंदर से खोखला हो कमजोर होता चला गया और 2007 में आए एक भीषण तूफान का सामना ना कर सकने के फलस्वरूप धराशाई हो गया ! वन विभाग ने इसके मान और गौरव का ध्यान रखते हुए इस पेड़ के तनों के साथ ही इस पेड़ के अलग-अलग हिस्सों को संरक्षित कर नदी किनारे एक संग्रहालय बना, उसके आस-पास इको पार्क का निर्माण करवा, उसे चीड़ के पेड़ की समाधि-स्थल का नाम दे दिया ! 
चीड़ वन 
दे वभूमि उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ग्लेशियरों, नदियों, झीलों, तालों, बुग्यालों के लिए तो प्रसिद्ध है ही, इस चीड़ के पेड़ की समाधि को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं और उसके आसपास बने इको पार्क में भी समय व्यतीत करते हैं। महावृक्ष समाधि स्थल पर्यटकों के लिए हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र बना रहा है, कभी समय और अवसर मिले तो जरूर जाइएगा !

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 8 जून 2025

नीब करौरी बाबा, कैंची धाम

एक बार अनजाने में बाबा जी को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीम करौली गांव के पास ट्रेन से उतार दिए जाने के बाद काफी कोशिशों और जद्दोजहद के बावजूद रेल गाड़ी एक इंच भी चल नहीं पाई थी ! उसके बाद उनसे विनम्रता पूर्वक क्षमा याचना कर, गाड़ी में सवार करवाने के पश्चात ही वह अपनी जगह से हिली थी ! तबसे उस अलौकिक घटनास्थल के नाम पर बाबा जी को नीम करौली बाबा कहा जाने लगा.......! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कैंची धाम उत्तराखंड राज्य के नैनीताल शहर से 17 की.मी. की दूरी पर अल्मोड़ा-नैनीताल मार्ग पर भवाली नामक स्थान के पास स्थित है। इसकी स्थापना हनुमान जी के परम भक्त, नीब करौरी बाबा, जिनका असली नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था, द्वारा 1964 के दशक में 15 जून को एक छोटी सी पहाड़ी नदी शिप्रा के पास करवाई गई थी। वे अक्सर इस नदी के किनारे अपनी धुन में बैठे रहा करते थे। उस समय यहां दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी, पर ऐसे दो अनोखे घुमावदार मोड़ थे, जो कैंची जैसा आकार बनाते हैं, इसलिए जगह की पहचान के लिए इस आश्रम को कैंचीधाम का नाम दे दिया गया ! 

कैंची धाम 

नीब करौरी बाबा या महाराज जी की गणना बीसवीं सदी के महान संतों में होती है। अपने जीवन काल में उन्होंने जगह-जगह भ्रमण करते हुए कई आश्रम तथा मंदिर बनवाए थे, जिनमें वृंदावन और कैंची धाम आश्रम प्रमुख हैं। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध का काफी समय उन्होंने कैंची धाम में ही बिताया था। इस जगह पर आश्रम और हनुमान जी के मंदिर का निर्माण उन्होंने अपने दो स्थानीय शिष्यों, प्रेमी बाबा और सोमवारी महाराज की पूजा-अर्चना की सुविधा के लिए करवाया था। 

