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गुरुवार, 6 नवंबर 2025

आस्था के साथ-साथ विवेक भी जरुरी है

मन व्यथित और क्षुब्ध है ! हर जगह, किसी के भी द्वारा हिंदुओं और सनातन का अपमान असहनीय हो जाता है ! गुस्सा उन पर भी आता है जो इसके वायस बनते हैं ! अब सोचना उन हिन्दुओं को भी है, जो जगह-जगह जा कर अपनी नाक घुसेड़ते हैं और बेइज्जती करवाने से बाज नहीं आते ! अरे जब तैंतीस श्रेणी के देवता तुम्हारा कुछ नहीं कर पाए तो समझ लो कि किसी के भी द्वारा तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता ...........!

#हिंदी_ब्लागिंग 

कल खबर आई कि पकिस्तान में ननकाना साहिब गए 2100 भारतीय सिख श्रद्धालुओं का लाहौर में गर्मजोशी से स्वागत किया गया ! पंजाब प्रांत के मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा और ETB का अधकारियों ने फूल बरसाए  आज खबर आई कि पाकिस्तानी अधिकारीयों ने जत्थे के बारह सदस्यों को यह कह कर वापस लौटा दिया कि इस यात्रा की अनुमति सिर्फ सिख तीर्थयात्रियों को है, आप हिंदू हो, इसलिए आपको जाने नहीं दिया जाएगा ! आज तक जो कभी नहीं हुआ, वह हुआ ! साफ नजर आता है कि दोनों समुदायों में फूट डालने की नापाक कोशिश की गई ! 

तीर्थ 
पर सवाल यह है कि फूल बरसाने वाले हिंदुस्तानी नाम धारक मंत्री रमेश सिंह ने कोई हस्तक्षेप किया या नहीं ! क्या उन्होंने कोई कोशिश की, इसकी कोई खबर नहीं आई है ! दूसरी तरफ साथ गए 2088 साथियों ने भी क्या इस बात का विरोध किया ? कोई धरना दिया ? कोई आवाज उठाई या परिस्थिति पर दुःख प्रगट कर, यह कह कर आगे बढ़ गए कि 'असी की कर सकदे यां !' अब सोचना उन हिन्दुओं को भी है, जो जगह-जगह जा कर अपनी नाक घुसेड़ते हैं और बेइज्जती करवाने से बाज नहीं आते ! ऊपर से आज का जैसा माहौल है और ये दर्जन भर लोग जहां गए थे, वहां कुछ भी हो सकता था ! कोई भी अनहोनी घट सकती थी !
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Adv.   
क्योंकि हर नजर अनमोल है 
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आज मन व्यथित और क्षुब्ध है ! हर जगह, किसी के भी द्वारा हिंदुओं और सनातन का अपमान असहनीय हो जाता है ! गुस्सा उन पर भी आता है जो इसके वायस बनते हैं ! यहां किसी भी धर्म, आस्था या पंथ का विरोध नहीं है ! सभी का पूरा मान-सम्मान है ! सभी आदरणीय हैं ! आस्था अपनी जगह है ! किसी को किसी के प्रति भी अटूट विश्वास हो सकता है ! विश्वास ही है जिस पर जगत टिका हुआ है ! पर उसके साथ विवेक बहुत जरुरी है ! प्रभु सभी को सद्बुद्धि दे ! 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से    

बुधवार, 18 जून 2025

गुरूजी, छतरपुर वाले

छतरपुर के मंदिर में गुरूजी का समाधिस्थल आज भी लोगों को सम्बल प्रदान कर रहा है ! वहां भक्तों की एक परिवार के रूप में रोज ही भीड़ लगी रहती है, जिसका मानना है कि उनके जीवन में कोई भी कठिनाई या संकट आए, गुरुजी की दया और आशीर्वाद हमेशा उन्हें सही रास्ता दिखाएंगे। मंदिर के भव्य परिसर में लगने वाले रोजाना के लंगर में लोगों का आपसी सौहार्द्र और सभी का एक ही परिवार का सदस्य होने का भाव साफ परिलक्षित होता है............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

अपने देश में समय-समय पर महान विभूतियों का जन्म होता रहा है। जिन्होंने समाज में पसरी बुराइयों को दूर करने और आम इंसान में चेतना जगाने, उनमें ज्ञान का बीजारोपण करने और जीवन का सही मार्ग दिखाने काम किया है। समय के साथ उनमें से कुछ विलक्षण हस्तियों को उनके अनुयायिओं ने अपना गुरु मान ईश्वर स्वरूप सम्मानित पद पर आसीन कर दिया ! ऐसे ही संतों में एक आध्यात्मिक, सम्मानित तथा अपने भक्तों में अत्यंत लोकप्रिय संत थे, छतरपुर वाले गुरूजी ! जिन्हें डुगरी वाले गुरुजी और शुक्राना गुरुजी के नाम से भी जाना जाता है। उनके अनुयायी तो उन्हें शिव जी का अंश मानते हैं !  

