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गुरुवार, 6 नवंबर 2025

आस्था के साथ-साथ विवेक भी जरुरी है

मन व्यथित और क्षुब्ध है ! हर जगह, किसी के भी द्वारा हिंदुओं और सनातन का अपमान असहनीय हो जाता है ! गुस्सा उन पर भी आता है जो इसके वायस बनते हैं ! अब सोचना उन हिन्दुओं को भी है, जो जगह-जगह जा कर अपनी नाक घुसेड़ते हैं और बेइज्जती करवाने से बाज नहीं आते ! अरे जब तैंतीस श्रेणी के देवता तुम्हारा कुछ नहीं कर पाए तो समझ लो कि किसी के भी द्वारा तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता ...........!

#हिंदी_ब्लागिंग 

कल खबर आई कि पकिस्तान में ननकाना साहिब गए 2100 भारतीय सिख श्रद्धालुओं का लाहौर में गर्मजोशी से स्वागत किया गया ! पंजाब प्रांत के मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा और ETB का अधकारियों ने फूल बरसाए  आज खबर आई कि पाकिस्तानी अधिकारीयों ने जत्थे के बारह सदस्यों को यह कह कर वापस लौटा दिया कि इस यात्रा की अनुमति सिर्फ सिख तीर्थयात्रियों को है, आप हिंदू हो, इसलिए आपको जाने नहीं दिया जाएगा ! आज तक जो कभी नहीं हुआ, वह हुआ ! साफ नजर आता है कि दोनों समुदायों में फूट डालने की नापाक कोशिश की गई ! 

तीर्थ 
पर सवाल यह है कि फूल बरसाने वाले हिंदुस्तानी नाम धारक मंत्री रमेश सिंह ने कोई हस्तक्षेप किया या नहीं ! क्या उन्होंने कोई कोशिश की, इसकी कोई खबर नहीं आई है ! दूसरी तरफ साथ गए 2088 साथियों ने भी क्या इस बात का विरोध किया ? कोई धरना दिया ? कोई आवाज उठाई या परिस्थिति पर दुःख प्रगट कर, यह कह कर आगे बढ़ गए कि 'असी की कर सकदे यां !' अब सोचना उन हिन्दुओं को भी है, जो जगह-जगह जा कर अपनी नाक घुसेड़ते हैं और बेइज्जती करवाने से बाज नहीं आते ! ऊपर से आज का जैसा माहौल है और ये दर्जन भर लोग जहां गए थे, वहां कुछ भी हो सकता था ! कोई भी अनहोनी घट सकती थी !
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Adv.   
क्योंकि हर नजर अनमोल है 
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आज मन व्यथित और क्षुब्ध है ! हर जगह, किसी के भी द्वारा हिंदुओं और सनातन का अपमान असहनीय हो जाता है ! गुस्सा उन पर भी आता है जो इसके वायस बनते हैं ! यहां किसी भी धर्म, आस्था या पंथ का विरोध नहीं है ! सभी का पूरा मान-सम्मान है ! सभी आदरणीय हैं ! आस्था अपनी जगह है ! किसी को किसी के प्रति भी अटूट विश्वास हो सकता है ! विश्वास ही है जिस पर जगत टिका हुआ है ! पर उसके साथ विवेक बहुत जरुरी है ! प्रभु सभी को सद्बुद्धि दे ! 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से    

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

यहां हनुमान जी की देवी स्वरूप में पूजा होती है

इसके पीछे रामायण के लंका कांड में वर्णित उस घटना की मान्यता है, जिसमें अहिरावण राम व लक्ष्मण जी को छल से उठाकर, पाताल लोक ले जा कर अपनी आराध्य कामदा देवी को उनकी बलि चढ़ाना चाहता था, तभी हनुमान जी वहां जा कर मूर्ति में प्रवेश कर देवी के स्वरूप में उसका वध कर राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बैठा वापस ले आते हैं ! क्योंकि हनुमान जी ने मूर्ति में प्रवेश कर देवी का रूप धारण किया था, इसीलिए इस मंदिर में हनुमान जी की देवी स्वरूप में पूजा होती है..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हमारा देश विचित्र, अनोखी, विलक्षण मान्यताओं से भरा पड़ा है ! कोई-कोई बात तो ऐसी होती है कि उस पर सहसा विश्वास ही नहीं होता ! पर जब वह बात साक्षात दिखती हो, उस मान्यता का सच में अस्तित्व नजर आता हो, तो अविश्वास की कोई गुंजाईश भी नहीं रह जाती है ! ऐसा ही एक अनोखा, अनूठा, सत्य हनुमान जी के मंदिर के रूप में छत्तीसगढ़ राज्य के रतनपुर जिले के गिरजाबंध इलाके में स्थित है !

