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बुधवार, 23 अप्रैल 2025

सपूत

हेमंत जब चुप हुआ तो रामगोपाल जी उससे आँखें नहीं मिला पा रहे थे ! अपने आप को बेटे के सामने बौना महसूस कर रहे थे ! लाज आ रही थी उन्हें अपनी सोच और निराधार विचारों पर ! आक्रोश था अपने पर कि कैसे उन्होंने अपने बेटे के बारे में गलत सोच लिया ! क्या उन्हें खुद अपने  दिए संस्कारों पर भी भरोसा नहीं रह गया था ! वे उठे और बेटे को कस कर गले से लगा लिया, आँखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे ! हेमंत उन्हें ऐसे संभाल रहा था जैसे वह उनका पिता हो........!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

शाम की चहलकदमी के बाद रामगोपाल जी घर आ, नम आँखों के साथ पत्नी रमा की फोटो के सामने बहुत देर तक खड़े रहे ! आज उन्हें बिछुड़े हुए पूरा एक साल हो गया था ! पत्नी के देहावसान के पश्चात वे इस शहर में बिलकुल अकेले रह गए थे ! इकलौता बेटा हेमंत अपनी पत्नी स्नेहा और तीन साल की बिटिया के साथ दिल्ली में रहता है ! उसने कई बार कहा, कितनी बार समझाया, इन बारह महीनों में बीसियों बार मनाने की कोशिश की कि पापा हमारे पास आ जाओ ! पर रामगोपाल जी ने, इस उम्र में अकेले रहना ठीक नहीं है, जानते हुए भी दिल्ली जाना गवारा नहीं किया ! वैसे तो वर्षों से उनके साथ रह रहा सहायक दीनू तो था, पर उसकी भी काफी उम्र हो चुकी थी ! 

अलौकिक अनुभूति 
ऐसा  नहीं है कि रामगोपाल जी परिवार के साथ रहना नहीं चाहते थे या उनका आपस में प्रेम नहीं था ! बेटे और उसके परिवार पर वे दिलो-जान से न्योछावर थे ! वो तो पोती को सदा अपने कंधे पर बैठाए, उसका घोड़ा बना रहना चाहते थे ! उसकी एक-एक हरकत को संजो लेना चाहते थे ! उसकी मासूमियत को यादगार बना लेना चाहते थे ! पर आए दिन अखबारों में छपने वाली खबरें उन्हें आशंकित और विचलित कर देती थीं ! उनके दिल में एक अनजाना डर, एक काल्पनिक खौफ घर कर गया था ! रोज ही कोई ना कोई ऐसी घटना सामने आ जाती थी, जिसमें सारी सम्पत्ति हथिया या पूरी जमीन-जायदाद अपने नाम कर बेटा-बहू, माँ-बाप को किसी स्टेशन या एयर पोर्ट पर लावारिस छोड़ गायब हो जाते हैं ! यदि कोई घर ले भी जाता है तो मतलब निकलते ही पालकों को शेष जीवन बिताने के लिए वृद्धाश्रम में छोड़ आता है ! उन्हें अपने बेटे पर विश्वास तो था पर दिल का क्या करें, जो उलटे-सीधे विचारों से इधर-उधर भटकाता रहता था ! 

तभी  फोन की घंटी बजती है ! हेमंत था दूसरी तरफ ! उसने बिना इनको कुछ कहने का मौका दिए, फरमान सुना दिया कि वह दो दिन बाद आ रहा है उनको लेने ! इस बार कोई बहाना नहीं चलने वाला और वे उसके साथ जा रहे हैं ! रामगोपाल जी जानते थे कि बेटा पूर्णतया उन पर गया है जो ठान लिया उसे पूरा करना ही होता है ! इन्होंने सोचा कि चलो कुछ दिन रह आता हूँ, हफ्ते दस दिन में लौट आऊंगा ! पर बेटे ने तो कुछ और ही सोच रखा था।  

पिता-पुत्र 
अगले  कुछ दिन तो बवंडर भरे थे ! उस तूफान में कब सामान पैक हुआ, कब मकान का निपटारा हुआ, कब सारी औपचारिकताएं पूरी हो गईं, कब दिल्ली घर पहुंच गए, पता ही नहीं चला ! जैसे किसी ने सम्मोहित कर दिया हो ! लाख चाह कर भी विरोध नहीं कर पाए रामगोपाल जी ! होश तब आया जब पोती किलकारी मारती हुई उछल कर दद्दू की गोद में चढ़ गई ! उस स्वर्गिक पल में रामगोपाल जी ने सब प्रभु पर छोड़ दिया, जो होगा देखा जाएगा !  

