गुरुवार, 24 सितंबर 2020

सरकारी सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो क्यों ना खर्च भी उसी से वसूला जाए

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है तो उस पर होने वाला खर्च भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा...............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग     

है ना विडंबना ! देश के तकरीबन 21 हजार वीआईपी लोगों की सुरक्षा के लिए करीब 57 हजार जवान तैनात हैं। जबकि आम इंसान जो अपनी गाढ़ी कमाई के एक हिस्से से इन महानुभावों की रक्षा का खर्च उठाता है, उस जैसे साढ़े छह सौ से भी ज्यादा लोगों की देख-भाल की जिम्मेदारी के लिए सिर्फ एक पुलिस वाला उपलब्ध होता है !

रोजमर्रा की जिंदगी का दवाब, परिवार की परवरिश, दो जून की रोटी, बच्चों का भविष्य, बुजुर्गों की दवा-दारु, खुद की हारी-बिमारी के उधड़ते तानों-बानों को सरियाने में उलझा होने के बावजूद उस आम इंसान के मन में तब और भी क्षोभ और आश्चर्य उत्पन्न हो जाता है, जब वह ऐसे-वैसे, कैसे-कैसे इंसानों को सुरक्षा के घेरे में चलते देखता है ! उनमें से कई ऐसे होते हैं जिनसे दूसरों को सुरक्षा की जरुरत होती है ! कुछ ऐसे धनाढ्य होते हैं, जिनके पालतू पशु भी इंसानों से बेहतर जिंदगी जीते हैं ! उनके कारवां को गुजरते देख यह भला आदमी किनारे खड़ा सोचता है कि इनको किससे सुरक्षा चाहिए और क्यूँ  ! और चाहिए तो सक्षम होते हुए भी अपने को सुरक्षित रखने का उपाय खुद ही क्यों नहीं करते ! देश पर, समाज पर, सरकार पर क्यों बोझ बने हुए हैं ! और फिर सरकार ही, जो इन्हें सुरक्षा मुहैय्या करवाती है, वह इनसे इन्हें सुरक्षित रखने की कीमत क्यों नहीं वसूल करती ! यह सही है कि देश हित में जुटे लोगों को सही मायने में सुरक्षा की जरुरत होती है ! उन्हें मिलनी भी चाहिए ! वैसे समर्पित लोगों लिए तो पूरा देश अपना सब कुछ समर्पण कर सकता है। पर किसी को भी, कभी भी, किसी भी बात पर सुरक्षा दे देना तो हर किसी को नागवार गुजरता है और गुजरना चाहिए भी !  

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आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है

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हालांकि सुरक्षा किसे दी जाए या किसे मिलनी चाहिए, इसके लिए केंद्र और राज्यो में कमेटियां बनाई गई हैं, पर वहां भी रसूख और राजनीति की गहरी दखलंदाजी पैठी हुई है। वैसे ही हमारे देश में पुलिस बल बहुत कम है और ऐसे कामों से संख्या में और क़तर-ब्योंत हो जाती है ! जरुरी  कामों और जगहों में पुलिस बल की कमी आम आदमी द्वारा भी वर्षों से महसूस की जाती रही है ! ऐसे में किसी को भी सुरक्षा प्रदान कर देने वाली ख़बरें सवाल खड़े करने लगी हैं। 

करीब तीन साल पहले संसद में वीआईपी की परिभाषा पूछे जाने पर तात्कालिक गृहराज्य मंत्री ने जवाब दिया था कि ऐसी कोई आधिकारिक नामावली नहीं है। इसके बावजूद इस गरीब देश में वीआईपी संस्कृति या कहिए ख़ास लोग और उनका दबदबा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उसी हिसाब से उनकी सुरक्षा भी बढ़ रही है। धीरे-धीरे यह सुरक्षा कम, स्टेटस सिम्बल यानी प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता चला जाने लगा है ! इसीलिए इस सुविधा के हटाए जाने पर बवाल भी मचने लगे हैं ! जिन जवानों ने देश के हित, सेवा और सुरक्षा की चाह में अपना खून-पसीना एक कर, कठोर प्रशिक्षण और हाड़-तोड़ मेहनत के बल पर जो लियाकत और उपलब्धि हासिल की, पता नहीं उनके दिलों पर क्या बीतती होगी जब वे अपना समय किसी की कार का दरवाजा खोलने और उनका सामान उठा उनके पीछे चलने में जाया होता देखते होंगे। वह भी तब जब उस आदमी की हकीकत भी उन्हें मालुम हो ! 

आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है। 

मारे देश में किसी को सुरक्षा प्रदान करने की पांच श्रेणियां हैं। सबसे ऊँची श्रेणी SPG है। फिर Z+ की श्रेणी आती है। उसके बाद Z, फिर Y, और फिर X कैटेगरी का नंबर आता है। इन्हें खुफिया विभाग की सूचना और सलाह पर गृह मंत्रालय द्वारा मुहैय्या करवाया जाता है। इसकी समय-समय पर सुरक्षा समीक्षा भी की जाती है। अलग-अलग श्रेणी के हिसाब से इनमें जवानों की संख्‍या तय होती है। खतरे का आकलन कर इन श्रेणियों को पाने वाले लोगों में राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद, वर्तमान और पूर्व जज, वर्तमान और सेवा निवृत सरकारी अफसर, व्यापारी, खिलाड़ी, फ़िल्मी कलाकार और धार्मिक गुरु, कोई भी हो सकता है।  