मंदिर का मुख्यद्वार 
अपने देश में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसे हनुमान जी के बारे में कुछ भी पता न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता ! देशभर में हनुमानजी के कई लोकप्रिय चमत्कारिक मंदिर हैं और लगभग सभी मंदिर जागृत हैं। प्रत्येक मंदिर से उसका कुछ ना कुछ इतिहास भी जुड़ा हुआ है। पर उनके इस मंदिर के बारे में जानने वालों की संख्या बहुत ही सिमित है, यहां तक कि इस जगह से सिर्फ 140 कि.मी. या उससे भी कुछ कम दूरी पर स्थित राज्य की राजधानी रायपुर के अधिकांश लोगों को भी इस की कोई खास जानकारी नहीं है ! जो भी इसके बारे में सुनता है, चौंक कर रह जाता है !  
देवी स्वरूप 

विश्व के इस अनोखे, इकलौते मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें हनुमान जी की देवी स्वरूप में पूरे साजोश्रृंगार के साथ पूजा-अर्चना की जाती है ! एक झटका सा लगा ना.....?? हनुमान जी, जो आजन्म ब्रह्मचारी रहे, हर नारी को पूज्यनीय माना ! उन्हीं की नारी स्वरूप में पूजा......!!  पर यह सच है ! इसके पीछे रामायण के लंका कांड में वर्णित उस घटना की मान्यता है, जिसमें अहिरावण राम और लक्ष्मण जी को छल से उठाकर पाताल लोक ले जा कर अपनी आराध्य कामदा देवी को उनकी बलि चढ़ाना चाहता है ! तभी हनुमान जी वहां जा कर मूर्ति में प्रवेश कर देवी के स्वरूप में उसका वध कर राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बैठा वापस ले आते हैं ! क्योंकि हनुमान जी ने मूर्ति में प्रवेश कर देवी का रूप धारण किया था, इसीलिए इस मंदिर में हनुमान जी की देवी स्वरूप में पूजा होती है !

श्री हनुमते नम:

हनुमान जी की यह नारी स्वरूप प्रतिमा दक्षिणमुखी है। दक्षिणमुखी हनुमान भक्तों के लिए परम पवित्र और पूज्यनीय माने जाते हैं ! इस प्रतिमा के बाएँ कंधे पर प्रभु श्रीराम और दाएँ कंधे पर लक्ष्मण जी विराजमान हैं। हनुमान जी के पैरों के नीचे दो राक्षसों की मूर्तियां भी बनी हुई हैं !   आस्था,विश्वास,

लोकमत के अनुसार 10वीं - 11वीं शताब्दी में हनुमान जी के परम भक्त रतनपुर के राजा रत्नदेव के पुत्र को गंभीर बिमारी ने जकड़ रखा था ! राजा को सपने में हनुमान जी ने दर्शन दे, अपने होने के स्थान की जानकारी दे, उसे एक तालाब खुदवा कर उसके पास स्थापित करने को कहा ! राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया ! उस तालाब में स्नान करने के पश्चात उनके पुत्र पृथ्वी देव को रोग से मुक्ति मिली ! मान्यता है कि आज भी उस तालाब में 21 मंगलवार स्नान करने से असाध्य रोगों से छुटकारा मिल जाता है और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं !

मान्यताएं जैसी भी हों, लोकमत कुछ भी हो, पर यह सच है कि यह मंदिर अपने आप में विलक्षण है, अनोखा है, अद्भुत है ! कभी भी मौका मिले तो एक बार यात्रा तो करनी ही चाहिए ! 

