pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: राष्ट्रपति
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रविवार, 3 अगस्त 2025

राष्ट्रपति लिंकन और केनेडी की जिंदगी और हत्या की अविश्वसनीय समानताएं

अमेरिका में कई राजनीतिक हस्तियों की हत्याएं हुईं हैं ! जिनमें अब्राहम लिंकन, जेम्स गारफील्ड, विलियम मैककिनले, रोनॉल्ड विलसन रीगन और अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की बहु-चर्चित व प्रमुख रही हैं ! लेकिन लिंकन और केनेडी की जिंदगी और हत्या से जुड़े संयोग ऐसे हैं, जो हैरान कर के रख देते हैं, इसके अलावा और ऐसे उदाहरण कहीं खोजे नहीं मिलते ........!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कभी-कभी दुनिया में कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिस पर सहसा विश्वास ही नहीं होता ! पर करना पड़ता है क्योंकि सब कुछ सामने घटित होता है। ऐसा ही एक अनोखा, विलक्षण वाकया है, अमेरिका के दो राष्ट्रपतियों के साथ घटी घटनाओं का ! हालांकि दोनों राष्ट्राध्यक्षों के कार्यकाल में करीब सौ सालका फासला है, पर थोड़ी सी अदला-बदली के साथ दोनों के जीवन में घटी घटनाओं की समानता और उनके बीच का सामंजस्य आश्चर्य से भर देता है ! विश्वास नहीं होता कि ऐसा कुछ हुआ होगा ! यह सच दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर देता है ! 

लिंकन और केनेडी 
जिन दोनों की बात है, उन में पहले हैं, प्रेसिडेंट अब्राहम लिंकन तथा दूसरे हैं जॉन एफ. केनेडी। 

प्रेसिडेंट लिंकन 1860 मे राष्ट्रपति चुने गये थे ! केनेडी का चुनाव 1960 मे हुआ था ! 

अब्राहम लिंकन को 1846 में कांग्रेस के लिए चुना गया था, वहीं 100 साल बाद यानि 1946 में जॉन एफ कैनेडी को कांग्रेस के लिए चुना गया था। 

लिंकन और केनेडी दोनों के नामों में सात-सात अक्षर हैं।

दोनों राष्ट्रपतियों का संबंध नागरिक अधिकारों से जुडा हुआ था !

लिंकन के सेक्रेटरी का नाम केनेडी तथा केनेडी के सेक्रेटरी का नाम लिंकन था !

दोनों राष्ट्रपतियों का कत्ल शुक्रवार को अपनी पत्नियों के सामने उनकी उपस्थिति में ही हुआ था !

लिंकन के हत्यारे बूथ ने थियेटर मे लिंकन पर गोली चला कर एक स्टोर मे शरण ली थी और केनेडी का हत्यारा ओस्वाल्ड स्टोर मे केनेडी को गोली मार कर एक थियेटर मे जा छुपा था ! 

बूथ का जन्म 1839 मे तथा ओस्वाल्ड का 1939 मे हुआ था ! 

दोनों हत्यारों की हत्या मुकद्दमा चलने के पहले ही कर दी गयी थी ! 

दोनों के हत्यारों जॉन विल्क्स बूथ (John Wilkes Booth) और ली हार्वे ओसवाल्ड (Lee Harvey Oswald) के नामों में 15-15 अक्षर हैं ! 

* दोनों राष्ट्रपतियों के उत्तराधिकारियों का नाम जॉनसन था ! 

लिंकन के उत्तराधिकारी एन्ड्रयु जॉनसन का जन्म 1808 में तथा केनेडी के वारिस लिंडन जॉनसन का जन्म 1908 मे हुआ था।   

लिंकन की हत्या फ़ोर्ड के थियेटर में हुई थी, जबकी केनेडी फ़ोर्ड कम्पनी की कार में सवार थे !

अमेरिका में कई राजनीतिक हस्तियों की हत्याएं हुईं हैं ! जिनमें अब्राहम लिंकन, जेम्स गारफील्ड, विलियम मैककिनले, रोनॉल्ड विलसन रीगन और अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की बहु-चर्चित व प्रमुख रही हैं ! लेकिन लिंकन और केनेडी की जिंदगी और हत्या से जुड़े संयोग ऐसे हैं, जो हैरान कर के रख देते हैं, इसके अलावा और ऐसे उदाहरण कहीं खोजे नहीं मिलते !

इतनी समानताएं ! इतने संयोग ! खुद तो खुद साथ में जुड़े लोग, साल, दिन भी वैसी ही विशिष्टता लिए हुए ! हैरान करने वाला है यह सारा सच !

