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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

पिगी बैंक में सूअर ही क्यों 🤔

ये चाहे मिट्टी से बनें हों, प्लास्टिक से या किसी भी दूसरी धातु से, बच्चों में अत्यंत प्रिय, इनका नाम पिगी बैंक ही होता है ! समय के साथ अब इनकी बनावट भी बदली है और यह विभिन्न आकारों-प्रकारों में मिलने लगा है ! पर भले ही इसका आकार-प्रकार और इसको बनाने में प्रयुक्त पदार्थ बदल गए हों, पर जो चीज नहीं बदली, वह है इसका बचपन से सीख देता आ रहा संदेश कि बचत  करना अच्छी बात है........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

चपन से ही देखते आने के बावजूद हम में से कभी किसी ने सोचा कि बच्चों की छोटी-छोटी बचत के लिए जो गुल्लक होती है, ज्यादातर उसका रूप पिग यानी सूअर का ही क्यों होता है ? दुनिया में हाथी, शेर, बाज, मोर जैसे और भी बहुतेरे जानवर और परिंदे हैं उनका आकार क्यों नहीं अपनाया गया ? सबसे पहले इन गुल्लकों को ऐसा रूप कहां मिला इस पर भी मतभेद है ! भले ही यह सब तय करना कुछ मुश्किल हो, पर कुछ तथ्य तो उपलब्ध हैं ही !

आओ बचत करें 
मध्य युग में धातुएं के अत्यधिक मंहगा होने के कारण  यूरोप में पाइग (pygg) नाम की एक खास मिट्टी से प्लेटें इत्यादि बर्तन बनाए जाते थे। उसी समय कुम्हारों ने अपने छोटे सिक्कों को सुरक्षित रखने के लिए गुल्लक बनाई और उसे पिगी बैंक कहा जाने लगा। समय के साथ धीरे-धीरे, सहूलियत या भूलवश पाइग पिग होता चला गया और Pygg शब्द को Pig समझ लिया गया। इसीलिए आगे चल कर कुम्हार लोग पिग को ध्यान में रख सूअर रूपी गुल्लकें बनाने लग गए। लोगों, खासकर बच्चों को यह बदलाव बहुत पसंद आया और इसी लोकप्रियता के कारण यह शब्द ''पिगी बैंक'' भी प्रचलित हो गया। कुछ लोग इसका संबंध चीन, जर्मनी और इंडोनेशिया से भी जोड़ते हैं क्योंकि वहां भी प्राचीन काल के ऐसे बर्तन मिले हैं ! कुछ लोग मिटटी के नाम पर भी संदेह करते हैं, इसीलिए इसके उद्भव के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता !  

पिग 
भले ही इतिहास, जिज्ञासाएं, कथाएं, कुछ भी हों, आज पिगी बैंक का मतलब या पर्याय सिक्के जमा करने के लिए बने किसी भी आकार और रूप के उपकरण से हो गया है ! ये चाहे मिट्टी से बनें हों, प्लास्टिक से या किसी भी दूसरी धातु से, बच्चों में अत्यंत प्रिय, इनका नाम पिगी बैंक ही होता है ! समय के साथ अब इनकी बनावट भी बदली है और यह विभिन्न आकारों-प्रकारों में मिलने लगा है ! पर भले ही इसका आकार-प्रकार और इसको बनाने में प्रयुक्त पदार्थ बदल गए हों, पर जो चीज नहीं बदली, वह है इसका बचपन से सीख देता आ रहा यह संदेश कि बचत  करना अच्छी बात है और यह नियम लोगों के बड़े होने पर आदत में तब्दील होता चला जाता है !  

