pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: एजिज्म
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शनिवार, 23 जनवरी 2021

शारीरिक शक्ति दौड़ में विजयी बनाती है, पर अनुभव सिखाता है कि कैसे दौड़ना है

सोशल मीडिया पर तो इसकी भरमार दिखती है, आज हमारे बेटे ने यह किया ! आज तो बेटू ने कमाल ही कर दिया ! मैं जो आज तक नहीं कर पाया, बेटेराम ने चुटकियों में कर डाला ! इस बात में दादियां, माएं, बुआएं भी पीछे नहीं हैं, उनकी बातों में ज्यादातर मोबाइल फोन का जिक्र रहता है कि हमें तो कुछ नहीं पता हम तो छुटकू के सहारे ही हैं ! बच्चों को खुश करने के लिए कही गई ऐसी सब बातों को सच मान बच्चा अपने को तीसमारखां समझने लगता है ! उसके मन में यह बातें गहरे तक पैठ जाती हैं कि बड़ों को कुछ नहीं आता ! उन्हें कुछ नहीं पता ! मैं ज्यादा बुद्धिमान हूँ..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी देश में एजिज्म यानी बुजुर्गों के प्रति बढ़ती युवाओं की असहिष्णुता, चर्चा का विषय बनी हुई है। उन्हें कमतर आंकना ! आधुनिक तकनीक के साथ जल्द सामंजस्य ना बैठा पाने के कारण मंदबुद्धि समझना ! शारीरिक अक्षमता के कारण कुछ कर ना पाना ! हारी-बिमारी पर होने वाले खर्च से आर्थिक बोझ बढ़ने से होने वाली परेशानियों को इसका कारण माना जा सकता है।   

इसके अलावा उम्रदराज लोगों को हेय समझने का एक और कारण संतति मोह भी लगता है। बच्चे सभी को प्यारे होते हैं। पर कुछ लोग उनके लाड-दुलार में अति कर जाते हैं। हम में से बहुतों की आदत होती है कि अपने बच्चों की उलटी-सीधी, सही-गलत, छोटी-बड़ी हर बात को सार्वजनिक तौर पर बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर उसे अनोखा सिद्ध करने की ! सोशल मीडिया पर तो इसकी भरमार दिखती है। जिसे देखो वह अपने नौनिहालों के लिए कसीदे गढ़ रहा होता है, आज हमारे बेटे ने यह किया ! आज तो बेटू ने कमाल ही कर दिया ! मैं जो आज तक नहीं कर पाया, बेटेराम ने चुटकियों में कर डाला ! इस बात में दादीयां, माएं, बुआएं भी पीछे नहीं हैं, बलाएँ लेने में ! उनकी बातों में ज्यादातर मोबाइल फोन का जिक्र रहता है कि हमें तो कुछ नहीं पता हम तो छुटकू के सहारे ही हैं: इत्यादि,इत्यादि !

बच्चों को खुश करने के लिए कही गई ऐसी सब बातों को सच मान बच्चा अपने को तीसमारखां समझने लगता है ! उसके मन में यह बातें गहरे तक पैठ जाती हैं कि बड़ों को कुछ नहीं आता ! उन्हें कुछ नहीं पता ! मैं ज्यादा बुद्धिमान हूँ ! धीरे-धीरे यह बात अहम् में बदल जाती है और फिर वह सार्वजनिक तौर पर भी बड़ों का मजाक बनाना शुरू कर देता है कि तुम तो रहने ही दो ! तुम्हारे बस का नहीं है यह सब !! तब अभिभावक खिसियानी हंसी के अलावा और कुछ पेश नहीं कर सकता ! हो सकता है बड़े-बूढ़ों के प्रति यही नकारात्मक सोच आगे चल एजिज्म का कारण बन जाती हो।

ठीक है, आज बच्चे ज्यादा काबिल हैं ! पर इसका एक कारण उनको मिलने वाली सुविधाएं भी तो हैं। यदि 40-50 साल पहले कम्प्यूटर और मोबाईल आ गए होते तो क्या आज के बुजुर्ग उनसे कोई असुविधा महसूस करते ? अरे भई, जब कोई चीज किसी के पास हो ही नहीं तो उससे सहज होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है ! अब दूर-दूर तक नदी-तालाब-सागर नहीं है तो मैं तैरना कहां सीखूंगा ! हवाई जहाज है ही नहीं मेरे पास तो उड़ाना कैसे सीखूंगा ! पर एजिज्म जैसी प्रवृत्ति का बड़ा कारण है, बेरोजगारी !   

