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गुरुवार, 24 सितंबर 2020

सरकारी सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो क्यों ना खर्च भी उसी से वसूला जाए

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है तो उस पर होने वाला खर्च भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा...............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग     

है ना विडंबना ! देश के तकरीबन 21 हजार वीआईपी लोगों की सुरक्षा के लिए करीब 57 हजार जवान तैनात हैं। जबकि आम इंसान जो अपनी गाढ़ी कमाई के एक हिस्से से इन महानुभावों की रक्षा का खर्च उठाता है, उस जैसे साढ़े छह सौ से भी ज्यादा लोगों की देख-भाल की जिम्मेदारी के लिए सिर्फ एक पुलिस वाला उपलब्ध होता है !

रोजमर्रा की जिंदगी का दवाब, परिवार की परवरिश, दो जून की रोटी, बच्चों का भविष्य, बुजुर्गों की दवा-दारु, खुद की हारी-बिमारी के उधड़ते तानों-बानों को सरियाने में उलझा होने के बावजूद उस आम इंसान के मन में तब और भी क्षोभ और आश्चर्य उत्पन्न हो जाता है, जब वह ऐसे-वैसे, कैसे-कैसे इंसानों को सुरक्षा के घेरे में चलते देखता है ! उनमें से कई ऐसे होते हैं जिनसे दूसरों को सुरक्षा की जरुरत होती है ! कुछ ऐसे धनाढ्य होते हैं, जिनके पालतू पशु भी इंसानों से बेहतर जिंदगी जीते हैं ! उनके कारवां को गुजरते देख यह भला आदमी किनारे खड़ा सोचता है कि इनको किससे सुरक्षा चाहिए और क्यूँ  ! और चाहिए तो सक्षम होते हुए भी अपने को सुरक्षित रखने का उपाय खुद ही क्यों नहीं करते ! देश पर, समाज पर, सरकार पर क्यों बोझ बने हुए हैं ! और फिर सरकार ही, जो इन्हें सुरक्षा मुहैय्या करवाती है, वह इनसे इन्हें सुरक्षित रखने की कीमत क्यों नहीं वसूल करती ! यह सही है कि देश हित में जुटे लोगों को सही मायने में सुरक्षा की जरुरत होती है ! उन्हें मिलनी भी चाहिए ! वैसे समर्पित लोगों लिए तो पूरा देश अपना सब कुछ समर्पण कर सकता है। पर किसी को भी, कभी भी, किसी भी बात पर सुरक्षा दे देना तो हर किसी को नागवार गुजरता है और गुजरना चाहिए भी !  

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आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है

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हालांकि सुरक्षा किसे दी जाए या किसे मिलनी चाहिए, इसके लिए केंद्र और राज्यो में कमेटियां बनाई गई हैं, पर वहां भी रसूख और राजनीति की गहरी दखलंदाजी पैठी हुई है। वैसे ही हमारे देश में पुलिस बल बहुत कम है और ऐसे कामों से संख्या में और क़तर-ब्योंत हो जाती है ! जरुरी  कामों और जगहों में पुलिस बल की कमी आम आदमी द्वारा भी वर्षों से महसूस की जाती रही है ! ऐसे में किसी को भी सुरक्षा प्रदान कर देने वाली ख़बरें सवाल खड़े करने लगी हैं। 

करीब तीन साल पहले संसद में वीआईपी की परिभाषा पूछे जाने पर तात्कालिक गृहराज्य मंत्री ने जवाब दिया था कि ऐसी कोई आधिकारिक नामावली नहीं है। इसके बावजूद इस गरीब देश में वीआईपी संस्कृति या कहिए ख़ास लोग और उनका दबदबा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उसी हिसाब से उनकी सुरक्षा भी बढ़ रही है। धीरे-धीरे यह सुरक्षा कम, स्टेटस सिम्बल यानी प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता चला जाने लगा है ! इसीलिए इस सुविधा के हटाए जाने पर बवाल भी मचने लगे हैं ! जिन जवानों ने देश के हित, सेवा और सुरक्षा की चाह में अपना खून-पसीना एक कर, कठोर प्रशिक्षण और हाड़-तोड़ मेहनत के बल पर जो लियाकत और उपलब्धि हासिल की, पता नहीं उनके दिलों पर क्या बीतती होगी जब वे अपना समय किसी की कार का दरवाजा खोलने और उनका सामान उठा उनके पीछे चलने में जाया होता देखते होंगे। वह भी तब जब उस आदमी की हकीकत भी उन्हें मालुम हो ! 

आज तकरीबन एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 21 हजार लोगों को केंद्र द्वारा विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा प्रदान की जा रही है। जिनके नाम सुरक्षा और गोपनीयता के तहत कभी उजागर नहीं किए जाते। नाहीं इस पर खर्च होने वाली राशि का सही-सही आकलन हो पाता है, क्योंकि खर्च विभिन्न चीजों पर अलग-अलग मद में हुआ होता है। परन्तु यह भारी-भरकम खर्च का बोझ तो कर दाताओं को ही उठाना पड़ता है। 

मारे देश में किसी को सुरक्षा प्रदान करने की पांच श्रेणियां हैं। सबसे ऊँची श्रेणी SPG है। फिर Z+ की श्रेणी आती है। उसके बाद Z, फिर Y, और फिर X कैटेगरी का नंबर आता है। इन्हें खुफिया विभाग की सूचना और सलाह पर गृह मंत्रालय द्वारा मुहैय्या करवाया जाता है। इसकी समय-समय पर सुरक्षा समीक्षा भी की जाती है। अलग-अलग श्रेणी के हिसाब से इनमें जवानों की संख्‍या तय होती है। खतरे का आकलन कर इन श्रेणियों को पाने वाले लोगों में राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद, वर्तमान और पूर्व जज, वर्तमान और सेवा निवृत सरकारी अफसर, व्यापारी, खिलाड़ी, फ़िल्मी कलाकार और धार्मिक गुरु, कोई भी हो सकता है।  

SPG, स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप, यह सर्वोच्च सुरक्षा श्रेणी है। इसमें पैरामिलिट्री फ़ोर्स के जवान होते हैं। फिलहाल यह सुरक्षा अभी सिर्फ प्रधान मंत्री को ही उपलब्ध है। इसकी रोज की लागत लगभग डेढ़ करोड़ रूपए से भी ऊपर आती है। परन्तु यदि इसकी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा पर की जाने वाली राशि से की जाए तो यह राशि उसके आस-पास भी नहीं पहुंचती, जो तकरीबन 36.5 करोड़ डॉलर यानी करीब 2500 करोड़ रूपए, रोज की है।

Z+, इस श्रेणी में 10 एनएसजी कमांडो सहित 36 जवान होते हैं। इसके अलावा पुलिस ऑफिसर भी सुरक्षा व्यवस्था में शामिल होते हैं। परंतु पहला सुरक्षा घेरा एनएसजी कमांडो ही बनाते हैं। ये जवान मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित होते है और बिना किसी हथियार के भी दुश्मन से लड़ने में सक्षम होते हैं। यह सुरक्षा वीवीआईपी को उपलब्ध करवाई जाती है। परन्तु जब वह व्यक्ति राज्य से बाहर जाता है तो कुछ ही जवान उसके साथ रहते हैं, बाकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उस राज्य की होती है, जहाँ वह व्यक्ति जा रहा होता है। इसके लिए दौरे की पूर्व सूचना राज्य को देनी होती है। इसका खर्च करीब एक करोड़ रूपए प्रति माह प्रति व्यक्ति का है !

Z, इसमें 22 जवान, स्थानीय पुलिस के कुछ लोग चार-पांच कमांडो होते हैं। इस पर हर माह करीब 20 लाख रूपए प्रति व्यक्ति खर्च होते हैं। 

Y, इस श्रेणी में 11 जवान, स्वचालित हथियारों के साथ निजी सुरक्षा कर्मी, आवास पर पांच गार्ड के अलावा एक एस्कॉर्ट वाहन भी उपलब्ध करवाया जाता है। इन सब पर प्रति व्यक्ति करीब 12 लाख रूपए प्रति माह का खर्च आता है।  

X, इस कैटेगरी में दो सुरक्षा कर्मी और एक पीएसओ उपलब्ध करवाया जाता है। इसमें कोई कमांडो नहीं होता। ऐसी व्यवस्था पर  प्रति माह करीब डेढ़ लाख रूपए खर्च होते हैं।  

वर्षों से चली आ रही इस ''परंपरा'' को सुधारने की बहुत जरुरत है। इसके लिए बनाई गई कमेटियों में ऐसे लोग हों जिन पर किसी का किसी भी तरह का दवाब ना पड़ सके। नामजद लोगों की पूरी जिम्मेदारी से पड़ताल हो ! सुरक्षा समीक्षा का समय निर्धारित हो ! सिर्फ अपने रुआब या दबदबे से लोगों को प्रभावित करने के लिए इसे ''जुगाड़ा'' ना जा सके ! सबसे अहम बात कि यदि सुरक्षा लेने वाला व्यक्ति सक्षम है, तो उस पर होने वाला खर्च  भी उसी से वसूला जाए। मुकेश अंबानी इसका उत्कृष्ट उदहारण हैं। यदि ऐसा हुआ तो आधे से ज्यादा लोग खुद ही अपने को सुरक्षित बतलाने लगेंगे। जवान अपने मुख्य कार्य देश की सुरक्षा पर ध्यान दे सकेंगे ! आम आदमी जेब और मन पर से बोझ कम होने पर अपने को और सुरक्षित महसूस करने लगेगा।   

मंगलवार, 10 मार्च 2020

होली के पावन पर्व पर मुस्कुराइए, ठहाके लगाइए

होली है ! 
हंसी, ख़ुशी, मस्ती के पर्व पर सभी को यथायोग्य शुभ व मंगलकामनाएं। सदा स्वस्थ व प्रसन्न रहते हुए हरेक के जीवन में खुशियों के रंग बिखरते रहें। आज के दिन तो बिना हँसे रहना मना है !