आधुनिक पिग्गी 
एक नजर उस पिग मिटटी से मिलते-जुलते नाम वाले पिग जैसे दिखने और अपने यहां पाए जाने वाले जीव पर भी ! भारत में पाए जाने वाले इस पिग को पिग्मी हॉग के नाम से जाना जाता है, जो असल में जंगली सूअरों की एक लुप्तप्राय प्रजाति है। अपने असम के राष्ट्रिय उद्यानों में इसे सुरक्षित रखा गया है ! घास के मैदानों में रहने वाला यह जीव अपनी थूथन से मिटटी खोद कर कंद, जंगली फल, केंचुए, दीमक जैसे कीटों को अपना आहार बनाता है और उसके इन्हीं उपक्रमों से मिटटी उपजाऊ होती चली जाती है ! 
पिग्मी हॉग 
अब यह तो प्रभु की माया और इच्छा है कि कौन-कब-कहां ख्याति प्राप्त करता है ! कैसे जंगल-जंगल घूमने वाला घर-घर में पैठ बना लेता है ! चलते-चलते एक मनोरंजक जानकारी, कोलकाता के सबसे प्रतिष्ठित इलाके, धर्मतल्ला यानी चौरंगी की लिंडसे स्ट्रीट पर 1874 में बना शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, न्यू मार्किट स्थित है ! इसका एक नाम हॉग मार्केट भी है ! बंगला भाषा में इसे हॉग साहेबेर बाजार भी कहा जाता है 😅

@संदर्भ और चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏  

बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

ललिता का बेटा

बिना किसी अपेक्षा के, अपनी अंतरात्मा की आवाज पर, निस्वार्थ भाव से किसी के लिए किया गया कोई भी कर्म जिंदगी भर आपको संतोष प्रदान करता रहता है। यह रचना काल्पनिक नहीं बल्कि सत्य पर आधारित है। श्रीमती जी शिक्षिका रह चुकी हैं। उसी दौरान उनका एक संस्मरण उन्हीं के शब्दों में ...........!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी अपने स्कूल पहुंची ही थी कि राजेंद्र को एक छोटे से बच्चे के साथ आते देखा ! अंदाज हो गया कि बच्चा उसी का होगा ! कुछ ही देर में इसकी पुष्टि भी हो गई ! उसने बताया कि वह अपने बच्चे का दाखिला करवाने आया है ! मेरी आँखों के सामने पिछले पैंतीस साल किसी फिल्म की तरह गुजर गए ! तब मुझे साल भर ही हुआ था, छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर शहर के इस स्कुल में शिक्षिका के रूप में काम करते, जब ललिता अपने इसी बेटे राजेंद्र को मेरे पास लाई थी, स्कुल में प्रवेश के हेतु। आज वही राजेंद्र मेरे सामने खड़ा है, अपने बेटे का हाथ थामे और आज साल भर ही  रह गया है, मेरे रिटायरमेंट में ! अजब संयोग था !
काफी पुरानी बात है, उस समय कुकुरमुत्तों की तरह गली-गली स्कूली दुकानें नहीं खुली थीं। हमारा विद्यालय भी एक संस्था द्वारा संचालित था। जहां बच्चों का दाखिला उनकी योग्यता के अनुसार ही किया जाता था। यहां की सबसे अच्छी बात थी कि इस स्कूल में समाज के हर तबके के परिवार के बच्चे बिना किसी भेद-भाव के शिक्षा पाते थे। कार से आने वाले बच्चे पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता था, जितना मेहनत-मजदूरी करने वाले के घर से आने वाले बच्चे पर। फीस के अलावा किसी भी तरह का अतिरिक्त आर्थिक भार किसी पर नहीं डाला जाता था। फीस से ही सारे खर्चे पूरे करने की कोशिश की जाती थी। इसीलिए स्टाफ की तनख्वाह कुछ कम ही थी। पर माहौल का अपनापन और शांति, यहां बने रहने के लिए काफी था। हालांकि करीब तीस साल की लम्बी अवधि में मेरे पास विभिन्न जगहों से कई नियुक्ति प्रस्ताव आए पर इस अपने परिवार जैसे माहौल को छोड़ कर जाने की कभी भी इच्छा नहीं हुई। स्कूल में कार्य करने के दौरान तरह-तरह के अनुभवों और लोगों से दो-चार होने का मौका मिलता रहता था।इसीलिए इतना लंबा समय कब गुजर गया पता ही नहीं चला।
पर इतने लम्बे कार्यकाल में सैकड़ों बच्चों को अपने सामने बड़े होते और जिंदगी में सफल होते देख खुशी और तसल्ली जरूर मिलती है। ऐसा कई बार हो चुका है कि किसी यात्रा के दौरान या बिलकुल अनजानी जगह पर अचानक कोई युवक आकर मेरे पैर छूता है और अपनी पत्नी को मेरे बारे में बतलाता है तो आँखों में ख़ुशी के आंसू आए बिना नहीं रहते। गर्व भी होता है कि मेरे पढ़ाए हुए बच्चे आज देश के साथ विदेशों में भी सफलता पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहे हैं। खासकर उन बच्चों की सफलता को देख कर खुशी चौगुनी हो जाती है, जिन्होंने गरीबी में जन्म ले, अभावग्रस्त होते हुए भी अपने बल-बूते पर अपने जीवन को सफल बनाया।
ऐसा ही एक छात्र था, राजेन्द्र, उसकी माँ ललिता हमारे स्कूल में ही आया का काम करती थी। एक दिन वह अपने चार-पांच साल के बच्चे का पहली कक्षा में दाखिला करवा उसे मेरे पास ले कर आई और एक तरह से उसे मुझे सौंप दिया। वक्त गुजरता गया। मेरे सामने वह बच्चा, बालक और फिर युवा हो बारहवीं पास कर महाविद्यालय में दाखिल हो गया। इसी बीच ललिता को तपेदिक की बीमारी ने घेर लिया। पर उसने लाख मुसीबतों के बाद भी राजेन्द्र की पढ़ाई में रुकावट नहीं आने दी। उसकी मेहनत रंग लाई, राजेन्द्र द्वितीय श्रेणी में सनातक की परीक्षा पास कर एक जगह काम भी करने लग गया। 