@छवियां अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 3 अगस्त 2025

राष्ट्रपति लिंकन और केनेडी की जिंदगी और हत्या की अविश्वसनीय समानताएं

अमेरिका में कई राजनीतिक हस्तियों की हत्याएं हुईं हैं ! जिनमें अब्राहम लिंकन, जेम्स गारफील्ड, विलियम मैककिनले, रोनॉल्ड विलसन रीगन और अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की बहु-चर्चित व प्रमुख रही हैं ! लेकिन लिंकन और केनेडी की जिंदगी और हत्या से जुड़े संयोग ऐसे हैं, जो हैरान कर के रख देते हैं, इसके अलावा और ऐसे उदाहरण कहीं खोजे नहीं मिलते ........!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कभी-कभी दुनिया में कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिस पर सहसा विश्वास ही नहीं होता ! पर करना पड़ता है क्योंकि सब कुछ सामने घटित होता है। ऐसा ही एक अनोखा, विलक्षण वाकया है, अमेरिका के दो राष्ट्रपतियों के साथ घटी घटनाओं का ! हालांकि दोनों राष्ट्राध्यक्षों के कार्यकाल में करीब सौ सालका फासला है, पर थोड़ी सी अदला-बदली के साथ दोनों के जीवन में घटी घटनाओं की समानता और उनके बीच का सामंजस्य आश्चर्य से भर देता है ! विश्वास नहीं होता कि ऐसा कुछ हुआ होगा ! यह सच दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर देता है ! 

लिंकन और केनेडी 
जिन दोनों की बात है, उन में पहले हैं, प्रेसिडेंट अब्राहम लिंकन तथा दूसरे हैं जॉन एफ. केनेडी। 

प्रेसिडेंट लिंकन 1860 मे राष्ट्रपति चुने गये थे ! केनेडी का चुनाव 1960 मे हुआ था ! 

अब्राहम लिंकन को 1846 में कांग्रेस के लिए चुना गया था, वहीं 100 साल बाद यानि 1946 में जॉन एफ कैनेडी को कांग्रेस के लिए चुना गया था। 

लिंकन और केनेडी दोनों के नामों में सात-सात अक्षर हैं।

दोनों राष्ट्रपतियों का संबंध नागरिक अधिकारों से जुडा हुआ था !

लिंकन के सेक्रेटरी का नाम केनेडी तथा केनेडी के सेक्रेटरी का नाम लिंकन था !

दोनों राष्ट्रपतियों का कत्ल शुक्रवार को अपनी पत्नियों के सामने उनकी उपस्थिति में ही हुआ था !

लिंकन के हत्यारे बूथ ने थियेटर मे लिंकन पर गोली चला कर एक स्टोर मे शरण ली थी और केनेडी का हत्यारा ओस्वाल्ड स्टोर मे केनेडी को गोली मार कर एक थियेटर मे जा छुपा था ! 

बूथ का जन्म 1839 मे तथा ओस्वाल्ड का 1939 मे हुआ था ! 

दोनों हत्यारों की हत्या मुकद्दमा चलने के पहले ही कर दी गयी थी ! 

दोनों के हत्यारों जॉन विल्क्स बूथ (John Wilkes Booth) और ली हार्वे ओसवाल्ड (Lee Harvey Oswald) के नामों में 15-15 अक्षर हैं ! 

* दोनों राष्ट्रपतियों के उत्तराधिकारियों का नाम जॉनसन था ! 

लिंकन के उत्तराधिकारी एन्ड्रयु जॉनसन का जन्म 1808 में तथा केनेडी के वारिस लिंडन जॉनसन का जन्म 1908 मे हुआ था।   

लिंकन की हत्या फ़ोर्ड के थियेटर में हुई थी, जबकी केनेडी फ़ोर्ड कम्पनी की कार में सवार थे !

अमेरिका में कई राजनीतिक हस्तियों की हत्याएं हुईं हैं ! जिनमें अब्राहम लिंकन, जेम्स गारफील्ड, विलियम मैककिनले, रोनॉल्ड विलसन रीगन और अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की बहु-चर्चित व प्रमुख रही हैं ! लेकिन लिंकन और केनेडी की जिंदगी और हत्या से जुड़े संयोग ऐसे हैं, जो हैरान कर के रख देते हैं, इसके अलावा और ऐसे उदाहरण कहीं खोजे नहीं मिलते !