गुरु जी 
गुरु जी का असली नाम निर्मल सिंह था। उनका जन्म 7 जुलाई 1954 को पंजाब के मलेरकोटला जिले के डुगरी गांव में हुआ था। बचपन से ही उनका रुझान आध्यात्मिकता की ओर था, वे साधु-संतों के सान्निध्य में ही अपना समय व्यतीत किया करते थे। पर उनके पिता जी की प्रबल इच्छा थी कि वे खूब पढ़ें, उनकी कामना की कद्र करते हुए गुरु जी ने दो उपाधियां अर्जित कीं। पर उनका ध्येय और लक्ष्य तो कुछ और ही था और उसी के चलते उन्होंने 1975 में गृहत्याग कर खुद को पूर्णतया गहरी आध्यात्मिकता में रमा दिया !

आश्रम, छतरपुर 
दे शाटन पर निकले गुरूजी को उनके आत्मज्ञान और धार्मिक विश्वास ने उन्हें जल्द ही एक महत्वपूर्ण और सम्मानित मार्गदर्शक बना दिया। 1990 के दशक में उन्होंने दिल्ली के छतरपुर के भट्टी माइंस इलाके में एक भव्य शिव मंदिर की स्थापना की ! जिसे आज उनके भक्त बड़ा मंदिर के नाम से जानते हैं। यह मंदिर लाखों लोगों के लिए आस्था और भक्ति का केंद्र बना हुआ है। भक्त यहां प्रार्थना करने आते हैं, अप्रत्यक्ष रूप में उनका आशीर्वाद प्राप्त कर, उनके उपदेशों पर अमल करते हैं।
शिव जी की भव्य प्रतिमा 
गुरु जी ने हमेशा अपने अनुयायियों को, जिनमें देश-विदेश की कई जानी-मानी हस्तियां भी शामिल हैं, प्रेमदया, और करुणा का संदेश दिया। उनका मानना था कि सभी धर्म समान हैं और ईश्वर एक ही है। उन्होंने यह सिखाया कि आध्यात्मिकता का असली अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांडों में नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के दिल में होता है। उनका कहना था कि हमें अपनी आत्मा के साथ गहरे संबंध बनाने के लिए एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए और दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
समाधी 
गुरु जी ने 31 मई 2007 को शरीर त्याग दिया, पर उनके उपदेश आज भी उनके अनुयायियों का सकारात्मक मार्गदर्शन कर उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में सहायक हो रहे हैं ! छतरपुर के मंदिर में गुरूजी का समाधिस्थल आज भी लोगों को सम्बल प्रदान कर रहा है ! वहां भक्तों की एक परिवार के रूप में रोज ही भीड़ लगी रहती है, जिसका मानना है कि उनके जीवन में कोई भी कठिनाई या संकट आए, गुरुजी की दया और आशीर्वाद हमेशा उन्हें सही रास्ता दिखाएंगे। मंदिर के भव्य परिसर में लगने वाले रोजाना के लंगर में लोगों का आपसी सौहार्द्र और सभी का एक ही परिवार का सदस्य होने का भाव साफ परिलक्षित होता है। मंदिर के अंदर-बाहर सैंकड़ों स्वयंसेवक, बिना किसी अपेक्षा के खुशी-खुशी, समर्पित भाव से वहां रोज आने वाले हजारों लोगों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं !  
भीतरी कक्ष 
किसी को भी गुरु, नायक या मार्गदर्शक का दर्जा देने में आम जनता की श्रद्धा-विश्वास तथा आस्था का बड़ा हाथ होता है ! जीवन की आपा-धापी की प्रचंड लपटों में जरा सी ठंडी बयार भी अत्यधिक सकून दे जाती है, भले ही वह प्रकृतिप्रदत्त हो ! पर हताश-निराश सर्वहारा को जब किसी के माध्यम से जरा सी भी राहत का एहसास होता है तो वह आँख मूँद कर उसे ही ईश्वर मान बैठता है ! एक सच्चे मार्गदर्शक, रहबर या समर्पित रहनुमा का मिलना सहरा में जल की उपलब्धि जैसा ही है ! आज के युग में जब कदम-कदम पर छल-कपट-फरेब अपना डेरा डाले बैठे हों तब इंसान को खुद के विवेक का सहारा ले, हंस जैसा होना चाहिए जिससे नीर-क्षीर की पहचान हो सके और प्रभु के सच्चे बंदे का सानिध्य मिल सके !

@संदर्भ व चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

क्षणिक बैराग्य

हमारे पहले भी वक्त यूँ ही चला करता था, हमारे बाद भी ऐसे ही चलता रहेगा, क्योंकि समय के पास तो अपने लिए भी समय नहीं होता ! हर सौ साल में मनुष्यों की पूरी दुनिया बदल जाने के बावजूद कायनात यूँ ही कायम रहती आई है ! वर्षों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई थी जो हमें पहचानते ही नहीं ! यह भी एक तरह का बैराग्य ही है, जो परिस्थियोंवश कुछ समय के लिए दिलो-दिमाग पर छा जाता है................! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बै राग्य यानी राग रहित ! वह स्थिति जब किसी विषय-वस्तु से लगाव खत्म हो जाए ! इसके कई प्रकार बताए गए हैं ! जैसे कारण बैराग्य, विवेक बैराग्य, श्मशान बैराग्य, मर्कट बैराग्य इत्यादि ! अधिकतर लोग मर्कट बैराग्य के वशीभूत होते रहते हैं ! जो कुछ समय के लिए ही प्रभावी रहता है ! जैसे ही स्थिति, परिस्थिति, माहौल बदलता है, इसका असर खत्म हो जाता है !  


