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बुधवार, 4 मार्च 2026

होली, रिलायंस की ! यादें बचपन की

 शुरुआत होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे। आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे.........................😌😍🙏 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
     
होली फिर आ गई और साथ ही ले आई बचपन के दिनों की रंग में सराबोर यादें। बचपन के वे दिन जो रिलांयस में बीते ! वैसे तो समय के साथ-साथ जैसे-जैसे वहां निज़ाम बदलते गए, वैसे-वैसे मिल के वाशिंदों के आचार-व्यवहार-त्यौहार आदि में भी थोड़ा-बहुत बदलाव आता चला गया, जोकि लाज़िमी भी था। पर आज जो बात बतला रहा हूँ, वह बिल्कुल शुरू के कुछ वर्षों में मनाई-खेली जाने वाली होली की है। 


दिनों सर, मैडम, मिसेज या अंकल-आंटी जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं के बराबर ही होता था। जो पंद्रह-बीस परिवार परिसर में रहते थे, उनकी महिला सदस्य एक-दूसरे को संबोधित करने के लिए भैन (बहन) या भैन जी तथा एक-दो अपवादों को छोड़, पुरुष सदस्यों के लिए उनका उपनाम या भाई जी का प्रयोग ही हुआ करता था। आज तो मुझे लगता था कि शायद मिल के स्टाफ का पूरा नाम तो सिर्फ कैशियर अंकल ही जानते होंगे, जिन्हें सैलरी देने के लिए पूरे नामों की जरुरत पड़ती होगी ! हाँ बच्चा पार्टी बिना भेद-भाव,जात-पात के सिर्फ नाम से पुकारी जाती थी। 
गुजरा ज़माना बचपन का 
तो बात हो रही थी होली की ! वैसे तो सारा परिसर एक ही परिवार था ! पर पुरुष वर्ग की ''क्रिमी लेयर'' के पांच-सात लोग बहुत ही मित्त-भाषी, सादगी प्रिय, गंभीर और एक अनुशासित ''औरा'' में ही रहने वाले थे ! ऐसा नहीं था कि वे स्वभाव से कठोर या अहम वाले थे ! वे सब बहुत प्रेमिल थे, पर अपने पर और अपनी भावनाओं पर उनका पूरा नियंत्रण हुआ करता था। समय-समय पर उनकी जिंदादिली भी सामने आती रहती थी पर कभी-कभी, किसी पूर्णिमा पर या एकादशी पर ! ये सब इसलिए बता रहा हूँ कि जिससे एक खाका खिंच सके, उस समय का। 
पहचान कौन 😜
मि में होली की दस्तक हफ्ते भर पहले ही शुरू हो जाती थी, उसके स्वागत में मिल का युवा स्टाफ रात दस बजे के बाद परिवेश के एक किनारे बने ''बेबी क्रेश'' में चंग या ढपली के साथ राजस्थानी फाग गीतों की स्वर लहरी छेड़ उसके पदचाप की ध्वनि सब तक पहुंचा देता था। ये पारंपरिक राजस्थानी होली गीत होते थे, जिनमें कुछ ''वयस्क शब्दों'' का समावेश भी होता था। इसीलिए यहां बच्चों के प्रवेश की अघोषित मनाही होती थी, पर तरुणाई में कदम रखते मैं और सुमन, बिना शब्दों के अर्थ जाने सिर्फ ढपली की मधुर आवाज से खिंचे वहां चले जाते थे ! भाई लोग कुछ देर तो हमारा लिहाज करते पर फिर गीतों की मस्ती में पूरी तरह डूब जाते थे ! न कोई माइक ना हीं कोई तामझाम, सिर्फ दिल से निकलती आवाज ! कुछ बड़े हो जाने पर उस झिझक का कारण भी समझ में आया 😀

