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रविवार, 9 जून 2024

कंगना कांड, विरोध की पराकाष्ठता,

बात उस समय की है जब शांति समझौते पर हस्ताक्षर के लिए राजीव गांधी कोलंबो गए थे ! 30 जुलाई 1987 को उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जा रहा था। तभी एक श्रीलंकाई सैनिक विजिथा रोहन विजेमुनि ने, जो भारत से शांति सेना को लंका भेजे जाने के फैसले से नाराज था, अपनी बंदूक की बट से उन पर हमला कर दिया था। हालांकि राजीव गांधी जी को ज्यादा चोट नहीं लगी, वे बच गए थे ! किसी भारतीय प्रधानमंत्री पर विदेशी धरती पर हुआ यह इकलौता हमला है। पर उस समय भारत की किसी विपक्षी पार्टी ने यह नहीं कहा था कि यह तमिलों का आक्रोश है या उनका कांग्रेस के प्रति गुस्सा है ! राजीव जी के धुर विरोधी भी उनके पक्ष में थे...................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

कंगना कांड की तपिश कम होती नहीं दिख रही ! पक्ष-विपक्ष दोनों लगे हैं हवा देने में ! जाहिर है विपक्ष की नफरत कंगना रूपी महिला से उतनी नहीं है जितनी भाजपा नेत्री कंगना से है ! उसका बड़बोलापन भी इसका एक कारण हो सकता है ! पर बात है उस सुरक्षा कर्मी कुलविंदर कौर की, जो अपनी भावनाओं पर काबू ना पा सकी ! आज वह जाने-अनजाने पूरे देश में नाम और बदनाम दोनों पा गई ! उसके भविष्य को लेकर चिंतित लोगों ने उसके लिए नौकरियों की बौछार कर दी ! उसका स्तुति गान होने लगा ! इसलिए नहीं कि वह एक महिला है बल्कि इसलिए कि वह भाजपा विरोधी है ! खुद महिला होते हुए भी कई महिलाएं तक इसी बात पर खुशी जाहिर कर रही हैं ! यह बात उनके दिमाग में क्यों नहीं आती कि विवेकहीन, कुंठित, पूर्वाग्रही दिमाग, ऐसा किसी के साथ भी कर सकता है ! अभी कुछ दिनों पहले फेबु का एक आत्मश्लाघि तथाकथित बुद्धिजीवी इस बात से खुश था कि IPL क्रिकेट तमाशे में गुजराती अंबानी की टीम हार गई थी और गुजराती पांड्या की भद पिट रही थी ! कहां ले जा रहा है हमें यह व्यक्तिगत विरोध ? क्या होगा ऐसी सोच का ? कब हमारा विरोध इंसान से उठ, जाति, समाज, धर्म, प्रदेश  तक पहुंच गया पता ही नहीं चला...........!

दुखद व शर्मनाक घटना 
इतिहास भी हमें राह नहीं दिखा पाया ! बात उस समय की है जब शांति समझौते पर हस्ताक्षर के लिए राजीव गांधी कोलंबो गए थे ! 30 जुलाई को उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जा रहा था। तभी एक श्रीलंकाई सैनिक विजिथा रोहन विजेमुनि ने, जो सिंहली समुदाय से था और भारत से शांति सेना को लंका भेजे जाने के फैसले से राजीव गांधी से नाराज था, अपनी बंदूक की बट से उन पर हमला कर दिया था। हालांकि राजीव गांधी जी को ज्यादा चोट नहीं लगी, वे बच गए थे ! किसी भारतीय प्रधानमंत्री पर विदेशी धरती पर हुआ यह इकलौता हमला है। यह व्यक्तिगत विरोध की पराकाष्ठता थी ! पर उस समय भारत की किसी विपक्षी पार्टी ने यह नहीं कहा था कि यह तमिलों का आक्रोश है या उनका कांग्रेस के प्रति गुस्सा है ! राजीव जी के धुर विरोधियों ने भी किसी भी तरह की खुशी जाहिर नहीं की थी ! सभी का मत था कि इस बात की जितनी भी निंदा की जाए वह कम है ! यह भी देखने की बात है कि उस समय भी भारत विरोधी शक्तियों ने रोहन विजेमुनि को हीरो नहीं बना दिया था ! तमिलों ने भी उसे पुरस्कृत नहीं कर दिया था ! क्योंकि गलत बात, गलत है, चाहे किसी के भी प्रति या किसी भी परिपेक्ष्य में की गई हो ! रोहन विजेमुनि को वहां की सरकार ने तत्काल गिरफ्त में लिया, उसका कोर्ट मॉर्शल हुआ और उसे छह साल की सख्त सजा मिली ! हालांकि बाद में राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा ने अढ़ाई साल बाद उसे क्षमा दान दे दिया था !