 गांव से नये-नये आये नौकर को पानी का गिलास यूंही हाथ में उठा कर लाते देख संताजी चिल्लाए, अरे गधे पानी कहीं इस तरह लाया जाता है ? नौकर ने घबडा कर पूछा, फिर कैसे लाऊं, मालिक ? संताजी बोले, प्लेट में रख कर लाओ। सहमा हुआ नौकर, मालिक चम्मच भी लाऊं या ऐसे ही चाट लेंगे ?

एक दादी मां मरने से बहुत डरती थीं। सो भगवान से सदा प्रार्थना करती रहती थीं। एक बार प्रभू ने तंग आकर उन्हें दर्शन दे ही दिए और बता दिया कि उनकी उम्र अभी चालीस साल और तीन महिने बाकी है। दादी मां खुश। अगले दिन से ही सुखमय जिंदगी की तैयारियां शुरु कर दीं। ब्युटी-पार्लर में जा बाल डाई करवाये, मसाज करवाई, फ़ेशिअल, पैडी और ना जाने क्या-क्या करवा कर जैसे ही बाहर निकलीं एक बस की चपेट में आ स्वर्ग सिधार गयीं। ऊपर जाते ही प्रभू का गला पकड़ लिया, कि तुमने तो मेरी उम्र अभी चालीस साल और बताई थी, तो यह क्या कर दिया। प्रभू भी हड़बड़ा गये, बोले "अरे माई तुम्हें तो मैं पहचान ही नहीं पाया।"

दो चलाकू टाईप के आदमी दिल्ली से, रात में कहीं जाने के लिए ट्रेन के डिब्बे में चढ़े, तो पाया कि कहीं बैठने तक की जगह नहीं है। तभी उनमें से एक चिल्लाने लगा, सांप-साप, भागो-भागो। इतना सुनना था कि सारे यात्री सर पर पैर रख भग लिए। दोंनो ने एक दूसरे को मुस्करा कर देखा और ऊपर की बर्थ पर चादर बिछा कर सो गये। सबेरे नींद खुलने पर उन्होने पाया कि गाड़ी कहीं खड़ी है, उन्होनें बाहर झाड़ु देते आदमी से पूछा कि भाई कौन सा स्टेशन है? उसने जवाब दिया, दिल्ली। अरे दिल्ली तो कल रात में थी, इन्होंने पूछा। तो जवाब मिला, साहब, कल रात इस डिब्बे में सांप निकल आया था तो इस डिब्बे को काट कर अलग कर बाकी गाडी चली गयी थी।
पोता दादा जी से जिद कर रहा था सर्कस दिखाने की। चलिए ना दादा जी सर्कस में नयी-नयी चीजें दिखा रहे हैं। हाथी और गैंडा फुटबाल खेलते हैं। जोकर बहुत हंसाते हैं। पर दादा जी मान ही नहीं रहे थे, क्या बिटवा वही सब पुराने खेल हैं। पोता भी कहां मानने वाला था बोला सुना है इस में ढेर सारे घोड़े ताल में नाचते हैं। दादा जी भी नहीं मान रहे थे बोले देख तो रहे हो मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। पर पोता भी अड़ा हुआ था, बताने लगा, उपर झूले में एक साथ दस जने झूलते हैं और अबकी चीन से लड़कियां आयीं हैं जो छोटे-छोटे कपड़ों में पोल डांस करती हैं !

दादा जी उठे बोले चल इतनी जिद करता है तो चले चलता हूं। मैने भी घोड़ों को ताल पर नाचते नहीं देखा है।
संता, बंता तथा कंता पुलिस में भर्ती होने गए। उनको अपराधियों की शिनाख्त करने के लिये एक फोटो दिखाई गयी जिसमें एक आदमी का बगल से खिंचा गया चित्र था। पहले कंता से पूछा गया कि इस आदमी की क्या खासियत है ? इसे कैसे पहचानोगे ? कंता बोला, अरे यह तो बहुत आसान है ! इस आदमी का एक ही कान है। इसे तुरंत पहचान लूंगा। 
सामने वाले ने अपना सिर पीट लिया। इसके बाद बंता को बुला कर उससे भी वही सवाल पूछा गया, उसने भी झट से जवाब दिया कि एक आंख वाले को पकड़ने और पहचानने में कोई दिक्कत नहीं है। साक्षात्कार लेने वाला झल्ला कर बोला, कैसे बेवकूफ हो तुम्हें इतना भी नहीं पता कि यह साइड पोज है। चलो भागो यहां से। चले आते हैं पुलिस में काम पाने। 
अब संता की बारी थी। उसको बुला कर भी वही सवाल पूछा गया, कि इस आदमी को कैसे पहचानोगे ? संता ने गौर से फोटो देखी और बोला, मैं इसे पहचान लूंगा, क्योंकि इसने कान्टेक्ट लेंस लगाया हुआ है। साक्षात्कार लेने वाला हैरान। यह बात तो उसे भी मालुम नहीं थी। तुरंत फाइलें खंगाली गयीं तो पाया गया कि संता का कहना सही है। सबने उसकी सूझ-बूझ की बड़ी प्रशंसा की। फिर ऐसे ही उससे पूछ लिया गया कि उसे यह बात कैसे पता चली। संता बोला, जी यह तो कॉमन सेंस की बात है। एक आंख वालों की नज़र कमजोर होती है और इस बेचारे का कान भी एक ही है तो यह चश्मा तो पहन नहीं सकता। जाहिर है यह कांटेक्ट लेंस ही लगाता होगा।
ननकु  ट्रेन में टायलेट जाकर लौटा तो बदहवास था। सहयात्री ने पूछा, क्या हो गया ?
ननकु बोला टायलेट के छेद से मेरा पर्स नीचे गिर गया।
अरे, तो चेन खींचनी थी ना। सहयात्री ने कहा।
दो बार खींची, पर हर बार पानी बहने लगा।
बाहर से आए पर्यटक को गाइड ने बताया कि जब अकबर सिर्फ चौदह साल का था तभी उसने बादशाह बन देश पर राज करना शुरु कर दिया था। पर्यटक बोला तुम्हारा देश भी अजीब है, यहां चौदह साल में देश संम्भालने दिया जाता है पर शादी अठ्ठारह साल के पहले नहीं करने दी जाती।
अब तुम्हें क्या बताएं साहब कि घर चलाना देश चलाने से कितना मुश्किल है। गाइड ने जवाब दिया।
पत्नी खर्च पूरा ना पड़ने और पति की अल्प कमाई से परेशान थी।एक दिन रहा नहीं गया बोली, "मैं शर्म के मारे अपना सर नहीं उठा पाती हूं। मेरी मां हमारे घर का किराया देती है। मेरी मौसी के यहां से कपड़े आते हैं। मेरी बहन हमारा राशन भरती है। कब हमारी हालत सुधरेगी?
" पति बोला, "शर्म तो आनी ही चाहिए। तुम्हारे दो-दो चाचा हैं जो एक पैसा भी नहीं भेजते।"
बाढ़ग्रस्त इलाके में तैनात कर्मचारियों से वायूसेना ने पूछा कि लोगों को निकालने के लिये कितनी ट्रिप लगेंगी। जवाब दिया गया कि तीस-एक ट्रिप में गांव खाली हो जायेगा। बचाव अभियान शुरु हो गया। एक-दो-तीन-पांच-दस-बीस, पचास फेरे लगने के बाद भी लोग नज़र आते रहे, तो सेना ने पुछा कि आपने तीस फेरों की बात कही थी यहां तो पचास फेरों के बाद भी लोग बचे हुए हैं ऐसा कैसे। नीचे से आवाज आयी कि सर, गांव वाले पहली बार हेलिकॉप्टर  में बैठे हैं तो जैसे ही उन्हें बचाव क्षेत्र में छोड़ कर आते हैं, वे फिर तैर कर वापस यहीं पहुंच जाते हैं।
गांव का एक लड़का अपनी नयी-नयी साईकिल ले, शहर मे नये खुले माल में घूमने आया। स्टैंड में सायकिल रख जब काफ़ी देर बाद लौटा तो अपनी साईकिल को काफ़ी कोशिश के बाद भी नहीं खोज पाया। उसको याद ही नहीं आ रहा था कि उसने उसे कहां रखा था। उसकी आंखों में पानी भर आया। उसने सच्चे मन से भगवान से प्रार्थना की कि हे प्रभू मेरी साईकिल मुझे दिलवा दो, मैं ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा। दैवयोग से उसे एक तरफ़ खड़ी अपनी साईकिल दिख गयी। उसे ले वह तुरंत मंदिर पहुंचा, भगवान को धन्यवाद दे, प्रसाद चढ़ा, जब बाहर आया तो उसकी साईकिल नदारद थी।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