होली के दिन भांग जरूर घुटा करती थी, जिसका पूरा सामान ''कलकत्ते'' से दो दिन पहले पहुँच जाता था। भांग-ठंडाई, बिना किसी मशीन या बाहरी इंसान की सहायता के खुद ही बनाई जाती थी। यह भी एक बड़ा कार्यक्रम होता था ! 60-70 लोगों के लिए इसको बनाना कोई हंसी-खेल नहीं था। सारी सामग्री, घटकों तथा मसालों का सही अनुपात-मात्रा का पूरा ज्ञान और ध्यान रख पूरी तन्मयता और एकांत में उसका निर्माण किया जाता था। भांग बच्चों के लिए पूरी और कठोरता से निषिद्ध थी। होली के एक दिन पहले होलिका दहन की रस्म पूरे रीती-रिवाजों के साथ पूरी की जाती थी और फिर आ जाता था वह दिन जिसका इंतजार हम बच्चे साल भर से करते रहते थे। 
होलिका दहन 
होली की चहल-पहल सुबह साढ़े आठ-नौ बजे शुरू हो जाती थी। महिलाओं-लड़कियों का अलग गुट होता था जो मैनेजर गेट के पास बांए हाथ के छोटे से मैदान में जुटता था। बाकी छोटे-बड़े पुरुष सामने लॉन में रंगों की धूम मचाते थे। गंगा सामने थीं, पानी इफरात था, रंगों की पूर्ती मिल से होती थी। हम अपनी हाफ पैंटों-निकरों की जेबों में तरह-तरह के रंगों को संजोए मोर्चे पर निकलने को तैयार होने लगते थे। ये दूसरी बात है कि ज्यादातर बच्चों की जेबों में कागज की पुड़ियों में रखे रंग पानी से मिलीभगत कर उन्हीं के बदन को ज्यादा रंगीन कर जाते थे। 

लॉन 
शुरु होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, बिना अपने-पराए का भेद-भाव कर, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। उसी बीच मिठाई का आदान-प्रदान भी बदस्तूर चलता रहता था। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे।  आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे। तीन-चार घंटों के हुड़दंग के बाद, माँओं के, बाथरूम को गंदा ना कर ध्यान से नहाने के कड़े निर्देशों का पालन करते हुए हम सब अपने-अपने जिद्दी रंगों को छुड़ाने की मशक्कत में जुट जाते थे। यह दूसरी बात है कि रंगों और हमारा स्नेह दो-तीन दिनों तक तो बना ही रहता था। 
हुदंग 

शा को पांच बजे के आस-पास लॉन में ठंडाई का कार्यक्रम भी पूरे उत्साह के साथ संपन्न होता था। उसके बाद कभी-कभी वहीं ''स्क्रीन'' लगा किसी फिल्म का भी प्रदर्शन हो जाता था। पूरा दिन कैसे छू-मंतर हो जाता था, पता ही नहीं चलता था।  उसके बाद थके-हारे कैसे बिस्तर पर पहुंचते थे, कब नींद आती थी, कब सुबह होती थी कुछ नहीं पता ! पता था तो सिर्फ यह कि अगली होली का इंतजार उसी दिन से फिर शुरू हो जाता था 😴😍  

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 30 मार्च 2025

शिव, मेरा मैन फ्राइडे

बालकगणों के लिए मील के फैक्ट्री एरिया के अलावा हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी, पर जब भी मुझे दिखता, उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मैं छोटा था और वह मुझसे भी छोटा था ! पता नहीं कहां से आया था, कौन लाया था ! यादाश्त में उसका घरों में काम करते सहायक का रूप ही दर्ज है। शिव उसका नाम  था, ना आगे कुछ ना ही पीछे ! कभी पूछा भी नहीं ! भले ही नाम के आगे-पीछे कुछ न हो पर मेरे साथ शायद उसके किसी पिछले जन्म का कोई संबंध जरूर था !