इतनी समानताएं ! इतने संयोग ! खुद तो खुद साथ में जुड़े लोग, साल, दिन भी वैसी ही विशिष्टता लिए हुए ! हैरान करने वाला है यह सारा सच !

मंगलवार, 18 मार्च 2025

लड्डू गोपाल जी के संरक्षण में चल रही एक मिठाई की दुकान

दुकान में ग्राहक आते हैं, अपनी पसंद की मिठाई लेते हैं, डिब्बे पर लिखी सारी जानकारी पढ़ते हैं और पास पड़े डिब्बे में उसकी कीमत डाल देते हैं। ग्राहकों की सहूलियत के लिए पास ही अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोट भी रखे रहते हैं जिससे मिठाई की उचित कीमत अदा की जा सके। क्यू आर कोड से भी भुगतान की सुविधा है ! इसके अलावा जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे भी मिठाई ले जा सकते हैं, इस विश्वास के साथ कि जब भी संभव होगा, वे उधार चुकता कर देंगे...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

के दौर में, जहां भाई-भाई का विश्वास नहीं करता ! धन-दौलत के लालच पिता-पुत्र में ठन जाती हो ! छोटी-छोटी बातों पर संदेह किया जाता हो ! आस्था-विश्वास-भाईचारा-इंसानियत किसी बीते युग की बातें लगती हों ! वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी ईश्वर पर अटूट आस्था है। जिनका विश्वास है कि भले ही दिखते ना हों पर भगवान सदा हमारे साथ रहते हैं !  
 
लड्डू गोपाल जी 
बलपुर के नेपियर टाउन में रहने वाले ऐसे ही एक प्रभु भक्त हैं, विजय पांडे जी। उनका मिठाई का कारोबार है। उनकी बचपन से ही श्री कृष्ण जी के बालरूप लड्डू गोपाल में गहरी आस्था व श्रद्धा है। चौबीस घंटे खुली रहने वाली उनकी दुकान 2014 से मंदिरों और पूजास्थलों के साथ-साथ श्रद्धालुओं की मांग पूरी करती आ रही है। पर उस दूकान में ना हीं कोई मालिक है, ना हीं कोई विक्रेता है, ना हीं कोई कैशियर है, ना हीं कोई सुरक्षा कर्मी ! यह दुकान पूरी तरह से विश्वास और ईमानदारी पर टिकी हुई है और पूरी तरह से भगवान के भरोसे चल रही है। यहां आने वाला हर ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार मिठाई उठाता है और पूरी ईमानदारी से पैसे रखकर चला जाता है। 

विजय पांडे जी 
ऐसा ख्याल कैसे आया, इस बारे में विजय जी बताते हैं कि एक दिन उनकी दुकान पर एक व्यक्ति आया, जो अपनी बेटी के जन्म-दिन पर मिठाई लेना चाहता था पर उसके पास पैसे नहीं थे, पर संकोचवश वह बोल नहीं पा रहा था ! विजय जी ने उसकी मजबूरी समझी और बिना झिझक उसे मिठाई दे दी और कहा कि जब संभव हो, वह पैसे दे जाए ! इसी घटना के बाद उन्होंने सोचा कि मजबूरी के संकोच के कारण कोई भी इंसान से कुछ माँगने पर झिझकेगा परंतु ईश्वर से नहीं ! आज यदि यहां मेरी जगह दुकान पर खुद लड्डू गोपाल बैठे होते, तो यह आदमी इतना संकोच नहीं करता ! बस, उसी समय से उन्होंने पूरी दुकान प्रभु को सौंप दी, उन्हें ही मालिक बना दिया ! इसीलिए इस दुकान में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम लड्डू गोपाल जी के दर्शन होते हैं। 
लड्डू गोपाल जी का कैश काउंटर 
ने पियर टाउन के शास्त्री ब्रिज के पास स्थित इस दुकान में ग्राहक आते हैं, अपनी पसंद की मिठाई लेते हैं, डिब्बे पर लिखी सारी जानकारी पढ़ते हैं और पास पड़े डिब्बे में उसकी कीमत डाल देते हैं। ग्राहकों की सहूलियत के लिए पास ही अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोट भी रखे रहते हैं जिससे मिठाई की उचित कीमत अदा की जा सके। क्यू आर कोड से भी भुगतान की सुविधा है ! इसके अलावा जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे भी मिठाई ले जा सकते हैं, इस विश्वास के साथ कि जब भी संभव होगा, वे उधार चुकता कर देंगे ! देश में अपनी तरह का शायद यह पहला प्रयोग है !
प्रवेश द्वार 
विजय जी का कहना है, यहां जो भी ग्राहक आता है, तो उसे पता होता है कि वह किसी इंसान से नहीं, बल्कि भगवान से लेन-देन कर रहा है, ऐसे में बेईमानी की गुंजाइश ही नहीं बचती ! यह पूछने पर कि भविष्य कैसा होगा, उन्होंने कहा मुझे पूरा भरोसा है कि लोग लड्डू गोपाल से धोखा नहीं करेंगे, सब कुछ ठीक चलेगा ! इसका प्रमाण है वह वजन की मशीन जिसे ग्राहकों की वजन को लेकर किसी शंका के समाधान के लिए रखा गया है पर आज तक किसी ने भी उसका उपयोग नहीं किया है !
इस प्रयोग की सफलता के बाद आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या इसी तरह की ईमानदारी आधारित दुकानों की संख्या बढ़ सकती है ? क्या दूसरे व्यवसाय भी इस मॉडल को अपनाएंगे ? फिलहाल, विजय पांडे जी ने समाज को एक नई सोच और दिशा दी है, जहां मुनाफे से ज्यादा आस्था, विश्वास, सौहार्द का वातावरण दिखाई देता है ! प्रभु उनके भरोसे को डगमगाने ना दें ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

