शनिवार, 29 अक्तूबर 2022

शिव वाहन नंदी

जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ मानी जाती हैं वैसे ही बैलों में नंदी को श्रेष्ठ माना गया है। आम तौर पर बल और शक्ति के प्रतीक, शांत और खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला माना जाता है। पर मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला यह प्राणी जब क्रोधित होता है तो शेर से भिड़ने में भी नहीं कतराता ! शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का साक्षात प्रतीक है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जितने विलक्षण हमारे देवाधिदेव शिव जी हैं, उतना ही अनोखा उनका परिवार भी है ! फिर वो चाहे मूषक हो ! चाहे सिंह हो ! मयूर हो या फिर शिव जी के प्रमुख गण नंदी ही क्यों ना हो ! परिवार का हर सदस्य अपने आप में अद्वितीय है ! हो भी क्यों ना ! देवों के भी देव का सानिध्य, उनकी कृपा, उनका सदा का साथ यूं ही तो नहीं मिल जाता ! इन सब के साथ अपनी-अपनी अद्भुत कथाएं भी जुडी हुई हैं ! इनमें सब से शक्तिशाली गण नंदी जी हैं ! संस्कृत में 'नन्दि' का अर्थ प्रसन्नता या आनन्द है। नंदी को शक्ति-संपन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है ! इनके प्रादुर्भाव की कथा भी बहुत अनोखी है !

शिवपुराण की एक कथा के अनुसार जब शिलाद मुनि ने योग और तप के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत अपना लिया तो उनके पितर अपना वंश समाप्त होते देख चिंतित हो गए ! आपसी परामर्श के बाद, वंश वृद्धि के लिए उन्होंने शिलाद मुनि को इंद्र देव से वरदान स्वरुप पुत्र की कामना करने को कहा। अपने पितरों की आज्ञानुसार शिलाद मुनि ने संतान की कामना के लिए इंद्र देव को प्रसन्न कर ऐसे पुत्र का वरदान तो मांगा, साथ ही यह शर्त भी जोड़ दी कि वह बालक जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो। इस पर इंद्र देव ने अपनी असमर्थता जाहिर कर उन्हें भगवान शिव के पास जाने की सलाह दी। इंद्रदेव की आज्ञा के अनुसार  शिलाद मुनि ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने शिलाद के पुत्र के रूप में अपने अंश के प्रकट होने का वरदान दिया। इसके कुछ समय के पश्चात ही हल जोतते हुए शिलाद मुनि को धरती से एक बालक की प्राप्ति हुई, जिसे शिव जी का वरदान मान उन्होंने उसका नाम नंदी रखा।   
जब नंदी कुछ बड़े हुए तब मित्र और वरुण नाम के दो ऋषि शिलाद मुनि के आश्रम आए ! उन्होंने नंदी के अल्पायु होने की बात बताई ! इससे शिलाद चिंतित हो गए ! उनकी चिंता का कारण जान नंदी हंसने लगे और कहा कि शिव जी की कृपा से आपने मुझे प्राप्त किया था, वही मेरी रक्षा करेंगे। इसके बाद नंदी ने भुवन नदी के किनारे शिव जी की कठिन तपस्या की। उनकी कठोर तपस्या और भक्तिभाव से प्रभु द्रवित हो गए और वर मांगने को कहा ! नंदी ने उम्र भर उनके सानिध्य में रहने की इच्छा जाहिर की। उनके समर्पण से शिवजी प्रसन्न हुए और उन्होंने नंदी जी को मृत्यु भय के साथ ही अन्य विभीषिकाओं से भी मुक्ति प्रदान कर माता पार्वती की सम्मति से गणों के अधिपति के रूप में अभिषेक कर नंदीश्वर का पद प्रदान कर उन्हें अपना वाहन और कैलाश पर अपने निवास का द्वारपाल नियुक्त कर दिया। 


एक बार शिव पार्वती के विहार के समय ऋषि भृगु उनके दर्शन करने आए तो नंदी जी ने बिना उनके क्रोध से डरे, निर्विकार रूप से उन्हें बाहर ही रोक दिया क्योंकि शिव-पार्वती जी की ऐसी ही आज्ञा थी। इससे ऋषि भृगु भी उनसे काफी प्रभावित हो गए ! इसी तरह जब रावण अपने अहम के चलते कैलाश पर्वत को उठाने की हिमाकत की थी तब भी नंदी ने क्रुद्ध होकर रावण को ऐसा जकड़ा कि लाख कोशिशों के बावजूद वह छूट नहीं पाया ! उसे मुक्ति तभी मिली जब उसने शिव जी की आराधना कर नंदी जी से क्षमा मांग अपनी गलती स्वीकार कर ली ! एक और कथा के अनुसार जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, उस वक्त भगवान शिव ने हलाहल विष पीकर इस संसार को बचाया था ! उस समय विष की कुछ बूंदे जमीन पर गिर गई थीं, जिसे नंदी ने बिना अपनी  परवाह किए जगत की रक्षा हेतु जीभ चाट लिया था ! नंदी का ये समर्पण देखकर भगवान शिव ने उन्हें अपने सबसे बड़े भक्त की उपाधि दी और ये आशीर्वाद दिया कि उनके दर्शन से पहले लोग नंदी के दर्शन करेंगे। 
                                           
कुछ समय पश्चात नंदी जी का विवाह मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ सम्पन्न करवा दिया गया ! उसी समय भगवान शिव ने उनको वरदान दिया कि जहां भी नंदी का निवास होगा, उसी स्थान पर मैं भी निवास करूंगा ! यही कारण है कि हर शिव मंदिर में नंदी की स्थापना की जाती है। जहां भी देवों के देव महादेव पूजे जाते हैं या उनका मंदिर होता है वहां नंदी का होना अवश्यम्भावी है। शिव की मूर्ति के सामने या मंदिर के बाहर शिव के वाहन नंदी की मूर्ति सदैव स्थापित होती है, जिसके नेत्र सदैव अपने इष्ट को देखते हुए उनका स्मरण करते रहते हैं। जिसका अर्थ है कि भक्ति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्राणी को क्रोध, अहम, दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य होना चाहिए। नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं।


जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ मानी जाती हैं वैसे ही बैलों में नंदी को श्रेष्ठ माना गया है। आम तौर पर बल और शक्ति के प्रतीक, शांत और खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला माना जाता है। पर मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला यह प्राणी जब क्रोधित होता है तो शेर से भिड़ने में भी नहीं कतराता ! शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का साक्षात प्रतीक है।

नंदी जी का इस जगत को एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव के वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर ही होनी चाहिए। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखनी चाहिए ! तभी जीवन की सार्थकता है। 

@संदर्भ तथा चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

8 टिप्‍पणियां:

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(३०-१०-२०२२ ) को 'ममता की फूटती कोंपलें'(चर्चा अंक-४५९६) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

Anita ने कहा…

नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं। भगवान शिव के वाहन नंदी के बारे में सुंदर और प्रेरणादायक आलेख !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सुंदर कथा से अवगत कराया ।

Abhilasha ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और ज्ञानवर्धक कथा।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनीता जी
सम्मिलित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनीता जी
अनेकानेक धन्यवाद, सदा स्वागत है आपका

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अभिलाषा जी
''कुछ अलग सा'' पर सदा स्वागत है, आपका

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

संगीता जी
हार्दिक आभार आपका

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