जीवन को जीएं, काटें नहीं

पिछले पंद्रह-बीस सालों में लोगों की जीवनचर्या में बहुत परिवर्तन आया है। कुछ को तो समस्याएं घेरती हैं तो कुछ खुद समस्याओं से जा लिपटते हैं। हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जिसे हर यंत्र की तरह उचित रख-रखाव की जरुरत पडती है पर विडंबना ही है कि इस सबसे ज्यादा जरूरी और कीमती यंत्र की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा की जाती है। 


#हिन्दी_ब्लागिंग 

अपनी दिनभर की दिनचर्या में रोज ही ऐसे कई युवा मिल जाते हैं जो निढाल, निस्तेज, सुस्त नजर आते हैं। जैसे जबरदस्ती शरीर को ढो रहे हों। अधिकांश नवयुवकों को किसी ना किसी व्याधि से ग्रस्त दवा फांकते देखना बडा अजीब लगता है। आज के प्रतिस्पर्द्धात्मक समय में हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी समस्या से जुझता हुआ किसी यंत्र की कसी हुई तार की तरह हर वक्त तना रहता है। जिसके फलस्वरूप देखने में बिमारी ना लगने वाली, सर दर्द, कमर दर्द, अनिद्रा, अपच, कब्ज जैसी व्याधियां उसे अपने चंगुल में फंसाती चली जाती हैं, जिससे अच्छा भला युवा उम्रदराज लगने लगता है। सदियों से हमारे यहां प्रभू से प्रार्थना की जाती रही है कि "हे प्रभू हमें सौ साल की उम्र प्राप्त हो।" पर यदि 30-35 साल के बाद ही रो-धो कर, दवाएं फांक कर, ज्यादातर समय बिस्तर पर गुजार कर जीना पडे तो ऐसे जीवन से क्या फायदा।

      

निश्चिंतता 
पिछले पंद्रह-बीस सालों में लोगों की जीवनचर्या में बहुत परिवर्तन आया है। कुछ को तो समस्याएं घेरती हैं तो कुछ खुद समस्याओं से जा लिपटते हैं। हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जिसे हर यंत्र की तरह उचित रख-रखाव की जरुरत पडती है पर विडंबना ही है कि इस सबसे ज्यादा जरूरी और कीमती यंत्र की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा की जाती है। अनियमित दिनचर्या, कुछ भी खाने-पीने का शौक, लापरवाही, मौज-मस्ती युक्त अपना रख-रखाव इस मशीन को भी बाध्य कर देता है अपने से ही विद्रोह के लिए। युवावस्था में यदि थोडी सी भी "केयर" अपने तन-बदन की कर ली जाए तो यह एक लम्बे अरसे तक मनुष्य का साथ निभाता है। लोग भूल जाते हैं कि मौज-मस्ती भी तभी तक रास आती है जब तक शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है। 

पर इस नैराश्य पूर्ण स्थिति में भी आप अपने चारों ओर देखें तो आपको ऐसे अनेक लोग दिख जाएंगे जो अपने कर्मों से, अपने आचरण से, अपने अनुभवों से हमारा मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। जिन्हें देख जिंदगी को खुशहाल बनाने के तौर-तरीकों को समझा जा सकता है, उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। ऐसे ही एक शख्स हैं मेरे मामा जी। जो 85 साल के होने के बावजूद किसी 35 साल के युवा से कम नहीं हैं। आज देश-प्रदेश के लोगों के बीच बहुचर्चित शतायु मैराथन धावक फौजा सिंह के प्रांत पंजाब के एक कस्बे फगवाडा के पास के गांव हदियाबाद के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में श्री प्यारे लाल सुंधीर बचपन से ही सामान्य कद-काठी के इंसान रहे। पर लाख विषमताओं, हजारों अडचनों, सैंकडों परेशानियों के बावजूद उन्होंने अनियमितता का सहारा नहीं लिया। यहां तक कि छोटी उम्र में ही जीवनसाथी की असमय मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपने को संभाले रखा और अपने बच्चों को सही तालीम दिलवा कर उन्हें जीवन पथ पर अग्रसर और स्थापित किया। आज जब वे हर तरह से सम्पन्न हैं, घर में हर आधुनिक सुविधा उपलब्ध है फिर भी इस उम्र में में भी उन्हें खाली बैठना ग्वारा नहीं है। आज भी सिर्फ व्यस्त रहने के लिए उन्होंने अपने व्यवसाय को तिलांजली नहीं दी है।  घर में कार होने के बावजूद अपनी सेहत की खातिर इस उम्र में भी रोज 10 से 15 की.मी. सायकिल पर चलना उनका शौक है। किसी भी तरह की चिंता, फिक्र, तनाव को वे पास नहीं फटकने देते। इसी वजह से बिना किसी का साथ ढूंढे अपनी बिटिया के पास नार्वे तक हर ढेढ दो साल बाद चक्कर लगाने से नहीं घबराते। वहा भी घर पर नहीं रुकते, आस-पास के दूसरे देशों को देखना, घूमना भी उनका शगल है, फिर चाहे किसी का साथ मिले या ना मिले। अपना देश तो इनका घूमा हुआ ही है वह भी अकेले. हमारे यहां तो उनका हर साल आना हमारी जरूरत है। उनके 10-15 दिनों का प्रवास हमें एक नई शक्ति प्रदान कर जाता है।  यह सब उन लोगों के लिए सबक है जो बचपन के खान-पान की कमी, अपनी उम्र, किसी का सहारा ना होने या अपनी जीवन में ना टाली जा सकने वाली मुसीबतों को अपने द्वारा पैदा की गयीं मुसीबतों का जिम्मेदार मानते हैं। सीधी  सी बात है जिसमे जीने की उद्दाम इच्छा हो उसके लिए कोइ बाधा कोइ मायने नहीं रखती।    

सोचिए जब होनी को टाला नहीं जा सकता तो फिर परेशान क्यों ? जब जो होना है, हो कर ही रहना है तो फिर नैराश्य क्यों ? जब भविष्य अपने वश में नहीं है तो उसके लिए वर्तमान में चिंता क्यों ?

जरा सोचिए, मैं भी सोचता हूं ! कठिन जरूर है पर मुश्किल बिल्कुल नहीं !

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

पार्ले-जी के बिस्कुट की वह क्यूट सी बच्ची

स्पर्द्धा में टिके रहने के लिए अपने ''पारले ग्लूको'' के नाम और उस समय के कवर पर की ''गाय और ग्वालन'' की तस्वीर को बदल एक विशेष पीले रंग के कवर. लाल रंग के लोगो व एक लड़की की फोटो के साथ एक नए पैकिंग को पेटेंट करवा उसे 1982 में बाजार में उतारा।  इतना सम्मान पाने वाली किस बच्ची की फोटो है यह.........? 

