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गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

यहां हनुमान जी की देवी स्वरूप में पूजा होती है

इसके पीछे रामायण के लंका कांड में वर्णित उस घटना की मान्यता है, जिसमें अहिरावण राम व लक्ष्मण जी को छल से उठाकर, पाताल लोक ले जा कर अपनी आराध्य कामदा देवी को उनकी बलि चढ़ाना चाहता था, तभी हनुमान जी वहां जा कर मूर्ति में प्रवेश कर देवी के स्वरूप में उसका वध कर राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बैठा वापस ले आते हैं ! क्योंकि हनुमान जी ने मूर्ति में प्रवेश कर देवी का रूप धारण किया था, इसीलिए इस मंदिर में हनुमान जी की देवी स्वरूप में पूजा होती है..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हमारा देश विचित्र, अनोखी, विलक्षण मान्यताओं से भरा पड़ा है ! कोई-कोई बात तो ऐसी होती है कि उस पर सहसा विश्वास ही नहीं होता ! पर जब वह बात साक्षात दिखती हो, उस मान्यता का सच में अस्तित्व नजर आता हो, तो अविश्वास की कोई गुंजाईश भी नहीं रह जाती है ! ऐसा ही एक अनोखा, अनूठा, सत्य हनुमान जी के मंदिर के रूप में छत्तीसगढ़ राज्य के रतनपुर जिले के गिरजाबंध इलाके में स्थित है !

मंदिर का मुख्यद्वार 
अपने देश में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसे हनुमान जी के बारे में कुछ भी पता न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता ! देशभर में हनुमानजी के कई लोकप्रिय चमत्कारिक मंदिर हैं और लगभग सभी मंदिर जागृत हैं। प्रत्येक मंदिर से उसका कुछ ना कुछ इतिहास भी जुड़ा हुआ है। पर उनके इस मंदिर के बारे में जानने वालों की संख्या बहुत ही सिमित है, यहां तक कि इस जगह से सिर्फ 140 कि.मी. या उससे भी कुछ कम दूरी पर स्थित राज्य की राजधानी रायपुर के अधिकांश लोगों को भी इस की कोई खास जानकारी नहीं है ! जो भी इसके बारे में सुनता है, चौंक कर रह जाता है !  
देवी स्वरूप 

विश्व के इस अनोखे, इकलौते मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें हनुमान जी की देवी स्वरूप में पूरे साजोश्रृंगार के साथ पूजा-अर्चना की जाती है ! एक झटका सा लगा ना.....?? हनुमान जी, जो आजन्म ब्रह्मचारी रहे, हर नारी को पूज्यनीय माना ! उन्हीं की नारी स्वरूप में पूजा......!!  पर यह सच है ! इसके पीछे रामायण के लंका कांड में वर्णित उस घटना की मान्यता है, जिसमें अहिरावण राम और लक्ष्मण जी को छल से उठाकर पाताल लोक ले जा कर अपनी आराध्य कामदा देवी को उनकी बलि चढ़ाना चाहता है ! तभी हनुमान जी वहां जा कर मूर्ति में प्रवेश कर देवी के स्वरूप में उसका वध कर राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बैठा वापस ले आते हैं ! क्योंकि हनुमान जी ने मूर्ति में प्रवेश कर देवी का रूप धारण किया था, इसीलिए इस मंदिर में हनुमान जी की देवी स्वरूप में पूजा होती है !

