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मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

राम जी के अटके काम ना होते, जो उनके साथ हनुमान ना होते (विडियो सहित)

पढ़ने-सुनने में यह सब बातें बहुत अजीब लगती हैं पर ये सब घटी हैं ! उन दिनों हुई इन घटनाओं का जिक्र मीडिया में कभी नहीं हुआ, क्योंकि अयोध्या बहुत संवेदनशील स्थान था और सुरक्षा और गोपनीयता के कारण ये इन सब बातों का कहीं भी जिक्र नहीं किया गया। वैसे भी जिनको सनातन में आस्था है, उनके लिए यह सब कोई बहुत चकित करने वाली बातें नहीं हैं ! क्योंकि उनको प्रभु पर भरोसा है ! उनका अटूट विश्वास है कि प्रभु सदा धर्म और धर्मालम्बियों की रक्षा करते आए हैं और करते रहेंगे ! उधर जो सूर्य और उसके प्रकाश को देखते-महसूस करते हुए भी उसके अस्तित्व का प्रमाण मांगते हों, यह विवरण उनके लिए है भी नहीं ..............!!   

#हिन्दी _ब्लागिंग 
अभ्यास पिछले दिनों 25 नवम्बर को दोपहर के शुभ अभिजीत मुहूर्त में अयोध्या के श्री राम मंदिर का ध्वजारोहण के साथ ही मंदिर निर्माण कार्य संपन्न हुआ ! पर इस पुनीत उपक्रम में देश के विभिन्न दलों, लोगों द्वारा जो अड़चने डाली गईं, बाधाऐं खड़ी की गईं, एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया गया कि मंदिर निर्माण ना होने पाए, उसके बावजूद यदि वर्षों-वर्ष से करोड़ों लोगों का यह सपना पूरा हुआ है तो निश्चित रूप से इसके पीछे किसी दैवीय शक्ति का हाथ है, बिना उसकी सहायता के आज की आसुरी ताकतों को परास्त करना असंभव था ! और वह हाथ किसका हो सकता है इसका अंदाज लगाना बिलकुल मुश्किल नहीं है, सभी जानते हैं कि श्री राम का कोई भी काम बिना हनुमान जी के संभव नहीं हुआ था ! यहां भी ऐसा ही हुआ !
राम काज करिबे को आतुर 
 भक्तों की अटूट आस्था का प्रतीक
   
जय श्री राम 
राम मंदिर निर्माण में भी अनगिनत अड़चने डाली गईं, यहां तक कि उन्हें काल्पनिक कथा चरित्र तक कह दिया गया ! रामायण पर सवाल उठाए गए ! अयोध्या के जन्मस्थली होने के प्रमाण मांगे गए ! पर विज्ञ साधू-संतों-विद्वानों-वकीलों के साथ-साथ पुरात्तव विभाग की भी सराहना करनी पड़ेगी, जिन्होंने अपने अकाट्य प्रमाणों के सहारे सारे षड्यंत्र विफल कर दिए ! इन्हीं सुधि जनों में से कइयों ने यह रहस्योद्घाटन किया कि मुकदमे और निर्माण के दौरान उन्हें ऐसा अहसास होता रहा कि हनुमान जी राम काज करने को आतुर हैं और उनकी कृपा सतत बनी हुई है !  
राम भक्त, पवन पुत्र 
आस्था के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनको सुन कर कोई भी हैरान रह जाएगा ! ये ऐसे चमत्कार हैं जिनका उल्लेख सरकारी दस्तावेजों में मौजूद है ! इनमें पहली बात, 1,फरवरी1986 को जब फैजाबाद कोर्ट में अयोध्या से जुड़े एक मामले की सुनवाई चल रही थी तो सुनवाई कर रहे, जिला जज कृष्ण मोहन पांडे ने महसूस की ! उन्होंने लिखित रूप से बताया कि मुकदमे के दौरान कहीं से एक काले मुंह का वानर कोर्ट में आ गया और जब तक मंदिर के पक्ष में फैसला नहीं हो गया, तब तक वह वहीं कोर्ट परिसर में मौजूद रहा ! इतना ही नहीं फैसला आने पर वह उन जज साहब के घर तक पहुंच गया, जैसे धन्यवाद देने आया हो। 
TV
जा पर कृपा श्री राम की होई 