पर मन में एक खटका बना ही हुआ था, क्योंकि उन्हें अपना सामान नजर नहीं आ रहा था ! हेमंत से पूछने पर उसने कहा आप जहां रहेंगे वहां रखवा दिया है ! रामगोपाल जी समझ गए कि मुझे यहां नहीं रहना है ! सामान पहले ही वृद्धाश्रम भिजवा दिया गया है ! आज नहीं तो कल तो जाना ही था, पहले से ही पहुंचा दिया गया है ! तभी हेमंत बोला, पापा आपके लिए एक सरप्राइज है ! रामगोपाल जी ने मन में सोचा काहे का सरप्राइज बेटा, मैं सब जानता हूँ ! तुम भी दुनिया से अलग थोड़े ही हो ! पैसा क्या कुछ नहीं करवा लेता है ! खुद पर क्रोध भी आ रहा था कि सब जानते-समझते भी सब बेच-बाच कर यहां क्यों चले आए ! पर अब तो जो होना था हो चुका था !

तभी हेमंत की आवाज सुनाई पड़ी, पापा चलिए ! रामगोपाल जी के पैर मन-मन भारी हो गए थे, किसी तरह खुद को घसीटते हुए बाहर आ खुद को लिफ्ट में समो दिया ! पर यह क्या ! लिफ्ट नीचे ना जा ऊपर की ओर चल अगले माले पर रुक गई ! उन्हें कुछ समझ नहीं आया ! तभी हेमंत ने बाहर निकल सामने के फ्लैट की घंटी बजाई ! दरवाजा खुला, जिसने खोला उसे देख रामगोपाल जी झटका खा गए, सामने दीनू खड़ा था ! दीनू यहां ? उन्हें बोध ही नहीं हो रहा था कि क्या हो रहा है ! वे कहां हैं ! क्या देख रहे हैं और जो देख रहे हैं वह सच भी है या नहीं ! पर अभी तो कुछ और भी हैरतंगेज होने वाला था !

हेमंत ने अंदर जा आवाज लगाई, काका बाहर आ जाओ, पापा आ गए हैं ! और अंदर से जो आया उसे देख कर तो रामगोपाल जी चकरा कर गिरते-गिरते बचे ! उनके सामने उनके बचपन का, भाई समान, जिगरी यार निशिकांत चला आ रहा था ! निशिकांत ने लपक कर उन्हें गले लगा लिया ! वर्षों के बिछुड़े दोस्तों के मिलन पर सभी की आँखें भीग गईं ! फोन से तो बात होती थी पर मिले अरसा बीत चुका था ! आज ईश्वर की कृपा हुई थी ! पर रामगोपाल जी पूरी तरह असमंजस में थे ! उन्हें सब कुछ किसी नाटक की तरह लग रहा था, जिसमें वे भी थे, पर नहीं थे ! तभी नीचे से बहू का संदेश आ गया, खाना तैयार है !

जब सब खाने की मेज पर इकठ्ठा हुए तो हेमंत ने सारी कहानी का खुलासा किया ! उसने बताया कि उसके अनेक प्रयासों के बावजूद पापा यहां आने के लिए मान नहीं रहे थे ! वह उनके लिए सदा परेशान रहता था। पर कोई हल नहीं निकल पा रहा था ! पर पिछले पखवाड़े जब निशिकांत काका का फोन आया और पता चला कि उनकी तबियत ठीक नहीं रहती, तो मैं उनसे मिलने गया ! वे भी बिलकुल अकेले रहते थे ! उन्होंने शादी वगैरह नहीं की थी ! मैंने उनके पास जा कर सारी परिस्थितियों का जायजा लिया और उसी समय  स्नेहा से मश्विरा कर एक योजना बना डाली।  उसी के तहत निशिकांत काका को भी अपने साथ ले आया ! यह ऊपर वाला फ्लैट भी उन दिनों बिकाऊ था, इसे ले लिया गया ! उसके बाद पापा को यहां कैसे लाया यह आप सब को पता ही है ! रही दीनू काका की बात तो उन्हें इस उम्र में अकेला छोड़ने का तो सोचा भी नहीं जा सकता था ! उनके लिए भी यहां एक अलग कमरे की व्यवस्था है, कोई दिक्कत नहीं होगी ! अब हम सब एक साथ रहेंगे ! मेरा सपना पूरा हुआ ! इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है ! 

हेमंत जब चुप हुआ तो रामगोपाल जी उससे आँखें नहीं मिला पा रहे थे ! अपने आप को बेटे के सामने बौना महसूस कर रहे थे ! लाज आ रही थी उन्हें अपनी सोच और निराधार विचारों पर ! आक्रोश था अपने पर कि कैसे उन्होंने अपने बेटे के बारे में गलत सोच लिया ! उस बेटे के बारे में जो उनका ही नहीं उनसे जुड़े लोगों का भी भला सोचता हो ! क्या उन्हें खुद अपने दिए संस्कारों पर भी भरोसा नहीं रह गया था ! वे उठे और बेटे को कस कर गले लगा लिया, आँखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे ! हेमंत उन्हें ऐसे संभाल रहा था जैसे वह उनका पिता हो ! बहू उनकी पीठ सहला रही थी ! इधर मासूम छुटकी जो यह जान कर ठुमक रही थी कि दादू अब यहीं रहेंगे उसको अब यह सब देख समझ ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है !