#हिन्दी_ब्लागिंग
पतानहीं कैसे यह बात चली और एक बहस शुरू हो गयी, पारले बिस्कुट के रैपर पर छपी बच्ची की पहचान को ले कर ! अधिकतर गूगल ज्ञानियों का दावा था कि यह फोटो सुधा कृष्णमूर्ति जी के पिताजी द्वारा खींची गयी, बचपन की फोटो है, जब वह चार साल की थीं !  कई इसे नीरू देशपांडे की तथा कुछ गुंजन गंडानिया की बता रहे थे। अक्सर कई चीजों को ले कर क्षण भर के लिए ऐसी जिज्ञासाएं उठती रहती हैं और कुछ देर बाद ही वह भूला भी दी जाती हैं ! पर इस बार सोचा कि गहरे पानी पैठ ही लिया जाए।

सन 1929 में एक रेशम के व्यापारी मोहनलाल चौहान ने मुंबई के पास इर्ले और पार्ले नामक गांवों के क्षेत्र में टॉफी, कैंडी व मिठाई इत्यादि बनाने के लिए एक छोटे से कारखाने ''पारले एग्रो उत्पादन'' की शुरुआत की तथा स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित हो कर खुद कन्फेक्शनरी बनाने की कला सीख अपने परिवार के सदस्यों के साथ काम शुरू कर दिया। सारा परिवार अपने काम में इतना मशगूल हो गया कि अपने संस्थान को कोई नाम देना ही याद ना रहा ! कुछ समय उपरांत नजदीकी स्टेशन, विले पार्ले, जो खुद पास के गांव पार्ले के नाम पर आधारित था, के नाम पर ही अपना नामकरण  कर दिया गया। इनका पहला उत्पाद नारंगी कैंडी थी। कारखाने की स्थापना के करीब दस साल बाद पारले कम्पनी ने 1939 में अपना पहला बिस्कुट निकाला था। जिसके बाद से यह भारत की सबसे बड़ी खाद्य उत्पाद कंपनियों से एक हो गयी थी। यह बात है, दूसरे विश्व युद्व की। कम कीमत और उच्च गुणवत्ता के कारण इसकी मांग उस समय इतनी बढ़ गयी कि आपूर्ति करना मुश्किल हो गया था। 
वैसे तो पारले कंपनी और भी बहुत सारी चीजें बनाती हैं जैसे कि सॉस, टॉफी, केक पर इसका सर्वोपरि बिकने वाला उत्पाद बिस्कुट ही है। जिसे गरीब हो या आमिर, चाहे बच्चा हो या बूढ़ा, हर कोई खाता-पसंद करता है। शायद ही देश में ऐसा कोई हो जिसने पारले का बिस्कुट कभी ना कभी, कहीं ना कहीं ना खाया हो। 
जैसा की होना ही था, इसकी प्रसिद्धि और कमाई देख अन्य निर्माता भी इस क्षेत्र में उतरे, जिनमें ब्रिटानिया प्रमुख था। उसने अपना ग्लूकोज बिस्कुट ब्रिटानिया-डी के नाम से बाजार में उतारा। मजबूरन पार्ले ने स्पर्द्धा में टिके रहने के लिए अपने ''पारले ग्लूको'' के नाम और उस समय के कवर पर की ''गाय और ग्वालन'' की तस्वीर को बदल एक विशेष पीले रंग के कवर. लाल रंग के लोगो व एक लड़की की फोटो के साथ एक नए पैकिंग को पेटेंट करवा उसे 1982 में बाजार में उतारा। पहले के पारले-जी यानी पारले ग्लूकोज को बदल नया नारा दिया पारले जीनियस। खर्च में कटौती के लिए वैक्स पेपर को प्लास्टिक के रैपर से बदल  दिया गया। जो भी हो इसकी लोकप्रियता अभी भी बरकरार है। सर्वे को देखा जाए तो पारले-जी की बिक्री दुनिया के चौथे सबसे बड़े बिस्कुट उपभोक्ता मुल्क चीन से भी ज्यादा है। भारत से बाहर यह यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आदि में भी उपलब्ध है। पारले-जी अकेला ऐसा बिस्कुट है जो कि गांवों से लेकर शहरों तक में एक ही रेट से बिकता है और दोनों जगह ही इसकी लोकप्रियता एक समान है।

अब रैपर पर छपी मासूम सी सुंदर बच्ची की बात, जिस पर बहस और यह लेख शुरू हुआ था ! तो यह जान लें कि यह फोटो किसी मॉडल या सेलिब्रेटी की नहीं बल्कि एक ऐनिमेटड पिक्चर है जिसका निर्माण 1979 में किया गया था। यह बात पारले कंपनी के ग्रुप प्रोडक्ट मैनेजर रहे मंयक शाह ने साफ़ की कि पारले के पैकिट पर दिखायी देने वाली लडकी एक काल्पनिक लडकी का चित्र है। जिसे एवरेस्ट क्रियेटिव कंपनी के चित्रकार मगनलाल दहिया ने 1960 के दशक में इस तस्वीर को पारले कंपनी के लिए बनाया था। उसके बाद ये बिस्कुटों पर नजर आने लगी थी। उनके अनुसार इससे संबंधित सारी अफवाहें बेबुनियाद हैं। तो यह है उस रैपर पर छपी क्यूट सी बच्ची के फोटो की हकीकत !  

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

हर भावी जननी की पहली चाहत बेटी ही होती है

पहली बार जब कोई युवती माँ बनती है तो वह शिशु में अपनी छाया ही देखती है। उसको अगाध ख़ुशी महसूस होती है जब कोई बच्चे की शक्ल को उस जैसा बताता है ! सौभाग्य से यदि नवजात पुत्री हो तब तो वह अपने आप को उसमें देखने लगती है ! वापस अपने बचपन में पहुंच जाती है ! इसके साथ ही उसी क्षण से उसके भविष्य के सपनों का ताना-बाना  भी बुनने लगती है। यह तो प्रकृति की खूबी ही है कि कल तक जो खुद एक बेटी थी वह कैसे एक जिम्मेदार माँ का रूप धारण कर लेती है.................

#हिन्दी_ब्लागिंग 
मेरी यह धारणा है कि हर भावी जननी की अपनी प्रथम उपलब्धि की अभिलाषा कन्या ही होती है, हो सकता है मैं गलत होऊं पर मुझे यही लगता है। भले ही रूढ़िवादी सोच, समाज के पितृतात्मक विचार या परिवार की वंश-वृद्धि की आधारहीन लालसा के सम्मुख वह अपनी कामनाओं का गला घोट, खुद की इच्छा सार्वजनिक रूप से भले ही स्वीकार ना कर पाती हो पर प्रकृति ने जगत की संवर्धना, बढ़ोत्तरी, विकास की जो अहम जिम्मेवारी अपनी इस सर्वोत्तम कृति को सौंपी है, तो उसके विचार, उसकी मनोवृति उसकी प्राकृत सोच भी निश्चित रूप से उसी के अनुरूप ही होती होगी। 

पहली बार जब कोई युवती माँ बनती है तो वह शिशु में अपनी छाया ही देखती है। उसको अगाध ख़ुशी महसूस होती है जब कोई बच्चे की शक्ल को उस जैसा बताता है ! सौभाग्य से यदि नवजात पुत्री हो तब तो वह अपने आप को उसमें देखने लगती है ! वापस अपने बचपन में पहुंच जाती है ! इसके साथ ही उसी क्षण से उसके भविष्य के सपनों का ताना-बाना  भी बुनने लगती है। यह तो प्रकृति की खूबी ही है कि कल तक जो खुद एक बेटी थी वह कैसे एक जिम्मेवार माँ का रूप धारण कर लेती है ! पर इसके साथ ही समाज की भयावह बुराईयां भी उसे डराने लगती हैं ! चिंताग्रस्त हो जाती है वह अपनी बच्ची की सुरक्षा, उसकी परवरिश, उसके भविष्य को लेकर ! इसीलिए जैसे-जैसे बच्ची बड़ी होती है, बालिका से युवती का रूप अख्तियार करती है वैसे-वैसे माँ की चिंताएं भी विशाल दरख़्त जैसा रूप ले लेती हैं ! भूल जाती है वह अपने आप को, अपनी जरूरतों को ! दफ़न कर देती है वह अपनी इच्छाओं को अपनी कामनाओं को अपनी परी की बेहतरी के लिए ! उसके आँख-कान-मन जैसे सिर्फ अपनी बच्ची की सुरक्षा में तैनात हो जाते हैं। डरी-शंकित-भयभीत माँ हर क्षण उस पर नजर रखने लगती है ! उसके उठने-बैठने-चलने-बोलने, हर गतिविधि पर उसे समझाने, टोकने, डांटने लगती है ! उसके लिए उसकी पारी सदा छौना ही रहती है ! वह स्वीकार ही नहीं कर पाती कि उसकी बिटिया भी बड़ी हो चुकी है ! और यहीं कहीं शायद अति हो जाती है, गलती हो जाती है ! बिटिया को बार-बार की टोकाटाकी नागवार गुजरने लगती है और एक दिन वह पलट कर जवाब दे देती है ! माँ स्तंभित रह जाती है ! उसे समझ नहीं आता कि उसकी भूल क्या है ! जिसके भले के लिए उसने अपना सुख-चैन सब कुछ त्याग दिया, वही बेटी आज इतनी बड़ी हो गयी ! दिल धक्क से रह जाता है और आँखें पनीली हो जाती हैं ! पर मानवीय रिश्तों में माँ-बेटी का रिश्ता शायद सबसे अनूठा और अहम् होता है। ना माँ को बेटी के बिना चैन पड़ता है ना हीं बेटी को माँ के बिना करार आता है। कुछ ही देर में दोनों फिर गले लग जाती हैं।