शिव, पचास साल पहले 

बात साठ के उत्तरार्द्ध की है। बंगाल के नार्थ परगना जिले के भाटपारा इलाके में स्थित रिलायंस जूट मील में  बचपन का वह बेफिक्र, सुखद, अवर्चनीय समय था ! स्कूल से कॉलेज और फिर कार्यक्षेत्र तक का सफर वहीं रहते पूरा हुआ ! उस जगह से मेरे परिवार का पच्चीस साल से भी ज्यादा का नाता रहा !

लॉन 

मील के स्टाफ परिसर में देश के तकरीबन हर प्रांत के लोगों के होने के बावजूद वहां एक परिवार का माहौल था ! तीज-त्यौहार, सुख-दुःख सबके साझा होते थे ! बच्चों को खेल-कूद या किसी भी घर में आने-जाने की पूरी छूट तो थी पर लाड-प्यार-डांट-डपट का हक भी सभी बड़ों को था ! उन दिनों वहां के सर्वेसर्वा डागा जी थे ! जो सिर्फ मील के ही नहीं, उसके स्टाफ के परिवारों के भी संरक्षक थे ! हर कोई उन्हें परिवार के मुखिया के रूप में आदर सहित देखता था ! 

परिसर 

बात हो रही थी शिव की ! जैसा कि मैंने बताया बालकगणों के लिए वहां की हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी पर जब भी मुझे दिखता उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे। 

कैसे भुलाएं इस जगह को 

स मय ने अपनी यात्रा के दौरान मुझे रिलायंस से करीब बीस किमी दूर सोदपुर में स्थित कमरहट्टी जूट मील पहुंचा दिया ! काम मैं वहां जरूर करता था, पर सप्ताहंत या मौका मिलते या बना कर ''घर'' पहुँच जाया करता था। ऐसे ही साल भर बीत गया ! एक दिन रिलायंस आया हुआ था कि अचानक शिव मेरे पास आया और मेरे साथ चलने की इच्छा जाहिर की ! उन दिनों मेरे खाने-पीने का इंतजाम मील के मेस में ही था ! उसके रहने-खाने के इंतजाम के बारे में सोच-विचार कर, कुछ समय पश्चात मेस में उसे सहायक के रूप में रखवा उसके रहने खाने का प्रबंध करवा कर मैंने उसकी इच्छा पूरी कर दी।    

वृक्षों के पीछे हुगली यानी गंगा नदी 

यहां से शुरू होती है शिव के मेरे मैन फ्राइडे बनने की यात्रा ! पता नहीं उस किशोर को मेरे से क्या लगाव था, काम तो उसको रिलांयस में भी मिल सकता था ! खैर ! यहां वह मेरी छोटी से छोटी जरुरत का ध्यान और ख्याल रखने लगा ! कभी-कभी मेरे साथ रिलायंस भी चला जाता था। हालांकि मेस का खाना साफ-सुथरे परिवेश में सफाई पसंद महाराज द्वारा बहुत अच्छी क्वालिटी का बना होता था, पर माँ को उस बारे में सदा चिंता लगी रहती थी ! ऐसे ही एक दिन इस समस्या के निदान हेतु शिव ने माँ को कह दिया आप दोपहर का खाना तैयार रखा करें,  मैं भैया के लिए ले जाया करूँगा !

मुझे इस सांठ-गाँठ के बारे में कुछ पता नहीं था। एक दिन ग्यारह बजे काम से लौटने पर देखता हूँ कि मेरे कमरे में टेबल पर एक टिफिन रखा हुआ है ! पूछताछ पर शिव ने बताया मैं घर से लाया हूँ ! घर से.......! मैं भौचक्क ! यहां यह बताना जरुरी है कि सिमित समय में दोनों जगहों पर आना-जाना आसान नहीं था ! सीधा सड़क मार्ग नहीं था, बस बदलनी पड़ती थी ! वैसे भी सड़क मार्ग से बहुत समय लगता था ! इसलिए यात्रा कई चरणों में पूरी करनी पड़ती थी ! पहले आधा की.मी. तय कर मेन रोड़ पर आना पड़ता था, वहां से बस ले कर सोदपुर स्टेशन, फिर वहां से लोकल ट्रेन से सातंवा स्टेशन कांकिनाड़ा ! उसके बाद फिर वहां से तकरीबन पौन की.मी. पर स्थित मील के अंदर घरों तक ! फिर वैसी ही वापसी ! पागलपन जैसा काम था !