ना वैसे सिंहासन रहे नाहीं वैसे आरूढ़ होने वाले

शायद यह उस प्राचीन सिंहासन की पुतलियों का ही श्राप हो, जिससे गलत तरीके से उसे हासिल कर उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है ! जिससे वह सच को छोड़ झूठ का पक्ष लेने लगता है ! सच्चाई सामने होते हुए भी वह अपनी आँखें बंद कर झूठ को सही ठहराने लगता है ! अपने हित, अपने पद, अपने भविष्य, अपने परिवार, अपनी सुरक्षा को मद्देनजर रख कर वह अपना फैसला गढ़ने लगता लगता है ! भले ही इसके लिए उसकी चारों ओर से लानत-मलानत हो रही हो..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी समय राजाओं के सिंहासन, न्यायाधीश की कुर्सी या पंचायतों के आसन की बहुत गरिमा होती थी। उस पर बैठने वाले का व्यवहार पानी में तेल की बूंद के समान रहा करता था। उसके लिए न्याय सर्वोपरी होता था। उस स्थान को पाने के लिए उसके योग्य बनना पड़ता था। समय बदला, उसके साथ ही हर चीज में बदलाव आया। पुराने किस्से-कहानियों में वर्णित घटनाएं कपोलकल्पित सी लगने लगीं। प्राचीन ग्रंथों को छोड़ दें तो 70-80 साल पहले की कथाओं को भी पढने से लोग आश्चर्यचकित होते हैं कि कहीं ऐसा भी हो सकता था ?
सिंहासन 
हमारे साहित्य ग्रंथों में राजा विक्रमादित्य का जितना बखान उनकी वीरता, न्याय प्रियता, उनके ज्ञान, चारित्रिक विशेषता, गुण ग्राहकता के लिए हुआ है, वह शायद ही किसी और सम्राट या नायक के लिए हुआ हो। कहते हैं कि उनके पराक्रम, शौर्य, न्यायप्रियता, कला-मर्मज्ञता तथा दानशीलता से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने उन्हें एक दिव्य रत्नजड़ित स्वर्णिम सिंहासन उपहार में दिया था ! इसमें 32 पुत्तलिकाएं यानी पुतलियां लगी हुई थीं ! उसी पर बैठ कर वे न्याय किया करते थे। उस आसन के उपर तक पहुंचने के लिए बत्तीस सीढियां चढ़नी पड़ती थीं। हर सीढ़ी की रखवाली एक-एक पुतली करती थी, जिससे कोई अयोग्य उस पर आसनारूढ ना हो जाए !  
न्याय का हथौड़ा 
विक्रम ने राज-पाट छोड़ते वक्त उस सिंहासन को भूमि में गड़वा दिया था कि कहीं इसका दुरूपयोग ना हो ! कालांतर में जब राजा भोज ने शासन संभाला और उन्हें इस बात का पता चला तो उन्होंने उसे जमीन से निकलवा, उस पर बैठ कर राज करने का निश्चय किया। शुभ मुहुर्त में जब उन्होंने उस पर पहला कदम रखा, तब उस पायदान की रक्षक पुतली ने उन्हें राजा विक्रम से जुड़ी एक कथा सुनाई और पूछा कि राजन, क्या आप अपने को इस सिंहासन के योग्य पाते हैं ? राजा भोज ने विचार कर कहा, नहीं ! फिर उन्होंने उस लायक बनने के लिए साधना की, अपने को उस योग्य बनाया। इस तरह उन्होंने बत्तीस पुतलियों को संतुष्ट कर अपने आप को उस सिंहासन के लायक बना, उस को ग्रहण किया, यह नहीं कि अपने रसूख का दुरूपयोग कर जबरन उसे हासिल कर लिया हो ! 