पर माँ की चिंताएं कहां खत्म होती हैं कभी ! वह जानती है कि उसकी सोनचिरैया को एक नया घर बसाना है, नए परिवेश में जाना है, नए लोगों के बीच ढलना है अपनी पहचान बनानी है, इसीलिए वह उसे समझाती-सिखाती-संवारती रहती है। वह उसे बताती है कि उस नए घर परिवार में भी एक माँ है जिसके अपने विचार, अपनी मान्यताएं, अपने तरीके होंगे घर चलाने-संभालने के ! उन्हें समझना है। मेरे द्वारा सिखाए-बताए तौर-तरीकों का उनसे ठीक उसी तरह सांमजस्य बैठाना है जैसे दूध और चीनी का बनता है। तुम्हारी पहली प्राथमिकताएं उनके लिए होंगी। समय के साथ वही घर तुम्हारा कहलाएगा। 

आज विदेशों की देखा-देखी अपने देश में भी सामाजिक विघटन के दौर ने पैर पसार लिए हैं ! फिर भी ऐसे में माँ की नसीहतें, समझाइशें, सीखें ही हैं जो उस विघटन रूपी दानव के सामने दृढ़ता से खड़ी हो देश-समाज-परिवार की रक्षा हेतु कटिबद्ध हैं।   

शुक्रवार, 7 जून 2019

किटी पार्टी, कुछ रोचक जानकारियां

किसी समय बचत करने या पैसा बचाने के उद्देश्य से जन्मे इस तरीके यानी ''किटी'' ने आज समाज के विभिन्न वर्गों में भी अपनी पैठ बना ली है। एक मुश्त अच्छी-खासी रकम मिलने के कारण यह बहुतेरे लोगों की परेशानियों का हल बन कर सामने आयी है। इसकी लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि इसमें कोई अतिरिक्त लाभ जैसे ब्याज आदि लिया-दिया नहीं जाता है। इसके अतिरिक्त इसका एक फायदा और भी है कि बड़े शहरों में अकेलेपन से जूझते लोगों, खासकर महिलाओं का एक-दूसरे से मिलने, हाल-चाल जानने के साथ-साथ मनोरंजन और आर्थिक सहायता का इंतजाम भी हो जाता है .................!

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किटी पार्टी की शुरुआत कब और कहां हुई, यह कहना तो कुछ मुश्किल है पर कैसे हुई इसका कुछ-कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। किटी का मतलब होता है सामूहिक धन ! यानी कुछ लोगों द्वारा किसी ख़ास उद्देश्य से एकत्रित की गयी एक छोटी सी रकम। कभी आपसी सहायता से किसी जरूरतमंद अपने साथी-मित्र-संबंधी की मदद करने की सदेच्छा आज मनोरंजन का साधन भी बन गयी है और जाने-अनजाने किसी हद तक बाजार की उदरपूर्ति का जरिया भी ! जो सुझाने लगा है अजीबो-गरीब नए-नए तरीके, जगहें, खेल इत्यादि ! 
हमारे देश का निम्न-मध्यम वर्ग सदा से ही अभावों से जूझता रहा है। शायद ही कभी अपनी सिमित आमदनी से उसकी जरूरतें पूरी हो पाती हों। अक्सर अचानक आ पड़ने वाली अपनी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा  करने के लिए भी उसे अपने दोस्तों या फिर महाजनों का आश्रय लेना पड़ता रहा है। एक बार महाजन के ब्याज के मकड़जाल में फंसे इंसान की हालत तो सभी जानते हैं। रही दोस्तों की बात तो सदा से दोस्त या हितैषी यथाशक्ति अपने छोटे-मोटे सहयोग से अपने किसी जरूरतमंद मित्र की सहायता करते ही रहे हैं। ऐसा लगता है कि उसी सहयोग की उपयोगिता और सार्थकता को देखते हुए उस तरीके को एक अलग रंग दे स्थाई रूप से अपना लिया गया। शुरुआत में इसे अपनाते हुए जान-पहचान के कुछ हम-पेशा लोगों ने, ज्यादा बचत की गुंजाइश ना होने के कारण, सिर्फ बीस रूपए की एक छोटी सी रकम के साथ शुरुआत की  होगी ! उसी बीस रूपए के कारण इसका नाम ''बीसी'' पड़ा होगा। जो कालांतर में ''बचत कमेटी'' के रूप में जाना जाने लगा। इसलिए किटी को कई जगह ''बीसी'' या ''कमेटी'' के नाम से भी जाना जाता है। धीरे-धीरे इसकी उपयोगिता को देखते हुए इसकी लोकप्रियता चारों ओर, खासकर छोटे शहरों और कस्बों में भी फैलती चली गयी !  
   
किसी समय कोई बचत ना हो पाने की सूरत में किटी, यानी पैसा बचाने के उद्देश्य से जन्मे इस तरीके ने समाज के विभिन्न वर्गों में भी अपनी पैठ बना ली। एक मुश्त अच्छी-खासी रकम मिलने के कारण यह बहुतेरे लोगों की परेशानियों का हल बनने लग गया। इसकी लोकप्रियता का कारण यह भी था कि इसमें कोई अतिरिक्त लाभ जैसे ब्याज आदि नहीं लिया-दिया जाता था। एक छोटी राशि जमा करने पर क्रमवार हरेक को एक अच्छी-खासी बड़ी रकम मिल जाती थी, जिससे उसके पैसे के अभाव में रुके कई काम पूरे हो जाते थे। इसके अलावा एक अतिरिक्त फायदा यह भी था कि लोग कम से कम महीने में एक बार मिल बैठ कर एक दूसरे का हाल-चाल जान लेते थे, मनोरंजन के साथ-साथ आर्थिक सहायता का इंतजाम भी हो जाता था।
किटी की शुरुआत भले ही पुरुषों ने की हो, पर इसकी उपयोगिता के कारण यह महिलाओं द्वारा ऐसे अपना ली गयी कि आज किटी या बीसी (बजट कमेटी) महिलाओं की पार्टी का पर्याय हो गयी है। पहले जिस आयोजन का उद्देश्य सिर्फ कुछ बचत करना था, आज वह महिलाओं का बचत के साथ-साथ आपस में मिलने-जुलने, तफरीह, एक मुश्त पैसा पाने और कुछ समय सिर्फ अपने लिए गुजारने का बेहतरीन जरिया भी बन गया है। घर में अकेलेपन से जूझती अधिकांश बुजुर्ग महिलाओं के लिए भी यह प्रणवायु सिद्ध हो रहा है। बहुतेरी महिलाएं हर हफ्ते अलग-अलग आयोजित ऐसी पार्टियों में शिरकत कर ख़ुशी के कुछ पल अपने लिए संजो लेती हैं। यही वजह है कि छोटे शहरों और कस्बों में भी किटी पार्टी तेजी से लोकप्रिय हुई है। अब तो बदलते चलन के साथ ही इसके भी कई रूप हो गए हैं जैसे, कालोनी किटी पार्टी, सीनियर सिटीजन किटी पार्टी, कपल किटी पार्टी इत्यादि !
जब समूह इत्यादि, जिसमें कई तरह के लोग जुड़े होते हैं, में कोई काम होता है तो जाहिर है अलग-अलग लोगों के विचारों से मतभेद होने की संभावना भी बढ़ जाती है इसलिए वहां कुछ नियम बना दिए जाते हैं, जिससे किसी तरह का मनमुटाव न हो और आपस में विश्वास बना रहे। वैसे ही हर किटी पार्टी के अपने कुछ नियम होते हैं जिनका कड़ाई से पालन करते हुए एक बजट कमेटी (BC) बनाई जाती है। सारे इंतजाम को सुचारु रूप से चलाने के लिए किसी एक सदस्य को कॉर्डिनेटर बना दिया जाता है, जो सभी सदस्यों को बुलाने, तारीख तय करने और पेमेंट लेने का काम करता है। जितने सदस्य होते हैं उतने ही माह निश्चित कर दिए जाते हैं। हर माह सारे सदस्य एक निश्चित राशि जमा कर एक फंड बनाते हैं और पर्ची की सहायता से कमेटी के किसी एक सदस्य चुन सारा पैसा उसे दे दिया जाता है। फिर उस सदस्य का नाम अलग कर दिया जाता है। इसी तरह हर महीने अलग-अलग सदस्य को ये फंड मिलता जाता है और इस तरह ये चक्र पूरा हो जाता है। हर सदस्य को कम से कम एक बार इसे आयोजित करना पड़ता है, और उस दिन मनोरंजन और जलपान का जिम्मा भी उसी का रहता है। आम तौर पर बारह सदस्य ही लिए जाते हैं, जिससे एक साल में चक्र पूरा हो जाए। अब मान लीजिए कि सभी को 5000 रुपये का योगदान करना है, इस तरह 60000 रुपये का फंड तैयार होता है। इस रकम को ड्रॉ द्वारा किसी एक सदस्य को दे दिया जाता है। जिस सदस्य को यह फंड मिलता है, अगली बार किटी पार्टी का सारा खर्च उसे उठाना होता है। इस तरह किटी पार्टी लोगों का ख़ासकर महिलाओं द्वारा आपस में मेलजोल बढ़ाने और बचत करने का एक बेहतरीन जरिया बन गया है। समय के साथ-साथ इसमें भी बदलाव भी आने लगे हैं और किटी पार्टियां अब किसी ख़ास थीम पर, किसी ख़ास जगह पर भी आयोजित होने लगी हैं। बाजार भी इस लोकप्रय आयोजन का फायदा उठाने में पीछे नहीं है। आज तक़रीबन हर होटल, रेस्त्रां में किटी पार्टियों के आयोजन की व्यवस्था रहने लगी है। लोग भी अपने घरों में झंझट पालने की जगह वहां जाने को प्राथमिकता देने लगे हैं।