मामले के दौरान आस्था के सबसे बड़े केंद्र अयोध्या पर आतंकी हमलों का खतरा निरंतर बना रहता था ! ऐसे कई उपक्रमों से अयोध्या को वानरों ने बचाया था ! ये घटनाएं खुद पुलिस के अधिकारीयों ने बयान की हैं ! सन 1998 में एक बार आतंकियों द्वारा हनुमान गढ़ी में 18 किलो RDX लगाने की खबर पर पुलिस, बम निरोधक टुकड़ी तथा तमाम सुरक्षा एजेंसियां ने तुरंत वहां पहुंच मंदिर खाली करवा लिया ! उस समय के इंचार्ज, इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा के अनुसार बम निरोधक दस्ते को लगा कि उन्होंने सारे बम निष्क्रिय कर दिए हैं ! पर तभी वहां बम डिस्पोजल दस्ते की यूनिफॉर्म पहने एक आतंकी भी पकड़ा गया, जिससे पता चला कि एक बम अभी भी कहीं लगा हुआ है ! सारा परिसर छान मारा गया पर कोई सुराग नहीं मिला ! समय निकलता जा रहा था, दहशत बढ़ती जा रही थी कि तभी  वहां लगे वाटर कूलर पर एक वानर दिखलाई पड़ा जो बम की तार को अपने दांतों से काट रहा था, बम निष्क्रिय हो चुका था ! जो बम मिल नहीं रहा था उसे एक वानर ने ना बल्कि खोजा और उसे खत्म भी कर दिया ! उस दिन सभी लोगों ने इसे हनुमान जी की कृपा माना, जिन्होंने एक बड़े हादसे को टलवा दिया !  
विश्वास करें या ना करें, पर ऐसा हुआ था 

बचाव अभियान 
अयोध्या के हालातों को देखते हुए वहां कई बार मॉक-ड्रिल की जाती रही है। ऐसे ही राम जन्म भूमि परिसर के पास, 29 मई 2020 को हुए एक पूर्वनियोजित अभ्यास में एक वानर आया और नकली बम को ले कर भाग गया और एक मंदिर के शिखर पर बैठ उसको तहस-नहस कर दिया ! शयद उसे लगा हो कि यह भी असली बम है जो लोगों को नुक्सान पहुंचा सकता है ! 
विघ्नहर्ता 
अयोध्या के चमत्कारों का जिक्र मंदिर का अंतिम फैसला सुनाने वाले पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगई भी अपनी पुस्तक ''जजटिस फॉर द जज'' में कर चुके हैं ! उन्होंने लिखा है कि कोई दैवीय शक्ति उन्हें इस केस जल्द को खत्म करने करने के लिए प्रेरित कर रही थी ! आश्चर्य की ही तो बात है कि तीन महीने की उस सुनवाई के दौरान उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति ने अवकास नहीं लिया ना ही कोई बीमार पड़ा और नहीं कोई अड़चन आई ! 
जज श्री कृष्ण मोहन पांडे 
पूर्व चीफ जस्टिस श्री रंजन गोगोई 
                                        

इंस्पेक्टर श्री अविनाश मिश्रा 
पढ़ने-सुनने में यह सब बातें बहुत अजीब लगती हैं पर ये सब घटी हैं ! उन दिनों हुई इन घटनाओं का जिक्र मीडिया में कभी नहीं हुआ, क्योंकि अयोध्या बहुत संवेदनशील स्थान था और सुरक्षा और गोपनीयता के कारण ये इन सब बातों का कहीं भी जिक्र नहीं किया गया। वैसे भी जिनको सनातन में आस्था है, उनके लिए यह सब कोई बहुत चकित करने वाली बातें नहीं हैं ! क्योंकि उनको प्रभु पर भरोसा है ! उनका अटूट विश्वास है कि प्रभु सदा धर्म और धर्मालम्बियों की रक्षा करते आए हैं और करते रहेंगे ! उधर जो सूर्य और उसके प्रकाश को देखते महसूस करते हुए भी उसके अस्तित्व का प्रमाण मांगते हों, उनके लिए यह सब बातें हैं भी नहीं !

@संदर्भ - श्री सुशांत सिन्हा, 
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

रामायण का सबसे तिरस्कृत पात्र, मंथरा

कैकेई का अपनी इस चचेरी बहन के साथ बहुत लगाव तथा प्रेम था ! दोनों बचपन की सहलियां भी थीं ! एक-दूसरे के बिना उनका समय नहीं बीतता था ! इसीलिए मंथरा की ऐसी हालत देख, उसके भविष्य को ले कर कैकेई भी चिंतित व दुखी रहा करती थी ! इसीलिए अपने विवाह के पश्चात उसको अपने साथ अयोध्या ले आई थी ! परंतु उसके रंग-रूप को देख अयोध्यावासी उसे कैकई की बहन नहीं बल्कि मुंहलगी दासी ही समझते थे.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

महाग्रंथ रामायण में मंथरा का विवरण एक ऐसी महिला का है, जिसने श्री राम को वनवास दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! इस संदर्भ में कई तरह की मान्यताएं प्रचलन में हैं ! कहीं उसका दुंदुभी नाम की गंधर्वी के रूप में उल्लेख है जो देवताओं की सहायक बन कैकई को उकसा कर श्री राम को वन भेजने का उपक्रम करती है, जिससे राक्षसों का नाश हो सके ! तो कहीं उसका भक्त प्रह्लाद के पुत्र विरोचन की पुत्री के रूप में उल्लेख है जो अपनी तथा राक्षस जाति की बदतर हालत का जिम्मेवार भगवान विष्णु को मान उनसे बदला लेने की ठान लेती है और त्रेता युग में पुनर्जन्म ले विष्णु जी के अवतार भगवान राम के जीवन को तहस-नहस कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करती है ! 

