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मंगलवार, 29 जुलाई 2025

एक कांवड़ यात्रा दक्षिण में भी

कांवड़ सांसारिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। शिव जी ने हलाहल पान कर सृष्टि की रक्षा की थी और भगवान कार्तिकेय ने देवताओं के सेनापति के रूप में संसार विरोधी ताकतों का शमन कर जगत को भय मुक्त किया था ! शिव और मुरुगन यानी पिता-पुत्र की उपासना से संबंधित ये दोनों यात्राऐं जहां देश की एकजुटता को तो दर्शाती ही हैं, साथ ही साथ सनातन की विशालता और व्यापकता का भी एहसास दिला जाती हैं.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सावन के पवित्र महीने में उत्तर भारत में हर साल शिव भक्त पदयात्रा कर, सुदूर स्थानों से नदियों का जल ला कर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं ! इस पारंपरिक यात्रा को कांवड़ यात्रा कहा जाता है। बांस की बनी जिस बंहगी के दोनों सिरों पर जलपात्र लटका कर लाया जाता है उसे कांवड़ कहते हैं ! 

कावड़ी यात्रा 
धर उत्तर भारत से बहुत दूर तमिलनाडु में भी इसी से मिलती-जुलती एक यात्रा निकलती है ! इसमें भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र कार्तिकेय, जिन्हें वहां मुरुगन और अयप्पा भी कहा जाता है, उनसे जुड़े त्योहार थाईपुसम में इनके भक्त कांवड़ समान कावडी, जिसे छत्रिस भी कहते हैं, अपने कंधों पर उठाकर चलते हैं। कावडी‌ मोर पंखों, फूलों तथा अन्य चीजों से सुसज्जित होती है, पर कांवड़ की तरह इसमें पानी के मटके नहीं टंगे होते। 

दक्षिण के कावड़िए 
कार्तिकेय जी की पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिलनाडु में की जाती है इसके अतिरिक्त विश्व में जहाँ कहीं भी तमिल प्रवासी रहते हैं, वहां भी इनकी बहुत मान्यता है ! तमिल भाषा में इन्हें तमिल कडवुल यानि कि तमिलों के देवता कह कर संबोधित किया जाता है। तमिलनाडु में पलानी शहर में शिवगिरी पर्वत नामक दो पहाड़ियों की ऊंची चोटी पर मौजूद भगवान मुरुगन का प्रमुख मंदिर है, जिसे पंचामृत का पर्याय माना जाता है, ऐसी मान्यता है कि मूल मूर्ति बोग सिद्धर द्वारा जहरीली जड़ी-बूटियों का उपयोग करके बनाई गई है।

पलानी में थाईपुसम उत्सव 
र साल हजारों भक्त पवित्र थाईपुसम उत्सव के दौरान विशेष रूप से छत्रिस उठा कर, नाचते-गाते, 'वेल वेल शक्ति वेल' का जाप करते पलानी मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। कुछ भक्त कावंड़ के रूप में दूध का एक बर्तन लेकर भी चलते हैं। 

श्रद्धा व विश्वास  

थाईपुसम त्योहार भगवान मुरुगन के प्रति समर्पण का उत्सव है ! इस त्योहार में सबसे कठिन तपस्या वाल कांवड़ है। वाल कांवड़ लगभग दो मीटर लंबा और मोर पंखों से सजा हुआ होता है। इसे भक्त अपनी शरीर से जोड़ लेते हैं। ये भक्त भगवान की भक्ति में इतने लीन रहते हैं कि इन्हें किसी भी तरह की दर्द, तकलीफ का अहसास तक नहीं होता। वहीं इस क्रिया में ना हीं खून निकलता है और ना हीं बाद में शरीर पर कोई निशान बचा रहता है !