नीब करौरी बाबा 
बाबा जी के पानी को घी में बदलने, बच्चे की जान बचाने, अपने भक्त को धूप से बचाने के लिए बादलों की छतरी बनाने जैसे अनगिनत चमत्कारों की कहानियां हैं ! जिनमें सबसे प्रमुख वह घटना है जब बाबा जी को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नीम करौली गांव के पास ट्रेन से उतार दिए जाने के बाद काफी कोशिशों और जद्दोजहद के बावजूद रेल गाड़ी एक इंच भी चल नहीं पाई थी और फिर उनसे विनम्रता पूर्वक क्षमा याचना कर, गाड़ी में सवार करवाने के पश्चात ही वह अपनी जगह से हिली थी ! तबसे उस अलौकिक घटनास्थल के नाम पर बाबा जी को नीम करौली बाबा कहा जाने लगा। 
हनुमान प्रतिमा  
हमेशा एक कंबल ओढ़े रहने वाले बाबा के आर्शीवाद के लिए भारतीयों के साथ-साथ बड़ी-बड़ी विदेशी हस्तियां भी उनके आश्रम पर आती रही हैं। पं. गोविंद वल्लभ पंत, डॉ. सम्पूर्णानन्द, राष्ट्रपति वीवी गिरि, उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरुप पाठक, जवाहर लाल नेहरू, जुगल किशोर बिड़ला, महाकवि सुमित्रानन्दन पंत, जैसी महान हस्तियों के साथ-साथ कई विदेशी जाने-माने नाम यहां आकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते रहे हैं ! जिनमें फेसबुक और एप्पल जैसी कंपनियों के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग और स्टीव जॉब भी शामिल हैं ! 
आश्रम में प्रतिष्ठित बाबा जी की प्रतिमा 
वैसे तो सुरम्य, मनोरम, हरियाली से घिरे आश्रम में, जुलाई अगस्त को छोड़, साल भर कभी भी जाया जा सकता है। पर मार्च से जून और सितम्बर से नवंबर का समय सबसे उपयुक्त होता है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम और हवाई मार्ग के लिए पंतनगर हवाई अड्डा है, जहां से सड़क मार्ग से आगे जाया जा सकता है। 
कृतार्थी 
कैंची धाम में साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, जो यहां पहुंच कर भक्तिभाव व श्रद्धा से बाबा का दर्शन कर कृतार्थ होते हैं। प्रतिवर्ष 15 जून को आश्रम के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य पर यहां एक विशाल मेले व भंडारे का आयोजन किया जाता है। ऐसी दृढ आस्था और मान्यता है कि यहां पर श्रद्धा एवं विनयपूर्वक की गई प्रार्थना कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। यहां पर हर मनोकामना हमेशा पूर्ण होती है। 

@एक के अलावा, सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

केदारनाथ मंदिर, हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियो, वैज्ञानिकों की विद्वता का साक्षात प्रमाण

उस समय कितना बड़ा असम्भव कार्य रहा होगा ऐसी जगह पर इतने भव्य मन्दिर को बनाना, जहां ठंड के दिनों में भारी मात्रा में बर्फ जमी रहती हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी का बहाव कहर बरपाता हो ! ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में 1200 साल से भी पहले ऐसा अप्रतिम मंदिर कैसे बनाया गया होगा, वह भी उन पत्थरों से जो यहां दूर दूर तक कहीं भी उपलब्ध नहीं है ! तो उनको वहां तक कैसे लाया गया होगा ! कैसे हमारे पुरातन भारतीय विज्ञान के जानकारों ने उस शिला को, जिसका उपयोग 6 फुट ऊंचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है, मंदिर स्थल तक पहुंचाया होगा ! ढेरों सवाल हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

केदारनाथ मंदिर भारत के उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जिले में भगवान शिव का विश्वप्रसिद्ध मंदिर है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में स्थित मंदिर का शिवलिंग अति प्राचीन है ! यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ ही चार धाम और पंच केदारों में से भी एक है ! यहाँ की विषम जलवायु और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इसके कपाट, प्रभु दर्शनार्थ सिर्फ अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही खुलते हैं ! पत्‍थरों से कत्यूरी शैली में बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडवों के पौत्र महाराजा जन्मेजय ने तथा इस का जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य जी ने करवाया था ! इसकी आयु का कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है पर विज्ञान के अनुसार इसका निर्माण 8वीं शताब्दी में हुआ था ! वैसे तत्कालीन विवरणों के अनुसार यह मंदिर कम से कम 1200 वर्षों से अपने अस्तित्व में है !

मंदिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। इसके मुख्य भाग, मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है, गर्भ गृह, मध्य भाग व सभा मण्डप। गर्भ गृह के मध्य में भगवान श्री केदारेश्वर जी का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है, जिसके अग्र भाग पर गणेश जी की आकृति और साथ ही माँ पार्वती का श्री यंत्र विद्यमान है। ज्योतिर्लिंग पर प्राकृतिक यज्ञोपवीत और इसके पृष्ठ भाग पर प्राकृतिक स्फटिक माला को आसानी से देखा जा सकता है । श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग में नव लिंगाकार विग्रह विद्यमान हैं, इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को नवलिंग केदार भी कहा जाता है।

मंदिर के बारे में जो कथा यह है कि हिमालय के केदार शृंग पर भगवान् विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने प्रकट हो उनकी प्रार्थनानुसार यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है। इस दुर्गम स्थल तक की यात्रा आज भी सबसे कठिनताम यात्राओं में से एक है, जहां किसी भी गाड़ी का पहुँचना लगभग नामुमकिन है !

इसके एक तरफ 22,000 फीट ऊंची केदारनाथ की पहाड़ी है तो दूसरी तरफ 21,600 फीट ऊंची कराचकुंड और तीसरी तरफ 22,700 फीट ऊंचा भरतकुंड है ! इन तीन पर्वतों से होकर बहने वाली पांच नदियां हैं, मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदरी। इन सब का ब्यौरा हमारे पुराणों में उपलब्ध है ! केदारनाथ के संबंध में लिखा गया है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किए बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों का नाश कर मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।

यह क्षेत्र मंदाकिनी नदी का एकमात्र जल-संग्रहण क्षेत्र है। यह मंदिर अपने आप में एक अद्भुत कलाकृति है ! इसे देख कर हर इंसान सोच में पड़ जाता है कि उस समय कितना बड़ा असम्भव कार्य रहा होगा ऐसी जगह पर इतने भव्य मन्दिर को बनाना, जहां ठंड के दिनों में भारी मात्रा में बर्फ जमी रहती हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी का बहाव कहर बरपाता हो ! ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में 1200 साल से भी पहले ऐसा अप्रतिम मंदिर कैसे बनाया गया होगा ! जबकि 1200 साल बाद भी उस क्षेत्र में अभी भी बिना हेलिकॉप्टर से कुछ भी ले जाया जाना असंभव सा है ! मशीनों के बिना आज भी जहां एक छोटा सा ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता, वहीं यह मंदिर वर्षों से खड़ा है और न सिर्फ खड़ा है, बल्कि बहुत मजबूती से टिका भी हुआ है !

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी, देहरादून ने केदारनाथ मंदिर की चट्टानों पर लिग्नोमैटिक डेटिंग का परीक्षण किया, जो "पत्थरों के जीवन" की पहचान करने के लिए किया जाता है। परीक्षण से पता चला कि मंदिर 14वीं सदी से लेकर 17वीं सदी के मध्य तक पूरी तरह से बर्फ में दब गया था !आश्चर्य की बात है कि फिर भी  मंदिर के निर्माण ढांचे में कहीं कोई नुकसान नहीं हुआ ! मंदिर ने प्रकृति के हर चक्र में अपनी ताकत बनाए रख अपने को सुरक्षित रखा है ! मंदिर के इन मजबूत पत्थरों को बिना किसी सीमेंट के "एशलर" तरीके से एक साथ चिपका दिया गया है। इसलिए पत्थर के जोड़ पर तापमान परिवर्तन का किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड़ता जो कि मंदिर की अभेद्य ताकत व क्षमता है। 

मंदिर निर्माण की एक अनोखी बात यह भी है कि इसमें इस्तेमाल किया गया पत्थर बहुत सख्त और टिकाऊ है। इस पत्थर की विशेषता यह है कि 400 साल तक बर्फ के नीचे दबे रहने के बाद भी इसके "गुणों" में कोई अंतर नहीं आता है ! इसके साथ ही एक खास बात यह है कि ऐसा पत्थर यहां से दूर दूर तक कहीं भी उपलब्ध नहीं है ! तो उस पत्थर को वहां तक कैसे ले जाया गया होगा ! जबकि उस समय इतने बड़े पत्थरों को ढोने के लिए विशेष अपकरण भी उपलब्ध नहीं थे ! कैसे हमारे पुरातन भारतीय विज्ञान ने उस शिला को, जिसका उपयोग 6 फुट ऊंचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है, मंदिर स्थल तक पहुंचाया होगा ! ढेरों सवाल हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है !