श्रीराम 
इसी संदर्भ में एक और कथा भी उल्लेखनीय है ! जिसके अनुसार कैकेई के पिता कैकेयराज अश्वपति का एक भाई था, जिसका नाम वृहदश्व था। उसकी एक बेहद खूबसूरत, विशाल नेत्रों वाली, बुद्धिमान, गुणवती बेटी थी, जिसका नाम रेखा था ! परंतु उसकी कुछ कमजोरियां भी थीं ! वह आत्ममुग्धता से बुरी तरह ग्रसित थी ! अपने आप से बेहद प्रेम करती थी ! अपने सौंदर्य पर उसे घमंड भी था ! उसकी चाहत थी कि उसका रूप-लावण्य कभी भी मलिन ना हो ! इसके लिए वह तरह-तरह उपचार व औषधियों का सेवन करती रहती थी ! इसी तरह के एक प्रयोग का उस पर विपरीत असर हो गया और उसके अंगों ने काम करना बंद कर दिया ! चिकित्सकों के अथक प्रयासों के बाद वह ठीक तो हो गई पर उसके शरीर की कांति जाती रही ! रूप-लावण्य तिरोहित हो गया ! चेहरा-मोहरा कुरूप हो कर रह गया तथा उसकी रीढ़ की हड्डी में स्थाई विकार आ गया, इसी कारण उसका नाम भी मंथरा पड़ गया ! इसी दोष के कारण उसका कभी विवाह भी नहीं हो सका ! इस सदमे से वह गहरे अवसाद में डूबती चली गई ! धीरे-धीरे नकारात्मकता उस पर बुरी तरह हावी हो गई ! बुद्धि-विवेक साथ छोड़ते चले गए ! 

रेखा/मंथरा 
कैकेई का अपनी इस चचेरी बहन के साथ बहुत लगाव तथा प्रेम था ! दोनों बचपन की सहलियां भी थीं ! एक-दूसरे के बिना उनका समय नहीं बीतता था ! इसीलिए मंथरा की ऐसी हालत देख, उसके भविष्य को ले कर कैकेई भी चिंतित व दुखी रहा करती थी ! इसीलिए अपने विवाह के पश्चात उसको अपने साथ अयोध्या ले आई थी ! परंतु उसके रंग-रूप को देख अयोध्यावासी उसे कैकई की बहन नहीं बल्कि मुंहलगी दासी ही समझते थे ! पर दशरथ की प्रिय रानी की सहचरी होने के कारण उसका सम्मान भी किया करते थे !  

षड्यंत्र 
समय के साथ जब मंथरा को श्री राम के राजतिलक के समाचार पता चला तो वह सोच में पड़ गई कि यदि महारानी कौशल्या का पुत्र राजा बनेगा तो कौशल्या राजमाता कहलाएगी और उनका स्थान अन्य रानियों से श्रेष्ठ हो जाएगा ! उनकी दासियां भी अपने आपको मुझसे श्रेष्ठ समझने लगेंगीं। इस समय कैकेयी राजा की सर्वाधिक प्रिय रानी है। राजमहल पर एक प्रकार से उसका शासन चलता है। इसीलिये राजप्रासाद की सब दासियां मेरा सम्मान करती हैं। किन्तु कौशल्या के राजमाता बनने पर वे मुझे हेय दृष्टि से देखने लगेंगीं। उनकी उस दृष्टि को मैं कैसे सहन कर सकूंगी ! मेरा जीवन तो और भी दूभर हो जाएगा ! इस विकृत सोच ने उसके कुटिल मष्तिष्क में एक षड्यंत्र की रुपरेखा तैयार कर दी ! 

दो वर 
अपनी साजिश को मूर्तरूप देने के चलते मंथरा ने कैकेई के कान भरे ! उसे कौशल्या के राजमाता बनने के पश्चात राजा दशरथ से दूर होने का डर दिखाया ! राम के राजा बनने के बाद उसके तथा भरत के अंधकारमय भविष्य का काल्पनिक भय दिखा उसे उकसाया ! इसके बाद जो हुआ उसे तो संसार ने भी देखा ! जो भी हो मंथरा के बिना तो राम कथा की कल्पना भी नहीं की जा सकती ! कहते हैं कि यह सब होने के पश्चात उसे अपने किए पर ग्लानि और पश्चाताप भी हुआ और वह राम के अयोध्या लौटने तक मुंह छुपा कर एकांत में पड़ी रही ! श्री राम ने वनवास से वापस आते ही उसके बारे में पूछा और उसके पास जा उसे स्नेहवश गले लगा उसके सारे अपराध क्षमा कर दिए !

नेत्र चिकित्सा का विश्वसनीय केंद्र 
वैसे हमारे प्राचीन ग्रंथों की कथाओं के साथ इतनी किंवदंतियां इस तरह जुड़ी हुई हैं कि भेद करना मुश्किल हो जाता है कि वास्तविकता क्या थी और कल्पना क्या है..........!

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