मुझे याद है, उस दिन वैसा करने पर मैं शिव पर बहुत झल्लाया था, गुस्सा हुआ था ! पर वह सर झुकाए सब सुनता रहा..........फिर माँ की ममता सब पर भारी रही ! समय अपनी गति से चलता रहा ! पांच साल निकल गए ! इसी बीच प्रभु ने भी मुझे गृहस्त बनाने की योजना बना डाली ! दिल्ली से संबंध जुड़ा ! यहां भी शिव साये की तरह मेरे साथ रहा ! एक राज की बात बताऊँ, शिव के दिल्ली प्रवास ने वधु-पक्ष पर काफी रुआब डाला था 😀  

हा लांकि शिव ने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा, पर उसके भविष्य को और आने वाली जिम्मेदारियों को ध्यान में रख मैंने उसे मील में स्थाई काम पर रखवा दिया ! मेहनती तो बहुत था, वहां भी कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया। 

मय का फेर ! बिमारी और स्वास्थय के चलते मुझे काम छोड़ना पड़ा ! इसी चक्कर में दिल्ली प्रवास और व्यस्तता के चलते सब पीछे छूट गया ! शिव की खोज-खबर लेने की कोशिशें नाकाम रहीं ! पर मुझे विश्वास है कि अपनी मेहनत के बूते वह जहां भी होगा खुश होगा ! प्रभु उसे स्वस्थ-प्रसन्न रखें ! 

बुधवार, 17 अगस्त 2022

हमें अपने बचपन को बचाए रखना है

हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में शिक्षा देते समय मानवता पर, इंसानियत पर जोर दिया है ! यदि इंसान इंसानियत ना छोड़े, मानव; महामानव बनने की लालसा में मानवता से दूर ना चला जाए, तो इस धरा पर कभी भी शांति, सौहार्द, परोपकार का माहौल खत्म ना हो ! ना किसी युद्ध की आशंका हो ! ना प्रकृति के दोहन या उससे छेड़-छाड़ की गुंजाइश बचे ! नाहीं कायनात को अपना रौद्र रूप धारण करने की जरुरत हो..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अब तो साफ लगने लग गया है कि प्रकृति हमसे रुष्ट हो चुकी है ! खफा तो बहुत पहले से ही थी, जिसका समय-समय पर एहसास भी दिलाती रही है ! पर अपने दर्प में चूर हमने कभी उसकी चेतावनियों पर ध्यान ही नहीं दिया ! इस धरा पर, प्रकृति पर लगातार बिना किसी अपराधबोध के जुल्म ढाते रहे ! उसके दिए अनमोल संसाधनों का शोषण करते रहे ! पर हर चीज की एक हद होती है ! आखिर कायनात ने भी हमें सबक सिखाने की ठान ही ली ! दुनिया भर में मौसम बदलने शुरू हो गए हैं ! कहीं अति वृष्टि, तो कहीं भयंकर सूखा ! कहीं पहाड़ दरक गए तो कहीं बादल फट गए ! कही बाढ़ ने कहर ढा दिया ! जहां सदियों से लोगों ने 25-30 से ऊपर तापमान ना देखा हो वहां पारा 45 के ऊपर जा टिका है ! पहाड़ों में जहां कभी घरों की छत में पंखा टांगने के हुक की जरुरत महसूस नहीं हुई, वहां कूलर बिकने शुरू हो गए हैं ! सागरों ने अपना अलग रौद्र रूप धारण कर लिया है !  पर बाज हम फिर भी नहीं आ रहे !

