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गुरुवार, 17 जुलाई 2025

सीधी पर अबूझ, शिवशक्ति रेखा

हमारे देश की मिटटी के कण-कण में धार्मिकता व्याप्त है ! जल-थल-पवन-गगन सभी जगहों पर देवत्व की रहस्यमय पर अलौकिक उपस्थिति महसूस की जाती है ! ऐसी ही एक रहस्यमय उपस्थिति है, शिवशक्ति रेखा ! यह कोई भौगोलिक रेखा नहीं है, पर यदि उत्तर के उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ मंदिर से सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु में स्थित रामेश्वरम तक 79* देशांतर की एक रेखा की कल्पना की जाए तो आश्चर्यजनक रूप से उस पर शिव जी के सात मंदिर एक सीध में बने नजर आते हैं, जो सिर्फ संयोग नहीं है.................!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जब-जब अपने देश की वे उपलब्धियां जिन्हें हमारे विद्वानों ने प्राचीन काल में ही हासिल कर लिया था, सामने आती हैं तो गर्व से पूरी देह उमग उठती है ! पर इसके साथ ही जब उन मुठ्ठी भर लोगों की कारस्तानियां उजागर होती हैं, जिन्होंने षड्यंत्रवश, अपने छद्म इतिहास में उन खूबियों को स्थान ना दे या उन्हें कल्पित बता, देश के जनमानस को गुमराह किया, हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा रचित ग्रंथों को झुठला कर पीढ़ी-दर-पीढ़ी गलत जानकारियां दीं, तब ऐसा आक्रोश उमड़ता है कि ऐसी हरकत करने वालों को तो सरे राह दंडित किया जाना चाहिए ! दंड भी ऐसा कि उनकी पीढ़ियां याद रखें !

शिव और शक्ति 
हमारे ऋषि-मुनि तो ज्ञान का सागर रहे हैं ! उन्हीं का प्रताप है कि हम दुनिया के सिरमौर रहे ! क्या-क्या खोजें उन्होंने नहीं कीं ! यदि सबका विवरण लिखने बैठें तो पूरा ग्रंथ बन जाएगा ! अभी सावन का पावन समय चल रहा है और यह माह शिव जी को समर्पित है तो आज उन्हीं से संबंधित एक अद्भुत, अद्वितीय, अनोखी, शिवशक्ति रेखा की बात ! जिसका विस्तार उत्तराखंड के केदारनाथ ज्योतिर्लिंग से लेकर दक्षिण के रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग तक एक सीध में करीब 2382 कि.मी. तक माना जाता है।  

नम: शिवाय 
भारत एक ऐसा देश है जिसकी मिटटी के कण-कण में धार्मिकता व्याप्त है ! जल-थल-पवन-गगन सभी जगहों पर देवत्व की रहस्यमय पर अलौकिक उपस्थिति महसूस की जाती है ! ऐसी ही एक रहस्यमय उपस्थिति है यह शिवशक्ति रेखा ! यह कोई भौगोलिक रेखा नहीं है पर यदि उत्तर के उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ मंदिर से सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु में स्थित रामेश्वरम तक 79* देशांतर की एक रेखा की कल्पना की जाए तो आश्चर्यजनक रूप से उस पर शिव जी के सात मंदिर एक सीध में बने नजर आते हैं। इन सातों मंदिरों मंदिरों की स्थिति एक सीधी रेखा पर होना महज संयोग नहीं है, यह रेखा यह दर्शाती है कि भारत के ऋषियों-मुनियों, गणितज्ञों तथा वास्तुकारों के पास ज्योतिष, खगोल विज्ञान और ऊर्जा सिद्धांतों का अद्भुत ज्ञान था।  

शिवशक्ति रेखा 
शास्त्रों के अनुसार इस रेखा पर स्थित सात प्राचीन मंदिरों में दो ज्योतिर्लिंगों के अलावा जो पांच मंदिर हैं वे पंचभूत यानी प्रकृति के पांच मूल तत्वों पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं ! जिनमें श्रीकालाहस्ती शिव मंदिर जल, एकाम्बेश्वरनाथ मंदिर अग्नि, अरुणाचलेश्वर मंदिर वायु, जम्बूकेश्वर मंदिर पृथ्वी और थिल्लई नटराज मंदिर आकाश के प्रतीक हैं ! इन पंचभूत मंदिरों के साथ-साथ केदारनाथ और रामेश्वरम जैसे पवित्र ज्योतिर्लिंगों का इस सीधी रेखा पर होना इस रेखा को और भी रहस्यमय बनाता है।एक आश्चर्य की बात और भी है कि भले ही उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर उस रेखा पर नहीं है पर उसकी उपस्थिति इन सातों मंदिरों के ठीक मध्य में बनती है !

