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शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

वही हो रहा है जो राम जी चाह रहे हैं

जिसने सारी कायनात बनाई है ! समय-काल बनाया है ! धर्म-ज्ञान बनाया है ! जिसके चाहे बिना पत्ता तक नहीं हिल पाता ! सूर्य-शनि जैसे ग्रह जिसके इशारे पर संचरण करते हैं ! जिसका नाम ही भवसागर पार करवा सकता है ! जो खुद अमंगलहारी हैं ! जिनके पिता के नाम का स्मरण ही दुःख दूर करने के लिए पर्याप्त है ! तुम उसके लिए मुहूर्त और इमारत में खामियां दिखलवा कर भ्रमित करना चाहते हो लोगों को ? वह भी अपनी तुच्छ कामनाओं के लिए ? तुम हो क्या ? तुम्हारा वजूद क्या है ? औकात क्या है तुम्हारी ! तुम.... तुम मुहूर्त बनाओगे उसके लिए जो खुद मुहूर्त बनाता है ! जो इतना शुभ है कि शुभ उसके चरणों में अपना शीश झुकाता है 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अयोध्या जाने से इंकार करने वालों की फोटो, उनके ब्यान मीडिया रोज ऐसे दिखा-बता रहा है जैसे कोई बहुत बड़ी घटना हो गई हो, यह बात तो देश की गलियों के कुत्ते-बिल्लियों को भी पता थी कि ये लोग मंदिर नहीं जाएंगे ! सारा देश जानता है कि ऐसे लोगों का ना कोई धर्म है, ना ईमान, ना नैतिकता है ना कोई विवेक ! इनका एक ही ध्येय है कुर्सी ! है तो बचाए रखो नहीं है तो उसको पाने के लिए देश तक की परवाह ना करो ! 

इनको अपने दंभ में पता ही नहीं चला कि यह कब एक इंसान से बैर के चक्कर में कैसे समाज, धर्म, देश और अब तो राम विरोधी भी बनते चले गए ! पर प्रभु की बेआवाज लाठी की चोट पर बिलबिलाते हुए आँख खुली तो एक एक तरफ तो खाई थी ही दूसरी तरफ और भी गहरी घाटी ! आसन्न संकट देख लगे चिल्लाने हम जाएंगे...हम जाएंगे..... ! पर 22 जनवरी के बाद ! क्यों भई ! तब क्या राम बदल जाएंगे ? स्थान बदल जाएगा ? मंदिर बदल जाएगा ? पूजा-अर्चना बदल जाएगी ? या जिन्होंने स्थापना करवाई उनके नाम बदल जाएंगे ?

एक और तरह के दादुर हैं जिन्होंने कुंठित मठाधीशों को भी बरगला दिया है ! वे मुहूर्त तथा मंदिर पर सवाल उठा रहे हैं ! कल एक चैनल पर एक ऐसे ही परपोषित मौलाना को भी लपेट लाए जिनका सनातन से कोई वास्ता नहीं है, वे भी मुहूर्त, आस्था, वास्तु पर अपना ज्ञान उगले जा रहे थे !

जिसने सारी कायनात बनाई है ! समय-काल बनाया है ! धर्म-ज्ञान बनाया है ! जिसके चाहे बिना पत्ता तक नहीं हिल पाता ! सूर्य-शनि जैसे ग्रह जिसके इशारे पर संचरण करते हैं ! जिसका नाम ही भवसागर पार करवा सकता है ! जो खुद अमंगलहारी हैं ! जिनके पिता के नाम का स्मरण ही दुःख दूर करने के लिए पर्याप्त है ! तुम उसके लिए मुहूर्त और इमारत में खामियां दिखलवा कर भ्रमित करना चाहते हो लोगों को ? वह भी अपनी तुच्छ कामनाओं के लिए ? तुम हो क्या ? तुम्हारा वजूद क्या है ? औकात क्या है तुम्हारी ! तुम.... तुम मुहूर्त बनाओगे उसके लिए जो खुद मुहूर्त बनाता है ! जो इतना शुभ है कि शुभ उसके चरणों में अपना शीश झुकाता है ! तुमने या तुम्हारे खानदान में भी किसी ने गीता पढ़ी है, जिसमें उसने ने खुद कहा है कि मैं इस सम्पूर्ण जगत का धारण-पोषण करने वाला हूं। पिता, माता, पितामह मैं ही हूं। देवताओं का गुरू भी मैं ही हूं। सबका स्वामी भी मैं ही हूं और तुम चले हो उसके लिए शुभ मुहूर्त की गणना करने .....! 