सर्वोच्च 
यह तो पुरानी बात हो गई। पर हमारे समय के दिग्गज कथाकारों की कहानियों के पंचपरमेश्वर या और भी धर्माधिकारियों के किस्से मशहूर हैं, जो अपनी बुद्धिमत्ता, कुशाग्रता तथा लियाकत से यह सम्मान पाते थे ! इन गरिमामय आसनों पर बैठने के पश्चात, किसी भी प्रकार का भेदभाव, दवाब या पक्षपात ना कर न्याय और सिर्फ न्याय किया करते थे, चाहे उनके सामने कोई भी वादी-प्रतिवादी खड़ा हो ! इसीलिए लोगों को उन पर अटूट विश्वास होता था और वे आदर के पात्र बने रहते थे ! 
न्यायस्थल 
पर अब समय बहुत कुछ बदल चुका है ! दुनिया के हर क्षेत्र की तरह न्याय का यह पावन स्थल भी बुराइयों से अछूता नहीं रह गया है ! कुछ लोगों द्वारा इसे हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड़-भेद हर तरह की नीति अपनाई जाने लगी है। योग्यता या काबिलियत ठगी सी रह जाती हैं, इस प्रकार के उपक्रमों को देख कर ! इसी कारण लोगों का विश्वास भी ऐसी प्रणाली से तिरोहित होने लगा है ! लोग हर फैसले को शक की निगाह से देखने लगे हैं !
कोर्ट रूम 
शायद यह उस प्राचीन सिंहासन की पुतलियों का ही श्राप हो, जिससे गलत तरीके से उसे हासिल कर उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है ! जिससे वह सच को छोड़ झूठ का पक्ष लेने लगता है ! सच्चाई सामने होते हुए भी वह अपनी आँखें बंद कर झूठ को सही ठहराने लगता है ! अपने हित, अपने पद, अपने भविष्य, अपने परिवार, अपनी सुरक्षा को मद्देनजर रख कर वह अपना फैसला गढ़ने लगता लगता है ! अपनी गलत बातों का विरोध करने वाला उसे अपना कट्टर दुश्मन लगने लगता है। उस आसन पर बैठ सत्ता हासिल होते ही वह अपने आप को खुदा समझने लगता है !
विश्वास 
पर संतोष की बात है कि ऐसे लोग मुठ्ठी भर के ही हैं ! ऐसा भी नहीं है कि यह क्षेत्र पूरी तरह से निराशा का पर्याय बन गया हो ! अभी भी अधिकांश कर्मठ लोग बिना किसी भय, लोभ, दवाब के अपने काम को सही ढंग से अंजाम देते आ रहे हैं ! जबकि उनको सदा जान-माल का खतरा बना रहता है ! पर उनका विवेक, उनका अंतर्मन, उनका आत्म विश्वास, उनकी निष्ठा उन्हें पथभ्रष्ट नहीं होने देती, भले ही उनके सामने कितना भी दुर्दांत अपराधी क्यों ना खड़ा हो ! इसीलिए सेवानिवृति के पश्चात भी उनकी गरिमा, उनका सम्मान, उनकी प्रतिष्ठा बनी रहती है ! पर वही बात है कि ओछे लोगों की हरकत आजकल ज्यादा प्रचार पाती है और कर्तव्यनिष्ट लोग गुमनामी की धुंध में अलक्षित से रह जाते हैं ! 