वह लड़का बहुत कम बोलता था ! अपने मन की बात भी जाहिर नहीं होने देता था ! पर उसकी सदा यही इच्छा रहती थी कि जिस तरह भी हो वह अपने माँ-बाप को सदा खुश रख सके। अच्छे चरित्र के उस लडके ने अपने अभिभावकों की सेवा में कोई कसर नहीं रख छोड़ी। उससे जितना बन पड़ता था अपने माँ-बाप को हर सुख-सुविधा देने की कोशिश करता रहता था। माँ के लाख कहने पर भी अपना परिवार बनाने को वह टालता रहता था। उसका एक ही ध्येय था, माँ-बाप की ख़ुशी। ऐसा पुत्र पा वे दोनों भी धन्य हो गए थे। यही वजह थी कि वह बच्चा मुझे सदा याद रहा !

विधि का अपना विधान होता है ! इस परिवार ने कुछ समय के लिए ही जरा सा सुख देखा था कि एक दिन ललिता के पति का देहांत हो गया। इस विपदा के बाद तो बेटा अपनी माँ के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो गया। पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था ! ललिता अपने पति का बिछोह और अपनी बिमारी का बोझ ज्यादा दिन नहीं झेल पाई और पति की मौत के साल भर के भीतर ही वह भी उसके पास चली गयी। राजेन्द्र बिल्कुल टूट सा गया। मेरे पास अक्सर आ बैठा रहता था। जितना भी और जैसे भी हो सकता था मैं उसे समझाने और उसका दुःख दूर करने की चेष्टा करती थी। समय और हम सब के समझाने पर धीरे-धीरे वह नॉर्मल हुआ। काम में मन लगाने लगा। सम्मलित प्रयास से उसकी शादी भी करवा दी गयी। 

