pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: समाधि
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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

अनोखी समाधि, एक महावृक्ष की

पुरोला देवता रेंज के चीड़ के पेड़ों में एक ऐसा वृक्ष भी था, जिसकी बढ़त आम पेड़ों से अलग थी। समय के साथ 2.70 मीटर की मोटाई वाले तने के इस पेड़ की ऊंचाई 60.65 मीटर तक पहुँच गई थी ! इस खूबी के कारण वह एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा चीड़ का पेड़ बन गया था ! जब यह खबर पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंची तो 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने एशिया के इस सबसे बड़े और ऊँचे चीड़ के पेड़ को सम्मानित करते हुए इसे ''महावृक्ष'' की उपाधि से नवाज, सम्मानित किया................!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 
माधि ! वैसे तो यह योग की अंतिम अवस्था है, जब साधक ध्येय वस्तु के ध्यान मे पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का भी ज्ञान नहीं रहता ! योग और समाधि एक दूसरे के पूरक शब्द हैं ! परंतु साधारण बोलचाल में इसे चलायमान प्राणियों के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है ! जब किसी मृत व्यक्ति या प्राणी का जिस जगह अंतिम संस्कार होता है और उस जगह पर उसकी स्मृति में कोई स्मारक बना दिया जाता है तो उस जगह को उस व्यक्ति या प्राणी की समाधि कहते हैं। पर क्या किसी पेड़ की भी समाधी हो सकती है ?
समाधि स्थल 
जी हाँ ! उत्तराखंड के उत्तरकाशी से 160 किमी की दूरी पर टौंस वन प्रभाग, पुरोला देवता रेंज के अंतर्गत मोरी-त्यूणी सड़क मार्ग पर टौंस नदी के किनारे स्थित है एक अनोखी समाधि ! जिसका एशिया के सबसे बड़े चीड़ के वृक्ष, जिसे पर्यावरण मंत्रालय ने ''महावृक्ष'' की उपाधि प्रदान की थी, की याद को बनाए रखने के लिए वन विभाग द्वारा निर्माण किया गया है ! इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है ! पर जिन्हें इस अनोखी और सुरम्य जगह का पता है, वह यहां मौका मिलते ही जरूर आते हैं !

अनोखी जगह 
त्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के पुरोला देवता रेंज में चीड़ के पेड़ों का एक जंगल है जिसका रखरखाव पर्यावरण मंत्रालय के वन-विभाग द्वारा किया जाता है। वहीं 220 साल की आयु का एक ऐसा वृक्ष भी था, जिसकी बढ़त आम पेड़ों से अलग थी। समय के साथ 2.70 मीटर की मोटाई वाले तने के इस पेड़ की ऊंचाई 60.65 मीटर तक पहुँच गई थी ! इस खूबी के कारण वह एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा चीड़ का पेड़ बन गया था ! जब यह खबर पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंची तो 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने एशिया के इस सबसे बड़े और ऊँचे चीड़ के पेड़ को सम्मानित करते हुए इसे ''महावृक्ष'' की उपाधि से नवाज, सम्मानित किया ! 

पर्यटकों का आकर्षण 
पर इस धरा पर जो भी आया है उसे जाना ही पड़ता है ! हर एक का समय निश्चित है ! यह महावृक्ष भी कवक रोग से ग्रसित हो गया ! कोई उपचार काम नहीं आया ! धीरे-धीरे यह अंदर से खोखला हो कमजोर होता चला गया और 2007 में आए एक भीषण तूफान का सामना ना कर सकने के फलस्वरूप धराशाई हो गया ! वन विभाग ने इसके मान और गौरव का ध्यान रखते हुए इस पेड़ के तनों के साथ ही इस पेड़ के अलग-अलग हिस्सों को संरक्षित कर नदी किनारे एक संग्रहालय बना, उसके आस-पास इको पार्क का निर्माण करवा, उसे चीड़ के पेड़ की समाधि-स्थल का नाम दे दिया ! 
चीड़ वन 
दे वभूमि उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ग्लेशियरों, नदियों, झीलों, तालों, बुग्यालों के लिए तो प्रसिद्ध है ही, इस चीड़ के पेड़ की समाधि को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं और उसके आसपास बने इको पार्क में भी समय व्यतीत करते हैं। महावृक्ष समाधि स्थल पर्यटकों के लिए हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र बना रहा है, कभी समय और अवसर मिले तो जरूर जाइएगा !