कुछ दिनों बाद आज फिर रामगोपाल जी पत्नी की तस्वीर के सामने खड़े थे ! सामने कप बोर्ड पर उनके तथा निशिकांत जी के नाम के फिक्स्ड डिपॉज़िट के पेपर रखे हुए थे, जो हेमंत ने दोनों घरों को बेच कर मिली राशि से बनवाए थे ! निशिकांत जी जैसे पत्नी को बता रहे थे कि तुम चिंता मत करना तुम्हारे लायक बेटे ने बिना बोले, अघोषित रूप से  मेरे सा-साथ दीनू तथा निशिकांत हम तीनों की जिम्मेदारी ले ली है ! भगवान उसे सदा सुखी रखें !

@दो चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

संस्कार भी किसी उपलब्धि को हासिल करने के लिए सहायक हो सकते हैं

जापान के नागरिक चाहे देश में रहें या विदेश में उनका स्वत अनुशासन सभी जगह एक सा रहता है ! इसकी एक झलक अपने ही देश में राजस्थान के अलवर जिले के नीमराना क्षेत्र में देखने को मिलती है ! जहां कई जापानी कंपनियों जगह आवंटित की गई है ! नीमराना का यह इलाका काफी हरा-भरा है ! अफरात मात्रा में पेड़-पौधे हैं ! पर हर कंपनी का परिसर बिलकुल साफ सुथरा, एक तिनका तक नजर नहीं आता ! जबकि यहां जापानियों की संख्या नगण्य सी ही है, पर उनका अनुशासन, उनका समर्पण, उनकी संस्कृति, उनकी जीवनशैली यहां चप्पे-चप्पे पर नजर आती है.........!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अपने देश में सफाई व स्वच्छता को लेकर काफी हो-हल्ला मचता रहता है ! अब दिल्ली को ही लें, इसके कूड़े के पहाड़ों की चर्चा दूर-दूर तक हो रही है ! हम सब दिल्ली वासी शर्मिंदा और दुखी होने का दिखावा भी खूब करते हैं ! पर निजी तौर पर अपने घर से निकलने वाले कूड़े में कोई कटौती करने की कभी कोई कोशिश नहीं करते ! हाँ, दूसरों पर इल्जाम लगाने में कोई कोताही नहीं बरतते ! सब यही चाहते हैं कि दूसरे इस मुहीम में जुटे रहें ! हमारा काम भी कोई और कर दे ! वैसे हम दिखावा करने या स्थान-परिवेश के अनुसार खुद को प्रस्तुत करने में भी बहुत माहिर हैं ! विदेश प्रवास पर हम खूब अनुशासित रहते हैं ! वहां के नियम-कानूनों का शत-प्रतिशत पालन करते हैं ! मर्यादित रहते हैं ! पर देश में कदम रखते ही उच्श्रृंखल हो जाते हैं ! यहां आते ही हमें अपनी आजादियां तो याद आ जाती हैं पर अपने कर्तव्य की कोई चिंता या परवाह नहीं रहती ! जब तक दिल से हर कोई इस काम में नहीं जुटेगा, सफाई सिर्फ बातों और कागजों पर ही रहेगी ! वैसे इसके लिए संस्कार भी बहुत जरुरी हैं !

नीमराना 

दुनिया के सबसे अनुशासित देश जापान को देखें ! उसके नागरिक चाहे देश में रहें या विदेश में उनका स्वत अनुशासन सभी जगह एक सा रहता है ! इसकी एक झलक देखनी हो तो जापान जाने की जरुरत नहीं है, अपने ही देश में राजस्थान के अलवर जिले के नीमराना क्षेत्र तक ही जाना बहुत है ! यहां बहुत सी जापानी कंपनियों को उत्पादन के लिए जगह आवंटित की गई है ! नीमराना का यह इलाका काफी हरा-भरा है ! अफरात मात्रा में पेड़-पौधे हैं ! पर हर कंपनी का परिसर बिलकुल साफ सुथरा, एक तिनका तक नजर नहीं आता ! जबकि यहां जापानियों की संख्या नगण्य सी ही है, पर उनका अनुशासन, उनका समर्पण, उनकी संस्कृति, उनकी जीवनशैली यहां चप्पे-चप्पे पर नजर आती है !