आस्था व समर्पण 

कांवड़ सांसारिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। शिव जी ने हलाहल पी कर सृष्टि की रक्षा की थी और भगवान कार्तिकेय ने देवताओं के सेनापति के रूप में संसार विरोधी ताकतों का शमन कर जगत को भय मुक्त किया था ! शिव और मुरुगन यानी पिता-पुत्र की उपासना से संबंधित ये दोनों यात्राऐं जहां देश की एकजुटता को तो दर्शाती ही हैं, साथ ही साथ सनातन की विशालता और व्यापकता का भी एहसास दिला जाती हैं !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 17 जुलाई 2025

सीधी पर अबूझ, शिवशक्ति रेखा

हमारे देश की मिटटी के कण-कण में धार्मिकता व्याप्त है ! जल-थल-पवन-गगन सभी जगहों पर देवत्व की रहस्यमय पर अलौकिक उपस्थिति महसूस की जाती है ! ऐसी ही एक रहस्यमय उपस्थिति है, शिवशक्ति रेखा ! यह कोई भौगोलिक रेखा नहीं है, पर यदि उत्तर के उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ मंदिर से सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु में स्थित रामेश्वरम तक 79* देशांतर की एक रेखा की कल्पना की जाए तो आश्चर्यजनक रूप से उस पर शिव जी के सात मंदिर एक सीध में बने नजर आते हैं, जो सिर्फ संयोग नहीं है.................!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जब-जब अपने देश की वे उपलब्धियां जिन्हें हमारे विद्वानों ने प्राचीन काल में ही हासिल कर लिया था, सामने आती हैं तो गर्व से पूरी देह उमग उठती है ! पर इसके साथ ही जब उन मुठ्ठी भर लोगों की कारस्तानियां उजागर होती हैं, जिन्होंने षड्यंत्रवश, अपने छद्म इतिहास में उन खूबियों को स्थान ना दे या उन्हें कल्पित बता, देश के जनमानस को गुमराह किया, हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा रचित ग्रंथों को झुठला कर पीढ़ी-दर-पीढ़ी गलत जानकारियां दीं, तब ऐसा आक्रोश उमड़ता है कि ऐसी हरकत करने वालों को तो सरे राह दंडित किया जाना चाहिए ! दंड भी ऐसा कि उनकी पीढ़ियां याद रखें !

शिव और शक्ति 
हमारे ऋषि-मुनि तो ज्ञान का सागर रहे हैं ! उन्हीं का प्रताप है कि हम दुनिया के सिरमौर रहे ! क्या-क्या खोजें उन्होंने नहीं कीं ! यदि सबका विवरण लिखने बैठें तो पूरा ग्रंथ बन जाएगा ! अभी सावन का पावन समय चल रहा है और यह माह शिव जी को समर्पित है तो आज उन्हीं से संबंधित एक अद्भुत, अद्वितीय, अनोखी, शिवशक्ति रेखा की बात ! जिसका विस्तार उत्तराखंड के केदारनाथ ज्योतिर्लिंग से लेकर दक्षिण के रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग तक एक सीध में करीब 2382 कि.मी. तक माना जाता है।  

नम: शिवाय 
भारत एक ऐसा देश है जिसकी मिटटी के कण-कण में धार्मिकता व्याप्त है ! जल-थल-पवन-गगन सभी जगहों पर देवत्व की रहस्यमय पर अलौकिक उपस्थिति महसूस की जाती है ! ऐसी ही एक रहस्यमय उपस्थिति है यह शिवशक्ति रेखा ! यह कोई भौगोलिक रेखा नहीं है पर यदि उत्तर के उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ मंदिर से सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु में स्थित रामेश्वरम तक 79* देशांतर की एक रेखा की कल्पना की जाए तो आश्चर्यजनक रूप से उस पर शिव जी के सात मंदिर एक सीध में बने नजर आते हैं। इन सातों मंदिरों मंदिरों की स्थिति एक सीधी रेखा पर होना महज संयोग नहीं है, यह रेखा यह दर्शाती है कि भारत के ऋषियों-मुनियों, गणितज्ञों तथा वास्तुकारों के पास ज्योतिष, खगोल विज्ञान और ऊर्जा सिद्धांतों का अद्भुत ज्ञान था।  

शिवशक्ति रेखा 
शास्त्रों के अनुसार इस रेखा पर स्थित सात प्राचीन मंदिरों में दो ज्योतिर्लिंगों के अलावा जो पांच मंदिर हैं वे पंचभूत यानी प्रकृति के पांच मूल तत्वों पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं ! जिनमें श्रीकालाहस्ती शिव मंदिर जल, एकाम्बेश्वरनाथ मंदिर अग्नि, अरुणाचलेश्वर मंदिर वायु, जम्बूकेश्वर मंदिर पृथ्वी और थिल्लई नटराज मंदिर आकाश के प्रतीक हैं ! इन पंचभूत मंदिरों के साथ-साथ केदारनाथ और रामेश्वरम जैसे पवित्र ज्योतिर्लिंगों का इस सीधी रेखा पर होना इस रेखा को और भी रहस्यमय बनाता है।एक आश्चर्य की बात और भी है कि भले ही उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर उस रेखा पर नहीं है पर उसकी उपस्थिति इन सातों मंदिरों के ठीक मध्य में बनती है !