बुधवार, 5 जून 2019

चलिए, खुद ही एक शुरुआत करें

आज की जरुरत यह कहती है कि हर आदमी को अपना पर्यावरण सुधारने के लिए, पानी को बचाने के लिए, अपने आस-पास के वातावरण को साफ़-सुथरा-स्वच्छ बनाने के लिए, बिना सरकार का मुंह जोहे या किसी और बाहरी सहायता या किसी और की पहल का इंतजार किए या यह सोचे कि मेरे अकेले के करने से क्या होता है, अपनी तरफ से शुरुआत कर देनी चाहिए। कोशिश चाहे कितनी भी छोटी हो पर होनी चाहिए ईमानदारी से। मंजिल पानी है तो कदम तो उठाना पड़ेगा ही ना ! सैकड़ों ऐसे उदहारण  अपने ही देश में ऐसे हैं जब किसी अकेले ने अपने पर विश्वास कर, खुद पहल करने का साहस किया और अपने गांव-कस्बे-जिले की सूरत बदल कर रख दी..........!

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जब भी मौसम बदलता है तब-तब अचानक स्वयंभू विशेषज्ञों की एक जमात हर पत्र-पत्रिका, अखबार, टी.वी. चैनलों पर आ-आ कर सीधे-सादे, भोले-भाले लोगों को डराने का काम शुरू कर देती है ! मौसम के अनुसार ये लोग हवा, पानी, ठण्ड, गर्मी, पर्यावरण का डरावना रूप और बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना शुरू कर देते हैं। सिर्फ नकारात्मक बातें ! वह भी इस लहजे में जैसे इन्हें छोड़ कर बाकी सारे लोग आज के हालात के लिए दोषी हों। ऐसे "उस्ताद लोगों" के पास कोई ठोस उपाय नहीं होते; वह वहाँ बैठे ही होते है दूसरों की या सरकार की आलोचना करने के लिए ! वे सिर्फ समय बताते हैं कि इतने सालों बाद यह हो जाएगा, उतने वर्षों बाद वैसा हो जाएगा; लोगों को ऐसा करना चाहिए, लोगों को वैसा करना होगा, इत्यादि,इत्यादि। 

इनके पास सिर्फ दूसरों के लिए सलाहें और निर्देश होते हैं ! उनसे कोई पूछने वाला नहीं होता कि जनाब आपने इस मुसीबत से पार पाने के लिए व्यक्तिगत तौर पर क्या-क्या किया है ? जैसे अभी भयंकर गर्मी पड़ रही है, तो आपने अपने निजी तौर पर उसे काम करने में क्या सहयोग या उपाय किया है ? क्या आपने अपने लॉन-बागीचे की सिंचाई के लिए प्रयुक्त होते पानी में कुछ कटौती की है ? आप के घर से निकलने वाले कूड़े में अब तक कितनी कमी आई है ? क्या आप शॉवर से नहाते हैं या बाल्टी से ? आपके 'पेट्स' की साफ़-सफाई में कितना पानी जाया किया जाता है ?  क्या आपके घर के AC या TV के चलने का समय कुछ कम हुआ है ? क्या आप यहां जब आए तो संयोजक से AC बंद कर पंखे की हवा में ही बात करने की सलाह दी ? क्या आप कभी पब्लिक वाहन का उपयोग करते हैं ? ऐसे सवाल उन महानुभावों से कोई नहीं पूछेगा ! क्योंकि वे ''कैटल क्लास'' से नहीं आते ! और यह सब करने की जिम्मेदारी तो सिर्फ मध्यम वर्ग की है ! 

वैसे हालत चिंताजनक जरूर है ! पर यह कोई अचानक आई विपदा नहीं है। हमारी आबादी जब बेहिसाब बढी है तो उसके रहने, खाने, पीने की जरूरतें भी तो साथ आनी ही थीं। अरब से ऊपर की आबादी को आप बिना भोजन-पानी-घर के तो रख नहीं सकते थे। उनके रहने खाने के लिये कुछ तो करना ही था जिसके लिये कुछ न कुछ बलिदान करना ही पड़ना था। सो संसाधनों की कमी लाजिमी थी पर हमें उपलब्ध संसाधनों की कमी का रोना ना रो, उन्हें बढाने की जी तोड़ कोशिश करनी चाहिये, समाज को जागरूक करने के साथ-साथ ! जब मुसीबत तो अपना डरावना चेहरा लिये सामने आ ही खड़ी हुई है, तो उससे मुकाबला करने का आवाहन होना चाहिये ना कि उससे लोगों को भयभीत करने का। 

दुनिया में यदि दसियों हजार लोग विनाश लीला पर तुले हैं तो उनकी बजाय उन सैंकड़ों लोगों के परिश्रम को सामने लाने की मुहिम भी छेड़ी जानी चाहिये जो पृथ्वी तथा पृथ्वीवासियों को बचाने के लिये दिन-रात एक किये हुए हैं। ये वे लोग हैं जो सरकार का मुंह जोहने या उसको दोष देने की बजाए खुद जुट पड़े विपदा का सामना करने को ! भले ही छोटे पैमाने पर काम शुरू हुआ हो पर कहते हैं ना, लोग जुड़ते गए काफिला बनता गया ! हम में से अधिकाँश सरकार को दोष देने से बाज नहीं आते ! यदि कभी किसी अभियान से जोश में आ कुछ कर भी देते हैं तो कुछ ही समय बाद उसकी सुध नहीं लेते ! अक्सर अखबारों में ऐसी बातें आती रहती हैं कि फलानी जगह इतने लाख पौधे लगाए गए ! ढिमकानी जगह सैंकड़ों लोगों ने पेड़ लगाने की मुहिम में हिस्सा लिया ! हजारों ने प्लास्टिक की थैलियों को काम में ना लेने की कसमें खायीं ! पर यह सब क्षणिक आवेश में उठाए गए कदम होते हैं ! उसके बाद ना कोई पेड़ों की खबर लेता है ना ही पौधों की सुध ली जाती है ! ना ही कोई प्लास्टिक का मोह छोड़ पाता है ! 

आज की जरुरत यह कहती है कि हर आदमी को अपना पर्यावरण सुधारने के लिए, पानी को बचाने के लिए, अपने आस-पास के वातावरण को साफ़-सुथरा-स्वच्छ बनाने के लिए, बिना सरकार का मुंह जोहे या किसी और बाहरी सहायता या किसी और की पहल का इंतजार किए या यह सोचे कि मेरे अकेले के करने से क्या होता है, अपनी तरफ से शुरुआत कर देनी चाहिए। कोशिश चाहे कितनी भी छोटी हो पर होनी चाहिए ईमानदारी से। मंजिल पानी है तो कदम तो उठाना पड़ेगा ही ना ! सैकड़ों ऐसे उदाहरण अपने ही देश में ऐसे हैं जब किसी अकेले ने अपने पर विश्वास कर, खुद पहल कर अपने गांव-कस्बे-जिले की सूरत बदल कर रख दी हो !

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

व्यस्त रहें, मस्त रहें !

अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा; पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे शरीर चलायमान रहता है। अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग  को उसने घर बनाया है वह स्वस्थ रहे ! बेशक उसकी नीयत ठीक होती है। पर नाम तो उसका बदनाम है, तो वह जो भी करवाता है, वह शैतानियत ही लगती है। जबकि सच्चाई यह है कि उसी के कारण हमारे व्यस्त व स्वस्थ रहने का सकारात्मक असर हमारे परिवार पर पड़ता है। वह बचा रहता है, हमारे बेवजह के हस्तक्षेप से, बिन मांगी सलाहों से, हमारी टोका-टाकी से, बार-बार की चाय-पानी की फरमाइश से, हमारी दवा-दारु की परेशानी से जिसके फलस्वरूप हमारे आत्मीय सुकून महसूस करते हैं, नतीजतन घर में शांति बनी रहती है.........!