श्री हनुमते नम:

हनुमान जी की यह नारी स्वरूप प्रतिमा दक्षिणमुखी है। दक्षिणमुखी हनुमान भक्तों के लिए परम पवित्र और पूज्यनीय माने जाते हैं ! इस प्रतिमा के बाएँ कंधे पर प्रभु श्रीराम और दाएँ कंधे पर लक्ष्मण जी विराजमान हैं। हनुमान जी के पैरों के नीचे दो राक्षसों की मूर्तियां भी बनी हुई हैं !   आस्था,विश्वास,

लोकमत के अनुसार 10वीं - 11वीं शताब्दी में हनुमान जी के परम भक्त रतनपुर के राजा रत्नदेव के पुत्र को गंभीर बिमारी ने जकड़ रखा था ! राजा को सपने में हनुमान जी ने दर्शन दे, अपने होने के स्थान की जानकारी दे, उसे एक तालाब खुदवा कर उसके पास स्थापित करने को कहा ! राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया ! उस तालाब में स्नान करने के पश्चात उनके पुत्र पृथ्वी देव को रोग से मुक्ति मिली ! मान्यता है कि आज भी उस तालाब में 21 मंगलवार स्नान करने से असाध्य रोगों से छुटकारा मिल जाता है और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं !

मान्यताएं जैसी भी हों, लोकमत कुछ भी हो, पर यह सच है कि यह मंदिर अपने आप में विलक्षण है, अनोखा है, अद्भुत है ! कभी भी मौका मिले तो एक बार यात्रा तो करनी ही चाहिए ! 

@छवियां अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

रामायण का सबसे तिरस्कृत पात्र, मंथरा

कैकेई का अपनी इस चचेरी बहन के साथ बहुत लगाव तथा प्रेम था ! दोनों बचपन की सहलियां भी थीं ! एक-दूसरे के बिना उनका समय नहीं बीतता था ! इसीलिए मंथरा की ऐसी हालत देख, उसके भविष्य को ले कर कैकेई भी चिंतित व दुखी रहा करती थी ! इसीलिए अपने विवाह के पश्चात उसको अपने साथ अयोध्या ले आई थी ! परंतु उसके रंग-रूप को देख अयोध्यावासी उसे कैकई की बहन नहीं बल्कि मुंहलगी दासी ही समझते थे.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

महाग्रंथ रामायण में मंथरा का विवरण एक ऐसी महिला का है, जिसने श्री राम को वनवास दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! इस संदर्भ में कई तरह की मान्यताएं प्रचलन में हैं ! कहीं उसका दुंदुभी नाम की गंधर्वी के रूप में उल्लेख है जो देवताओं की सहायक बन कैकई को उकसा कर श्री राम को वन भेजने का उपक्रम करती है, जिससे राक्षसों का नाश हो सके ! तो कहीं उसका भक्त प्रह्लाद के पुत्र विरोचन की पुत्री के रूप में उल्लेख है जो अपनी तथा राक्षस जाति की बदतर हालत का जिम्मेवार भगवान विष्णु को मान उनसे बदला लेने की ठान लेती है और त्रेता युग में पुनर्जन्म ले विष्णु जी के अवतार भगवान राम के जीवन को तहस-नहस कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करती है ! 

श्रीराम 
इसी संदर्भ में एक और कथा भी उल्लेखनीय है ! जिसके अनुसार कैकेई के पिता कैकेयराज अश्वपति का एक भाई था, जिसका नाम वृहदश्व था। उसकी एक बेहद खूबसूरत, विशाल नेत्रों वाली, बुद्धिमान, गुणवती बेटी थी, जिसका नाम रेखा था ! परंतु उसकी कुछ कमजोरियां भी थीं ! वह आत्ममुग्धता से बुरी तरह ग्रसित थी ! अपने आप से बेहद प्रेम करती थी ! अपने सौंदर्य पर उसे घमंड भी था ! उसकी चाहत थी कि उसका रूप-लावण्य कभी भी मलिन ना हो ! इसके लिए वह तरह-तरह उपचार व औषधियों का सेवन करती रहती थी ! इसी तरह के एक प्रयोग का उस पर विपरीत असर हो गया और उसके अंगों ने काम करना बंद कर दिया ! चिकित्सकों के अथक प्रयासों के बाद वह ठीक तो हो गई पर उसके शरीर की कांति जाती रही ! रूप-लावण्य तिरोहित हो गया ! चेहरा-मोहरा कुरूप हो कर रह गया तथा उसकी रीढ़ की हड्डी में स्थाई विकार आ गया, इसी कारण उसका नाम भी मंथरा पड़ गया ! इसी दोष के कारण उसका कभी विवाह भी नहीं हो सका ! इस सदमे से वह गहरे अवसाद में डूबती चली गई ! धीरे-धीरे नकारात्मकता उस पर बुरी तरह हावी हो गई ! बुद्धि-विवेक साथ छोड़ते चले गए ! 