उदहारण स्वरूप नीमराना स्टील सर्विस सेंटर इंडिया नाम की कंपनी में तक़रीबन चार सौ कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें जापानी कर्मचारी सिर्फ तीन हैं पर उन्होंने सफाई से लेकर अनुशासन तक हर चीज में अपने भारतीय साथियों को भी अपनी संस्कृति में ढाल लिया है ! इतनी हरियाली के बावजूद परिसर में एक तिनका तक दिखाई नहीं देता ! वहां के जनरल मैनेजर के अनुसार यहां चलने वाली तीन शिफ्टों में हर व्यक्ति को अनिवार्यतः दस मिनट का समय सफाई में देना होता है ! शिफ्ट में निश्चित समय पर सफाई अभियान के लिए म्यूजिक बजना शुरू हो जाता है उस दौरान बिना किसी भेदभाव के छोटे-बड़े सारे अधिकारी सफाई में जुट जाते हैं ! इस इलाके में करीब 46 जापानी कंपनियां हैं जिनमें गिनती के जापानी लोग हैं, बाकी तक़रीबन 25-26 हजार लोग भारतीय हैं ! इन सभी की कार्यप्रणाली की संरचना एक सी है ! यहां कार्यरत लोगों की एक विशेष जीवनशैली बन चुकी है। यहां फैक्ट्रियों में आदमी हर कहीं नहीं चल सकता। एक लेन निर्धारित है। सफाई के अलावा कंपनी की कैंटीन में एम.डी. से लेकर लेबर तक सब एक साथ बैठते हैं। खाने के लिए कतार में अपना नंबर आने का इंतजार करते हैं।


इसके उलट हम अपने सरकारी दफ्तरों या कारखानों की हालत देख लें ! जहां ज्यादातर लोग समय काटने और रौब जमाने जाते हैं ! सारा ध्यान मिलने वाली पगार पर ही रहता है ! वहाँ की तो छोड़ें अपने घरों की और भी एक निगाह डालें तो निराशा ही हाथ लगती है ! अधिकतर घरों में सफाई और बेतरतीबी को व्यस्थित करने की जिम्मेदारी काम पर आने वाले/वाली सहायिका पर ही डाल दी गई होती है ! जैसे घर आपका नहीं उसका हो ! जहां-तहां कबाड़ पसरा रहने देते हैं ! यही संस्कार बच्चों में भी स्थांतरित होते चले जाते हैं ! फलत हर काम के लिए इधर हम दूसरों का और उधर कूड़े के पहाड़ आकाश का मुंह जोहने लगते हैं ! 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

अहमदाबाद ! गहराती रात, अनजान सहायक

साबरमती आश्रम में हमारे साथ मेहमानों की तरह व्यवहार किया गया ! उस कमरे को भी खोल कर दिखाया और बताया गया जहां बापू देश और विदेश के नेताओं से मिलते थे और मंत्रणा करते थे ! वहीं उनके द्वारा उपयोग में लाई गईं वस्तुएं और चरखा भी रखा हुआ था ! साबरमती आश्रम अपने आप में एक सुंदर और दर्शनीय स्थल तो है ही वहां के लोगों के व्यवहार ने उसे और ख़ास बना दिया हम सब के लिए...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी पिछले दिनों अपनी संस्था R&SCB के सौजन्य से गुजरात यात्रा का सुयोग मिला था। यात्रा के मुख्य पड़ावों और एक-एक दर्शनीय स्थल के बारे में तो विस्तार से लिखूंगा ही, पर यात्रा के दौरान एक रात जो एक सुखद, संवेदनशील, आपबीती घटी, उसका विवरण सबसे पहले साझा करना चाहता हूँ !

वर्षों से मन में जमी बैठी, गुजरात भ्रमण की ईप्सा, को अब जा कर दिसंबर 22 में पूरा होने का सुयोग मिल रहा था ! संस्था के अनुभवी अग्रजों द्वारा विस्तार से यात्रा के हर पहलू, उसकी रूप-रेखा, उसके हर कोण को चाक-चौबंद करने के बाद दिसंबर की 13 तारीख को रवानगी तय की गई ! रोमांच अपनी पराकाष्ठा पर था ! तभी जाने के चार-पांच दिन पहले, बदलते मौसम और विभिन्न कारणों से शरीर ने असहयोग कर दिया ! पर सारी तैयारियां हो चुकी थीं ! हवाई टिकट और नौ दिनों के अलग-अलग होटलों में व्यक्तिगत नामों से बुकिंग हो चुकी थी ! वैसे भी जाना तो था ही.....!