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वैसे तो मनुष्य की आदत है अपने भूतकाल को गौरवान्वित करने की ! पर जब इंसान, खासकर सेवा-निवृत्त हुआ, कुछ नहीं करता होता है यानि बेल्ला होता है; और बैठे-बैठे अपने अतीत को खंगालने लगता है तो उस समय खुशनुमा बातें तो कम, बुरी यादें, नाकामियां, आधे-अधूरे प्रसंग,  कष्ट, अभाव व तकलीफ में गुज़रे लम्हों की जैसे फ़िल्मी रील सी चलने लगती है या फिर अनिश्चित भविष्य के खतरे, निर्मूल आशकाएं या अनहोनी घटनाओं का डर उसे घेर लेता है। इस नकारात्मक सोच का दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। जिससे वह अपने को बीमार सा महसूस करने लगता है। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपने-आप को सदा व्यस्त तथा किसी भी काम में उलझाए रखे। काम ही सखा, साथी, सहारा बन जाना चाहिए। इससे एक तो नकारात्मक विचारों को दिमाग में घुसने का मार्ग नहीं मिल पाता, ऊल-जलूल बातों पर ध्यान नहीं जाता और सबसे बड़ी बात शारीरिक और मानसिक रूप से थकने के बाद रात को नींद ना आने की बिमारी से भी मुक्ति मिल जाती है। दिमाग दुरुस्त रहता है और शरीर स्वस्थ। इसलिए हरेक को कुछ भी कैसा भी कोई ना कोई शौक, रूचि, ''हॉबी'' जरूर पाल कर रखनी चाहिए। 

एक कहावत भी है, खाली दिमाग शैतान का घर ! अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे शरीर चलायमान रहे। अब अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग को उसने घर बनाया है, वह स्वस्थ रहे ! बेशक उसकी नीयत ठीक होती है पर नाम तो उसका बदनाम है सो वह जो भी करवाता है, वह शैतानियत ही लगती है ! जबकि सच्चाई यह है कि उसी के कारण हमारे व्यस्त व स्वस्थ रहने का सकारात्मक असर हमारे परिवार पर पड़ता है। वह बचा रहता है, हमारे बेवजह के हस्तक्षेप से, बिन मांगी सलाहों से, हमारी टोका-टाकी से, बार-बार की चाय-पानी की फरमाइश से, हमारी दवा-दारु की परेशानी से ! जिसके फलस्वरूप हमारे आत्मीय सुकून महसूस करते हैं, नतीजतन घर में शांति बनी रहती है। 

भाग्यवश अपने काम के दौरान ही मेराआभासी दुनिया से नाता जुड़ गया था। थोड़ी-बहुत कम्प्युटर की जानकारी हो गयी, खोलना, लिखना, बंद करना आ गया ! जो अब निवृत्ति के बाद ब्लॉग लेखन में सहायक हुआ तो व्यस्त रहने का एक जरिया मिल गया। जीवन का एक अंग हो गया हो जैसे। दो-चार दिन के लिए भी लैप-टॉप अपनी हारी-बिमारी ठीक करवाने डॉक्टर के पास चला जाए तो ऐसा महसूस होता है जैसे कोई प्रियजन बिछुड़ गया हो ! इतना तो कभी श्रीमती जी के मायके जाने पर (शुरूआती दिनों में) भी सूनापन महसूस नहीं होता था ! हालांकि मोबाईल पर सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, पर उस छुटकु पर ना ढंग से लिखा जाता है ना हीं पढ़ा !अलबत्ता धकेले-थकेले-अकेले मैसेज कुछ समय जरूर निकलवा देते हैं। पर आनंद देने वाली व्यस्तता नहीं मिल पाती। तो लब्बो-लुआब यह है कि हमारे पास अपने-आप को व्यस्त रखने का कोई ना कोई जरिया जरूर होना चाहिए। और वह भी ऐसा जिसमें व्यस्त रहते हुए ख़ुशी मिले। आनंद महसूस हो। कुछ ज्ञान बढे। सृजनता का आभास हो। समय की बर्बादी न लगे और ना हीं मजबूरी ! ऐसे के साथ बोनस में घरेलू सुख-शांति-सुकून तो हईये है !        

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

अभयारण्य की देख भाल करने के लिए जरुरी है, जीवट, धैर्य व साहस

सफारी के दौरान शुरू से ही सबके दिमाग में सिर्फ और सिर्फ टाइगर ही छाया हुआ था ! नहीं तो जंगल के परिवेश के एक-एक मीटर का फासला अपने आप में अजूबा समेटे रहता है। अजूबे तो मुझे वे तीन सरकारी कर्मचारी भी लगे, जो अभ्यारण्य के उस हिस्से की सुरक्षा के लिए घोर जंगल में दिन-रात रहते हुए अपना कर्तव्य निभाते हैं !उन्हीं में से सैनी जी ने बताया कि ''जानवर शांति प्रिय ही होते हैं। बेवजह कभी भी आक्रमण नहीं करते, तभी तो आपलोग खुले वाहनों में घूमते हैं, और आपको तो प्रत्यक्ष प्रमाण मिल गया है, जब वह चिड़िया निडर हो आपके हाथ पर चुग्गा चुगने आ बैठी '' 

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कल यहीं बात की थी, अपनी जंगल सफारी की, जब यात्रा के अंत में जा कर अद्भुत रूप से वनराज के दर्शन हुए थे। सफारी में सैंकड़ों लोगों का रोज आना-जाना लगा रहता है। उन सब का मुख्य ध्येय एक ही  रहता है, जंगल के राजा के दर्शन का ! जिन्हें भाग्यवश वनराज दिख जाता है, वे इसे एक बड़ी उपलब्धि मान खुश हो जाते हैं, जिन्हें नहीं दिखता वे कुछ मायूस हो वापस चले जाते हैं। हालांकि अभ्यारण्यों में और भी दसियों तरह के जीव होते हैं, वे भी अपने आप में नायाब होते हैं, उनमें लोगों की दिलचस्पी भी होती है, पर संतुष्टि वनराज को देखने से ही मिलती है। अब; वो तो राजा है ! कब-कहां-कैसे दिखना है यह सब उसकी मर्जी के ऊपर निर्भर करता है। उसकी दुर्लभ पर गरिमामयी उपस्थिति वातावरण को बदल कर रख देती है। कुछ लोग तो हफ़्तों उसके नजर आने का इंतजार करते हैं और दिख जाने पर मंत्रमुग्ध हो, जड़ बने उसे निहारते रहते हैं। 

मार्ग में 

निडर पक्षी 

पर मान लीजिए शेर या बाघ आम जानवरों की तरह जंगल में कहीं भी, कभी भी नजर आने लग जाएं तो भी क्या लोगों में इतनी ही उत्सुकता रहेगी उनको देखने की ? मुझे नहीं लगता ! क्योंकि जो सुगम हो, सर्वत्र उपलब्ध हो उसके लिए उतनी रुचि नहीं रह जाती लोगों में ! देखा गया है कि जंगली सूअर, भैंसे, भालू जैसे खतरनाक जीवों को भी लोग एक नजर देख आगे बढ़ जाते हैं, क्योंकि उनका दिखना आम होता है। अब जैसे जंगल के कर्मचारियों, वहां जाने वाले वाहन चालकों, गाइडों या अन्य स्टाफ के लिए वनराज कोई उत्सुकता का विषय नहीं रह जाता है क्योंकी वे उसे तक़रीबन रोज ही देख लेते हैं। 