महाकालेश्वर 
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अक्ष रेखा पृथ्वी के चुंबकीय या ऊर्जात्मक केंद्रों के निकट हो सकती है। ऐसा माना जाता है कि इसीलिए इन मंदिरों की स्थापना ऋषियों और सिद्ध योगियों द्वारा यहां की गई, जिन्होंने पृथ्वी की ऊर्जा रेखाओं को ध्यान में रखकर इन्हें स्थापित किया। शिव शक्ति अक्ष रेखा एक ऊर्जावान रेखा के समान है, जहां शिव की चेतना और शक्ति एकाकार होती है। 

पंचभूत 
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि प्राचीन काल में जब जगहों को जानने का या दिशा बोध का कोई सुगम उपाय नहीं था, तब इन मंदिरों को एक सीध में इसीलिए बनाया गया था, जिससे दर्शनार्थी बिना मार्ग भटके, एक ही दिशा में चलते हुए ज्यादा से ज्यादा मंदिरों के दर्शन कर सकें ! वैसे यह तर्क सही नहीं लगता क्योंकि हमारे देश में कई ऐसी विलक्षण, रहस्यमयी बातें हैं, जिन्हें समझ पाना लगभग नामुमकिन है। उन्हीं में से एक है शिव शक्ति रेखा, गहन रहस्यों से भरी हुई ! भले ही हम  उसका रहस्य अभी ना समझ पा रहे हों पर हमें उस पर, उसकी विलक्षणता पर गर्व तो होना ही चाहिए !  

 ।। ॐ नम: शिवाय ।। 

@चित्र तथा संदर्भ हेतु अंतर्जाल का आभार 

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

केदारनाथ मंदिर, हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियो, वैज्ञानिकों की विद्वता का साक्षात प्रमाण

उस समय कितना बड़ा असम्भव कार्य रहा होगा ऐसी जगह पर इतने भव्य मन्दिर को बनाना, जहां ठंड के दिनों में भारी मात्रा में बर्फ जमी रहती हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी का बहाव कहर बरपाता हो ! ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में 1200 साल से भी पहले ऐसा अप्रतिम मंदिर कैसे बनाया गया होगा, वह भी उन पत्थरों से जो यहां दूर दूर तक कहीं भी उपलब्ध नहीं है ! तो उनको वहां तक कैसे लाया गया होगा ! कैसे हमारे पुरातन भारतीय विज्ञान के जानकारों ने उस शिला को, जिसका उपयोग 6 फुट ऊंचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है, मंदिर स्थल तक पहुंचाया होगा ! ढेरों सवाल हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

केदारनाथ मंदिर भारत के उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जिले में भगवान शिव का विश्वप्रसिद्ध मंदिर है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में स्थित मंदिर का शिवलिंग अति प्राचीन है ! यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ ही चार धाम और पंच केदारों में से भी एक है ! यहाँ की विषम जलवायु और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इसके कपाट, प्रभु दर्शनार्थ सिर्फ अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही खुलते हैं ! पत्‍थरों से कत्यूरी शैली में बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडवों के पौत्र महाराजा जन्मेजय ने तथा इस का जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य जी ने करवाया था ! इसकी आयु का कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है पर विज्ञान के अनुसार इसका निर्माण 8वीं शताब्दी में हुआ था ! वैसे तत्कालीन विवरणों के अनुसार यह मंदिर कम से कम 1200 वर्षों से अपने अस्तित्व में है !

मंदिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। इसके मुख्य भाग, मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है, गर्भ गृह, मध्य भाग व सभा मण्डप। गर्भ गृह के मध्य में भगवान श्री केदारेश्वर जी का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है, जिसके अग्र भाग पर गणेश जी की आकृति और साथ ही माँ पार्वती का श्री यंत्र विद्यमान है। ज्योतिर्लिंग पर प्राकृतिक यज्ञोपवीत और इसके पृष्ठ भाग पर प्राकृतिक स्फटिक माला को आसानी से देखा जा सकता है । श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग में नव लिंगाकार विग्रह विद्यमान हैं, इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को नवलिंग केदार भी कहा जाता है।

मंदिर के बारे में जो कथा यह है कि हिमालय के केदार शृंग पर भगवान् विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने प्रकट हो उनकी प्रार्थनानुसार यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है। इस दुर्गम स्थल तक की यात्रा आज भी सबसे कठिनताम यात्राओं में से एक है, जहां किसी भी गाड़ी का पहुँचना लगभग नामुमकिन है !

इसके एक तरफ 22,000 फीट ऊंची केदारनाथ की पहाड़ी है तो दूसरी तरफ 21,600 फीट ऊंची कराचकुंड और तीसरी तरफ 22,700 फीट ऊंचा भरतकुंड है ! इन तीन पर्वतों से होकर बहने वाली पांच नदियां हैं, मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदरी। इन सब का ब्यौरा हमारे पुराणों में उपलब्ध है ! केदारनाथ के संबंध में लिखा गया है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किए बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों का नाश कर मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।

यह क्षेत्र मंदाकिनी नदी का एकमात्र जल-संग्रहण क्षेत्र है। यह मंदिर अपने आप में एक अद्भुत कलाकृति है ! इसे देख कर हर इंसान सोच में पड़ जाता है कि उस समय कितना बड़ा असम्भव कार्य रहा होगा ऐसी जगह पर इतने भव्य मन्दिर को बनाना, जहां ठंड के दिनों में भारी मात्रा में बर्फ जमी रहती हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी का बहाव कहर बरपाता हो ! ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में 1200 साल से भी पहले ऐसा अप्रतिम मंदिर कैसे बनाया गया होगा ! जबकि 1200 साल बाद भी उस क्षेत्र में अभी भी बिना हेलिकॉप्टर से कुछ भी ले जाया जाना असंभव सा है ! मशीनों के बिना आज भी जहां एक छोटा सा ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता, वहीं यह मंदिर वर्षों से खड़ा है और न सिर्फ खड़ा है, बल्कि बहुत मजबूती से टिका भी हुआ है !

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी, देहरादून ने केदारनाथ मंदिर की चट्टानों पर लिग्नोमैटिक डेटिंग का परीक्षण किया, जो "पत्थरों के जीवन" की पहचान करने के लिए किया जाता है। परीक्षण से पता चला कि मंदिर 14वीं सदी से लेकर 17वीं सदी के मध्य तक पूरी तरह से बर्फ में दब गया था !आश्चर्य की बात है कि फिर भी  मंदिर के निर्माण ढांचे में कहीं कोई नुकसान नहीं हुआ ! मंदिर ने प्रकृति के हर चक्र में अपनी ताकत बनाए रख अपने को सुरक्षित रखा है ! मंदिर के इन मजबूत पत्थरों को बिना किसी सीमेंट के "एशलर" तरीके से एक साथ चिपका दिया गया है। इसलिए पत्थर के जोड़ पर तापमान परिवर्तन का किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड़ता जो कि मंदिर की अभेद्य ताकत व क्षमता है। 

मंदिर निर्माण की एक अनोखी बात यह भी है कि इसमें इस्तेमाल किया गया पत्थर बहुत सख्त और टिकाऊ है। इस पत्थर की विशेषता यह है कि 400 साल तक बर्फ के नीचे दबे रहने के बाद भी इसके "गुणों" में कोई अंतर नहीं आता है ! इसके साथ ही एक खास बात यह है कि ऐसा पत्थर यहां से दूर दूर तक कहीं भी उपलब्ध नहीं है ! तो उस पत्थर को वहां तक कैसे ले जाया गया होगा ! जबकि उस समय इतने बड़े पत्थरों को ढोने के लिए विशेष अपकरण भी उपलब्ध नहीं थे ! कैसे हमारे पुरातन भारतीय विज्ञान ने उस शिला को, जिसका उपयोग 6 फुट ऊंचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है, मंदिर स्थल तक पहुंचाया होगा ! ढेरों सवाल हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है !