दवा वगैरह और आराम के जरिए हालत सामान्य होती सी लग तो रही थी पर भीतर ही भीतर कुछ खेल चल भी रहा था ! खैर चार-पांच दिन निकल गए ! द्वारका, सोमनाथ जैसे दिव्य स्थानों के ''ओरा'', उनकी सकारात्मक ऊर्जा, उनकी भव्यता ने शारीरिक कष्ट को कहीं पीछे छोड़ दिया था ! पर कुछ थका देने वाली यात्रा, गर्म मौसम तथा रोज-रोज के बदलते खान-पान ने असर दिखाना शुरू कर दिया था ! पांचवें दिन भाई सारस्वत जी की तबियत ने बिगड़ने के आसार दिखाए ! इसके बाद इन सब का असर मल्लिक जी की सेहत पर पड़ा और छठवें दिन मैं खुद सर दर्द-खांसी और गले की जकड़न के चपेट में आ गया ! कुछ और सदस्यों को भी गले की तकलीफ से दो-चार होना पड़ रहा था ! 

साबरमती रिवरफ्रंट 

सारे ब्योरे का विवरण इसलिए जरुरी था जिससे आगे होने वाले अनुभव और उसके पूरे असर की बानगी मिल सके ! अहमदाबाद की रात ! रात के भोजन के बाद सारस्वत जी, ठीक नहीं लगने के कारण होटल के रिसेप्शन पर अपनी जरुरत की दवाएं मंगवाने का कह, मुझे भी वैसा करने की सलाह दे, अपने कमरे में चले गए ! पहले तो मैंने भी वही रास्ता अपनाने की सोची पर फिर पता नहीं कैसे विचार बदल गया ! मेरे साथ विपिन जी थे मैंने उनसे पूछा कि क्या टहलते हुए दवा वगैरह ले आई जाए ! वे तुरंत तैयार हो गए ! होटल के स्टाफ के दिशा निर्देश के अनुसार करीब पौन किमी चलने के बावजूद किसी भी तरह की कोई दूकान नज़र नहीं आई ! हम लौटने का सोच ही रहे थे कि नीम अँधेरे में एक जगह दो-तीन लोग बैठे बातें करते दिखे ! कम रौशनी में उनके चेहरे भी साफ़ नजर नहीं आ रहे थे ! विपिन जी ने आगे बढ़ कर दवा की दूकान की जानकारी ली ! उन्होंने करीब और आधा किमी आगे दूकान होने की बात कही ! साथ में यह भी कहा कि आज रविवार है, हो सकता है कि दवा की दूकान बंद हो ! हम दोनों होटल से कुछ दूर तक आ गए थे ! रात गहरा रहे थी ! सड़कें भी जनशून्य थीं ! हमने वापस लौटना ही ठीक समझा ! यहीं घटनाक्रम में एक ट्विस्ट आया !

साबरमती आश्रम 

उन तीनों ने आपस में कुछ बात की और उनमें से एक युवक ने अपनी स्कूटी निकाली और कहा, जिन्हें दवा की जरुरत हो मेरे साथ चलें और दूसरे अंकल यहीं बैठ कर इंतजार करें ! विपिन जी वहाँ बैठ गए और वह युवक मुझे साथ ले दवा की खोज में निकल पड़ा ! उसने कहा कि रविवार को ज्यादातर दवाओं की दुकानें बंद रहती हैं, इसलिए हम किसी हॉस्पिटल की तरफ चलते हैं, जहां के मेडिकल स्टोर सदा खुले रहते हैं ! मैं क्या कहता ! खैर जब करीब दो-अढ़ाई किमी चल कर गंतव्य तक पहुंचे तो वहाँ की दूकान भी बंद मिली ! युवक बोला, अंकल नई जगह है, रात है, अनजान लोग हैं, पर घबड़ाइएगा नहीं ! आपको दवा जरूर दिलवाऊंगा ! मैंने कहा कि मैं घबड़ा नहीं रहा हूँ मुझे झिझक इस बात की हो रही है कि आपका टाइम खोटी हो रहा है ! उसकी कोई परवाह नहीं, उसने कहा ! खैर और चार-पांच मिनट के बाद एक दुकान दिखी, दवा ली गई ! वहीं उसने बताया कि जिस सज्जन ने उसे भेजा है उनके परदादा गांधी जी के साथ चरखे पर सूत काता करते थे और कल जब आप साबरमती आश्रम जाओगे तो वहां की गाइड लता जी को उनका नाम बताइएगा, तो जो कमरा सिर्फ वीआईपी के लिए खुलता है वह भी आप लोगों के लिए खोल दिया जाएगा ! लौटते समय युवक ने, जिसका नाम जिग्नेश था, मुझे  यह कह कर होटल उतारा कि आपको बेकार फिर पैदल चल कर आना पडेगा, आप यहां उतर जाइए मैं दूसरे अंकल को ले कर आता हूँ ! फिर वह विपिन जी को छोड़ कर गया ! हम पूरी तरह अभिभूत थे, कैसे उसका धन्यवाद करें समझ ही नहीं पा रहे थे ! 