साल 2013 में केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ के बारे में सभी को पता है ! इस दौरान जहां लगभग सब कुछ तबाह हो गया था, वहीं इतनी बड़ी विभीषिका के बावजूद भी केदारनाथ मंदिर का पूरा ढांचा जरा भी प्रभावित नहीं हुआ ! भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक, बाढ़ के बाद भी मंदिर का 99 फीसदी ढांचा पूरी तरह सुरक्षित है ! "आईआईटी मद्रास" ने भी अपने "एनडीटी परीक्षण" में इसे पूरी तरह से सुरक्षित और मजबूत पाया है ! यानी विज्ञान के अनुसार मंदिर के निर्माण में जिस पत्थर और संरचना का इस्तेमाल किया गया है, तथा जिस दिशा में इसे बनाया गया उसी की वजह से यह मंदिर इस त्रासदी से बच पाया है ! कितने आश्चर्य की बात है कि सदियों पहले कैसे उस स्थान और दिशा की खोज की गई होगी, जहां पर मंदिर अपने निर्माण के सैकड़ों साल बाद भी सुरक्षित बना रह सके ! केदारनाथ मंदिर "उत्तर-दक्षिण" दिशा के अनुरूप बनाया गया है। जबकि भारत में लगभग सभी मंदिर "पूर्व-पश्चिम" दिशा के अनुरूप हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह मंदिर "पूर्व-पश्चिम" की स्थिति में होता तो पहले ही कब का नष्ट हो चुका होता !

यह इस जगह की दैवीय शक्ति और प्रभु की कृपा ही थी कि 2013 में, मंदिर के पिछले हिस्से में दैवयोग से पहाड़ की ऊंचाइयों की तरफ से एक बड़ी चट्टान आ कर फंस गई, जिससे विकराल पानी की धार दो भागों में विभाजित हो गई ! पानी का प्रचंड वेग मंदिर के दोनों किनारों पर बने निर्माणों को तो अपने साथ लेता चला गया, लेकिन मंदिर और मंदिर में शरण लेने वाले लोग सुरक्षित रहे ! जिन्हेंअगले दिन भारतीय वायुसेना ने एयरलिफ्ट कर सुरक्षित निकाल लिया ! सवाल यह नहीं है कि आस्था पर विश्वास किया जाए या नहीं ! लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि मंदिर के निर्माण के लिए स्थल, उसकी दिशा, उसकी निर्माण सामग्री और यहां तक ​​कि प्रकृति को भी ध्यान में रख इस भव्य मंदिर का निर्माण किया गया था जो 1200 वर्षों के बाद भी अपनी संस्कृति और ताकत को बनाए रख रहा है ! 

आज हम सदा नतमस्तक हैं, अपने ऋषि-मुनियों तथा प्राचीन वैज्ञानिकों के ज्ञान पर, उनकी महानता पर, जिन्होंने वास्तुकला, मौसम विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, आयुर्वेद में इतनी महारतता हासिल कर ली थी ! जिन्होंने तमाम प्राकृतिक विपदाओं, असंख्य अड़चनों और विपरीत परिस्थियों के बावजूद इस दुर्गम स्थल पर स्थित ज्योतिर्लिग पर एक भव्य मंदिर बनाने का संकल्प पूरा किया था ! यह एक उदाहरण है हमारे उन्नत तथा उत्कर्ष वैदिक हिंदू धर्म और संस्कृति का ! हमें गर्व है कि हम भारतीय हैं ! भारतीय संस्कृति हमारी धरोहर है और उसी आस्था व विश्वास पर भारत को नाज है जिसे सम्पूर्ण विश्व अचरज से देखता है किन्तु आधिपत्य स्वीकार करने से बचता है ! पर किसी के मानने  ना मानने से क्या होता है ! सच्चाई सदा सच्चाई रहेगी ! हम सबको विश्वास है अपनी आस्था, अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं पर जो सदैव मजबूत व बुलंद रहेंगी ! 

@संदर्भ और चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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