महाकालेश्वर 
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अक्ष रेखा पृथ्वी के चुंबकीय या ऊर्जात्मक केंद्रों के निकट हो सकती है। ऐसा माना जाता है कि इसीलिए इन मंदिरों की स्थापना ऋषियों और सिद्ध योगियों द्वारा यहां की गई, जिन्होंने पृथ्वी की ऊर्जा रेखाओं को ध्यान में रखकर इन्हें स्थापित किया। शिव शक्ति अक्ष रेखा एक ऊर्जावान रेखा के समान है, जहां शिव की चेतना और शक्ति एकाकार होती है। 

पंचभूत 
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि प्राचीन काल में जब जगहों को जानने का या दिशा बोध का कोई सुगम उपाय नहीं था, तब इन मंदिरों को एक सीध में इसीलिए बनाया गया था, जिससे दर्शनार्थी बिना मार्ग भटके, एक ही दिशा में चलते हुए ज्यादा से ज्यादा मंदिरों के दर्शन कर सकें ! वैसे यह तर्क सही नहीं लगता क्योंकि हमारे देश में कई ऐसी विलक्षण, रहस्यमयी बातें हैं, जिन्हें समझ पाना लगभग नामुमकिन है। उन्हीं में से एक है शिव शक्ति रेखा, गहन रहस्यों से भरी हुई ! भले ही हम  उसका रहस्य अभी ना समझ पा रहे हों पर हमें उस पर, उसकी विलक्षणता पर गर्व तो होना ही चाहिए !  

 ।। ॐ नम: शिवाय ।। 

@चित्र तथा संदर्भ हेतु अंतर्जाल का आभार 

सोमवार, 7 जुलाई 2025

कांवड़ यात्रा, सृष्टि रूपी शिव की आराधना

इस पवित्र पर कठिन यात्रा में भाग लेने वाले कांवड़िए अपनी पूरी यात्रा के दौरान नंगे पांव, बिना कावंड को नीचे रखे, अपने आराध्य को खुश करने के लिए सात्विक जीवन शैली अपनाए रखते हैं ! यात्रा में तामसिक भोजन, दुर्व्यवहार, कदाचार पूर्णतया निषेद्ध होता है ! यहां तक कि एक-दूसरे का नाम तक नहीं लेते ! सब ''बोल बम'' हो जाते हैं ! शिवमय हो जाते हैं ! उनके बीच का फर्क मिट जाता है ! आपसी एकता, सहयोग, समानता की भावना मजबूत होती है ! पहचान, जाति, वर्ग सब तिरोहित हो जाते हैं ! हर कांवड़िया एक दूसरे का भाई बन जाता है...........!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हर साल सावन के पवित्र महीने में शिव भक्त पदयात्रा कर, सुदूर स्थानों से नदियों का जल ला कर अपने निवास के पास के शिव मंदिर में स्थित शिवलिंग का इस माह की चतुर्दशी के दिन जलाभिषेक करते हैं ! कंधे पर जल ला कर भगवान शिव को चढ़ाने की पारम्परिक यात्रा को कांवड़ यात्रा बोला जाता है। कांवड़ का मूल शब्द कांवर है जिसका अर्थ कंधा होता है ! बांस की बनी जिस बंहगी के दोनों सिरों पर जलपात्र लटका कर लाया जाता है उसे कांवड़ तथा जल लाने वाले भक्तों को कांवड़िया कहा जाता है ! इस पूरी यात्रा में कांवड़ को भूमि पर नहीं रखा जाता है ! मुख्यता यह यात्रा हरिद्वार से शुरू होती है ! इस साल यह यात्रा ग्यारह जुलाई से प्रारम्भ हो कर नौ अगस्त तक चलेगी !   