बुधवार, 18 मार्च 2020

प्रभु कभी अपने बच्चों को नहीं बिसारते

आज  कोरोना की भयावकता को देख युद्ध स्तर पर इसके खिलाफ मुहीम छेड़ी जा चुकी है ! जिसके तहत कई मंदिरों को बंद कर दिया गया है तो कुछ में अत्यधिक सावधानी बरती जा रही है। इस पर कुछ अति बुद्धिमान तथा आत्मश्लाघी विद्वान भगवान का मजाक उड़ाने से भी बाज नहीं आ रहे ! इसी पर एक पुरानी कहानी याद आ गयी...............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग
देश के एक हिस्से में बरसात के दिनों में तूफ़ान आ जाने से हाहाकार मचा हुआ था ! सैलाब ने हर ओर तबाही मचा दी थी ! बड़े-बड़े घर जमींदोज हो गए थे ! धन-जन की बेहिसाब क्षति हुई थी। इंसान-पशु-मवेशी सब बाढ़ की चपेट में आ जान गंवा रहे थे। ऐसे में भगवान में गहरी आस्था रखने वाला एक आदमी किसी तरह खुद को बचाते हुए एक पेड़ पर बैठा प्रभु से खुद को बचाने की गुहार लगा रहा था। उसे पूरा विश्वास था कि भगवान् उसकी रक्षा जरूर करेंगे। तभी उधर से एक नाव गुजरी और उसे देख उन्होंने पुकार कर कहा कि नौका में आ जाओ ! पर उसने जवाब दिया कि आप जाओ, मुझे मेरे भगवान बचा लेंगे। उसे ना आता देख नाव आगे बढ़ ली। कुछ देर बाद वहां से लोगों को पानी से बचा सुरक्षित जगह तक ले जाता हुआ एक स्टीमर गुजरा, उसमें बैठे कर्मियों के उसे बुलाने पर उसने उनको भी वही जवाब दिया, कि उसे उसके प्रभु बचा लेंगे ! उसको समझाने का कोई असर ना होते देख वे भी आगे चले गए। इधर शाम घिरने लगी थी, ऐसे में कुछ देर बाद उधर से सेना के जवान अपनी मोटर बोट से निकले और इसे देख बोले कि इधर के सभी लोगों को बचा लिया गया है, यह अंतिम प्रयास है ! तुम ही बचे हो आ जाओ ! पर इस भोले भक्त ने फिर वही राग अलाप कर ईश्वर की दुहाई दी ! लाख समझाने पर भी उसके ना मानने और अपने राहत कार्य में विलंब होता देख वे लोग भी आगे बढ़ गए।

रात घिर आई, पानी का वेग बढ़ गया और वह पेड़ जिसका सहारा उस आदमी ने लिया था उखड कर पानी में जा गिरा ! दिन भर के भूखे-प्यासे, थके-हारे उस आदमी की पानी से संघर्ष ना कर पाने से मौत हो गयी। मरणोपरांत जब वह ऊपर भगवान के सामने हाजिर हुआ तो गुस्से से भरा हुआ था ! उसने चिल्ला कर शिकायत की कि मैं तुम्हारा भक्त, मुसीबत में पड़ा, गहरी आस्था से तुम्हें पुकार रहा था ! मुझे पूरा विश्वास था कि तुम मुझे बचा लोगे ! पर तुमने तो मेरी एक ना सुनी और मुझे मार ही डाला, ऐसा क्यों ?
प्रभु बोले, अरे मुर्ख ! मैंने तो तेरी हर पल सहायता करनी चाही ! पहले एक नाव भेजी, तूने उसे नकार दिया ! फिर मैंने स्टीमर भेजा, तू उसमें भी नहीं चढ़ा ! फिर मैंने सेना के जवानों को तुझे बचाने भेजा, पर तू कूढ़मगज तब भी नहीं माना ! तो क्या मैं खुद गरुड़ पर सवार हो तुझे बचाने आता ? चल जा अपने लेखे-जोखे का हिसाब होने तक अपने अगले जन्म का इंतजार कर !

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...