गांधीजी का मंत्रणा कक्ष 

दवाई की दूकान आगे है, इतना कह कर वह अपना पल्लू झाड़ सकता था ! क्या था जो अनजाने लोगों के लिए कोई अपना समय दे रहा था ! क्या था जो बिना किसी अपेक्षा के कोई अनजान लोगों की जरुरत पूरी करने पर उतारू था ! क्या था जो कोई दूसरे की तकलीफ को अपनी समझ उसको दूर करने की सोच रहा था ! यही इंसानियत है ! यही मानवता है ! यही हमारी संस्कृति है ! यही हमारे संस्कार हैं ! यही वह सोच है कि सारी वसुंधरा ही हमारा परिवार है !

उन सज्जन के प्रभाव के कारण दूसरे दिन साबरमती आश्रम में हमारे साथ मेहमानों की तरह का व्यवहार किया गया ! उस कमरे को भी खोल कर दिखाया और बताया गया जहां बापू देश और विदेश के नेताओं से मिलते थे और मंत्रणा करते थे ! वहीं उनके द्वारा उपयोग में लाइ गईं वस्तुएं और चरखा भी रखा हुआ था ! साबरमती आश्रम अपने आप में एक सुंदर और दर्शनीय स्थल तो है ही वहां के लोगों के व्यवहार ने उसे और ख़ास बना दिया हम सब के लिए !

@आभार जिग्नेश जी ! आभार गुजरात !

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

कहीं बहुत देर ना हो जाए

अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की ऐसी कुशाग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है..................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्तमान ! हारी-बिमारी को छोड़ दें, वह तो अल्प कालीन है ! उसके अलावा समय बड़ा कठिन या कहें तो अराजक चल रहा है ! हर जगह असंतोष, दिशा हीनता, अज्ञानता, लिप्सा, अमानवीयता का बोलबाला होता चला जा रहा है ! चली आ रही मान्यताओं, परंपराओं, आस्थाओं को बिना उनकी उपयोगिता समझे-जाने दर किनार किया जा रहा है ! विज्ञों, चिंतकों, विद्वानों को देश के भविष्य की चिंता सताने लगी है ! वर्षों पहले की छेड़-छाड़ के बीजारोपण का असर अब सामने आने लगा है !  

संस्कार ! इसका मतलब हैशरीर, मन और मस्तिष्क की शुद्धि और उनको मजबूत करना ! जिससे मनुष्य  संसार में अपनी भूमिका आदर्श रूप मे निभा सके। हमारे देश-समाज में संस्कार का बहुत महत्व हुआ करता था ! संस्कार सिर्फ धार्मिक कृत्य ही नहीं होते थे ! इनमें वह सब कुछ समाहित होता था जो मनुष्य को मानव बना, उससे सारे संसार के कल्याण की कामना करवाता था ! पीढ़ी दर पीढ़ी ये परिवारों में धरोहर की तरह आगे बढ़ते-बढ़ाए जाते रहते थे ! घर के बड़ों-बुजुर्गों द्वारा बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई के अलावा इनसे भी परिचित करवाया जाता रहा था ! जहां कहीं मौज-मस्ती के कारण कुछ लोगों ने गलत आचरण किया, उसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना भी पड़ा ! जैसा कि एक प्रदेश के नशे की चपेट में बर्बाद होने का उदाहरण हम सबके सामने है ! हालांकि सभी लोग बुरे नहीं होते पर एक मछली या खटाई की एक बूँद सारे पानी या दुध को नष्ट कर धर देती है !

फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी का नाम घर-घर लिया जाने लगा ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी से अलग हो गए, पता ही नहीं चला

बाजार ! बच्चे तो, प्रतिमा बनाई जाने वाली मिट्टी की तरह होते हैं ! उन्हें जैसा ''मोल्ड'' यानी ढाला जाएगा, वे वैसे ही बन जाएंगे ! आज जब एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है तो बच्चों को सही रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी तो उनके अभिभावकों यानी उनके माता-पिता की ही बनती है ! पर यदि घर वाले अपने कार्यभार के कारण उन्हें सही ढंग से मोल्ड नहीं करेंगे तो बच्चे आसानी से बाहरी ताकतों यानी बाजार का शिकार बन विकृत रूप में ढल जाएंगे और विडंबना यही है कि ज्यादातर ऐसा ही हो रहा है ! शोध और खोज खबर के नतीजे बता रहे हैं कि कुछ समय पहले तक बाजार और उसका व्यापार 90% महिलाओं का आश्रित था ! पर आज बच्चों के सहारे उनकी 50% की आमदनी होने लगी है ! टीवी पर आने वाले विज्ञापन इस बात की पुष्टि कर ही रहे हैं ! बाजार ने अपने मतलब के लिए महिलाओं को प्रदर्शन की "चीज" और फल से होते हुए ऋषि (अ से अनार, ऋ से ऋषि) तक जाने वाले मासूमों को फल से  होते हुए जानवर (A for Apple से Z for Zebra) तक पहुंचा कर उन्हें अपना खिलौना बना डाला है ! यदि परिवार से सही मार्गदर्शन नहीं मिला तो बाजार तो बैठा ही है, उन्हें अमानुष बनाने हेतु ! 