SPG, स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप, यह सर्वोच्च सुरक्षा श्रेणी है। इसमें पैरामिलिट्री फ़ोर्स के जवान होते हैं। फिलहाल यह सुरक्षा अभी सिर्फ प्रधान मंत्री को ही उपलब्ध है। इसकी रोज की लागत लगभग डेढ़ करोड़ रूपए से भी ऊपर आती है। परन्तु यदि इसकी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा पर की जाने वाली राशि से की जाए तो यह राशि उसके आस-पास भी नहीं पहुंचती, जो तकरीबन 36.5 करोड़ डॉलर यानी करीब 2500 करोड़ रूपए, रोज की है।

Z+, इस श्रेणी में 10 एनएसजी कमांडो सहित 36 जवान होते हैं। इसके अलावा पुलिस ऑफिसर भी सुरक्षा व्यवस्था में शामिल होते हैं। परंतु पहला सुरक्षा घेरा एनएसजी कमांडो ही बनाते हैं। ये जवान मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित होते है और बिना किसी हथियार के भी दुश्मन से लड़ने में सक्षम होते हैं। यह सुरक्षा वीवीआईपी को उपलब्ध करवाई जाती है। परन्तु जब वह व्यक्ति राज्य से बाहर जाता है तो कुछ ही जवान उसके साथ रहते हैं, बाकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उस राज्य की होती है, जहाँ वह व्यक्ति जा रहा होता है। इसके लिए दौरे की पूर्व सूचना राज्य को देनी होती है। इसका खर्च करीब एक करोड़ रूपए प्रति माह प्रति व्यक्ति का है !

Z, इसमें 22 जवान, स्थानीय पुलिस के कुछ लोग चार-पांच कमांडो होते हैं। इस पर हर माह करीब 20 लाख रूपए प्रति व्यक्ति खर्च होते हैं। 

Y, इस श्रेणी में 11 जवान, स्वचालित हथियारों के साथ निजी सुरक्षा कर्मी, आवास पर पांच गार्ड के अलावा एक एस्कॉर्ट वाहन भी उपलब्ध करवाया जाता है। इन सब पर प्रति व्यक्ति करीब 12 लाख रूपए प्रति माह का खर्च आता है।  

X, इस कैटेगरी में दो सुरक्षा कर्मी और एक पीएसओ उपलब्ध करवाया जाता है। इसमें कोई कमांडो नहीं होता। ऐसी व्यवस्था पर  प्रति माह करीब डेढ़ लाख रूपए खर्च होते हैं।  

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो उस पर होने वाला खर्च  भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदहारण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा।   

16 टिप्‍पणियां:

Meena Bhardwaj ने कहा…

सादर नमस्कार,
आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 25-09-2020) को "मत कहो, आकाश में कुहरा घना है" (चर्चा अंक-3835) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है.

"मीना भारद्वाज"

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

ज्ञानवर्धक आलेख।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी
रचना को चर्चित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी
हार्दिक आभार

दिव्या अग्रवाल ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 24 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

दिव्या जी
सम्मिलित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

कदम शर्मा ने कहा…

होना तो यही चाहिए

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कदम जी
सुरक्षा मिलती ही है हर तरह से सक्षम को

hindiguru ने कहा…

बिलकुल सही

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

@hindiguru
आभार आपका

Chetan ने कहा…

करोडों रुपये और जन बल का दुरुपयोग होता है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जैसे झटके से लाल बत्ती हटी, वैसे ही इसे भी हटाए जाने की जरूरत है

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

जी मेरा विचार जरा जुदा है। सरकार की जिम्मेदारी हर नागरिक को सुरक्षा प्रदान करने की होती है। इन लोगों पर खतरा ज्यादा रहता है इसलिए उन्हें सुरक्षा दी जाती है। हाँ, जुगाड़ होगा ये मानता हूँ लेकिन जहाँ तक टैक्स के पैसों से सुरक्षा की बात है तो नेताओं का तो नहीं पता लेकिन व्यापारी गोलमाल करने के बाद भी काफी टैक्स भरते ही हैं।

अब मुकेश अम्बानी की बात ही ले लीजिये। जिस कंपनी का वो मालिक है उस कंपनी ने ही हजारों करोड़ में टैक्स भरा है। ऐसे में सरकार की तरफ से मिली सुरक्षा के लिए खुद ही पैसे देना इतना जमेगा नहीं। हाँ, अगर सरकार को टैक्स न दे रहा होता तो बात अलग थी।

कायदे से होना ये चाहिए कि सुरक्षाबलों में वृद्धि होनी चाहिए। रिक्त जगहों को भरा जाना चाहिए जो शायद वो न जाने क्यों नहीं भरते हैं।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

विकास जी
सहमत हूं आप की बात से! पर कभी इन पच्चीस हजारों नामों को टटोल कर देखें, यहां नाम उजागर करना शायद उचित न हो, तो सैंकड़ों ऐसे मिल जाऐंगे जहां रसूख के कारण फिजुल का तामझाम होता नजर आ जाएगा। रही अंबानी की बात तो उनकी तरफ से खर्च का भार उठाया जा रहा है।

Satish Rohatgi ने कहा…

आप सभी हृदय स्पर्श कविताएँ पढ़ने हेतु मेरे ब्लॉग पर आमंत्रित हैं

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सतीश जी
नमस्कार, आते रहिए संबंध पुख्ता होंगे

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