शावक 
अपनी इस यात्रा के दौरान और एक बात नोट कि तफरीह के दौरान हम मुख्य उद्देश्य को छोड़ और किसी ओर ध्यान ही नहीं देते, जैसे शुरू से ही सबके दिमाग में सिर्फ और सिर्फ टाइगर ही छाया हुआ था ! नहीं तो जंगल के परिवेश के एक-एक मीटर का फासला अपने आप में अजूबा समेटे रहता है। अजूबे तो मुझे वे तीन सरकारी कर्मचारी भी लगे, जो अभ्यारण्य के उस हिस्से की सुरक्षा के लिए घोर जंगल में रहते हुए अपना कर्तव्य निभाते हैं। सफारी के तय मार्ग के अनुसार कारवां को करीब 15-16 की.मी जंगल के अंदर उस हिस्से के जंगलात के दफ्तर तक जा वहां से वापस होना होता है। वॉश-रूम की सुविधा उपलब्ध होने के कारण भी सारे कैंटर और जीपें वहां कुछ देर रुकते हैं जिससे सैलानी कुछ तरो-ताजा हो सकें। 
जंगलात विभाग का ऑफिस 
प्राकृतिक बावड़ी 
बुद्धि राम व रामअवतार 
वाहनों के ठहरने के स्थान से दफ्तर कुछ ऊंचाई पर बना हुआ है जो शायद सुरक्षा की दृष्टि से किया गया होगा। जब तक लोग इधर-उधर टहल कर पीठ सीधी कर रहे थे उसी समय मेरा ध्यान वहां के तीन के कर्मचारियों की तरफ गया, जो निरपेक्ष भाव से हम सब को देख रहे थे। मैं उनके पास गया। परिचय का लेन-देन हुआ। समय कम था, सो किशोर सैनी और उनके दो सहायक बुद्धि राम तथा राम अवतार से उतने में जो बात हुई, उसका सार यही था कि अपनी ड्यूटी की अवधि के दौरान उन्हें उस घोर जंगल में, अपने परिवार तक से दूर रहना पड़ता है। वहां जानवरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बिजली तो बिजली टार्च तक रखने की मनाही है। रात होने के पहले उन्हें अपना भोजन पका लेना पड़ता है क्योंकि रात में वहां किसी भी प्रकार की रौशनी निषेध है। उनकी अपनी सुरक्षा के लिए उनके पास सिर्फ एक पांच फुट का डंडा ही होता है। सांय-सांय करता बियावान जंगल, घुप अंधकार, जहां हाथ को हाथ न सुझाई दे, चारों ओर दुर्दांत जंगली जीव, दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं, कैसे कटती होगी इन तीनों की रातें ? कुछ अनहोनी हो जाए तो घंटों लगें सहायता आने में ! सलाम है इनके जीवट को !
घिरती शाम 
इनका कहना है कि अब इस सबकी आदत पड़ चुकी है। जंगली जानवर भी अपने लगते हैं। वैसे भी  जानवर शांति प्रिय ही होते हैं। बेवजह कभी भी आक्रमण नहीं करते। यदि कभी कोई जीव रुष्ट भी हो जाता है तो हम धैर्य से ही काम लेते हैं, इससे अब वे हमसे खतरा महसूस नहीं करते। सैनी जी ने हंसते हुए कहा, ''तभी तो आप लोग खुले वाहनों में घूमते हैं, और आपको तो प्रत्यक्ष प्रमाण मिल गया है, जब वह चिड़िया निडर हो आपके हाथ पर चुग्गा चुगने आ बैठी '' ! दफ्तर के पास ही एक प्राकृतिक बावड़ी है जिसमें बारहों महीने स्वच्छ-निर्मल पानी उपलब्ध रहता है, उसी से सबका काम चलता है। दिनके उजाले में या सफारी के वाहनों की आवाजाही से जो वन्य-जीव जंगल के गर्भ में चले जाते हैं वे भी दिन ढलने के बाद स्वछंद हो इधर आ कर अपनी प्यास बुझाते हैं। आजकल एक व्याघ्र परिवार इधर अक्सर आता है, जिसमें नर, मादा तथा दो बच्चे हैं। 
वनराज आराम के मूड में 
तभी कारवां के ''मूवने'' का समय हो गया। किसी बार्डर पर बैठे सैनिकों के समान उन तीनों से मैंने विदा ली। सारे सैलानी अपने-अपने वाहनों में जा कर फिट हो गए। आगे क्या होने वाला है ! प्रकृति क्या रंग दिखाने वाली है ! इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी ! किसी को सपने में भी ख्याल नहीं आया होगा कि हमें विदाई देने के लिए खुद वनराज द्वार पर मौजूद रहेंगे !!! 

बुधवार, 17 अक्टूबर 2018

नवरात्रों में कन्या भोज

कन्या भोज के दिन फिर आ गए हैं पर कुछ वर्षों से नवरात्रों में भी कुछ बदलाव आया है, कन्या भोज के दिनों में वह पहले जैसी आपाधापी कुछ कम हुई लगती है, अब आस-पडोस की अभिन्न सहेलियों में वैसा अघोषित युद्ध नहीं छिड़ता ! नहीं तो पहले सप्तमी की रात से ही कन्याओं की बुकिंग शुरु हो जाती थी । फिर भी सबेरे-सबेरे हरकारे दौड़ना शुरु कर देते हैं। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं ? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी ! एक पुरानी रचना जो आज भी सामयिक और प्रासंगिक है.................


#हिन्दी_ब्लागिंग 
सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी।  द्वार खोल कर देखा तो पांच से दस  साल की चार - पांच  बच्चियां  लाल रंग के 
कपड़े  पहने  खड़ी थीं।   छूटते ही  उनमें सबसे  बड़ी  लड़की ने  सपाट आवाज  में सवाल  दागा,   ''अंकल, कन्या
खिलाओगे'' ?   
मुझे  कुछ सूझा नहीं,  अप्रत्याशित   सा था यह सब। अष्टमी के दिन कन्या पूजन होता है। पर वह सब परिचित चेहरे होते हैं, और आज वैसे भी षष्ठी है। फिर सोचा शायद गृह मंत्रालय  ने कोई अपना विधेयक पास कर दिया हो इसलिये इन्हें बुलाया हो। अंदर पूछा,   तो पता चला कि ऐसी कोई बात नहीं है !  मैं फिर  कन्याओं  की ओर  मुखातिब   हुआ और बोला,  ''बेटाआज नहीं,  हमारे  यहां अष्टमी  को पूजा  की जाती है''। "अच्छा कितने बजे" ? फिर सवाल उछला, जो  सुनिश्चित  कर  लेना  चाहता था,  उस दिन के निमंत्रण को।  मुझसे कुछ कहते नहीं बना, कह दिया,  ''बाद में बताऐंगे''।  तब   तक बगल वाले घर की घंटी बज चुकी थी।

मैं सोच रहा था कि बड़े-बड़े व्यवसायिक घराने या नेता आदि ही नहीं आम जनता भी चतुर होने लग गयी है। सिर्फ दिमाग होना चाहिये। दुह लो, मौका देखते ही, जहां भी जरा सी गुंजाईश हो। बच ना पाए कोई। जाहिर है कि ये छोटी-छोटी बच्चियां इतनी चतुर सुजान नहीं हो सकतीं। यह सारा खेल इनके माँ, बाप, परिजनों द्वारा रचा गया है।
जोकि दिन भर टी.वी. पर जमाने भर के बच्चों को उल्टी-सीधी हरकतें करते और पैसा कमाते देख, हीन भावना से ग्रसित होते रहते हैं। अपने नौनिहालों को देख कुढते रहते हैं कि लोगों के कुत्ते-बिल्लियाँ भी छोटे पर्दे पर पहुँच कमाई करने लग गए हैं, दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी और हमारे बच्चे घर बैठे सिर्फ रोटियां तोड़े जा रहे हैं। फिर ऐसे ही किसी कुटिल दिमाग में इन दिनों  बच्चों को घर-घर जीमते देख यह योजना आयी होगी और उसने इसका कापी-राइट कोई और करवाए, इसके पहले ही, दिन देखा ना कुछ और बच्चियों को नहलाया, धुलाया, साफ सुथरे कपड़े पहनवाए, एक वाक्य रटवाया, "अंकल/आंटी, कन्या खिलवाओगे ? और इसे अमल में ला दिया।

ऐसे लोगों को पता है कि इन दिनों लोगों की धार्मिक भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। फिर  बच्ची स्वरुपा देवी को

अपने दरवाजे पर देख भला  कौन मना करेगा।    सब  ठीक   रहा तो सप्तमी, अष्टमी और नवमीं इन तीन दिनों तक बच्चों और हो सकता है कि पूरे घर के खाने का इंतजाम हो जाए। ऊपर से बर्तन, कपड़ा और नगदी अलग से। इसमें कोई  दिक्कत   भी नहीं आती,  क्योंकि इधर वैसे ही आस्तिक गृहणियां चिंतित रहती हैं, कन्याओं की आपूर्ती को लेकर।   जरा सी देर हुई या  अघाई कन्या ने खाने से इंकार किया और हो गया अपशकुन ! इसलिए होड़ लग जाती है पहले अपने घर कन्या बुलाने की !



अब फिर कन्या भोज के दिन आ गए हैं पर पिछले कुछ वर्षों से नवरात्रों में भी कुछ बदलाव आया है, अब इन दिनों में वह पहले जैसी आपाधापी कुछ कम हुई लगती है, अब आस - पडोस की  अभिन्न सहेलियों में वैसा अघोषित युद्ध
नहीं छिड़ता ! नहीं तो  सप्तमी की रात से ही कन्याओं की बुकिंग शुरु हो जाती है। फिर भी सबेरे-सबेरे हरकारे
दौड़ना शुरु कर देते हैं। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी  तक आई क्यूं नहीं? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी ! कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है।इधर काम पर जाने वाले हाथ में लोटा, जग लिए खड़े हैं कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार कर काम पर जाएं। देर हो रही है, पर आफिस के बॉस से तो निपटा जा सकता है, वैसे आज के दिन तो वह भी लोटा लिए खड़ा होगा कन्याओं के इन्जार में,  घर के इस बॉस से कौन पंगा ले, वह भी तब जब बात धर्म की हो।                                                                                 
आज इन "चतुर-सुजान" लोगों ने कितना आसान कर दिया है  सब कुछ।  पूरे देश को राह दिखाई है, घर पहुंच सेवा प्रदान कर।

"जय माता दी"

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