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

बाबा हरभजन सिंह, मृत्योपरांत भी देश सेवा में लीन (वीडियो सहित)

समय-समय पर वे सपने में आ कर, अपने सैनिकों को सतर्क करते रहते हैं। कई बार उन्होंने विषम परिस्थितियों के आने के पहले ही सेना को सचेत किया है ! उनकी सूचना हर बार पूरी तरह सही साबित हुई है ! पर वे खुद कभी दिखाई नहीं पड़ते ! पर दूसरी ओर चीनी सैनिकों का मानना है कि उन्होंने एकाधिक बार रात में बाबा हरभजन सिंह को घोड़े पर सवार होकर सीमा पर गश्त लगाते हुए देखा है ...........!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

क्या यह संभव है कि कोई सैनिक अपने देश से इतना प्रेम करता हो कि अपनी मृत्यु के पश्चात भी वह अपनी मातृभूमि की सुरक्षा के लिए सदा सचेत व तत्पर रहता हो ! शायद हाँ ! यहाँ शायद कहना भी शायद गलत होगा क्योंकि इस बात का प्रमाण हम नहीं विदेशी देश के सैनिक देते हैं ! भारत माँ के उस वीर सपूत का नाम है, हरभजन सिंह, जिन्हें मृत्योपरांत अब बाबा हरभजन सिंह के नाम से सादर याद किया जाता है !

बाबा हरभजन सिंह 

मंदिर
मंदिर में स्थित प्रतिमा 
अगस्त, 30, 1946 को पंजाब के गुजरांवाला में जन्मे हरभजन सिंह, बचपन से ही फौजी बनना चाहते थे ! उनकी इस अदम्य इच्छा का ही परिणाम था जिससे 9, फरवरी 1966 को भारतीय सेना के पंजाब रेजिमेंट में एक सिपाही के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई ! 1968 में उन्हें 23वें पंजाब रेजिमेंट के साथ पूर्वी सिक्किम के बार्डर पर तैनात किया गया।



उसी वर्ष की घटना है ! ऐसा कहा और माना जाता है कि 4, अक्टूबर 1968 को जब वे नाथुला दर्रे से डोंगचुई तक अपनी पोस्ट के लिए खच्चरों पर रसद लेकर जा रहे थे, तभी बदकिस्मती से उनका पैर फिसल गया और वे कई फुट नीचे नदी में जा गिरे, पानी का तेज बहाव उनके शरीर को बहा कर दूर ले गया। पांच दिनों की तलाश पर भी जब उनका पता नहीं चल पाया तो उन्हें लापता घोषित कर दिया गया !

दफ्तर और रेस्ट रूम 
कहा जाता है कि उन्होंने अपने साथी सैनिक प्रीतम सिंह के सपने में आकर अपनी मौत की खबर दी और यह भी बताया कि उनका शरीर कहाँ मिलेगा। प्रीतम सिंह की बात पर पहले तो किसी ने भी विश्वास नहीं किया पर शव भी नहीं मिल पा रहा था सो बताए गए स्थान पर गहन खोज की गई और ठीक उसी जगह हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर मिल गया। सेना ने सम्मान पूर्वक उनका अंतिम संस्कार किया ! इसके कुछ दिनों के बाद प्रीतम सिंह को एक बार फिर सपने में आ कर हरभजन जी ने अपनी समाधि बनाने की इच्छा व्यक्त की ! उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए सेना के उच्च अधिकारियों ने “छोक्या छो” नामक स्थान पर उनकी समाधि बनवा दी ! 