अविवेक, अहम्, घमंड, सत्तामद जब सर पर सवार होते हैं, तो मनुष्य अधमावस्था को प्राप्त हो जाता है ! मदांधता में  पतन अवश्यंभावी है चाहे वह कोई सम्राट हो, ऋषि हो, ज्ञानी हो, रावण हो या फिर शंकराचार्य ही क्यों ना हो ! आदि शंकराचार्य जी को यह कल्पना जरूर रही होगी कि भविष्य में मेरी धरोहर अयोग्य हाथों में भी जा सकती है पर उस वक्त पीठों का निर्माण भी अति आवश्यक था ! 

आज कल के विवाद में पामर लोगों द्वारा जिन प्रतिष्ठित नामों को भी घसीट लिया गया है उन आदरणीयों को भी तो एक बार जांच लेनी चाहिए थी कि हमारे नाम का कौन, कैसा, किस नियति से प्रयोग कर रहा है ? धर्म के बारे में उनका इतिहास क्या रहा है ? इतिहास ना खंगाल पाते तो सिर्फ तीन -चार महीनों का ही लेखा-जोखा देख लेते ! वर्षों की कमाई इज्जत, नाम, मर्यादा, प्रतिष्ठा दो दिनों में भू-लुंठित हो गई ! आज तो आम जनता यही समझ रही है कि पांच सौ सालों से भी ज्यादा समय तक महाराज ने प्रभु की सुध नहीं ली ! ठंड-गर्मी-आंधी-तूफान में एक टेंट में पड़े राम का ख्याल ना आया ! जबकि उसी राम की बदौलत खुद सोने के सिंहासनों पर विराजमान हो दुनिया भर की सुविधाओं का लाभ लेते रहे ! आज उन्हें निमत्रंण पर मान-अपमान नजर आ रहा है ! दुनिया को ज्ञान बांटने वाले खुद कैसे ऐसे अज्ञानी हो गए ! जब सारा देश राममय हुआ पड़ा है ! जड़-चेतन कोई भी विरोध का कोई स्वर सुनना नहीं चाहता तब ऐसा रवैया......! सब प्रभु की इच्छा है, वे यही चाहते होंगें !

जय श्री राम, जय-जय राम 

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

रामटेक, श्रीराम को समर्पित क्षेत्र

अब रामटेक ठहरा श्री राम का क्षेत्र ! अब जहां राम हों वहां उनकी सेना ना हो, यह कैसे हो सकता है ! तो वहां भी कपि परिवारों की भरमार है ! उनका आतंक कहना ठीक नहीं होगा पर उनका वर्चस्व पूरी तरह से विद्यमान है ! हमारे हाथों में की पूजा सामग्री के कारण वहां हमें वैसे ही घेर लिया गया, जैसे समुद्र तट पर लंका को छोड़ कर आए विभीषण को घेर लिया गया था ! संजय जी और मैंने तो घबराहट में अपनी सारी सामग्री निहार जी को थमा दी ! अब वे किसी तरह, हाथ ऊपर-नीचे करते हुए, ऐ.....ऐ....! हट....हट...! अरे दे रहा हूँ ना.....! अरे रुक....,,जैसा कुछ-कुछ बोलते, किसी तरह पिंड छुड़ा, मुख्य द्वार से अंदर आ पाए..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