प्रभु की कृपा और अपने माँ-बाप के आशीर्वाद उसका गृहस्थ जीवन सुखमय रहा। जब कभी भी मुझसे मिलता, तो उसकी विनम्रता, विनयशीलता मुझे अंदर तक छू जाती ! आज वही राजेन्द्र अपने बच्चे के साथ मेरे सामने खड़ा था और मुझे उस बच्चे में वर्षों पहले का राजेंद्र नजर आ रहा था, जो पहली बार ऐसे ही मुझसे मिला था ! ऊपर से उसके माँ-बाप भी उसे देखते होंगे तो उनकी आत्मा भी उसे ढेरों आशीषों से नवाजती होगी। मुझे भी उसका अपने माँ-बाप के प्रति समर्पण कभी भूलता नहीं है। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 15 मार्च 2022

होली हो ले, उसके पहले सोचना तो बनता है

आज दोपहर बाद घर लौटते समय कालोनी के किसी ऊँचे से मकान से किसी बच्चे के हाथ से छूटी गुब्बारे रूपी मिसाइल मुझे मिस करती हुई सड़क से टकरा कर नष्ट हो गई ! अभी दो दिन बचे हैं त्यौहार के आने में, ऐसा ही कुछ सोच, टारगेट यानी मैंने तुरंत पलट कर देखा पर आशानुरूप ''लॉन्चर'' गायब था ! तभी पता नहीं कैसे विचारों ने पलटा खाया ! अपने बचपन के दिन याद आ गए, जब दसियों दिन पहले से इस आनंदमय उत्सव को मनाने का उत्साह जाग जाता था ! बड़े-छोटे-महिलाएं सब अपने-अपने तरीके से इसका स्वागत करने की तैयारियों में जुट जाते थे........!

#हिन्दी_ब्लागिंग

होली अपने समय पर फिर आ पहुंची है ! गांवों-कस्बों में तो भले ही कुछ जिंदादिली बची भी हो पर शहरों में तो सिर्फ औपचारिकता ही शेष रह गई है ! अब ना ही पहले जैसा उत्साह है, ना ही उमंग है, ना हीं कोई चाव ! ना ढफली ना चंग ना हीं ढोलक ! ना हीं फाग ना हीं संगीत ना हीं मस्ती ! ना घर में बने पकवान, ना ठंडाई, ना बेफिक्री का आलम ! सब तिरोहित होता चला गया समय के साथ-साथ ! उस पर सदा से किसी षड्यंत्र के तहत, तथाकथित बुद्धिजीवी, छद्म इतिहासकार, परजीवी सोशल मीडिया, मौकापरस्त वार्ताकार, अपनी आस्था, संस्कृति, परंपरा, उत्सवों में मीनमेख निकालने वालों की, ऐन मौके पर पानी बचाने की नसीहतें ढहती दिवार पर धक्के का काम करती रहीं !  

हमारे त्योहारों पर ही मंहगाई, बेरोजगारी, जिंसों की कमियों का रोना क्यों रोया जाता है ! क्यों हमारे त्यौहार सिमटते चले जा रहे हैं ! क्यों एक दिवसीय आयातित उत्सव धीरे-धीरे हफ्तों तक मनवाए जाने लगते हैं ! क्यों हमारी पारंपरिक पकवानों-मिठाइयों को दरकिनार करवा कर चॉकलेट-पेस्ट्रियों को प्रमुखता दी जाने लग जाती है ! क्यों दीप जला कर वातावरण को प्रकाशमय बनाने की जगह दीप बुझा कर अंधेरे के आह्वान को उचित बताया जाने लगा है   

अब बच्चों को भी पहले जैसे अवकाश नहीं मिलते ! उल्टे इन्हीं दिनों में परीक्षा का भूत उनके सर पर सवार करवा दिया जाता है ! फिर भी त्योहारों के प्रति उनका बालसुलभ उत्साह खत्म नहीं हुआ है ! सोचा जाए तो वे ही हैं, हमारे ध्वजवाहक, जो किसी भी बहाने सही, अपनी परंपराओं को जिंदा रखे हुए हैं ! इसलिए यदि कहीं से किसी बच्चे का कोई गुब्बारा या पिचकारी की धार आ कर आपके कपड़ों को भिगो भी जाती है तो मुस्कुरा कर उसे देखें, आपकी जरा सी मुसकुराहट उसको खुशी से लबरेज कर देगी ! कपड़ों का क्या है कुछ ही देर में सूख जाएंगे पर सारा वातावरण बच्चे की निश्छल हंसी, उसकी खुशी के रस से सराबोर हो जाएगा ! शायद इतने से उपक्रम से ही हम गायब होती परंपराओं को कुछ हद तक बचाने में कुछ सहयोग कर सकें !  