विडंबना ! यदि बच्चों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिला और वे बाजार के हत्थे चढ़ गए तो हमारा-समाज का भविष्य और भी भयावह रूप ले लेगा ! पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बच्चों को संस्कार देगा कौन ? टूटते, मैं-तुम-हमारे तक सिमटते हुए परिवारों के ज्यादातर सदस्य पहले ही बाजार के षड्यंत्रों का शिकार हो उसी की बोली बोलने लगे हैं ! अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की इस कुशग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है ! अब इस पर आगे क्या कहा जाए ! यह तो मात्र एक झलक है, हमारी तथाकथित मॉडर्न पीढ़ी की !  

पराभव ! कुछ सालों पहले तक ज्यादातर घरों में बच्चों को दो-तीन श्लोक रटवाने की प्रथा सी थी ! दादी-नानी द्वारा जाने-अनजाने वीरों, शहीदों, नायकों की कथा-कहानी सुना बच्चों को सद्गुणी बनाने का उपक्रम होता रहता था ! फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी ने घर-घर में प्रवेश कर लिया ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने मासूम खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी जैसे साथियों से अलग हो गए, पता ही नहीं चला ! इन सब के साथ ही हमारे संस्कार भी तिरोहित होते चले गए !  

आशा ! पर कहते हैं ना कि कभी भी हताश-निराश नहीं होना चाहिए ! हर चीज का अंत निश्चित है ! जब अच्छा दौर नहीं रहा तो बुरा कैसे रह पाएगा ! घोर अँधेरी रात के बाद ही भोर की लालिमा उभरती है ! हमें बिना निराश हुए उसी का इंतजार करना है। हाँ ! इस अँधेरे के छटने तक अपना हौसला और विश्वास बनाए रखने के लिए हमें अपने स्तर पर हर संभव प्रयास भी करते रहना है !  

शनिवार, 23 जनवरी 2021

शारीरिक शक्ति दौड़ में विजयी बनाती है, पर अनुभव सिखाता है कि कैसे दौड़ना है

सोशल मीडिया पर तो इसकी भरमार दिखती है, आज हमारे बेटे ने यह किया ! आज तो बेटू ने कमाल ही कर दिया ! मैं जो आज तक नहीं कर पाया, बेटेराम ने चुटकियों में कर डाला ! इस बात में दादियां, माएं, बुआएं भी पीछे नहीं हैं, उनकी बातों में ज्यादातर मोबाइल फोन का जिक्र रहता है कि हमें तो कुछ नहीं पता हम तो छुटकू के सहारे ही हैं ! बच्चों को खुश करने के लिए कही गई ऐसी सब बातों को सच मान बच्चा अपने को तीसमारखां समझने लगता है ! उसके मन में यह बातें गहरे तक पैठ जाती हैं कि बड़ों को कुछ नहीं आता ! उन्हें कुछ नहीं पता ! मैं ज्यादा बुद्धिमान हूँ..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी देश में एजिज्म यानी बुजुर्गों के प्रति बढ़ती युवाओं की असहिष्णुता, चर्चा का विषय बनी हुई है। उन्हें कमतर आंकना ! आधुनिक तकनीक के साथ जल्द सामंजस्य ना बैठा पाने के कारण मंदबुद्धि समझना ! शारीरिक अक्षमता के कारण कुछ कर ना पाना ! हारी-बिमारी पर होने वाले खर्च से आर्थिक बोझ बढ़ने से होने वाली परेशानियों को इसका कारण माना जा सकता है।   

इसके अलावा उम्रदराज लोगों को हेय समझने का एक और कारण संतति मोह भी लगता है। बच्चे सभी को प्यारे होते हैं। पर कुछ लोग उनके लाड-दुलार में अति कर जाते हैं। हम में से बहुतों की आदत होती है कि अपने बच्चों की उलटी-सीधी, सही-गलत, छोटी-बड़ी हर बात को सार्वजनिक तौर पर बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर उसे अनोखा सिद्ध करने की ! सोशल मीडिया पर तो इसकी भरमार दिखती है। जिसे देखो वह अपने नौनिहालों के लिए कसीदे गढ़ रहा होता है, आज हमारे बेटे ने यह किया ! आज तो बेटू ने कमाल ही कर दिया ! मैं जो आज तक नहीं कर पाया, बेटेराम ने चुटकियों में कर डाला ! इस बात में दादीयां, माएं, बुआएं भी पीछे नहीं हैं, बलाएँ लेने में ! उनकी बातों में ज्यादातर मोबाइल फोन का जिक्र रहता है कि हमें तो कुछ नहीं पता हम तो छुटकू के सहारे ही हैं: इत्यादि,इत्यादि !