हर की पौड़ी, हरिद्वार 
मारे ग्रंथों में कांवड़ यात्रा का संबंध सागर-मंथन से जोड़ा गया है। उस महा-उपक्रम में जब विष निकला और उसकी ज्वाला से सारी दुनिया में त्राहि-त्राहि मच गई, तब शिव जी ने उस गरल का पान किया लेकिन उसकी गर्मी उन्हें भी परेशान करने लगी, तब उस ज्वाला को शांत करने के लिए उनका गंगा जल से अभिषेक किया गया जिससे विष की दग्धता कम हुई ! तबसे यह परम्परा चली आ रही है ! कहने को तो ये धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी हैं। कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए है।

यात्रा विश्राम 
मारे शास्त्रों के अनुसार जब दोनों पात्रों में जल भर कर उन्हें कांवड़ में श्रद्धा और विधि पूर्वक सजा-संवार तथा पूजित कर स्थापित कर दिया जाता है तो शिव जी कांवड़ में तथा ब्रह्मा तथा विष्णु जी दोनों घटों में समाहित हो जाते हैं ! ऐसे में भक्त कांवड़िए को कांवड़ के माध्यम से ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तीनों की कृपा एक साथ प्राप्त हो जाती है ! कांवड़िया, शिवयोगी के समान हो जाता है जो मन, वाणी, कर्म से किसी भी प्राणी का अहित नहीं करता, सब में एकमात्र सदाशिव का ही दर्शन करता है। कांवड़ यात्रा शिव भक्ति का एक रास्ता तो है ही साथ ही व्यक्तिगत विकास में भी सहायक है ! 

हर-हर महादेव 
इस पवित्र पर कठिन यात्रा में भाग लेने वाले कांवड़िए अपनी पूरी यात्रा के दौरान नंगे पांव, बिना कावंड को नीचे रखे, अपने आराध्य को खुश करने के लिए सात्विक जीवन शैली अपनाए रखते हैं ! यात्रा में तामसिक भोजन, दुर्व्यवहार, कदाचार पूर्णतया निषेद्ध होता है ! यहां तक कि एक-दूसरे का नाम तक नहीं लेते ! सब ''बोल बम'' हो जाते हैं ! शिवमय हो जाते हैं ! उनके बीच का फर्क मिट जाता है ! आपसी एकता, सहयोग, समानता की भावना मजबूत होती है ! पहचान, जाति, वर्ग सब तिरोहित हो जाते हैं ! हर कांवड़िया एक दूसरे का भाई बन जाता है !

बम-बम भोले 
इस यात्रा में भाग लेने वाले सभी कांवड़ियों के अपने-अपने संकल्प होते हैं ! उन्हीं में से कुछ ऐसे होते हैं, जो जल भरने के बाद अगले 24 घंटे के अंदर उसे भोलेनाथ पर चढ़ाने का संकल्प लिए दौड़ते हुए शिवालयों तक पहुंच कर शिवलिंगों पर यह जल अर्पित करते हैं, उन्हें 'डाकबम' कहते हैं ! उनके लिए कुछ अलग सुविधाएं और इंतजाम भी किए जाते हैं !

गंतव्य के पहले रुकना नहीं 

ऐसे ही एक शिव भक्त आशीष उपाध्याय का नाम शीर्ष कांवड़ियों में दर्ज है, जिन्होंने 22 जुलाई 2016 को हरिद्वार से जल लेकर 18 दिनों की पैदल यात्रा के पश्चात लगभग 1032 किलोमीटर की यात्रा संपन्न कर बनारस में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था ! यह आज तक की सबसे लंबी कांवड़ यात्रा में शामिल है !

भक्ति की शक्ति 
प्रतीकात्मक तौर पर कांवड यात्रा का संदेश यही है कि प्रत्येक इंसान जल बचाकर और नदियों के पानी का उपयोग कर अपने खेत खलिहानों की सिंचाई करें और अपने निवास स्थान पर पशु पक्षियों और पर्यावरण को पानी उपलब्ध कराए तो प्रकृति की तरह उदार शिव सहज ही प्रसन्न होंगे। 

@सभी चित्र और संदर्भ अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 30 मार्च 2025

शिव, मेरा मैन फ्राइडे

बालकगणों के लिए मील के फैक्ट्री एरिया के अलावा हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी, पर जब भी मुझे दिखता, उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मैं छोटा था और वह मुझसे भी छोटा था ! पता नहीं कहां से आया था, कौन लाया था ! यादाश्त में उसका घरों में काम करते सहायक का रूप ही दर्ज है। शिव उसका नाम  था, ना आगे कुछ ना ही पीछे ! कभी पूछा भी नहीं ! भले ही नाम के आगे-पीछे कुछ न हो पर मेरे साथ शायद उसके किसी पिछले जन्म का कोई संबंध जरूर था !