रामटेक, महाराष्ट्र के नागपुर शहर से तक़रीबन 50 किलोमीटर की दूरी पर, विंध्याचल की रामगिरि नामक पहाड़ी पर, श्री राम को समर्पित है यह प्राचीन तीर्थ स्थल ! इसका विवरण वाल्मीकि रामायण तथा पद्मपुराण में भी उल्लेखित है ! यह जगह श्री राम के वनवास काल से जुड़ी हुई है ! दंडकारण्य से पंचवटी की यात्रा के दौरान प्रभु राम, सीताजी तथा लक्ष्मण जी ने बरसात के मौसम के चार माह यहीं टिक कर गुजारे थे ! इसीलिए इस जगह का नाम ''रामटेक'' पड़ गया ! उसी दौरान माता सीता ने यहीं अपनी पहली रसोई बना ऋषि-मुनियों को भोजन करवाया था ! इसके अलावा यही वह जगह है जहां प्रभु राम की भेंट अगस्त्य ऋषि से हुई थी और उन्होंने श्री राम को ब्रह्मास्त्र प्रदान किया था, जिससे रावण की मृत्यु संभव हो सकी ! ऐसी मान्यता है कि इसी जगह पर महाकवि कालिदास ने अपने सुप्रसिद्ध काव्य मेघदूत की रचना भी की थी ! 

पहाड़ी पर मंदिर 
मंदिर को जाती सीढ़ियां 

प्रवेशद्वार 

परिसर 

लक्ष्मण मंदिर 
पहली बार नब्बे के दशक में यहां जाने का सुयोग बना था, उसके लंबे अर्से के बाद अब जा कर पिछली मई में नागपुर जाना हुआ ! अनुज निहार को रामटेक दर्शन की इच्छा जताई ! प्रभु की मर्जी और निहार जी के प्रयास से तुरंत कार्यक्रम बन गया ! इसके साथ ही एक अच्छी बात और यह हुई कि इसी दौरान संजय जी के रूप में एक मिलनसार, हंसमुख बेहतरीन व्यक्तित्व से मिलने का सुयोग बना ! उनसे पहली बार मिलने के बावजूद एक क्षण को भी ऐसा नहीं लगा जैसे हम पहली बार मिल रहे हों ! उन्हीं के सौजन्य से ही यह दर्शन यात्रा संभव हो सकी ! 

अगस्त्य आश्रम 


वराह प्रतिमा 

समय के साथ-साथ होने वाले बदलावों से रामटेक भी अछूता नहीं है ! पिछली बार जब जाना हुआ था, तब भी निहार जी के प्रयास से यह संभव हो पाया था, तब और अब के परिदृश्य में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है ! सुनसान सी जगह में अब रौनक नजर आने लगी है ! ऊपर तक जाने के लिए उत्तम सड़क मार्ग बन गया है ! परिसर में कई दुकानें खुल चुकी हैं ! लोगों का हुजूम नजर आने लगा है ! अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी रेलिंग वगैरह लगा दी गई है ! उस खुले ऊँचे स्थान को, जहां मान्यता है कि कालिदास जी ने अपना महाकाव्य लिखा था, किसी अनहोनी से बचाव हेतु घेर दिया गया है ! यहां से नीचे का विंहगम दृश्य मन मोह लेता है ! मई की उस गर्मी में भी वहां हम जैसे सैंकड़ों लोग उपस्थित थे ! 

