pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: जिन्न
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सोमवार, 28 अक्टूबर 2024

कक्ख दी वी लोड़ पै जांदी ऐ यानी पड़ सकती है तिनके की भी जरूरत कभी

अल्लादीन के जिन्न को भले ही वापस बोतल में भेजना  बहुत दुष्कर हो, पर बिखरे हुए घरेलू सामान को समेटना उससे भी विकट  समस्या होती है ! ऊपर से सामान  की मालकिन को अपनी हर चीज बेहद जरूरी लगती है, भले ही वर्षों से उसका उपयोग न हुआ हो ! पर उनके अनुसार क्या पता कब किस चीज की जरूरत पड़ जाए ! फिर बाजार दौड़ो ! इसके साथ ही पंजाबी का वह मुहावरा सुनाने से भी नहीं चूकतीं कि "कक्ख दी बी लोड़ पै जांदी ऐ ", अब उनके इस "कक्ख" के चक्कर में मैं तो चकरघिन्नी बन कर रह जाता हूँ...........!           

 #हिन्दी_ब्लागिंग

अभी हफ्ता भर पहले पड़ोस में एक गर्ग दंपति रहने आए हैं ! पता चला कि डिब्रूगढ़ से सेवा निवृत्ति के पश्चात यहां आना हुआ है ! किसी नई जगह सामान को टिकाना-जमाना बहुत ही श्रमसाध्य कार्य होता है ! अभी शायद उन्हें घरेलू सहायक भी नहीं मिला था ! दोनों पति-पत्नी के व्यवस्था में जुटे रहने के बावजूद, आते-जाते दिखता रहता था कि इतने दिनों के बाद भी उनका कुछ सामान अभी भी आंगन में वैसे ही बिना खुले, पैक पड़ा हुआ है ! एक-दो बार पड़ोसी धर्म के नाते अपने सहयोग की पेशकश की थी पर उन्होंने आभार मानते हुए, बड़ी शिष्टता से मना कर दिया था ! वैसे भी बिलकुल अनजान लोगों के निजी कामों में दखल देने और लेने में संकोच भी होता ही है ! 
गर्ग परिवार की अवस्था को देख मुझे अपने वो दिन याद आ गए जब वर्षों बाद हमारा दिल्ली लौटना हुआ था ! ढिबरी टाइट हो गई थी, सामान को ठिकाने लगाते-लगाते। दोस्त-मित्रों का जब फोन आता, मेरी खोज-खबर-जानकारियों के लिए और जब उन्हें थकान से हुई अपनी पस्त हालत के बारे में बताता तो वे हंसने लगते कि अरे आप कहां थकते हो ! तो उनसे कहना पड़ता कि भाई शरीर की एक सीमा होती है । अब पहले जैसा तो रहा नहीं ! पर एक बात तो मन को तब गुदगुदा ही जाती थी, जब कोई कहता था कि सर आपको देख कर लगता नहीं कि आप साठ पार कर चुके हो, तो यह बताने पर कि भइए साठ नहीं पैंसठ गुजरे भी एक अरसा हो गया है तो अगले का चेहरा देखने पर मजा तो आता ही था ! ये अलग बात है कि इन बातों को सुनने के चस्के को बरकरार रखने के लिए रोज तकरीबन घंटा भर पसीना बहाना पड़ता था, जो आज भी जारी है ! 

चलिए दोस्त-मित्र तो बाहर के हैं, दूर हैं, पर अपने बच्चे भी अभी तक अपने पापा को बाहुबली ही समझते हैं। कुछ भी हो, पापा हैं ना ! पर अपनी हद मुझे  तो मालुम है ! सो उन दिनों बच्चों के सहयोग के बावजूद कैसे धीरे-धीरे आराम से काम निपटाया था वह भी याद है ! क्योंकि बड़े शहरों में तुरंत कोई घरेलू सहायक तो मिल नहीं जाता और मिल भी जाता है तो दस तरह की सावधानियां बरतनी पड़ती हैं ! सो अपने हाथ ही जगन्नाथ बनाने पड़े थे ! 