शिव, पचास साल पहले 

बात साठ के उत्तरार्द्ध की है। बंगाल के नार्थ परगना जिले के भाटपारा इलाके में स्थित रिलायंस जूट मील में  बचपन का वह बेफिक्र, सुखद, अवर्चनीय समय था ! स्कूल से कॉलेज और फिर कार्यक्षेत्र तक का सफर वहीं रहते पूरा हुआ ! उस जगह से मेरे परिवार का पच्चीस साल से भी ज्यादा का नाता रहा !

लॉन 

मील के स्टाफ परिसर में देश के तकरीबन हर प्रांत के लोगों के होने के बावजूद वहां एक परिवार का माहौल था ! तीज-त्यौहार, सुख-दुःख सबके साझा होते थे ! बच्चों को खेल-कूद या किसी भी घर में आने-जाने की पूरी छूट तो थी पर लाड-प्यार-डांट-डपट का हक भी सभी बड़ों को था ! उन दिनों वहां के सर्वेसर्वा डागा जी थे ! जो सिर्फ मील के ही नहीं, उसके स्टाफ के परिवारों के भी संरक्षक थे ! हर कोई उन्हें परिवार के मुखिया के रूप में आदर सहित देखता था ! 

परिसर 

बात हो रही थी शिव की ! जैसा कि मैंने बताया बालकगणों के लिए वहां की हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी पर जब भी मुझे दिखता उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे। 

कैसे भुलाएं इस जगह को 

स मय ने अपनी यात्रा के दौरान मुझे रिलायंस से करीब बीस किमी दूर सोदपुर में स्थित कमरहट्टी जूट मील पहुंचा दिया ! काम मैं वहां जरूर करता था, पर सप्ताहंत या मौका मिलते या बना कर ''घर'' पहुँच जाया करता था। ऐसे ही साल भर बीत गया ! एक दिन रिलायंस आया हुआ था कि अचानक शिव मेरे पास आया और मेरे साथ चलने की इच्छा जाहिर की ! उन दिनों मेरे खाने-पीने का इंतजाम मील के मेस में ही था ! उसके रहने-खाने के इंतजाम के बारे में सोच-विचार कर, कुछ समय पश्चात मेस में उसे सहायक के रूप में रखवा उसके रहने खाने का प्रबंध करवा कर मैंने उसकी इच्छा पूरी कर दी।    

वृक्षों के पीछे हुगली यानी गंगा नदी 

यहां से शुरू होती है शिव के मेरे मैन फ्राइडे बनने की यात्रा ! पता नहीं उस किशोर को मेरे से क्या लगाव था, काम तो उसको रिलांयस में भी मिल सकता था ! खैर ! यहां वह मेरी छोटी से छोटी जरुरत का ध्यान और ख्याल रखने लगा ! कभी-कभी मेरे साथ रिलायंस भी चला जाता था। हालांकि मेस का खाना साफ-सुथरे परिवेश में सफाई पसंद महाराज द्वारा बहुत अच्छी क्वालिटी का बना होता था, पर माँ को उस बारे में सदा चिंता लगी रहती थी ! ऐसे ही एक दिन इस समस्या के निदान हेतु शिव ने माँ को कह दिया आप दोपहर का खाना तैयार रखा करें,  मैं भैया के लिए ले जाया करूँगा !

मुझे इस सांठ-गाँठ के बारे में कुछ पता नहीं था। एक दिन ग्यारह बजे काम से लौटने पर देखता हूँ कि मेरे कमरे में टेबल पर एक टिफिन रखा हुआ है ! पूछताछ पर शिव ने बताया मैं घर से लाया हूँ ! घर से.......! मैं भौचक्क ! यहां यह बताना जरुरी है कि सिमित समय में दोनों जगहों पर आना-जाना आसान नहीं था ! सीधा सड़क मार्ग नहीं था, बस बदलनी पड़ती थी ! वैसे भी सड़क मार्ग से बहुत समय लगता था ! इसलिए यात्रा कई चरणों में पूरी करनी पड़ती थी ! पहले आधा की.मी. तय कर मेन रोड़ पर आना पड़ता था, वहां से बस ले कर सोदपुर स्टेशन, फिर वहां से लोकल ट्रेन से सातंवा स्टेशन कांकिनाड़ा ! उसके बाद फिर वहां से तकरीबन पौन की.मी. पर स्थित मील के अंदर घरों तक ! फिर वैसी ही वापसी ! पागलपन जैसा काम था !