कुछ दिनों पहले एक समागम में सम्मलित होने का मौका मिला था। उत्तराखंड से कुछ प्रबुद्ध लोगों का आगमन हुआ था, सभी पढ़े-लिखे ज्ञानी जन थे। प्रवचन चल रहे थे ! बीच में नेताओं की, उनके कुकर्मों की बातें आ गईं ! फिर वही सब दोहराया जाने लगा कि सभी यह जानते हैं कि एक दिन सब को जाना ही है और वह भी खाली हाथ, फिर भी संचय की लालसा नहीं मिटा पाता कोई भी ! पाप करने से खुद को रोक नहीं पाता, यही दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है !

प्र वचन जारी था, "सोचने की बात है कि दिन-रात मेहनत कर हम अपना कमाया हुआ धन शादी-ब्याहों में पानी की तरह बहाते हैं, पर किस को याद रहता है कि पिछली दो शादियों में जिनमें शिरकत की थी, उनमें कितना धन खर्च हुआ था या वहां क्या खाया था ? सब भूल चूका होता है ! अपनी जरुरत से कहीं ज्यादा जमीं-जायदाद खरीद कर हम किसे प्रभावित करना चाहते हैं ? कौन सा सकून पाना चाहते हैं ? जानवरों की तरह मेहनत-मश्शकत कर हम अपनी आने वाली कितनी पीढ़ियों को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना चाहते हैं ? क्या हमें अपनी नस्लों की लियाकत के ऊपर भरोसा नहीं है कि वे भी अपने काम में सक्षम होंगे ?'' 
बैरागी 
वा र्तालाप चल रहा था, ''आजकल ज्यादातर घरों में दो या तीन बच्चे होते हैं, किसी-किसी के तो एक ही संतान होती है फिर भी लोग लगे रहते हैं अपनी सेहत को दांव पर लगा कमाने में ! कितना चाहिए एक इंसान को जीवन-यापन करने के लिए ? जिनके लिए हम कमाते हैं वह उनके काम आएगा कि नहीं यह भी पता नहीं ! फिर विडंबना देखिए कि जिनके भविष्य के लिए दिन-रात एक किए हुए होते हैं, वर्तमान में उन्हीं से दो बातें करने के लिए, उनके साथ कुछ समय गुजारने का हमारे पास वक्त नहीं होता ! सारा जीवन यूँ ही और-और सिर्फ और इकट्ठा करने में गुजर जाता है ! 

समागम 
व्या ख्यान में सीख ने स्थान ले लिया, ''धनी होना कोई बुरी बात नहीं है पर धन को अपने ऊपर हावी होने देना ठीक नहीं होता। समय चक्र कभी रुकता नहीं है। जो आज है, वह कल नहीं रहता, जो कल होगा वह भी आगे नहीं रहेगा। एक न एक दिन हम सबको जाना है, एक दूसरे से बिछुड़ना है। हमारे पहले भी वक्त यूँ ही चला करता था, हमारे बाद भी ऐसे ही चलता रहेगा, क्योंकि समय के पास तो अपने लिए भी समय नहीं होता ! हर सौ साल में मनुष्यों की पूरी दुनिया बदल जाने के बावजूद कायनात यूँ ही कायम रहेगी।

वर्षों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई जो हमें पहचानते ही नहीं ! पर हमें यह ख्याल शायद ही आए कि हम अपने पूर्वजों को और उनकी पहचान को कितना याद रख पाए थे !

प्र वचन चल रहा था, लोग दत्तचित्त हो सुन रहे थे। सभी सहमत थे उपरोक्त बातों से ! सभी पर जैसे विरक्ति हावी होती जा रही थी ! यह मर्कट बैराग्य था ! पर इसकी मौजूदगी तभी तक रहनी थी जब तक श्रवण क्रिया चल रही थी ! जैसे कोई सम्मोहन से चुटकी बजते ही होश में आ जाता है वैसे ही इस माहौल से बाहर आते ही सभी ने फिर दो और दो को पांच करने के चक्कर में फंस जाना था ! 

यही तो माया है ! प्रभू की लीला है ! यदि इंसान भूलता नहीं, हर बात को दिल से लगाए रखता या बात-बात पर विरक्त हो जाता, तब तो यह संसार कभी का खत्म हो गया होता ! फिर भी ऐसे समागम हमें कभी-कभी आईना तो दिखा ही जाते हैं। कभी-ना कभी कुछ गंभीरता से सोचने को मजबूर तो कर ही देते हैं !   

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से   

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ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...