समाधि बनने के बाद अजीबोगरीब वाकए होने लगे ! ऐसा लगने लगा जैसे मृत्यु के बाद भी हरभजन सिंह अपनी ड्यूटी करते हुए चीनी सेना की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और समय-समय पर सपने में आ कर अपने सैनिकों को सतर्क करते रहते हैं। कई बार उन्होंने विषम परिस्थितियों के आने के पहले ही सेना को सचेत किया है ! उनकी सूचना हर बार सही साबित हुई है ! पर वे खुद कभी दिखाई नहीं पड़ते ! पर दूसरी ओर चीनी सेना ने बॉर्डर पर घोड़े पर सवार किसी जवान को अपनी निगरानी करते हुए पाया है ! इन बातों की पुष्टि सैन्य अधिकारीयों ने भी की है ! भारतीय सेना के जवान उन्हें ''नाथुला के नायक'' के रूप में याद करते हैं ! 

 


समाधि स्थल 
इन सब बातों के चलते, सेना द्वारा एक अद्भुत निर्णय लिया गया ! उसके द्वारा उन्हें मरणोपरांत कैप्टन की उपाधि से सम्मानित किया गया और बाकी सैनिकों की तरह हरभजन सिंह जी को भी वेतन, दो महीने की छुट्टी, इत्यादि सुविधाएं दी जाने लगीं ! दो महीने की छुट्टी के दौरान उनके घर जाने के लिए ट्रेन में दो सहायकों के साथ उनकी सीट बुक करवाई जाने लगी ! सेना के जवान बताते हैं कि बाबा को ड्यूटी पर कोई भी गफलत बर्दास्त नहीं है, जब कभी किसी सिपाही की सीमा पर पहरा देते वक्त आंख लग जाती है तो उनको अदृश्य चाटें भी पड़ते हैं, जैसे कोई उन्हें जगा रहा हो !

पूजा स्थल 
लोगों में इस जगह को लेकर बढ़ती आस्था तथा उनकी सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने 1982 में  9 किलोमीटर नीचे एक मंदिर बनवा दिया, जिसे अब बाबा हरभजन मंदिर के नाम से जाना जाता है।  हर साल हजारों लोग यहां दर्शन करने आते हैं। मंदिर में बाबा हरभजन सिंह के जूते और बाकी का सामन रखा गया है। भारतीय सेना के जवान इस मंदिर की चौकीदारी करते हैं ! वहां पर तैनात सिपाहियों का कहना है कि रोज उनके जूतों पर किचड़ लगा हुआ होता है और उनके बिस्तर पर सलवटें भी दिखाई पड़ती हैं, जैसे उस पर कोई सोया हो ! ‌

बाबा हरभजन सिंह जी का छोटी सी उम्र में परलोक-गमन के कारण उनकी देश सेवा की अदम्य इच्छा पूरी नहीं हो सकी ! इसीलिए शायद उन्होंने अपनी अल्पकालीन देश सेवा को दीर्घकालिक में तब्दील करने के लिए ही उस लोक में जाने के बजाए अशरीरी रूप में यहीं रह अपने को मातृभूमि के लिए समर्पित कर दिया ! आज उस घटना को घटे करीब 57 साल होने जा रहे हैं, लेकिन उनकी आत्मा आज भी भारतीय सेना के लिए अपना कर्तव्य निभा रही है। सेना भी उनको सदा आदर के साथ याद रखती है। उसी ने उन्हें 'बाबा' की उपाधि दी है। वे हमेशा अमर रहेंगे।

मंदिर और चीनी सीमा 
 
कुहासे से घिरा मंदिर 

यह मंदिर सिक्किम राज्य की राजधानी गंगटोक से 59 किलोमीटर की दूरी पर नाथुला दर्रे से 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, यानी एक तरह से चीनी सीमा से लगा हुआ है ! उनकी निगाह हम पर सदा बनी रहती है ! इसके अलावा यहां का मौसम बिल्कुल अप्रत्याशित है ! एक पल में सुहाना, दूसरे पल में शीत लहर ! कभी कुहासा इतना गहरा कि कुछ गज देखना भी दूभर हो जाता है ! इसलिए यात्रा के पहले समुचित तैयारी होनी चाहिए ! सेना द्वारा संचालित यहां एक गिफ्ट शॉप भी है, जहां से यादगार के तौर पर खरीदारी की जा सकती है ! 

जय हिन्द ! जय हिन्द की सेना !!

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