pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: आयुवाद
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गुरुवार, 21 जनवरी 2021

चिंता का विषय बनता, ''एजिज्म'' (ageism)

युवा पीढ़ी यदि अपने कर्मों से तत्काल फल दे सकती है तो बुजुर्ग अपने अनुभवों की छाया से उन्हें लाभान्वित कर सकते हैं। इसलिए जरुरी है कि इस प्रवृति से बचा जाए। क्योंकि कठिन समय, संकट और मुश्किलात में बुजुर्गों की नसीहत, उनकी बुद्धिमत्ता और उनके अनुभव ही काम आते हैं। शायद ऐसी ही स्थिति के लिए के बालगंगाधर तिलक जी ने कहा था कि "तुम्हें कब क्या करना है, यह बताना बुद्धि का काम है, पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है ''..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

''एजिज्म'' यानी आयुवाद या बुजुर्गों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता, वृद्धों के प्रति अनुचित व्यवहार ! उनके रहन-सहन, चलने-फिरने, बातचीत करने का मजाक उड़ाना, एजिज्म कहलाता है ! उम्रदराज लोगों को बेकार मानना, यह सोचना कि घूमना, फिरना, शॉपिंग, प्यार, मोहब्बत और नए नए शौक रखना यह सब उनके लिए नहीं हैं ! यानी उम्र की वजह से भेदभाव करना एजिज्म के अंतर्गत आता है ! विश्व में पहले से ही पांव पसार चुकी यह धारणा, भावना या प्रवृत्ति अब धीरे-धीरे हमारे समाज में भी पैठती जा रही है ! वृद्ध लोगों को मुर्ख, व्यर्थ और मन के जड़त्व का पर्याय ठहरा दिया गया है ! युवा लोग काफी गंभीरता से मानने लगे हैं कि एक निश्चित समय के बाद स्मार्ट, पारंगत, सफल व सुंदर होना असंभव होता है ! 

दरअसल नई जीवनशैली और नए मूल्य बूढ़ों को समाज में कोई जगह नहीं देते ! बल्कि उन्हें उनकी जगह से भी विस्थापित करते हैं। संस्थाओं और कंपनियों को लगता है कि उम्रदराज लोग आज हर क्षेत्र की तकनीकी में तेजी से आते बदलावों के अनुसार ना अपने को ढाल पाएंगे नाहीं जल्दी से उसे अपना पाएंगे !  कुछ हद तक यह सही भी है ! इसीलिए विकास की अबाध गति उन्हें असहाय छोड़ देती है और वे निसहाय से अपने अतीत के गलियारों में डोलने लगते हैं। उनकी तमाम सेवाओं, मेहनत, समर्पण को सिरे से भुला दिया जाता है ! आज का समाज किसी के भी सेवानिवृत्त होते ही, वह चाहे जितना ही साधन संपन्न हो, नकार देता है ! उसकी पूछ कम हो जाती है। 

                                
हमारे देश में संयुक्त परिवार का चलन होने के नाते सदा से ही बुजुर्गों का एक मार्गदर्शक और पारिवारिक मुखिया के रूप में सम्माननीय स्थान रहा है। उनके अनुभवों को अमूल्य समझा जाता था। पर पहले जहां उम्रदराज लोगों को उनके जीवन से अर्जित अनुभवों के लिए सम्मान दिया जाता था ! गुण-दोष, अच्छाई-बुराई, ऊँच-नीच का, वर्षों की परिपक्वता के कारण सटीक विश्लेषण, उन्हें मार्गदर्शक का ओहदा दिलाता था ! वहीं अब परिवारों के विघटन के साथ-साथ धीरे-धीरे स्थितियां भी बदलती सी लग रही हैं। अब उम्रदराज लोग अपनी हारी-बिमारी, इलाज-दवा के खर्च, शारीरिक अशक्तता, बढ़ती उम्र से जुडी अतिरिक्त साज-संभार की जरुरत के चलते एक बोझ सा लगने लगे हैं !

                               

''हेल्पेज इंडिया'' के एक सर्वे में भारत के बुजुर्गों ने अपने साथ होने वाले तिरस्कार, वित्तीय परेशानी के अलावा मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न  जैसे दुर्व्यवहारों की शिकायत की है। सर्वे में शामिल करीब 53 प्रतिशत बुजुर्गों ने बताया कि अस्पताल, बस अड्डों, बसों, बिल भरने और बाजार इत्यादि जगहों में उनके साथ भेदभाव होता है। खासतौर पर अस्पतालों में बुजुर्गों को भेदभाव या बुरे बर्ताव का अधिक सामना करना पड़ता है ! हालांकि अन्य सर्वे के अनुसार भारत में दूसरे देशों के मुकाबले में उम्रदराज लोगों की स्थिति उतनी खराब नहीं है। फिर भी बुजुर्गों के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदलने के लिए बुजुर्गों और युवा पीढ़ी को एक साथ मिल कर और आपस में सहयोग बढ़ाना होगा, जिससे दोनों पीढ़ियों को ही लाभ होगा। युवा पीढ़ी यदि अपने कर्मों से तत्काल फल दे सकती है तो बुजुर्ग अपने अनुभवों की छाया से उन्हें लाभान्वित कर सकते हैं। इसलिए जरुरी है कि इस प्रवृति से बचा जाए। क्योंकि कठिन समय, संकट और मुश्किलात में बुजुर्गों की नसीहत, उनकी बुद्धिमत्ता और उनके अनुभव ही काम आते हैं। शायद ऐसी ही स्थिति के लिए के बालगंगाधर तिलक जी ने कहा था कि "तुम्हें कब क्या करना है, यह बताना बुद्धि का काम है, पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है ।''

वैसे भी इंसान शरीर से भले ही वृद्ध हो जाए, किन्तु दिमाग से उसे अपनी सोच युवा रखनी चाहिए। बढ़ती उम्र से तो बचा नहीं जा सकता पर वार्धक्य को अपने पर हावी होने या उसे ओढ़े जाने से तो बचा जा ही सकता है !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

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