बाढ़ की विभीषिका 
अभी हाल ही के गर्म मौसम ने सबकी ऐसी की तैसी कर धर दी थी ! विभिन्न इलाकों में गर्मी ने तकरीबन 2000 से अधिक लोगों को मौत की नींद सुला दिया ! कुछ वर्ष पहले तक गर्मी से बचने लोग पहाड़ों का रुख किया करते थे, पर अब वहाँ भी पारे का 40 डिग्री तक पहुँच जाना आम बात हो गई है ! उस पर पानी की बेहद तंगी ! ऐसे में मैदानी भागों के हाल का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है ! 
 
गर्मी से दरकी जमीन 
विड़बना है कि हमारे जीवन से सादगी और सहजता पूरी तरह से तिरोहित हो चुकी है ! सहजता का मतलब जो जैसा है, वैसा ही सबको स्वीकार्य हो ! कोई भेद-भाव नहीं ! क्या प्रकृति के पाँचों मूल तत्व किसी से भेदभाव करते है ? हम भले ही उन्हें उनके रूप में ना स्वीकारें पर उनकी तरफ से कोई भेद-भाव नहीं होता ! उनके लिए पेड़-पौधे, लता-गुल्म, पशु-पक्षी, जानवर-इंसान सब एक बराबर हैं ! धरा ने अपने आँचल में सभी को समेट कर रखा है ! हरेक के लिए भोजन-आश्रय का प्रबंध किया है ! पानी सबको शीतलता प्रदान करता है, प्यास बुझाता है ! वायु प्राणिमात्र को समान राहत देती है, ऐसा नहीं कि वो मानव का ज्यादा ख्याल रखती हो और कंटीली झाड़ियों को बिना छुए निकल जाती हो ! अग्नि अपने दहन में कोई भेद-भाव नहीं करती ! आकाश सभी को अपनी गोद समान रूप से उपलब्ध करवाता है ! ऐसे में माँ प्रकृति की भी यही इच्छा रहती है कि जगत के समस्त प्राणी सबके हों सबके लिए हों ! पर मानव ने अपने हित के लिए सभी को हर तरह का नुक्सान ही पहुंचाया है !  
ढहते पहाड़ 
सृष्टि ने बनाया तो मानव को भी सहज, निश्छल, सरल बनाया है ! शैशवावस्था में उसमें कोई छल-कपट, वैर, अहम् नहीं होता ! प्रकृति के सारे, सहजता, सरलता, सादगी, निश्छलता जैसे गुण उसमें मौजूद होते हैं ! बचपन में ये सारे गुण उसमें सुरक्षित रहते हैं ! इसीलिए वह सबसे हिल-मिल जाता है ! सबसे एक जैसा प्रेमल व्यवहार करता है ! किसी को हानि पहुंचाने की तो वह सोच भी नहीं सकता ! पर जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, आस-पास के माहौल, परिस्थितियों व अन्य कारणों से वह इन सब को भूलता चला जाता है ! सहजता की जगह आडंबर ले लेता है ! अहम् सर चढ़ बोलने लगता है ! परोपकार की जगह स्वार्थ ले लेता है ! खुद को ही महान समझने लगता है ! यहीं से वह प्राणिमात्र तो क्या प्रकृति का भी दुश्मन बन जाता है !  
भोला मासूम बचपन 
इसीलिए हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में शिक्षा देते समय मानवता पर, इंसानियत पर जोर दिया है ! यदि इंसान इंसानियत ना छोड़े, मानव; महामानव बनने की लालसा में मानवता से दूर ना चला जाए, तो इस धरा पर कभी भी शांति, सौहार्द, परोपकार का माहौल खत्म ना हो ! ना किसी युद्ध की आशंका हो ! ना प्रकृति के दोहन या उससे छेड़-छाड़ की गुंजाइश बचे ! नाहीं कायनात को अपना रौद्र रूप धारण करने की जरुरत हो ! इसके लिए हमें सिर्फ अपने बचपन को बचाए रखना है ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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