हम 

निहार जी के साथ 


अब रामटेक ठहरा श्री राम का क्षेत्र ! अब जहां राम हों वहां उनकी सेना ना हो, यह कैसे हो सकता है ! तो उसी के अनुसार यहां कपि परिवारों की भरमार है ! उनका आतंक कहना ठीक नहीं होगा पर उनका वर्चस्व यहां पूरी तरह से विद्यमान है ! अब जैसी प्रथा है, हमने भी प्रभु अर्पण के लिए कुछ सामग्री ली थी ! जाहिर है जिसे हम तीनों के हाथों में ही रहना था ! पर उसी से आकर्षित हो वहां हमें वैसे ही घेर लिया जैसे समुद्र तट पर लंका को छोड़ कर आए विभीषण को घेर लिया गया था !  जामा-तलाशी होने लगी ! संजय जी और मैंने तो घबराहट में अपनी सारी सामग्री निहार जी को थमा दीं ! अब वे किसी तरह, हाथ ऊपर-नीचे करते हुए, ऐ.....ऐ....! हट....हट...! अरे दे रहा हूँ ना.....! अरे रुक....,,जैसा कुछ-कुछ बोलते, किसी तरह मुख्य द्वार के भीतर आए तो रहत की सांस आई !  
 
दबदबा 
   
संजय जी के साथ 

करीब छह सौ साल पुराने इस मंदिर की अद्भुत खासियत यह है कि इसका निर्माण सिर्फ पत्थरों से किया गया है, जो आपस में जुड़े हुए नहीं हैं, बल्कि जिन्हें एक दूसरे के ऊपर रख कर इस भव्य इमारत का निर्माण किया गया है और जो वर्षों से इसे जस का तस सहेजे खड़े हैं ! स्थानीय लोग इसे भगवान राम की ही कृपा बताते हैं ! जमीन से तकरीबन साढ़े तीन सौ मीटर ऊपर मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब सात सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, हालांकि अब मंदिर तक सड़क मार्ग बन चुका है और गाडी से आसानी से ऊपर जाना संभव हो गया है, फिर भी कुछ श्रद्धालुगण अभी भी सीढ़ियों का प्रयोग करते हैं ! इस भव्य मंदिर के परिसर की बनावट एक किले की तरह है, इसलिए इसे गढ़ मंदिर भी कहा जाता है !  
   
                                          
विहंगम दृश्य 
इस विशाल परिसर में कई मंदिर हैं, जैसे राम मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, हनुमान मंदिर, सत्यनारायण मंदिर ! इसके साथ ही रामायण व कृष्ण लीला की खूबसूरत प्रतिमाएं भी सुसज्जित हैं ! मंदिर के प्रवेश द्वार के साथ ही अगस्त्य ऋषि का आश्रम विद्यमान है ! इसके निकट ही वराह की एक विराट मूर्ति स्थित है जो एक ही शिलाखंड से उकेर कर बनाई गई है ! यहीं एक ऐसा तालाब भी है, जिसका पानी पूरे साल एक समान रहता है, चाहे कितनी भी गर्मी हो उसका पानी कम नहीं होता ! रामनवमी, हनुमान जन्मोत्सव जैसे त्योहारों पर यहां लोगों का अपार हुजूम उमड़  पड़ता है ! कभी नागपुर जाने का मौका मिले तो यहां जरूर जाएं ! पर एक बात का ध्यान रहे कि यहां की राम सेना सदा अतिथियों के स्वागत के लिए तत्पर रहती है ! इसलिए सावधान व सचेत रहने की भी जरूरत है !

*जय श्री राम*

बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

रावण का मरना भी असंभव है

आज देश भर में दशहरे के दिन, भले ही सांकेतिक रूप से ही सही, रावण को मारने, उसके पुतले का दहन करने का जिम्मा कौन लेता है या किसको दिया जाता है ! रावण को अग्नि के हवाले करने और करवाने वालों ने क्या कभी अपने गिरेबान में झाँक कर देखा है ! इस दिन पार्कों में, चौराहों पर, कालोनियों में या मैदानों में जो रावण के पुतले फूंके जाते हैं, उनको फूंकने में अगुवाई करने वाले अधिकांश तो खुद बुराइयों के पुतले होते हैं ! उनकी तो खुद की लंकाऐं होती हैं, काम-क्रोध-मद-लोभ जैसी बुराइयों से भरपूर ! तो बुराई ही बुराई पर क्योंकर विजय पाती होगी ...................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दशहरा, देश के बड़े त्योहारों में से एक। बुराई पर अच्छाई की प्रतीतात्मक जीत को दर्शाने का माध्यम। रामलीला का मंचन, धूम-धड़ाका, आतिशबाजी, हाट-मेला-बाज़ार, भीड़-भाड़, लोगों का रेला, मौज-मस्ती,
उत्साही बच्चे। ऊँचे से ऊँचे पुतले बनाने की होड़, दिन ब दिन बढ़ते आयोजन ! इन सब के चलते छुटभइए नेताओं को भी अपनी दूकान सजाने-चलाने के लिए मिलते अवसर ! 

