शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

कहीं बहुत देर ना हो जाए

अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की ऐसी कुशाग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है..................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्तमान ! हारी-बिमारी को छोड़ दें, वह तो अल्प कालीन है ! उसके अलावा समय बड़ा कठिन या कहें तो अराजक चल रहा है ! हर जगह असंतोष, दिशा हीनता, अज्ञानता, लिप्सा, अमानवीयता का बोलबाला होता चला जा रहा है ! चली आ रही मान्यताओं, परंपराओं, आस्थाओं को बिना उनकी उपयोगिता समझे-जाने दर किनार किया जा रहा है ! विज्ञों, चिंतकों, विद्वानों को देश के भविष्य की चिंता सताने लगी है ! वर्षों पहले की छेड़-छाड़ के बीजारोपण का असर अब सामने आने लगा है !  

संस्कार ! इसका मतलब हैशरीर, मन और मस्तिष्क की शुद्धि और उनको मजबूत करना ! जिससे मनुष्य  संसार में अपनी भूमिका आदर्श रूप मे निभा सके। हमारे देश-समाज में संस्कार का बहुत महत्व हुआ करता था ! संस्कार सिर्फ धार्मिक कृत्य ही नहीं होते थे ! इनमें वह सब कुछ समाहित होता था जो मनुष्य को मानव बना, उससे सारे संसार के कल्याण की कामना करवाता था ! पीढ़ी दर पीढ़ी ये परिवारों में धरोहर की तरह आगे बढ़ते-बढ़ाए जाते रहते थे ! घर के बड़ों-बुजुर्गों द्वारा बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई के अलावा इनसे भी परिचित करवाया जाता रहा था ! जहां कहीं मौज-मस्ती के कारण कुछ लोगों ने गलत आचरण किया, उसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना भी पड़ा ! जैसा कि एक प्रदेश के नशे की चपेट में बर्बाद होने का उदाहरण हम सबके सामने है ! हालांकि सभी लोग बुरे नहीं होते पर एक मछली या खटाई की एक बूँद सारे पानी या दुध को नष्ट कर धर देती है !

फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी का नाम घर-घर लिया जाने लगा ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी से अलग हो गए, पता ही नहीं चला

बाजार ! बच्चे तो, प्रतिमा बनाई जाने वाली मिट्टी की तरह होते हैं ! उन्हें जैसा ''मोल्ड'' यानी ढाला जाएगा, वे वैसे ही बन जाएंगे ! आज जब एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है तो बच्चों को सही रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी तो उनके अभिभावकों यानी उनके माता-पिता की ही बनती है ! पर यदि घर वाले अपने कार्यभार के कारण उन्हें सही ढंग से मोल्ड नहीं करेंगे तो बच्चे आसानी से बाहरी ताकतों यानी बाजार का शिकार बन विकृत रूप में ढल जाएंगे और विडंबना यही है कि ज्यादातर ऐसा ही हो रहा है ! शोध और खोज खबर के नतीजे बता रहे हैं कि कुछ समय पहले तक बाजार और उसका व्यापार 90% महिलाओं का आश्रित था ! पर आज बच्चों के सहारे उनकी 50% की आमदनी होने लगी है ! टीवी पर आने वाले विज्ञापन इस बात की पुष्टि कर ही रहे हैं ! बाजार ने अपने मतलब के लिए महिलाओं को प्रदर्शन की "चीज" और फल से होते हुए ऋषि (अ से अनार, ऋ से ऋषि) तक जाने वाले मासूमों को फल से  होते हुए जानवर (A for Apple से Z for Zebra) तक पहुंचा कर उन्हें अपना खिलौना बना डाला है ! यदि परिवार से सही मार्गदर्शन नहीं मिला तो बाजार तो बैठा ही है, उन्हें अमानुष बनाने हेतु ! 

विडंबना ! यदि बच्चों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिला और वे बाजार के हत्थे चढ़ गए तो हमारा-समाज का भविष्य और भी भयावह रूप ले लेगा ! पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बच्चों को संस्कार देगा कौन ? टूटते, मैं-तुम-हमारे तक सिमटते हुए परिवारों के ज्यादातर सदस्य पहले ही बाजार के षड्यंत्रों का शिकार हो उसी की बोली बोलने लगे हैं ! अभी कुछ दिनों से मीडिया पर एक क्लिप दिख रही है जिसमें एक व्यक्ति एक डेढ़-दो साल के बच्चे को गोद में उठाए अलग-अलग शराब की किस्मों का नाम लेता है और वह बच्चा नाम लिए गए लेबल को सामने रखी बीसियों बोतलों में खोज उसकी तरफ इशारा कर सही-सही पहचान बताता जाता है ! इस दौरान उसकी सफलता पर ''गुड ब्वाय'', ''बाव'', "ओये वाह", ''य्ये", ''क्या बात है, क्या बात है" के नारे गुंजायमान होते हैं ! साथ की महिला, जो उसकी ''मॉम" होगी, क्योंकि माँएं शायद अपने मासूम की इस कुशग्रता पर कभी खुश नहीं होंगी, अपने बच्चे की क्षमता पर हँसते-हँसते वारी जा रही है ! अब इस पर आगे क्या कहा जाए ! यह तो मात्र एक झलक है, हमारी तथाकथित मॉडर्न पीढ़ी की !  