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

हताश-निराश युवाओं को लिंकन की जीवनी जरूर पढनी चाहिए

आज के युवा जो किसी कारणवश अपने लक्ष्य से दूर रह हताश हो बैठ जाते हैं, ज़रा सी असफलता मिलते ही तनावग्रस्त हो अपनी जान तक देने पर उतारू हो जाते है, जो समझ नहीं पाते कि एक हार से जिंदगी ख़त्म नहीं हो जाती, उन्हें एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति की जीवनी जरूर पढनी चाहिए जो एक पूर्ण कर्मयोगी थे। पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है ? शायद हां ! इसी  "हां " को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था  …… !

#हिन्दी_ब्लागिंग                       

अब्राहम लिंकन ने गीता तो शायद नहीं पढी होगी, पर उनका जीवन पूरी तरह एक कर्म-योगी का ही रहा। वर्षों-वर्ष असफलताओं के थपेड़े खाने के बावजूद वह इंसान अपने कर्म-पथ से नहीं हटा, इतनी हताशा, इतनी निराशा, इतनी असफलताऐं तो ऋषि-मुनियों का भी मनोबल तोड़ के रख दें ! पर धन्य था वह इंसान, जिसने दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की ! अंत में तकदीर को ही झुकना पड़ा उसके सामने।

अब्राहम लगातार 28-30 सालों तक असफल होते रहे, जिस काम में हाथ ड़ाला वहीं असफलता हाथ आई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लोगों के लिए मिसाल पेश की और असफलता को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। लगे रहे अपने कर्म को पूरा करने में, जिसका फल भी मिला, दुनिया के सर्वोच्च पद के रूप में।

अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैण्ड से आकर केंटुकी के हार्डिन काउंटी में बसे एक अश्वेत गरीब परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम थॉमस लिंकन तथा माता का नाम नैंसी लिंकन था। उनके पिता ने कठिन मेहनत कर अपने परिवार को संभाला था ! 

अब्राहम लिंकन अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल 1861 से 1865 तक रहा। वे रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य थे ! वे प्रथम रिपब्लिकन थे जो अमेरिका के राष्ट्रपति बने। उन्होने अमेरिका को उसके सबसे बड़े संकट गृहयुद्ध से उबारा था ! अमेरिका में दास प्रथा के अंत का श्रेय  भी लिंकन को ही जाता है। पर उनको इस पद तक पहुंचने के पहले इतनी असफलताओं का सामना करना पड़ा कि हैरानी होती है कि कैसे उन्होंने तनाव तथा अवसाद को अपने पर हावी नहीं होने दिया होगा ! 

घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए 20-22 साल की आयु में उन्होंने व्यापार करने की सोची, पर कुछ ही समय में घाटे के कारण सब कुछ बंद करना पड़ा। कुछ दिन इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद फिर एक बार अपना कारोबार शुरु किया पर फिर असफलता हाथ आयी। 26 साल की उम्र में जिसे चाहते थे और विवाह करने जा रहे थे, उसी लड़की की मौत हो गयी। इससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया ! पर फिर उन्होंने अपने आप को संभाला और स्पीकर के पद के लिए चुनाव लड़ा पर वहां भी हार का सामना करना पड़ा ! 31 साल की उम्र में फिर चुनाव में हार ने पीछा नहीं छोड़ा ! 34 साल में कांग्रेस से चुनाव जीतने पर खुशी की एक झलक मिली पर वह भी अगले चुनाव में हार की गमी में बदल गयी ! पर 46 वर्षीय जीवट से भरे इस इंसान ने तो हार नहीं मानी पर हार भी कहां उनका पीछा छोड़ रही थी ! फिर सिनेट के चुनाव में पराजय ने अपनी माला उनके गले में डाल दी ! अगले साल उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए खड़े हुए पर हार का भूत पीछे लगा ही रहा ! अगले दो सालों में फिर सिनेट पद की जोर आजमाईश में सफलता दूर ही खड़ी मुस्कुराती रही ! 

पर कब तक भगवान परीक्षा लेता रहता, कब तक असफलता मुंह चिढाती रहती, कब तक जीत आंख-मिचौनी खेलती रहती ! दृढ प्रतिज्ञ लिंकन के भाग्य ने पलटा खाया और 51 वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के पद के लिए चुन लिया गया। ऐसा नहीं था कि वह वहां चैन की सांस ले पाते हों वहां भी लोग उनकी बुराईयां करते रहते थे ! वहां भी उनकी आलोचना होती रहती थी ! पर लिंकन ने तनाव-मुक्त रहना सीख लिया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं होता कि वह राष्ट्रपति बने, परंतु किसी ना किसी को तो राष्ट्रपति बनना ही होता है। 

तो यह तो लिंकन थे जो इतनी असफलताओं का भार उठा सके ! पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है ? शायद हां ! इसी 'हां' को समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण जी ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस ''हां'' से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।

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