एक समय था, जब दशहरे पर सार्वजनिक पुतला दहन, वह भी कहीं-कहीं आयोजित होता था। पर समय के साथ, आपसी होड़ और मतलबपरस्ती के तहत अब जैसे गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा, होली-दिवाली मिलन, इन सबके कार्यक्रम हर गली-मौहल्ले में होने लगे हैं, उसी क्रम में अब दशहरे में पुतला दहन का भी आयोजन जगह-जगह होने लगा है ! एक ही कॉलोनी में आपसी स्पर्द्धा, अहम और वैमनस्य के चलते दो-तीन पुतले खड़े कर दिए जाते हैं ! जगह न हो तो छोटे-छोटे पार्कों में भी खतरा मोल ले, तीन-तीन पुतलों का दहन किया जाने लगा है ! इसी बहाने कुछ लोगों को अपना वर्चस्व, पहुंच व तथाकथित प्रभुत्व दिखाने तथा भविष्य का मंच तैयार करने का अवसर हाथ लग जाता है ! 
रावण को मारने के लिए राम का होना जरुरी है और राम ऐसे ही कोई नहीं बन जाता ! उसके लिए उसमें प्रबल शक्ति का होना तो अवश्यंभावी है ही, साथ ही उसे कर्त्वयनिष्ठ, सत्यनिष्ठ, दृढ़निश्चयी, करुणामय, ज्ञानी, वचन पालक, संयमी, ईर्ष्या मुक्त, विवेकी, निरपेक्ष, शरणागत वत्सल, दयालु, समदर्शी, काम-क्रोध-मोह विहीन होना भी बहुत जरुरी है
समय में कितना बदलाव आ गया है, अब भीड़ के लिए दशहरे का दिन रावण के नाम रहता है ! उसके पुतलों की भव्यता आकर्षण का केंद्र बन जाती है ! बड़ी रामलीलाओं में रावण का किरदार निभाने के लिए खास और जाने-माने चेहरों को चुना जाता है ! रावण के पुतले को अग्नि के सुपुर्द करने का जिम्मा भी किसी बड़ी हस्ती को ही दिया जाता है ! जितनी बड़ी रामलीला कमेटी उतना ही बड़ा आदमी ! जितना बड़ा आदमी उतनी ही बड़ी कमेटी की प्रतिष्ठा !
अत्यंत खेद के साथ यह कहना और सहना पड़ता है ! बहुत कटु है ! पर सच्चाई यही है कि इस दिन प्रभू राम तो जैसे गौण हो जाते हैं ! किसी भी बड़े आयोजन को देख लें ! श्रीराम पक्ष के कुछ किरदारों की आरती-तिलक की ओपचारिकता पूरी होते ही सब का ध्यान पधारे हुए विशिष्ट जनों पर सिमट कर रह जाता है ! जितनी आव-भगत उन में से हरेक की होती है उतनी तो पूरे राम-दल की भी नहीं होती ! फिर होड़ सी लग जाती है रावण के पुतले पर तीरों की बौछार करवाने में ! यह सब देख ऊपर बैठा रावण भी हाथ जोड़ कर कहता होगा, हे प्रभू, उस समय तो अपने कर्मों के कारण आपने मेरा वध किया था, वह सम्मानजनक अंत था मेरा ! तब  मुझे उतनी तकलीफ नहीं हुई थी पर इस अपमानजनक स्थिति से हर साल दो-चार होने में बहुत कष्ट होता है ! किसी तरह मुझे निजात दिलवाइए इन अज्ञानी-मूढ़ों के चंगुल से !