समय बेहद बदल चुका है ! अब यह चल नहीं, भाग रहा है। आपाधापी मची हुई है ! बेहतर जीवन शैली और चिकित्सा से औसत आयु दर ऊँची हो गई है। जिससे आबादी बेलगाम बढ़ती जा रही है ! नौकरियां, काम-काज कम होते जा रहे हैं ! गला-काट प्रतिस्पर्द्धाएं चल निकली हैं ! परिवार टूटते चले जा रहे हैं ! इन सबके चलते इंसान तनाव ग्रस्त, असहिष्णु, आक्रोषित तथा परेशान रहने लगा है। उसे हर दूसरा आदमी अपना प्रतिद्वंदी नज़र आने लगा है। जाहिर है, ऐसे में अशक्त, लाचार, बीमार बुजुर्ग उसे बोझ लगने लगे हैं।

आज सेवानिवृत या अक्षम हो चुके लोगों का एक अच्छा-ख़ासा प्रतिशत ऐसा है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में अपना दायित्व और फर्ज निभाते हुए अपने परिवार, अपने बच्चों के भविष्य, उनकी बेहतर जीवन वृत्ति के लिए अपनी पूरी जमा-पूँजी होम करने में गुरेज नहीं किया। कभी अपने लिए बचत का नहीं सोचा ! क्योंकि वे भूले नहीं थे कि उनके लिए भी कोई ऐसा कर चुका है। संस्कार ही ऐसे होते थे ! उन्हें भी अपने लिए वैसे ही भविष्य की कल्पना रहती थी कि हमारे लिए तो आने वाली पीढ़ी है ही ! पर बहुतेरे ऐसे लोग कहीं ना कहीं आज अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगे हैं ! 

आज समय की मांग है कि जब तक इंसान सक्षम है, उसे कुछ ना कुछ उद्यम करते ही रहना चाहिए ! इससे कई लाभ हैं, एक तो आदमी अपने को लाचार और उपेक्षित नहीं समझेगा ! दूसरे कुछ ना कुछ आर्थिक सहयोग दे सकेगा परिवार को ! तीसरे शारीरिक और मानसिक रूप से भी स्वस्थ व सक्षम रहेगा !इसके अलावा युवाओं के जोश और बुजुर्गों के अनुभव में सामंजस्य की आवश्यकता है। दोनों को ही एक दूसरे की जरुरत है। शारीरिक शक्ति दौड़ में विजयी जरूर बनाती है पर अनुभव ही सिखाता है कि किधर, कैसे और कितना दौड़ना है ! 

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

चिंता का विषय बनता, ''एजिज्म'' (ageism)

युवा पीढ़ी यदि अपने कर्मों से तत्काल फल दे सकती है तो बुजुर्ग अपने अनुभवों की छाया से उन्हें लाभान्वित कर सकते हैं। इसलिए जरुरी है कि इस प्रवृति से बचा जाए। क्योंकि कठिन समय, संकट और मुश्किलात में बुजुर्गों की नसीहत, उनकी बुद्धिमत्ता और उनके अनुभव ही काम आते हैं। शायद ऐसी ही स्थिति के लिए के बालगंगाधर तिलक जी ने कहा था कि "तुम्हें कब क्या करना है, यह बताना बुद्धि का काम है, पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है ''..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

''एजिज्म'' यानी आयुवाद या बुजुर्गों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता, वृद्धों के प्रति अनुचित व्यवहार ! उनके रहन-सहन, चलने-फिरने, बातचीत करने का मजाक उड़ाना, एजिज्म कहलाता है ! उम्रदराज लोगों को बेकार मानना, यह सोचना कि घूमना, फिरना, शॉपिंग, प्यार, मोहब्बत और नए नए शौक रखना यह सब उनके लिए नहीं हैं ! यानी उम्र की वजह से भेदभाव करना एजिज्म के अंतर्गत आता है ! विश्व में पहले से ही पांव पसार चुकी यह धारणा, भावना या प्रवृत्ति अब धीरे-धीरे हमारे समाज में भी पैठती जा रही है ! वृद्ध लोगों को मुर्ख, व्यर्थ और मन के जड़त्व का पर्याय ठहरा दिया गया है ! युवा लोग काफी गंभीरता से मानने लगे हैं कि एक निश्चित समय के बाद स्मार्ट, पारंगत, सफल व सुंदर होना असंभव होता है ! 