आपके विचार, आपका मत, आपकी धारणा किसी और से मेल नहीं खाती तो इसका मतलब यह तो नहीं कि आप हिंसा का सहारा ले लें ! क्या इस तरह के क्षणिक आवेश की प्रशंसा करना उचित है ? यदि इस बात को शह दी जाती रही तो अराजकता का क्या हाल होगा, सोचा भी नहीं जा सकता ! कल ऐसा ही कोई सिरफिरा विपक्ष के नेता पर हाथ उठा देगा ! किसी दिन कोई सुरक्षाकर्मी किसी बड़े व्यवसाई का अपमान कर देगा ! ऐसा ही रहा तो आम इंसान के साथ कैसा व्यवहार हो सकता है, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है ! सीधे शब्दों में कहें तो उस सुरक्षा कर्मी की इस हरकत पर गहराई से विचार होना चाहिए ! 

आज यह देख कर खेद होता है कि समाज में असहिष्णुता बढ़ती ही जा रही है ! जरा-जरा सी बात पर लोग उत्तेजित, उद्वेलित हो जाते हैं ! ऐसा होना व्यक्ति, परिवार, समाज और देश, किसी के लिए भी हितकर नहीं है ! ठीक है कि सभी की अपनी-अपनी सोच है, अपने-अपने विचार हैं ! अपनी-अपनी परिस्थितियां हैं ! अपने-अपने हित हैं ! पर फिर भी हमारी विचारधारा कुछ भी हो ! हम किसी भी दल नेता, जाति, धर्म को मानते हों ! हमारी मान्यता कुछ भी हो, इसका मतलब यह नहीं कि हम ही सही हैं और जो हमारा विरोधी है वह सिरे से गलत है और गलत है तो वो हमारा शत्रु है ! देश हित में तो ऐसा कदापि, कदापि उचित नहीं है ! नेताओं, सामाजिक संगठनों, धर्म के झंडाबरदारों, हमको-आपको सभी के लिए देश, सिर्फ देश ही प्रथम होना चाहिए !   

रविवार, 1 जनवरी 2023

नीलकंठ धाम, पोयचा, गुजरात

यह विशाल मंदिर और इसका परिसर इतना सुंदर, मनमोहक और आकर्षक है कि इसकी भव्यता को शब्दों में व्यक्त करना बहुत ही कठिन है ! मंदिर का परिसर किसी महल जैसा लगता है। इसकी हर चीज, चाहे वह मूर्तियां हों, चाहे नक्काशी हो, चाहे सजावट हो, चाहे वास्तुशिल्प हो, के के आकर्षण में पर्यटक अचंभित सा अभिभूत हो बंध सा जाता है ! यहां से वापस जाने का मन ही नहीं करता...........!                                                

#हिन्दी_ब्लागिंग 

गुजरात,अपनी परंपरा, संस्कृति तथा धार्मिक स्थलों की वजह से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है ! फिर चाहे वह द्वारका हो, बेट द्वारका हो, सोमनाथ व नागेश्वर ज्योतिर्लिंग हों, प्रभास क्षेत्र हो, अक्षरधाम हो या फिर सरदार सरोवर ! इंसान देखते-देखते थक जाए पर दिव्य, मनोरम, दर्शनीय स्थलों की गिनती पूरी न हो ! ऐसा ही एक अनुपम धार्मिक स्थल है, नीलकंठ धाम !  