देश भर में दशहरे के दिन, भले ही सांकेतिक रूप से ही सही, रावण को मारने, उसके पुतले का दहन करने का जिम्मा कौन किसको देता है यह सब अपनी मिलीभगत और स्वार्थसिद्धि पर निर्भर करता है ! आज पार्कों में, चौराहों पर, कालोनियों में या मैदानों में जो रावण के पुतले फूंके जाते हैं, उनको फूंकने में अगुवाई करने वाले अधिकांश तो खुद बुराइयों के पुतले होते हैं ! उन्होंने कभी अपने गिरेबाँ में झांक कर देखा है ! उनकी तो खुद की अपनी लंकाऐं होती हैं, काम-क्रोध-मद-लोभ जैसी बुराइयों से भरपूर ! ऐसा करते हुए उन्हें जरा सी भी ग्लानि नहीं होती ! ऐसे में बुराई ही बुराई पर क्योंकर विजय पाएगी ? 
आज बुराई पर अच्छाई की विजय निश्चित करने के लिए किसीको उसके गुणों का आकलन कर के नहीं बल्कि उसकी हैसियत देख कर चुना जाता है। आज रावण दहन के लिए उसे ''धनुष'' थमाया जाता है जो अपने क्षेत्र में येन-केन-प्रकारेण अगुआ हो ! फिर चाहे वह राजनीतिज्ञ हो, चाहे कलाकार हो, चाहे व्यापारी हो या फिर अपने इलाके का प्रमुख ही हो, जैसे किसी कॉलोनी या हाऊसिंग सोसायटी का प्रेजिडेंट ! अगुआ होना ही उसकी लियाकत है भले ही कर्मों से वह दुर्योधन ही क्यों न हो ! 
रावण अपने आप में ज्ञानी-ध्यानी, सबसे बड़ा शिव भगत, पुरातत्ववेता, ज्योतिष का जानकार, विद्वान, युद्ध-विशारद के साथ-साथ महाबली योद्धा था ! उससे बड़ा महा पंडित उस युग में कोई दूसरा नहीं था ! ऐसा नहीं होता तो क्या श्रीराम उसे अपने यज्ञ का पुरोहित बनाते ! उस पर राम जो सारे जगत के पालनहार हैं, नियोजक हैं, सर्व शक्तिमान हैं, सारे चराचर के स्वामी हैं, उन्हें भी उस रावण पर विजय पाने में ढाई महीने लग गए थे ! तब जा कर कहीं उसका वध हुआ था ! रावण को मारने के लिए राम का होना जरुरी है और राम ऐसे ही कोई नहीं बन जाता ! उसके लिए उसमें प्रबल शक्ति का होना तो अवश्यंभावी है ही, साथ ही उसे कर्त्वयनिष्ठ, सत्यनिष्ठ, दृढ़निश्चयी, करुणामय, ज्ञानी, वचन पालक, संयमी, ईर्ष्या मुक्त, विवेकी, निरपेक्ष, शरणागत वत्सल, दयालु, समदर्शी, काम-क्रोध-मोह विहीन होना भी बहुत जरुरी है ! क्या आज एक ही इंसान में इतने गुणों  होना संभव है ?    
नहीं ! 
तो रावण का मरना भी असंभव है !     