साल 2013 में केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ के बारे में सभी को पता है ! इस दौरान जहां लगभग सब कुछ तबाह हो गया था, वहीं इतनी बड़ी विभीषिका के बावजूद भी केदारनाथ मंदिर का पूरा ढांचा जरा भी प्रभावित नहीं हुआ ! भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक, बाढ़ के बाद भी मंदिर का 99 फीसदी ढांचा पूरी तरह सुरक्षित है ! "आईआईटी मद्रास" ने भी अपने "एनडीटी परीक्षण" में इसे पूरी तरह से सुरक्षित और मजबूत पाया है ! यानी विज्ञान के अनुसार मंदिर के निर्माण में जिस पत्थर और संरचना का इस्तेमाल किया गया है, तथा जिस दिशा में इसे बनाया गया उसी की वजह से यह मंदिर इस त्रासदी से बच पाया है ! कितने आश्चर्य की बात है कि सदियों पहले कैसे उस स्थान और दिशा की खोज की गई होगी, जहां पर मंदिर अपने निर्माण के सैकड़ों साल बाद भी सुरक्षित बना रह सके ! केदारनाथ मंदिर "उत्तर-दक्षिण" दिशा के अनुरूप बनाया गया है। जबकि भारत में लगभग सभी मंदिर "पूर्व-पश्चिम" दिशा के अनुरूप हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह मंदिर "पूर्व-पश्चिम" की स्थिति में होता तो पहले ही कब का नष्ट हो चुका होता !

यह इस जगह की दैवीय शक्ति और प्रभु की कृपा ही थी कि 2013 में, मंदिर के पिछले हिस्से में दैवयोग से पहाड़ की ऊंचाइयों की तरफ से एक बड़ी चट्टान आ कर फंस गई, जिससे विकराल पानी की धार दो भागों में विभाजित हो गई ! पानी का प्रचंड वेग मंदिर के दोनों किनारों पर बने निर्माणों को तो अपने साथ लेता चला गया, लेकिन मंदिर और मंदिर में शरण लेने वाले लोग सुरक्षित रहे ! जिन्हेंअगले दिन भारतीय वायुसेना ने एयरलिफ्ट कर सुरक्षित निकाल लिया ! सवाल यह नहीं है कि आस्था पर विश्वास किया जाए या नहीं ! लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि मंदिर के निर्माण के लिए स्थल, उसकी दिशा, उसकी निर्माण सामग्री और यहां तक ​​कि प्रकृति को भी ध्यान में रख इस भव्य मंदिर का निर्माण किया गया था जो 1200 वर्षों के बाद भी अपनी संस्कृति और ताकत को बनाए रख रहा है ! 

आज हम सदा नतमस्तक हैं, अपने ऋषि-मुनियों तथा प्राचीन वैज्ञानिकों के ज्ञान पर, उनकी महानता पर, जिन्होंने वास्तुकला, मौसम विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, आयुर्वेद में इतनी महारतता हासिल कर ली थी ! जिन्होंने तमाम प्राकृतिक विपदाओं, असंख्य अड़चनों और विपरीत परिस्थियों के बावजूद इस दुर्गम स्थल पर स्थित ज्योतिर्लिग पर एक भव्य मंदिर बनाने का संकल्प पूरा किया था ! यह एक उदाहरण है हमारे उन्नत तथा उत्कर्ष वैदिक हिंदू धर्म और संस्कृति का ! हमें गर्व है कि हम भारतीय हैं ! भारतीय संस्कृति हमारी धरोहर है और उसी आस्था व विश्वास पर भारत को नाज है जिसे सम्पूर्ण विश्व अचरज से देखता है किन्तु आधिपत्य स्वीकार करने से बचता है ! पर किसी के मानने  ना मानने से क्या होता है ! सच्चाई सदा सच्चाई रहेगी ! हम सबको विश्वास है अपनी आस्था, अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं पर जो सदैव मजबूत व बुलंद रहेंगी ! 

@संदर्भ और चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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