विशाल परिसर 


यह आश्चर्यजनक स्थान राजपीपला नर्मदा जिले के नर्मदा नदी के तट पर पोइचा गाँव में स्थित है। जो अहमदाबाद से 170 किमी, वड़ोदरा से 60 किलोमीटर और सरदार सरोवर बाँध, केवड़िया से तक़रीबन 30 किमी की दूरी पर पोयचा नामक गांव में स्थापित है। यह स्वामीनारायण मंदिर लोगों की आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र है। नर्मदा नदी के तट के समीप,  2013 में 105 एकड़ में बने इस भव्य मंदिर का निर्माण स्वामी नारायण गुरुकुल राजकोट की तरफ से करवाया गया है। इसके मुख्यद्वार का अनूठापन, इसकी वास्तुकला, इसके उद्यान, इसकी मूर्तियों की सजीवता, शांत वातावरण, एक-एक पत्थर पर उकेरी गई इसकी कारीगरी पर्यटकों को बाँध कर रख लेती है ! यह अलौकिक स्थान श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों में भी अत्यंत लोकप्रिय है ! इसीलिए यहां आने वाले लोगों का तांता लगा रहता है। 

भव्य व आकर्षक प्रवेशद्वार 



यह विशाल मंदिर और इसका परिसर इतना सुंदर, मनमोहक और आकर्षक है कि उसकी भव्यता को शब्दों में व्यक्त करना बहुत ही कठिन है ! मंदिर का परिसर किसी महल जैसा लगता है। इसकी हर चीज, चाहे वह मूर्तियां हों, चाहे नक्काशी हो, चाहे सजावट हो, चाहे वास्तुशिल्प हो, के आकर्षण में पर्यटक अचंभित सा अभिभूत हो बंध सा जाता है ! यहां से वापस जाने का मन ही नहीं करता ! सबसे बड़ी बात यहां फोटो खींचने की कोई मनाही नहीं है, जिससे पर्यटक यहां की अद्भुत यादें अपने साथ घर भी ले जा सकता है। 





मंदिर परिसर के द्वार के समीप विशाल नटराज की मूर्ति स्थापित है, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है। परिसर में मौजूद सरोवर मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगाता है। सरोवर में भगवान गणेश, शिवलिंग और हनुमान जी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में प्रभु के चौबीस अवतारों के साथ-साथ स्वामी नारायण, शिवलिंग, गणेश जी, हनुमान जी, राधाकृष्ण देव इत्यादि के  32 और छोटे-बड़े मंदिर बने हुए हैं। रोज होने वाली रथ-यात्रा तथा रात का साउंड व लाइट शो अपना अतिरिक्त आकर्षण रखते हैं ! मंदिर में नीचे की ओर बहती नर्मदा नदी में डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ सुबह से ही इकट्ठा हो जाती है। अंधेरा होने पर मंदिर अलग-अलग तरह की लाइट्स से रोशनी में नहा जाता है। जो इस इमारत की खूबसूरती को और भी बढ़ा देती है। 

स्वामी नारायण जी का मंदिर 

सरोवर का निर्मल जल 

मूर्तियों की सजीवता 

स्वामी नारायण रथ 
इसके सहजानंद परिसर में, नीलकंठ हृदय कमल, भारतीय संस्कृति और हिंदू तीर्थयात्रा, विज्ञान नगर, मनोरंजन पार्क, नाव की सवारी, भुल भुलैया इत्यादि का आनंद लिया जा सकता है। इसके खुलने का समय सुबह 11:00 बजे से रात  8:00 बजे तक है। सहजानंद विश्वविद्यालय के 7 भाग हैं। इस सभी भागों में भारतीय संस्कृति और धार्मिक ब्योरों कोआकर्षक ढंग से पेश किया गया है। यदि कभी गुजरात घूमने का सुयोग बने तो कार्यक्रम में नीलकंठ धाम जरूर शामिल होना चाहिए।  