रेखा/मंथरा 
कैकेई का अपनी इस चचेरी बहन के साथ बहुत लगाव तथा प्रेम था ! दोनों बचपन की सहलियां भी थीं ! एक-दूसरे के बिना उनका समय नहीं बीतता था ! इसीलिए मंथरा की ऐसी हालत देख, उसके भविष्य को ले कर कैकेई भी चिंतित व दुखी रहा करती थी ! इसीलिए अपने विवाह के पश्चात उसको अपने साथ अयोध्या ले आई थी ! परंतु उसके रंग-रूप को देख अयोध्यावासी उसे कैकई की बहन नहीं बल्कि मुंहलगी दासी ही समझते थे ! पर दशरथ की प्रिय रानी की सहचरी होने के कारण उसका सम्मान भी किया करते थे !  

षड्यंत्र 
समय के साथ जब मंथरा को श्री राम के राजतिलक के समाचार पता चला तो वह सोच में पड़ गई कि यदि महारानी कौशल्या का पुत्र राजा बनेगा तो कौशल्या राजमाता कहलाएगी और उनका स्थान अन्य रानियों से श्रेष्ठ हो जाएगा ! उनकी दासियां भी अपने आपको मुझसे श्रेष्ठ समझने लगेंगीं। इस समय कैकेयी राजा की सर्वाधिक प्रिय रानी है। राजमहल पर एक प्रकार से उसका शासन चलता है। इसीलिये राजप्रासाद की सब दासियां मेरा सम्मान करती हैं। किन्तु कौशल्या के राजमाता बनने पर वे मुझे हेय दृष्टि से देखने लगेंगीं। उनकी उस दृष्टि को मैं कैसे सहन कर सकूंगी ! मेरा जीवन तो और भी दूभर हो जाएगा ! इस विकृत सोच ने उसके कुटिल मष्तिष्क में एक षड्यंत्र की रुपरेखा तैयार कर दी ! 

दो वर 
अपनी साजिश को मूर्तरूप देने के चलते मंथरा ने कैकेई के कान भरे ! उसे कौशल्या के राजमाता बनने के पश्चात राजा दशरथ से दूर होने का डर दिखाया ! राम के राजा बनने के बाद उसके तथा भरत के अंधकारमय भविष्य का काल्पनिक भय दिखा उसे उकसाया ! इसके बाद जो हुआ उसे तो संसार ने भी देखा ! जो भी हो मंथरा के बिना तो राम कथा की कल्पना भी नहीं की जा सकती ! कहते हैं कि यह सब होने के पश्चात उसे अपने किए पर ग्लानि और पश्चाताप भी हुआ और वह राम के अयोध्या लौटने तक मुंह छुपा कर एकांत में पड़ी रही ! श्री राम ने वनवास से वापस आते ही उसके बारे में पूछा और उसके पास जा उसे स्नेहवश गले लगा उसके सारे अपराध क्षमा कर दिए !

नेत्र चिकित्सा का विश्वसनीय केंद्र 
वैसे हमारे प्राचीन ग्रंथों की कथाओं के साथ इतनी किंवदंतियां इस तरह जुड़ी हुई हैं कि भेद करना मुश्किल हो जाता है कि वास्तविकता क्या थी और कल्पना क्या है..........!