देखा जाए तो घर के अंदर सिमटे, व्यवस्थित असबाब के आकार-प्रकार-आयतन का अंदाज नहीं लगता पर जब वह बाहर आकर अंगड़ाइयां लेना शुरू करता है, तो अच्छी भली जगह भी कम पड़ती दिखती है। अल्लादीन के जिन्न को भले ही वापस बोतल में भेजना बहुत दुष्कर हो, पर बिखरे हुए घरेलू सामान को समेटना उससे भी विकट समस्या होती है ! वैसे भी चालीस साल की गृहस्थी में जरूरी के साथ गैरजरूरी वस्तुओं का जुटते चले जाना कोई बड़ी बात नहीं है। पर उठा-पटक के मौके पर लगता है कि जिंदगी में मजाक-मजाक में ही सही, कुछ ज्यादा ही मोह-माया इकठ्ठी कर ली ! ऊपर से सामान की मालकिन को हर चीज बेहद जरूरी लगती है, भले ही सालों से उसका उपयोग न हो रहा हो ! पर उनके अनुसार क्या पता कब किस चीज की जरूरत पड जाए ! फिर पंजाबी का वह मुहावरा सुनाने से भी नहीं चूकतीं कि "कक्ख दी बी लोड पै जांदी ए".  अब उनके इस "कक्ख" के चक्कर में मैं तो चकरघिन्नी बन कर रह जाता हूँ। 

पर सर पर पड़ी को निपटाना भी पड़ता है ! वैसे उन दिनों मैं अकेला ही नहीं था, श्रीमती जी ने भी अपनी हद से ज्यादा ही साथ दिया था ! थकान से दोनों ही लस्त-पस्त हुए थे ! वही हालत आज मैं गर्ग परिवार की देख रहा हूँ ! यह भी जिंदगी के नाटक का एक दृश्य, एक अंक ही तो है !

बुधवार, 18 जनवरी 2023

पासोवर, पीला ढक्कन, कुलेखारा, बाजार की तनिक प्रशंसा तो बनती है

सुबह आँख खोलने के बाद से रात सोने के वक्त तक बाजार, चिराग के जिन्न की तरह आपके दरवाजे पर हाथ बांधे आपके हुक्म के इंतजार में खड़ा रहता है ! कुछ भी, कहीं से भी ला कर आपको सौंपने के लिए ! उदाहरण के लिए, एक औषधीय पौधा होता है, "कुलेखारा", इसकी पत्तियों का रस होमोग्लोबिन बढ़ाने में बहुत सहायक होता है ! अधिकाँश लोगों को तो इसकी जानकारी तो क्या इसका नाम तक भी ज्ञात नहीं होगा ! यह सब जगह उपलब्ध भी नहीं है ! ऐसे ही कोका कोला के पीले ढक्कन के पेय को भी लिया जा सकता है ! पर बाजार का जिन्न इन सबको देश के किसी भी कोने तक पहुँचाने में सक्षम है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज पल-पल बदलते फैशन, पसंद और जरुरत के जमाने मे भले ही बाजार की नीतियों, उसकी मंशा, उसकी व्यूह-रचना, उसके मायाजाल में सिर्फ उसकी खुदगर्जी और धन अर्जन की प्रमुखता हो, पर एक बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वह दिन-रात, 24x7, लगातार जी तोड़ मेहनत भी करता है ! उसकी नजर, अपने उपभोक्ताओं की हर जरुरत को, गुंजाईश चाहे कितनी भी छोटी से छोटी क्यों ना हो, भांपने और आंकने से नहीं चूकती ! इसके लिए उसकी ''मशीनरी'' बिना विराम के लगातार शोध करती रहती है ! अक्सर हमें लगता है कि हम बाजार के काले पहलू के षड्यंत्र में उलझते जा रहे हैं, पर उसका एक उजला पहलू भी है, भले ही उसका दायरा छोटा हो, पर अशक्त, उम्रदराज, घर से बाहर ना जा पाने को मजबूर, महिलाएं, काम में अत्यधिक व्यस्त लोगों के लिए वह किसी वरदान से कम भी नहीं है ! 