मुझे याद है, उस दिन वैसा करने पर मैं शिव पर बहुत झल्लाया था, गुस्सा हुआ था ! पर वह सर झुकाए सब सुनता रहा..........फिर माँ की ममता सब पर भारी रही ! समय अपनी गति से चलता रहा ! पांच साल निकल गए ! इसी बीच प्रभु ने भी मुझे गृहस्त बनाने की योजना बना डाली ! दिल्ली से संबंध जुड़ा ! यहां भी शिव साये की तरह मेरे साथ रहा ! एक राज की बात बताऊँ, शिव के दिल्ली प्रवास ने वधु-पक्ष पर काफी रुआब डाला था 😀  

हा लांकि शिव ने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा, पर उसके भविष्य को और आने वाली जिम्मेदारियों को ध्यान में रख मैंने उसे मील में स्थाई काम पर रखवा दिया ! मेहनती तो बहुत था, वहां भी कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया। 

मय का फेर ! बिमारी और स्वास्थय के चलते मुझे काम छोड़ना पड़ा ! इसी चक्कर में दिल्ली प्रवास और व्यस्तता के चलते सब पीछे छूट गया ! शिव की खोज-खबर लेने की कोशिशें नाकाम रहीं ! पर मुझे विश्वास है कि अपनी मेहनत के बूते वह जहां भी होगा खुश होगा ! प्रभु उसे स्वस्थ-प्रसन्न रखें ! 

शनिवार, 29 अक्टूबर 2022

शिव वाहन नंदी

जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ मानी जाती हैं वैसे ही बैलों में नंदी को श्रेष्ठ माना गया है। आम तौर पर बल और शक्ति के प्रतीक, शांत और खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला माना जाता है। पर मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला यह प्राणी जब क्रोधित होता है तो शेर से भिड़ने में भी नहीं कतराता ! शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का साक्षात प्रतीक है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जितने विलक्षण हमारे देवाधिदेव शिव जी हैं, उतना ही अनोखा उनका परिवार भी है ! फिर वो चाहे मूषक हो ! चाहे सिंह हो ! मयूर हो या फिर शिव जी के प्रमुख गण नंदी ही क्यों ना हो ! परिवार का हर सदस्य अपने आप में अद्वितीय है ! हो भी क्यों ना ! देवों के भी देव का सानिध्य, उनकी कृपा, उनका सदा का साथ यूं ही तो नहीं मिल जाता ! इन सब के साथ अपनी-अपनी अद्भुत कथाएं भी जुडी हुई हैं ! इनमें सब से शक्तिशाली गण नंदी जी हैं ! संस्कृत में 'नन्दि' का अर्थ प्रसन्नता या आनन्द है। नंदी को शक्ति-संपन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है ! इनके प्रादुर्भाव की कथा भी बहुत अनोखी है !