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

रामटेक, श्रीराम को समर्पित क्षेत्र

अब रामटेक ठहरा श्री राम का क्षेत्र ! अब जहां राम हों वहां उनकी सेना ना हो, यह कैसे हो सकता है ! तो वहां भी कपि परिवारों की भरमार है ! उनका आतंक कहना ठीक नहीं होगा पर उनका वर्चस्व पूरी तरह से विद्यमान है ! हमारे हाथों में की पूजा सामग्री के कारण वहां हमें वैसे ही घेर लिया गया, जैसे समुद्र तट पर लंका को छोड़ कर आए विभीषण को घेर लिया गया था ! संजय जी और मैंने तो घबराहट में अपनी सारी सामग्री निहार जी को थमा दी ! अब वे किसी तरह, हाथ ऊपर-नीचे करते हुए, ऐ.....ऐ....! हट....हट...! अरे दे रहा हूँ ना.....! अरे रुक....,,जैसा कुछ-कुछ बोलते, किसी तरह पिंड छुड़ा, मुख्य द्वार से अंदर आ पाए..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

रामटेक, महाराष्ट्र के नागपुर शहर से तक़रीबन 50 किलोमीटर की दूरी पर, विंध्याचल की रामगिरि नामक पहाड़ी पर, श्री राम को समर्पित है यह प्राचीन तीर्थ स्थल ! इसका विवरण वाल्मीकि रामायण तथा पद्मपुराण में भी उल्लेखित है ! यह जगह श्री राम के वनवास काल से जुड़ी हुई है ! दंडकारण्य से पंचवटी की यात्रा के दौरान प्रभु राम, सीताजी तथा लक्ष्मण जी ने बरसात के मौसम के चार माह यहीं टिक कर गुजारे थे ! इसीलिए इस जगह का नाम ''रामटेक'' पड़ गया ! उसी दौरान माता सीता ने यहीं अपनी पहली रसोई बना ऋषि-मुनियों को भोजन करवाया था ! इसके अलावा यही वह जगह है जहां प्रभु राम की भेंट अगस्त्य ऋषि से हुई थी और उन्होंने श्री राम को ब्रह्मास्त्र प्रदान किया था, जिससे रावण की मृत्यु संभव हो सकी ! ऐसी मान्यता है कि इसी जगह पर महाकवि कालिदास ने अपने सुप्रसिद्ध काव्य मेघदूत की रचना भी की थी ! 

पहाड़ी पर मंदिर 
मंदिर को जाती सीढ़ियां 

प्रवेशद्वार 

परिसर 

लक्ष्मण मंदिर 
पहली बार नब्बे के दशक में यहां जाने का सुयोग बना था, उसके लंबे अर्से के बाद अब जा कर पिछली मई में नागपुर जाना हुआ ! अनुज निहार को रामटेक दर्शन की इच्छा जताई ! प्रभु की मर्जी और निहार जी के प्रयास से तुरंत कार्यक्रम बन गया ! इसके साथ ही एक अच्छी बात और यह हुई कि इसी दौरान संजय जी के रूप में एक मिलनसार, हंसमुख बेहतरीन व्यक्तित्व से मिलने का सुयोग बना ! उनसे पहली बार मिलने के बावजूद एक क्षण को भी ऐसा नहीं लगा जैसे हम पहली बार मिल रहे हों ! उन्हीं के सौजन्य से ही यह दर्शन यात्रा संभव हो सकी ! 

अगस्त्य आश्रम 


वराह प्रतिमा 

समय के साथ-साथ होने वाले बदलावों से रामटेक भी अछूता नहीं है ! पिछली बार जब जाना हुआ था, तब भी निहार जी के प्रयास से यह संभव हो पाया था, तब और अब के परिदृश्य में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है ! सुनसान सी जगह में अब रौनक नजर आने लगी है ! ऊपर तक जाने के लिए उत्तम सड़क मार्ग बन गया है ! परिसर में कई दुकानें खुल चुकी हैं ! लोगों का हुजूम नजर आने लगा है ! अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी रेलिंग वगैरह लगा दी गई है ! उस खुले ऊँचे स्थान को, जहां मान्यता है कि कालिदास जी ने अपना महाकाव्य लिखा था, किसी अनहोनी से बचाव हेतु घेर दिया गया है ! यहां से नीचे का विंहगम दृश्य मन मोह लेता है ! मई की उस गर्मी में भी वहां हम जैसे सैंकड़ों लोग उपस्थित थे ! 