आज दोपहर बाद घर लौटते समय कालोनी के किसी ऊँचे से मकान से किसी बच्चे के हाथ से छूटी गुब्बारे रूपी मिसाइल मुझे मिस करती हुई सड़क से टकरा कर नष्ट हो गई ! अभी दो दिन बचे हैं त्यौहार के आने में, ऐसा ही कुछ सोच, टारगेट यानी मैंने तुरंत पलट कर देखा पर आशानुरूप ''लॉन्चर'' गायब था ! तभी पता नहीं कैसे विचारों ने पलटा खाया ! अपने बचपन के दिन याद आ गए, जब दसियों दिन पहले से इस आनंदमय उत्सव को मनाने का उत्साह जाग जाता था ! बड़े-छोटे-महिलाएं सब अपने-अपने तरीके से इसका स्वागत करने की तैयारियों में जुट जाते थे !

उन दिनों पिताजी उस समय के कलकत्ता के पास एक जूट मील में अधिकारी थे ! मिल का पूरा स्टाफ एक परिवार की तरह था ! हर त्यौहार मिल-जुल कर ही मनाया जाता था, पर होली की बात सबसे निराली थी ! यह सबका सबसे प्रिय उत्सव हुआ करता था ! नई चंग या डफ लाई जाती थी ! उसका तरह-तरह से परिक्षण कर तैयार किया जाता था। इतने सारे परिवारों के लिए ठंडाई, गुझिया, मिठाई, नमकीन इत्यादि का पर्याप्त मात्रा में इंतजाम किया जाता था। रंग तो फैक्ट्री में उपलब्ध होते थे पर व्यक्तिगत पिचकारियों की खरीद उनका रख-रखाव एक अलग काम हुआ करता था। उन दिनों प्लास्टिक का चलन नहीं था। पिचकारियां लोहे या पीतल की, तीन आकारों में छोटी, मध्यम और बड़ी, हुआ करती थीं। उनमें दो तरह के "अड्जस्टमेंट" होते थे, एक फौव्वारे की तरह रंग फेंकता था, जिसकी दूरी के हिसाब से क्षमता कम होती थी, दूसरा एक धार वाला, जो कम से कम दस-बारह फुट तक पानी फेंक किसी को भिगो सकता था। सिर्फ रंग-गुलाल ! ना कीचड़ ना ग्रीस, ना कपड़ा फाडू हुड़दंग !

हफ्ते-दस दिन पहले से रात को डफ पर थपकियां पड़नी शुरू हो जाती थीं। "सर्रा-रा-रा"  की गूंज देर रात तक मस्ती बरसाती रहती थी। होली वाले दिन स्टाफ के युवा टोली बना मील-परिसर में चक्कर लगाना शुरू करते थे। आगे-आगे डफ वादक अपनी मीठी तान में फाग गाते हुए चला करता था, पीछे पूरी टोली सुर में सुर मिलाती  चलती थी। घर-घर जा यथायोग्य अभिवादन कर, रंग लगा, लगवा, अपने पूरे रंग में आ कर मैदान में  एकत्रित हो जाते थे। एक शालीनता तारी रहती थी पूरे माहौल में। बड़े-छोटे का लिहाज, बड़ों के प्रति आदर-सम्मान तथा अनुशासन ! हाँ, बच्चे जरूर अपने-अपने ''हथियारों'' के साथ लैस हो अनवरत उन पर रंगों की बरसात बदस्तूर जारी किए रहते थे !