पराभव ! कुछ सालों पहले तक ज्यादातर घरों में बच्चों को दो-तीन श्लोक रटवाने की प्रथा सी थी ! दादी-नानी द्वारा जाने-अनजाने वीरों, शहीदों, नायकों की कथा-कहानी सुना बच्चों को सद्गुणी बनाने का उपक्रम होता रहता था ! फिर आहिस्ता से चीनी खा कर बाप से झूठ बोलने वाले जॉनी ने घर-घर में प्रवेश कर लिया ! हम्पटी-डम्पटी के दिवार से गिरने का दुःख बच्चों को सालने लगा ! भेड़ के बच्चे से ऊन का हिसाब मांगते-मांगते हम कब अपने मासूम खरगोश, चूहे, हाथी, बंदर, कबूतर, चींटी जैसे साथियों से अलग हो गए, पता ही नहीं चला ! इन सब के साथ ही हमारे संस्कार भी तिरोहित होते चले गए !  

आशा ! पर कहते हैं ना कि कभी भी हताश-निराश नहीं होना चाहिए ! हर चीज का अंत निश्चित है ! जब अच्छा दौर नहीं रहा तो बुरा कैसे रह पाएगा ! घोर अँधेरी रात के बाद ही भोर की लालिमा उभरती है ! हमें बिना निराश हुए उसी का इंतजार करना है। हाँ ! इस अँधेरे के छटने तक अपना हौसला और विश्वास बनाए रखने के लिए हमें अपने स्तर पर हर संभव प्रयास भी करते रहना है !  

10 टिप्‍पणियां:

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२५-१२ -२०२१) को
'रिश्तों के बन्धन'(चर्चा अंक -४२८९)
पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनीता जी
बहुत-बहुत धन्यवाद, सम्मिलित करने के लिए

Manisha Goswami ने कहा…

हमें बिना निराश हुए उसी का इंतजार करना है। हाँ ! इस अँधेरे के छटने तक अपना हौसला और विश्वास बनाए रखने के लिए हमें अपने स्तर पर हर संभव प्रयास भी करते रहना है !
बिल्कुल सही कहा आपने सर
हमें इस मानसिकता को त्यागना होगा कि हटाओ हम से क्या मतलब कौन सा हमारा कोई अपना बिगड़ रहा है! बल्कि
हमें हर संभव प्रयास करना होगा तभी यह आशा की ज्योति जलती रहेगी और प्रकाश होगा अंधेरा छटेगा! तभी एक अच्छे समाज का निर्माण होगा और एक अच्छे व प्रगतिशील समाज से एक प्रगतिशील (बुराइयों से मुक्त) सुखी और स्वस्थ्य राष्ट्र का निर्माण होगा!
लेकिन हाथ हाथ धरे सिर्फ इंतजार ही करते रहे और सोचे सही वक्त आने पर सब सुधर जाएगा तो यह मूर्खता होगी!
इस लिए हर संभव प्रयास करना ही होगा!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जी! मनीषा जी
और दूसरों से अपेक्षा की बजाय शुरूआत खुद व घर से ही हो ताकि सनद और मिसाल दोनों रह सकें!

Sudha Devrani ने कहा…

सच में सही कहा आपने यही डर है कि कहीं देर ना हो जाय...पाश्चात्य संस्कृति का ऐसा बोलबाला फैला है कि बड़े प्रभावित हैं और बुजुर्ग मौन...ऐसे में कौन दिशा दें समाज को..
बहुत सुन्दर एवं विचारणीय लेख।

मन की वीणा ने कहा…

बदलते परिवेश को आधार बनाकर आनेवाली भयावहता का आपने सटीक खाका खींचा है आपने गगन जी।
सचमुच मन सिहर उठता है आगे की पीढ़ियों के बारे में सोच कर न जाने हमारी भावी पीढ़ी को हम किस भावना के आधीन अंधे कूप में धकेल रहे हैं।
ऐसी सार्थक पोस्ट डालते रहें और ऐसी जगह भेजें जहां ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ सकें।
शायद हमारा नैतिक पतन कुछ रुक जाये।
बहुत बहुत बहुत उपयोगी,सटीक।

Bharti Das ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुधा जी
हार्दिक आभार ! आशा है अब पूर्णतया स्वस्थ होंगी।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कुसुम जी
कभी-कभी तो आस-पास ऐसा होता देख बहुत चिंता होने लगती है ! फिर लगता है कि सिर्फ सोचने से कुछ नहीं होगा ! आवाज तो उठनी चाहिए ही....

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

भारती जी
''कुछ अलग सा'' पर आपका सदा स्वागत है

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