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

राम वन गए, राम बन गए

वनगमन के बाद ही श्री राम की धीर, वीर, स्थिर व गंभीर छवि उभर कर आई ! इसमें जिन गुणों की प्रमुख भूमिका रही, वे थे, धैर्य और सहनशीलता ! माता-पिता के वचनों की रक्षा हेतु पल भर में राजमहल का सुख और तमाम वैभव त्यागने वाले वाले युवराज राम वन से लौटने पर ही मर्यादा पुरषोत्तम राम कहलाए ! आज वे सिर्फ किसी प्रदेश, देश के नहीं बल्कि पूरी दुनिया के आदर्श और गौरव हैं..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

राम भगवान विष्णु का अवतार थे ! विष्णु तो गुणों का भंडार हैं ! पर उनका यह अवतार मर्यादित था ! गुणों को खुद सिद्ध होते हुए उभरना था ! हालांकि वनवास की घटना बहुत दुःखदाई, कष्टदाई और संतापदाई है ! पर यदि राम वनगमन ना होता तो क्या राम मर्यादा पुरषोत्तम बन पाते ! क्या सारे गुण उभर कर जगत के सामने आ पाते ! क्या वे सिर्फ युवराज राम या राजा राम बन कर ही ना रह जाते ! पर वे तो नारायणावतार थे और अवतार सिर्फ राजा बनने के लिए ही नहीं लिया गया था ! सब कुछ पहले से सुनिश्चित था ! सारी पटकथा सारे तथ्यों को, परिणामों को, परिस्थितों को, अंजामों को देख-भाल कर, बहुत निपुणता के साथ, सारे नियम-कानूनों को ध्यान में रख, न्याय-अन्याय को संतुलित करने और लिए-दिए गए वचनों को पूरा करने हेतु रची गई थी ! जिसमें राम वनगमन प्रमुख व अति आवश्यक अध्याय था ! 

राम जैसा धीरोदात्त व्यक्तित्व फिर ना कभी हुआ और शायद ना कभी हो भी पाएगा ! आलेखानुसार उनका वनगमन तो होना ही था ! उसी के परिणाम स्वरूप ही तो देश-दुनिया-समाज को मातृ-पितृ भक्ति, आदर्श भाई, भाई-बंधुओं-आत्मीयों पर स्नेह, त्याग, धैर्य, प्रेम, समर्पण, वियोग, स्थिर स्वभाव, सहनशीलता, दयालुता, श्रेष्ठ चरित्र, प्रबंधन कुशलता, सत्य का साथ, न्याय, उच्च नेतृत्व क्षमता, शरणागत रक्षा जैसे और भी अनेक, अनगिनत गुणों का अप्रतिम व सर्वोत्तम उदाहरण मिल पाया  ! 

वनगमन के दौरान ही उन्होंने हर जाति, हर वर्ग के व्यक्तियों के साथ मित्रता की ! हर रिश्ते को दिल से पूरी आत्मीयता और ईमानदारी से निभाया ! केवट हो या सुग्रीव, निषादराज हो या विभीषण सभी मित्रों के लिए उन्होंने स्वयं कई बार संकट झेल कर एक आदर्श संसार के सामने रखा ! इन सब के अलावा वर्षों पहले कहे गए कथन, वचन, वरदान, श्राप, सबका परिमार्जन भी किया जाना था ! कइयों को न्याय दिलवाना था ! कइयों को दंडित करना था ! देश-समाज में शान्ति स्थापित करनी थी ! इतना सब कुछ बिना वनगमन किए राजमहल में बैठ कर करना, अत्यधिक समय व रुकावटों का सबब बन सकता था !

वनगमन के बाद ही श्री राम की धीर, वीर, स्थिर व गंभीर छवि उभर कर आई ! इसमें जिन गुणों की प्रमुख भूमिका रही, वे थे, धैर्य और सहनशीलता ! माता-पिता के वचनों की रक्षा हेतु पल भर में राजमहल का सुख और तमाम वैभव त्यागने वाले वाले युवराज राम वन से लौटने पर ही मर्यादा पुरषोत्तम राम कहलाए ! आज वे सिर्फ किसी प्रदेश, देश के नहीं बल्कि पूरी दुनिया के आदर्श और गौरव हैं ! 

जय श्री राम !

विशिष्ट पोस्ट

बरगलाए हुए "जेंजी'' 😞

अपने शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों प...