घंटों चलने वाले इन सब कार्यक्रमों के बाद संध्या समय होता था, प्रीतिभोज का। खाना-पीना मौज -मस्ती, गाना-बजाना या फिर मैदान में पर्दा लगा प्रोजेक्टर के माध्यम से किसी फिल्म का शो। पर उस शाम का मुख्य आकर्षण होती थी ठंडाई जो वहीं उचित देख-रेख में तैयार की जाती थी। जिसका स्वाद आज तक नहीं भुलाया जा सका है।  उसके भी दो वर्ग हुआ करते थे, बच्चों और महिलाओं के लिए सादी और पुरुषों के लिए "बूटी" वाली। उधर युवा भी अपने से बड़ों का लिहाज कर ही उसका सेवन करते थे। जिस पर शिव जी की कृपा कुछ ज्यादा होने लगती वह चुपचाप वहां से खिसक लेता था। ना कभी हुड़दंग देखा- सुना गया ना हीं कभी किसी गलत हरकत को उभरते देखा गया ! कैसा समय था ! कैसे थे वे दिन और कैसे थे वे लोग !

क्या आज हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती कि हम अपने गुम होते या सुनियोजित तरीके से गायब करवा दिए जा रहे त्योहारों, उत्सवों, परंपराओं को बचाने का उपक्रम करें ! सोचें कि हमारे त्योहारों पर ही मंहगाई, बेरोजगारी, जिंसों की कमियों का रोना क्यों रोया जाता है ! क्यों हमारे त्यौहार सिमटते चले जा रहे हैं ! क्यों एक दिवसीय आयातित उत्सव धीरे-धीरे हफ्तों तक मनवाए जाने लगे हैं ! क्यों हमारे ऋषि-मुनियों को भुलवा कर इम्पोर्टेड महापुरुषों को हम पर थोपा जाने लगा है ! क्यों हमारे पारंपरिक पकवानों, मिठाइयों को दरकिनार करवा कर चॉकलेट-पेस्ट्रियों को प्रमुखता दी जाने लगी है ! क्यों दीप जला कर वातावरण को प्रकाशमय बनाने की जगह दीप बुझा कर अंधेरे के आह्वान को उचित बताया जाने लगा है !ऐसे बहुत सारे क्यों हैं, जिन पर जरा सा थम कर विचार करने की जरुरत है ! 

क्या आप थमेंगे, जरा सा.........!!

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

कहीं बहुत देर ना हो जाए

अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की ऐसी कुशाग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है..................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्तमान ! हारी-बिमारी को छोड़ दें, वह तो अल्प कालीन है ! उसके अलावा समय बड़ा कठिन या कहें तो अराजक चल रहा है ! हर जगह असंतोष, दिशा हीनता, अज्ञानता, लिप्सा, अमानवीयता का बोलबाला होता चला जा रहा है ! चली आ रही मान्यताओं, परंपराओं, आस्थाओं को बिना उनकी उपयोगिता समझे-जाने दर किनार किया जा रहा है ! विज्ञों, चिंतकों, विद्वानों को देश के भविष्य की चिंता सताने लगी है ! वर्षों पहले की छेड़-छाड़ के बीजारोपण का असर अब सामने आने लगा है !  

संस्कार ! इसका मतलब हैशरीर, मन और मस्तिष्क की शुद्धि और उनको मजबूत करना ! जिससे मनुष्य  संसार में अपनी भूमिका आदर्श रूप मे निभा सके। हमारे देश-समाज में संस्कार का बहुत महत्व हुआ करता था ! संस्कार सिर्फ धार्मिक कृत्य ही नहीं होते थे ! इनमें वह सब कुछ समाहित होता था जो मनुष्य को मानव बना, उससे सारे संसार के कल्याण की कामना करवाता था ! पीढ़ी दर पीढ़ी ये परिवारों में धरोहर की तरह आगे बढ़ते-बढ़ाए जाते रहते थे ! घर के बड़ों-बुजुर्गों द्वारा बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई के अलावा इनसे भी परिचित करवाया जाता रहा था ! जहां कहीं मौज-मस्ती के कारण कुछ लोगों ने गलत आचरण किया, उसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना भी पड़ा ! जैसा कि एक प्रदेश के नशे की चपेट में बर्बाद होने का उदाहरण हम सबके सामने है ! हालांकि सभी लोग बुरे नहीं होते पर एक मछली या खटाई की एक बूँद सारे पानी या दुध को नष्ट कर धर देती है !

फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी का नाम घर-घर लिया जाने लगा ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी से अलग हो गए, पता ही नहीं चला

बाजार ! बच्चे तो, प्रतिमा बनाई जाने वाली मिट्टी की तरह होते हैं ! उन्हें जैसा ''मोल्ड'' यानी ढाला जाएगा, वे वैसे ही बन जाएंगे ! आज जब एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है तो बच्चों को सही रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी तो उनके अभिभावकों यानी उनके माता-पिता की ही बनती है ! पर यदि घर वाले अपने कार्यभार के कारण उन्हें सही ढंग से मोल्ड नहीं करेंगे तो बच्चे आसानी से बाहरी ताकतों यानी बाजार का शिकार बन विकृत रूप में ढल जाएंगे और विडंबना यही है कि ज्यादातर ऐसा ही हो रहा है ! शोध और खोज खबर के नतीजे बता रहे हैं कि कुछ समय पहले तक बाजार और उसका व्यापार 90% महिलाओं का आश्रित था ! पर आज बच्चों के सहारे उनकी 50% की आमदनी होने लगी है ! टीवी पर आने वाले विज्ञापन इस बात की पुष्टि कर ही रहे हैं ! बाजार ने अपने मतलब के लिए महिलाओं को प्रदर्शन की "चीज" और फल से होते हुए ऋषि (अ से अनार, ऋ से ऋषि) तक जाने वाले मासूमों को फल से  होते हुए जानवर (A for Apple से Z for Zebra) तक पहुंचा कर उन्हें अपना खिलौना बना डाला है ! यदि परिवार से सही मार्गदर्शन नहीं मिला तो बाजार तो बैठा ही है, उन्हें अमानुष बनाने हेतु ! 

विडंबना ! यदि बच्चों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिला और वे बाजार के हत्थे चढ़ गए तो हमारा-समाज का भविष्य और भी भयावह रूप ले लेगा ! पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बच्चों को संस्कार देगा कौन ? टूटते, मैं-तुम-हमारे तक सिमटते हुए परिवारों के ज्यादातर सदस्य पहले ही बाजार के षड्यंत्रों का शिकार हो उसी की बोली बोलने लगे हैं ! अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की इस कुशग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है ! अब इस पर आगे क्या कहा जाए ! यह तो मात्र एक झलक है, हमारी तथाकथित मॉडर्न पीढ़ी की !  

पराभव ! कुछ सालों पहले तक ज्यादातर घरों में बच्चों को दो-तीन श्लोक रटवाने की प्रथा सी थी ! दादी-नानी द्वारा जाने-अनजाने वीरों, शहीदों, नायकों की कथा-कहानी सुना बच्चों को सद्गुणी बनाने का उपक्रम होता रहता था ! फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी ने घर-घर में प्रवेश कर लिया ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने मासूम खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी जैसे साथियों से अलग हो गए, पता ही नहीं चला ! इन सब के साथ ही हमारे संस्कार भी तिरोहित होते चले गए !  

आशा ! पर कहते हैं ना कि कभी भी हताश-निराश नहीं होना चाहिए ! हर चीज का अंत निश्चित है ! जब अच्छा दौर नहीं रहा तो बुरा कैसे रह पाएगा ! घोर अँधेरी रात के बाद ही भोर की लालिमा उभरती है ! हमें बिना निराश हुए उसी का इंतजार करना है। हाँ ! इस अँधेरे के छटने तक अपना हौसला और विश्वास बनाए रखने के लिए हमें अपने स्तर पर हर संभव प्रयास भी करते रहना है !  

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