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

अहमदाबाद ! गहराती रात, अनजान सहायक

साबरमती आश्रम में हमारे साथ मेहमानों की तरह व्यवहार किया गया ! उस कमरे को भी खोल कर दिखाया और बताया गया जहां बापू देश और विदेश के नेताओं से मिलते थे और मंत्रणा करते थे ! वहीं उनके द्वारा उपयोग में लाई गईं वस्तुएं और चरखा भी रखा हुआ था ! साबरमती आश्रम अपने आप में एक सुंदर और दर्शनीय स्थल तो है ही वहां के लोगों के व्यवहार ने उसे और ख़ास बना दिया हम सब के लिए...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी पिछले दिनों अपनी संस्था R&SCB के सौजन्य से गुजरात यात्रा का सुयोग मिला था। यात्रा के मुख्य पड़ावों और एक-एक दर्शनीय स्थल के बारे में तो विस्तार से लिखूंगा ही, पर यात्रा के दौरान एक रात जो एक सुखद, संवेदनशील, आपबीती घटी, उसका विवरण सबसे पहले साझा करना चाहता हूँ !

वर्षों से मन में जमी बैठी, गुजरात भ्रमण की ईप्सा, को अब जा कर दिसंबर 22 में पूरा होने का सुयोग मिल रहा था ! संस्था के अनुभवी अग्रजों द्वारा विस्तार से यात्रा के हर पहलू, उसकी रूप-रेखा, उसके हर कोण को चाक-चौबंद करने के बाद दिसंबर की 13 तारीख को रवानगी तय की गई ! रोमांच अपनी पराकाष्ठा पर था ! तभी जाने के चार-पांच दिन पहले, बदलते मौसम और विभिन्न कारणों से शरीर ने असहयोग कर दिया ! पर सारी तैयारियां हो चुकी थीं ! हवाई टिकट और नौ दिनों के अलग-अलग होटलों में व्यक्तिगत नामों से बुकिंग हो चुकी थी ! वैसे भी जाना तो था ही.....!

दवा वगैरह और आराम के जरिए हालत सामान्य होती सी लग तो रही थी पर भीतर ही भीतर कुछ खेल चल भी रहा था ! खैर चार-पांच दिन निकल गए ! द्वारका, सोमनाथ जैसे दिव्य स्थानों के ''ओरा'', उनकी सकारात्मक ऊर्जा, उनकी भव्यता ने शारीरिक कष्ट को कहीं पीछे छोड़ दिया था ! पर कुछ थका देने वाली यात्रा, गर्म मौसम तथा रोज-रोज के बदलते खान-पान ने असर दिखाना शुरू कर दिया था ! पांचवें दिन भाई सारस्वत जी की तबियत ने बिगड़ने के आसार दिखाए ! इसके बाद इन सब का असर मल्लिक जी की सेहत पर पड़ा और छठवें दिन मैं खुद सर दर्द-खांसी और गले की जकड़न के चपेट में आ गया ! कुछ और सदस्यों को भी गले की तकलीफ से दो-चार होना पड़ रहा था ! 

साबरमती रिवरफ्रंट 

सारे ब्योरे का विवरण इसलिए जरुरी था जिससे आगे होने वाले अनुभव और उसके पूरे असर की बानगी मिल सके ! अहमदाबाद की रात ! रात के भोजन के बाद सारस्वत जी, ठीक नहीं लगने के कारण होटल के रिसेप्शन पर अपनी जरुरत की दवाएं मंगवाने का कह, मुझे भी वैसा करने की सलाह दे, अपने कमरे में चले गए ! पहले तो मैंने भी वही रास्ता अपनाने की सोची पर फिर पता नहीं कैसे विचार बदल गया ! मेरे साथ विपिन जी थे मैंने उनसे पूछा कि क्या टहलते हुए दवा वगैरह ले आई जाए ! वे तुरंत तैयार हो गए ! होटल के स्टाफ के दिशा निर्देश के अनुसार करीब पौन किमी चलने के बावजूद किसी भी तरह की कोई दूकान नज़र नहीं आई ! हम लौटने का सोच ही रहे थे कि नीम अँधेरे में एक जगह दो-तीन लोग बैठे बातें करते दिखे ! कम रौशनी में उनके चेहरे भी साफ़ नजर नहीं आ रहे थे ! विपिन जी ने आगे बढ़ कर दवा की दूकान की जानकारी ली ! उन्होंने करीब और आधा किमी आगे दूकान होने की बात कही ! साथ में यह भी कहा कि आज रविवार है, हो सकता है कि दवा की दूकान बंद हो ! हम दोनों होटल से कुछ दूर तक आ गए थे ! रात गहरा रहे थी ! सड़कें भी जनशून्य थीं ! हमने वापस लौटना ही ठीक समझा ! यहीं घटनाक्रम में एक ट्विस्ट आया !