आज कोई भी चीज, यानी कोई भी चीज चाहिए हो तो वह एक कॉल पर घर बैठे उपलब्ध हो सकती है ! फिर वह चाहे खाना हो, दवा हो, रोजमर्रा की जरुरत की वस्तुएं हों, यात्रा का टिकट हो, होटल की बुकिंग हो, स्टेशन-एयरपोर्ट तक जाने के लिए वाहन हो, कपडे हों, जूते हों .... क्या-क्या गिनाया जाए, शायद ही कोई चीज ऐसी हो जो घर बैठे उपलब्ध न हो सकती हो ! उसके ऊपर पसंद ना आने पर वापसी की भी सुविधा ! सुबह आँख खोलने के बाद से रात सोने के वक्त तक बाजार, चिराग के जिन्न की तरह आपके दरवाजे पर हाथ बांधे आपके हुक्म के इंतजार में खड़ा रहता है ! कुछ भी, कहीं से भी ला कर आपको सौंपने के लिए ! उदाहरण स्वरुप, एक औषधीय पौधा होता है, "कुलेखारा", इसकी पत्तियों का रस होमोग्लोबिन बढ़ाने में बहुत सहायक होता है ! अधिकाँश लोगों को तो इसकी जानकारी तो क्या इसका नाम तक भी ज्ञात नहीं होगा ! यह सब जगह उपलब्ध भी नहीं है ! पर बाजार का जिन्न इसे भी देश के किसी भी कोने तक पहुँचाने में सक्षम है ! अजूबा ही तो है यह !

कुलेखारा की पत्तियां 


कुछ साल पहले तक हमारे कट्टर जैन भाइयों को यात्रा या पर्यटन के दौरान खाने-पीने के मामले में बहुत दिक्क्तों का सामना करना पड़ता था ! आज देश के किसी भी हिस्से में अच्छे होटल जैन फूड परोसने में सक्षम हैं ! तीज-त्योहारों के अनुरूप हर तरह की खाद्य सामग्री या जरुरत की वस्तुएं देश के हर कोने में उपलब्ध हैं ! बाजार तो जैसे संसार के हर इंसान की छोटी से छोटी जरुरत पूरी करने के लिए कमर कसे बैठा है ! इसका छोटा सा उदाहरण कोका कोला कंपनी है जो साल में एक बार, बसंत के महीने में अपनी परंपरागत बोतलों के साथ ही यहूदियों के धार्मिक त्यौहार (Passover) को ध्यान में रख एक पीले ढक्कन वाली बोतल भी बाजार में उतारती है। इस त्यौहार में यहूदी लोगों को गेहूं, जई, राई, जौ, मक्का, चावल, बीन्स इत्यादि का सेवन वर्जित होता है और चूंकि कोका कोला में मक्के के रस का प्रयोग किया जाता है इसलिए वे इसे पीने से बचते हैं। इस बात को भांप कर कोका कोला इन दिनों के लिए अपने मुख्य उत्पाद के साथ एक और पेय भी तैयार करता है जिसमें कॉर्न सिरप की जगह चीनी मिलाई जाती है, इसे Kosher Coke कहा जाता है और इसकी पहचान के लिए इसे पीले ढक्कन की बोतलों में भर कर रखा जाता है जिससे इसकी आसानी से पहचान हो सके ! यह बताता है कि बाजार की नजर कितनी पैनी है ! तो लब्बोलुआब यही रहा कि हर चीज के दो पहलू होते हैं ! बाजार से भी अच्छाई और बुराई दोनों जुडी हैं ! हंस तो हमें ही बनना होगा !       

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