दरअसल नई जीवनशैली और नए मूल्य बूढ़ों को समाज में कोई जगह नहीं देते ! बल्कि उन्हें उनकी जगह से भी विस्थापित करते हैं। संस्थाओं और कंपनियों को लगता है कि उम्रदराज लोग आज हर क्षेत्र की तकनीकी में तेजी से आते बदलावों के अनुसार ना अपने को ढाल पाएंगे नाहीं जल्दी से उसे अपना पाएंगे !  कुछ हद तक यह सही भी है ! इसीलिए विकास की अबाध गति उन्हें असहाय छोड़ देती है और वे निसहाय से अपने अतीत के गलियारों में डोलने लगते हैं। उनकी तमाम सेवाओं, मेहनत, समर्पण को सिरे से भुला दिया जाता है ! आज का समाज किसी के भी सेवानिवृत्त होते ही, वह चाहे जितना ही साधन संपन्न हो, नकार देता है ! उसकी पूछ कम हो जाती है। 

                                
हमारे देश में संयुक्त परिवार का चलन होने के नाते सदा से ही बुजुर्गों का एक मार्गदर्शक और पारिवारिक मुखिया के रूप में सम्माननीय स्थान रहा है। उनके अनुभवों को अमूल्य समझा जाता था। पर पहले जहां उम्रदराज लोगों को उनके जीवन से अर्जित अनुभवों के लिए सम्मान दिया जाता था ! गुण-दोष, अच्छाई-बुराई, ऊँच-नीच का, वर्षों की परिपक्वता के कारण सटीक विश्लेषण, उन्हें मार्गदर्शक का ओहदा दिलाता था ! वहीं अब परिवारों के विघटन के साथ-साथ धीरे-धीरे स्थितियां भी बदलती सी लग रही हैं। अब उम्रदराज लोग अपनी हारी-बिमारी, इलाज-दवा के खर्च, शारीरिक अशक्तता, बढ़ती उम्र से जुडी अतिरिक्त साज-संभार की जरुरत के चलते एक बोझ सा लगने लगे हैं !

                               

''हेल्पेज इंडिया'' के एक सर्वे में भारत के बुजुर्गों ने अपने साथ होने वाले तिरस्कार, वित्तीय परेशानी के अलावा मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न  जैसे दुर्व्यवहारों की शिकायत की है। सर्वे में शामिल करीब 53 प्रतिशत बुजुर्गों ने बताया कि अस्पताल, बस अड्डों, बसों, बिल भरने और बाजार इत्यादि जगहों में उनके साथ भेदभाव होता है। खासतौर पर अस्पतालों में बुजुर्गों को भेदभाव या बुरे बर्ताव का अधिक सामना करना पड़ता है ! हालांकि अन्य सर्वे के अनुसार भारत में दूसरे देशों के मुकाबले में उम्रदराज लोगों की स्थिति उतनी खराब नहीं है। फिर भी बुजुर्गों के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदलने के लिए बुजुर्गों और युवा पीढ़ी को एक साथ मिल कर और आपस में सहयोग बढ़ाना होगा, जिससे दोनों पीढ़ियों को ही लाभ होगा। युवा पीढ़ी यदि अपने कर्मों से तत्काल फल दे सकती है तो बुजुर्ग अपने अनुभवों की छाया से उन्हें लाभान्वित कर सकते हैं। इसलिए जरुरी है कि इस प्रवृति से बचा जाए। क्योंकि कठिन समय, संकट और मुश्किलात में बुजुर्गों की नसीहत, उनकी बुद्धिमत्ता और उनके अनुभव ही काम आते हैं। शायद ऐसी ही स्थिति के लिए के बालगंगाधर तिलक जी ने कहा था कि "तुम्हें कब क्या करना है, यह बताना बुद्धि का काम है, पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है ।''

वैसे भी इंसान शरीर से भले ही वृद्ध हो जाए, किन्तु दिमाग से उसे अपनी सोच युवा रखनी चाहिए। बढ़ती उम्र से तो बचा नहीं जा सकता पर वार्धक्य को अपने पर हावी होने या उसे ओढ़े जाने से तो बचा जा ही सकता है !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

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