शिवपुराण की एक कथा के अनुसार जब शिलाद मुनि ने योग और तप के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत अपना लिया तो उनके पितर अपना वंश समाप्त होते देख चिंतित हो गए ! आपसी परामर्श के बाद, वंश वृद्धि के लिए उन्होंने शिलाद मुनि को इंद्र देव से वरदान स्वरुप पुत्र की कामना करने को कहा। अपने पितरों की आज्ञानुसार शिलाद मुनि ने संतान की कामना के लिए इंद्र देव को प्रसन्न कर ऐसे पुत्र का वरदान तो मांगा, साथ ही यह शर्त भी जोड़ दी कि वह बालक जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो। इस पर इंद्र देव ने अपनी असमर्थता जाहिर कर उन्हें भगवान शिव के पास जाने की सलाह दी। इंद्रदेव की आज्ञा के अनुसार  शिलाद मुनि ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने शिलाद के पुत्र के रूप में अपने अंश के प्रकट होने का वरदान दिया। इसके कुछ समय के पश्चात ही हल जोतते हुए शिलाद मुनि को धरती से एक बालक की प्राप्ति हुई, जिसे शिव जी का वरदान मान उन्होंने उसका नाम नंदी रखा।   
जब नंदी कुछ बड़े हुए तब मित्र और वरुण नाम के दो ऋषि शिलाद मुनि के आश्रम आए ! उन्होंने नंदी के अल्पायु होने की बात बताई ! इससे शिलाद चिंतित हो गए ! उनकी चिंता का कारण जान नंदी हंसने लगे और कहा कि शिव जी की कृपा से आपने मुझे प्राप्त किया था, वही मेरी रक्षा करेंगे। इसके बाद नंदी ने भुवन नदी के किनारे शिव जी की कठिन तपस्या की। उनकी कठोर तपस्या और भक्तिभाव से प्रभु द्रवित हो गए और वर मांगने को कहा ! नंदी ने उम्र भर उनके सानिध्य में रहने की इच्छा जाहिर की। उनके समर्पण से शिवजी प्रसन्न हुए और उन्होंने नंदी जी को मृत्यु भय के साथ ही अन्य विभीषिकाओं से भी मुक्ति प्रदान कर माता पार्वती की सम्मति से गणों के अधिपति के रूप में अभिषेक कर नंदीश्वर का पद प्रदान कर उन्हें अपना वाहन और कैलाश पर अपने निवास का द्वारपाल नियुक्त कर दिया। 


एक बार शिव पार्वती के विहार के समय ऋषि भृगु उनके दर्शन करने आए तो नंदी जी ने बिना उनके क्रोध से डरे, निर्विकार रूप से उन्हें बाहर ही रोक दिया क्योंकि शिव-पार्वती जी की ऐसी ही आज्ञा थी। इससे ऋषि भृगु भी उनसे काफी प्रभावित हो गए ! इसी तरह जब रावण अपने अहम के चलते कैलाश पर्वत को उठाने की हिमाकत की थी तब भी नंदी ने क्रुद्ध होकर रावण को ऐसा जकड़ा कि लाख कोशिशों के बावजूद वह छूट नहीं पाया ! उसे मुक्ति तभी मिली जब उसने शिव जी की आराधना कर नंदी जी से क्षमा मांग अपनी गलती स्वीकार कर ली ! एक और कथा के अनुसार जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, उस वक्त भगवान शिव ने हलाहल विष पीकर इस संसार को बचाया था ! उस समय विष की कुछ बूंदे जमीन पर गिर गई थीं, जिसे नंदी ने बिना अपनी  परवाह किए जगत की रक्षा हेतु जीभ चाट लिया था ! नंदी का ये समर्पण देखकर भगवान शिव ने उन्हें अपने सबसे बड़े भक्त की उपाधि दी और ये आशीर्वाद दिया कि उनके दर्शन से पहले लोग नंदी के दर्शन करेंगे। 
                                           
कुछ समय पश्चात नंदी जी का विवाह मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ सम्पन्न करवा दिया गया ! उसी समय भगवान शिव ने उनको वरदान दिया कि जहां भी नंदी का निवास होगा, उसी स्थान पर मैं भी निवास करूंगा ! यही कारण है कि हर शिव मंदिर में नंदी की स्थापना की जाती है। जहां भी देवों के देव महादेव पूजे जाते हैं या उनका मंदिर होता है वहां नंदी का होना अवश्यम्भावी है। शिव की मूर्ति के सामने या मंदिर के बाहर शिव के वाहन नंदी की मूर्ति सदैव स्थापित होती है, जिसके नेत्र सदैव अपने इष्ट को देखते हुए उनका स्मरण करते रहते हैं। जिसका अर्थ है कि भक्ति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्राणी को क्रोध, अहम, दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य होना चाहिए। नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं।


जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ मानी जाती हैं वैसे ही बैलों में नंदी को श्रेष्ठ माना गया है। आम तौर पर बल और शक्ति के प्रतीक, शांत और खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला माना जाता है। पर मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला यह प्राणी जब क्रोधित होता है तो शेर से भिड़ने में भी नहीं कतराता ! शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का साक्षात प्रतीक है।

नंदी जी का इस जगत को एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव के वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर ही होनी चाहिए। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखनी चाहिए ! तभी जीवन की सार्थकता है। 

@संदर्भ तथा चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

विशिष्ट पोस्ट

यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...