बच्चों को खुश करने के लिए कही गई ऐसी सब बातों को सच मान बच्चा अपने को तीसमारखां समझने लगता है ! उसके मन में यह बातें गहरे तक पैठ जाती हैं कि बड़ों को कुछ नहीं आता ! उन्हें कुछ नहीं पता ! मैं ज्यादा बुद्धिमान हूँ ! धीरे-धीरे यह बात अहम् में बदल जाती है और फिर वह सार्वजनिक तौर पर भी बड़ों का मजाक बनाना शुरू कर देता है कि तुम तो रहने ही दो ! तुम्हारे बस का नहीं है यह सब !! तब अभिभावक खिसियानी हंसी के अलावा और कुछ पेश नहीं कर सकता ! हो सकता है बड़े-बूढ़ों के प्रति यही नकारात्मक सोच आगे चल एजिज्म का कारण बन जाती हो।

ठीक है, आज बच्चे ज्यादा काबिल हैं ! पर इसका एक कारण उनको मिलने वाली सुविधाएं भी तो हैं। यदि 40-50 साल पहले कम्प्यूटर और मोबाईल आ गए होते तो क्या आज के बुजुर्ग उनसे कोई असुविधा महसूस करते ? अरे भई, जब कोई चीज किसी के पास हो ही नहीं तो उससे सहज होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है ! अब दूर-दूर तक नदी-तालाब-सागर नहीं है तो मैं तैरना कहां सीखूंगा ! हवाई जहाज है ही नहीं मेरे पास तो उड़ाना कैसे सीखूंगा ! पर एजिज्म जैसी प्रवृत्ति का बड़ा कारण है, बेरोजगारी !   

समय बेहद बदल चुका है ! अब यह चल नहीं, भाग रहा है। आपाधापी मची हुई है ! बेहतर जीवन शैली और चिकित्सा से औसत आयु दर ऊँची हो गई है। जिससे आबादी बेलगाम बढ़ती जा रही है ! नौकरियां, काम-काज कम होते जा रहे हैं ! गला-काट प्रतिस्पर्द्धाएं चल निकली हैं ! परिवार टूटते चले जा रहे हैं ! इन सबके चलते इंसान तनाव ग्रस्त, असहिष्णु, आक्रोषित तथा परेशान रहने लगा है। उसे हर दूसरा आदमी अपना प्रतिद्वंदी नज़र आने लगा है। जाहिर है, ऐसे में अशक्त, लाचार, बीमार बुजुर्ग उसे बोझ लगने लगे हैं।

आज सेवानिवृत या अक्षम हो चुके लोगों का एक अच्छा-ख़ासा प्रतिशत ऐसा है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में अपना दायित्व और फर्ज निभाते हुए अपने परिवार, अपने बच्चों के भविष्य, उनकी बेहतर जीवन वृत्ति के लिए अपनी पूरी जमा-पूँजी होम करने में गुरेज नहीं किया। कभी अपने लिए बचत का नहीं सोचा ! क्योंकि वे भूले नहीं थे कि उनके लिए भी कोई ऐसा कर चुका है। संस्कार ही ऐसे होते थे ! उन्हें भी अपने लिए वैसे ही भविष्य की कल्पना रहती थी कि हमारे लिए तो आने वाली पीढ़ी है ही ! पर बहुतेरे ऐसे लोग कहीं ना कहीं आज अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगे हैं ! 

आज समय की मांग है कि जब तक इंसान सक्षम है, उसे कुछ ना कुछ उद्यम करते ही रहना चाहिए ! इससे कई लाभ हैं, एक तो आदमी अपने को लाचार और उपेक्षित नहीं समझेगा ! दूसरे कुछ ना कुछ आर्थिक सहयोग दे सकेगा परिवार को ! तीसरे शारीरिक और मानसिक रूप से भी स्वस्थ व सक्षम रहेगा !इसके अलावा युवाओं के जोश और बुजुर्गों के अनुभव में सामंजस्य की आवश्यकता है। दोनों को ही एक दूसरे की जरुरत है। शारीरिक शक्ति दौड़ में विजयी जरूर बनाती है पर अनुभव ही सिखाता है कि किधर, कैसे और कितना दौड़ना है ! 

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