हम 

निहार जी के साथ 


अब रामटेक ठहरा श्री राम का क्षेत्र ! अब जहां राम हों वहां उनकी सेना ना हो, यह कैसे हो सकता है ! तो उसी के अनुसार यहां कपि परिवारों की भरमार है ! उनका आतंक कहना ठीक नहीं होगा पर उनका वर्चस्व यहां पूरी तरह से विद्यमान है ! अब जैसी प्रथा है, हमने भी प्रभु अर्पण के लिए कुछ सामग्री ली थी ! जाहिर है जिसे हम तीनों के हाथों में ही रहना था ! पर उसी से आकर्षित हो वहां हमें वैसे ही घेर लिया जैसे समुद्र तट पर लंका को छोड़ कर आए विभीषण को घेर लिया गया था !  जामा-तलाशी होने लगी ! संजय जी और मैंने तो घबराहट में अपनी सारी सामग्री निहार जी को थमा दीं ! अब वे किसी तरह, हाथ ऊपर-नीचे करते हुए, ऐ.....ऐ....! हट....हट...! अरे दे रहा हूँ ना.....! अरे रुक....,,जैसा कुछ-कुछ बोलते, किसी तरह मुख्य द्वार के भीतर आए तो रहत की सांस आई !  
 
दबदबा 
   
संजय जी के साथ 

करीब छह सौ साल पुराने इस मंदिर की अद्भुत खासियत यह है कि इसका निर्माण सिर्फ पत्थरों से किया गया है, जो आपस में जुड़े हुए नहीं हैं, बल्कि जिन्हें एक दूसरे के ऊपर रख कर इस भव्य इमारत का निर्माण किया गया है और जो वर्षों से इसे जस का तस सहेजे खड़े हैं ! स्थानीय लोग इसे भगवान राम की ही कृपा बताते हैं ! जमीन से तकरीबन साढ़े तीन सौ मीटर ऊपर मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब सात सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, हालांकि अब मंदिर तक सड़क मार्ग बन चुका है और गाडी से आसानी से ऊपर जाना संभव हो गया है, फिर भी कुछ श्रद्धालुगण अभी भी सीढ़ियों का प्रयोग करते हैं ! इस भव्य मंदिर के परिसर की बनावट एक किले की तरह है, इसलिए इसे गढ़ मंदिर भी कहा जाता है !  
   
                                          
विहंगम दृश्य 
इस विशाल परिसर में कई मंदिर हैं, जैसे राम मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, हनुमान मंदिर, सत्यनारायण मंदिर ! इसके साथ ही रामायण व कृष्ण लीला की खूबसूरत प्रतिमाएं भी सुसज्जित हैं ! मंदिर के प्रवेश द्वार के साथ ही अगस्त्य ऋषि का आश्रम विद्यमान है ! इसके निकट ही वराह की एक विराट मूर्ति स्थित है जो एक ही शिलाखंड से उकेर कर बनाई गई है ! यहीं एक ऐसा तालाब भी है, जिसका पानी पूरे साल एक समान रहता है, चाहे कितनी भी गर्मी हो उसका पानी कम नहीं होता ! रामनवमी, हनुमान जन्मोत्सव जैसे त्योहारों पर यहां लोगों का अपार हुजूम उमड़  पड़ता है ! कभी नागपुर जाने का मौका मिले तो यहां जरूर जाएं ! पर एक बात का ध्यान रहे कि यहां की राम सेना सदा अतिथियों के स्वागत के लिए तत्पर रहती है ! इसलिए सावधान व सचेत रहने की भी जरूरत है !

*जय श्री राम*

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