साबरमती आश्रम 

उन तीनों ने आपस में कुछ बात की और उनमें से एक युवक ने अपनी स्कूटी निकाली और कहा, जिन्हें दवा की जरुरत हो मेरे साथ चलें और दूसरे अंकल यहीं बैठ कर इंतजार करें ! विपिन जी वहाँ बैठ गए और वह युवक मुझे साथ ले दवा की खोज में निकल पड़ा ! उसने कहा कि रविवार को ज्यादातर दवाओं की दुकानें बंद रहती हैं, इसलिए हम किसी हॉस्पिटल की तरफ चलते हैं, जहां के मेडिकल स्टोर सदा खुले रहते हैं ! मैं क्या कहता ! खैर जब करीब दो-अढ़ाई किमी चल कर गंतव्य तक पहुंचे तो वहाँ की दूकान भी बंद मिली ! युवक बोला, अंकल नई जगह है, रात है, अनजान लोग हैं, पर घबड़ाइएगा नहीं ! आपको दवा जरूर दिलवाऊंगा ! मैंने कहा कि मैं घबड़ा नहीं रहा हूँ मुझे झिझक इस बात की हो रही है कि आपका टाइम खोटी हो रहा है ! उसकी कोई परवाह नहीं, उसने कहा ! खैर और चार-पांच मिनट के बाद एक दुकान दिखी, दवा ली गई ! वहीं उसने बताया कि जिस सज्जन ने उसे भेजा है उनके परदादा गांधी जी के साथ चरखे पर सूत काता करते थे और कल जब आप साबरमती आश्रम जाओगे तो वहां की गाइड लता जी को उनका नाम बताइएगा, तो जो कमरा सिर्फ वीआईपी के लिए खुलता है वह भी आप लोगों के लिए खोल दिया जाएगा ! लौटते समय युवक ने, जिसका नाम जिग्नेश था, मुझे  यह कह कर होटल उतारा कि आपको बेकार फिर पैदल चल कर आना पडेगा, आप यहां उतर जाइए मैं दूसरे अंकल को ले कर आता हूँ ! फिर वह विपिन जी को छोड़ कर गया ! हम पूरी तरह अभिभूत थे, कैसे उसका धन्यवाद करें समझ ही नहीं पा रहे थे ! 


गांधीजी का मंत्रणा कक्ष 

दवाई की दूकान आगे है, इतना कह कर वह अपना पल्लू झाड़ सकता था ! क्या था जो अनजाने लोगों के लिए कोई अपना समय दे रहा था ! क्या था जो बिना किसी अपेक्षा के कोई अनजान लोगों की जरुरत पूरी करने पर उतारू था ! क्या था जो कोई दूसरे की तकलीफ को अपनी समझ उसको दूर करने की सोच रहा था ! यही इंसानियत है ! यही मानवता है ! यही हमारी संस्कृति है ! यही हमारे संस्कार हैं ! यही वह सोच है कि सारी वसुंधरा ही हमारा परिवार है !

उन सज्जन के प्रभाव के कारण दूसरे दिन साबरमती आश्रम में हमारे साथ मेहमानों की तरह का व्यवहार किया गया ! उस कमरे को भी खोल कर दिखाया और बताया गया जहां बापू देश और विदेश के नेताओं से मिलते थे और मंत्रणा करते थे ! वहीं उनके द्वारा उपयोग में लाइ गईं वस्तुएं और चरखा भी रखा हुआ था ! साबरमती आश्रम अपने आप में एक सुंदर और दर्शनीय स्थल तो है ही वहां के लोगों के व्यवहार ने उसे और ख़ास बना दिया हम सब के लिए !

@आभार जिग्नेश जी ! आभार गुजरात !

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