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बुधवार, 13 मार्च 2024

अवमानना संविधान की

आज CAA के नियमों को लेकर जैसा बवाल मचा हुआ है, उसका मुख्य कारण उसके नियम नहीं हैं बल्कि हिन्दू विरोधी नेताओं की शंका है, जिसके तहत उन्हें लगता है कि गैर मुस्लिम लोगों को नागरिकता मिल जाने से उनका वोट बैंक कमजोर पड़ जाएगा ! उन्हें अपने मतलब के अंधकार में उन लाखों लोगों का दर्द नहीं दिखलाई पड़ता जो वर्षों-वर्ष से बिना किसी पहचान के निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हैं ! ये लोग सीधे-सीधे तो कह नहीं सकते तो उसी संविधान की आड़ ले कर इस कानून का विरोध कर रहे हैं जो उन्हें ऐसा करने का अधिकार ही नहीं देता ! पर वे ऐसा अभी भी आम जनता को बौड़म समझने वाली सोच की तहत किए जा रहे हैं..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक होता है संविधान, जिसके अनुसार देश चलता है ! एक होता है न्यायालय, जिस पर देश की कानून व न्याय व्यवस्था की जिम्मेवारी होती है। न्यायालय का शिखर है सर्वोच्च न्यायालय ! यही सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक होता है ! अब देखने की बात यह है कि जब न्यायालयों के संचालकों, महामहिमों की बात की जरा सी अवहेलना पर किसी पर भी मानहानि का मुकदमा चल सकता है तो उनके संरक्षण में रहने वाले संविधान, के विरुद्ध आचरण करने वालों पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की जाती ! क्यों उसका मजाक बनाया जाता है ? उसकी गलत आड़ लेकर अपना मतलब सिद्ध करने वालों को कोर्ट क्यों नहीं तुरंत बेनकाब करता ? जबकि संविधान सर्वोपरि है, गुरुग्रंथ है, उसकी कसमें खाई जाती हैं !

ज्यादातर राजनीति करने वालों का मुख्य लक्ष्य सत्ता हासिल करने का ही होता है ! उसके लिए वे किसी भी हथकंडे को काम में लाने में नहीं हिचकते ! इसमें कोई भी दल दूध का धुला नहीं होता ! वर्षों से मौकापरस्त, सत्ता पिपासु लोग समयानुसार संविधान की दुहाई दे कर जनता को गुमराह करते रहे हैं ! जबकि जनता ज्यादातर अनपढ़ होती थी ! आज भी अनपढ़ को तो छोड़िए, लाखों पढ़े-लिखे लोगों को भी संविधान के "स'' का पता नहीं है ! पर अब जिस तरह से देश में जागरूकता दस्तक दे रही है,  हर तरफ बदलाव दिख रहा है, खासकर शिक्षा के क्षेत्र में ! बच्चे भी पहले से ज्यादा समझदार और जानकार हो गए हैं, तो अब होना यह चाहिए कि संविधान की मुख्य बातें स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दी जाएं ! जिससे वे जब बड़े हो कर जिम्मेदार नागरिक बनें तो कोई भी ऐरा-गैरा उन्हें बेवकूफ ना बना सके ! हालांकि अभी भी हमारी आँखों पर धर्म, जाति, भाषा, सम्प्रदाय की पट्टी बंधी हुई है। अभी भी चुनावों में यह मुख्य कारक होते हैं फिर भी कोशिश तो जारी रहनी ही चाहिए ! इसके लिए सबसे अहम है जागरूकता और उसके लिए जरुरी है शिक्षा और यही वह अस्त्र है जिसके द्वारा हर तरह की कुटिलता का नाश संभव हो सकता है। सत्य की सदा जय हो सकती है। 

आज नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के नियमों को लेकर जैसा बवाल मचा हुआ है, उसका मुख्य कारण उसके नियम नहीं हैं बल्कि हिन्दू विरोधी नेताओं की शंका है, जिसके तहत उन्हें लगता है कि गैर मुस्लिम लोगों को नागरिकता मिल जाने से उनका वोट बैंक कमजोर पड़ जाएगा ! उन्हें अपने मतलब के अंधकार में उन लाखों लोगों का दर्द नहीं दिखलाई पड़ता जो वर्षों-वर्ष से बिना किसी पहचान के निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हैं ! ये लोग सीधे-सीधे तो कह नहीं सकते तो उसी संविधान की आड़ ले कर इस कानून का विरोध कर रहे हैं जो उन्हें ऐसा करने का अधिकार ही नहीं देता ! पर वे ऐसा अभी भी आम जनता को बौड़म समझने वाली सोच की तहत किए जा रहे हैं ! विडंबना है कि वे उसी संविधान का गलत सहारा लेने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी शपथ ले वे सत्ता की कुर्सी पर काबिज हुए हैं ! 

जो भी दल सत्ता में होता है वह चुनावों में अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिए हर दांव चलता है, हर पैंतरा आजमाता है ! ऐसे में विरोधी दलों के नेता, जो खुद उसी खेल के खिलाड़ी हैं, ऐसे दांव-पेंच वे खुद भी बखूबी आजमाते रहते हैं, उनको अपनी अलग मजबूत रणनीति बना मुकाबला करना चाहिए नाकि सिर्फ सत्ता पक्ष को गरियाते हुए चिल्ल्पों मचा के अपना ही जुलुस निकलवाना चाहिए ! जनता तो इनका तमाशा देख ही रही है पर आश्चर्य है कि संविधान के संरक्षक क्यों चुप हैं.........!

सोमवार, 26 फ़रवरी 2024

मैनिकिन (पुतले) राजनीति के

सच तो यह है कि जैसे कपड़ों की दुकानों के बाहर मानवाकार पुतलों (Mannequins) को कपड़े पहना कर ग्राहकों को आकृष्ट करने का उपक्रम किया जाता है कुछ वैसे ही राजनीतिक पार्टियां इन प्रसिद्ध हस्तियों को अपना चिन्ह दे वोटरों को लुभाने की चेष्टा करती रहती हैं। उनके माथे पर अपने दल का चिन्ह अंकित कर, किसी भी आड़ी-टेढ़ी गली से प्रवेश दिला, उन्हें देश के सदनों में ला कर शो-पीस की तरह सजा दिया जाता है ! ऐसी मूर्तियों को इससे कोई मतलब नहीं होता कि जिस दल का ये प्रतिनिधित्व कर रही हैं उसके नेता और उनका सिद्धांत देश और समाज के लिए हितकर हैं भी कि नहीं ..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज अखबार में एक खबर थी कि आगामी चुनावों में दिल्ली की एक सीट पर फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को उतारा जा सकता है ! पता नहीं क्यों ऐसे अनगिनत नकारात्मक प्रयोगों के बावजूद फिल्म वालों से राजनीतिक दलों का मोह भंग नहीं होता ! आजादी के बाद से ही यह सिलसिला जारी है ! शो जगत के वाशिंदे सदा चर्चा में बने रहने के लिए अपने करियर के अवसान को भांप राजनीति की ओर उन्मुख होने लगते हैं ! जोड़-तोड़ और अपने विगत की लोकप्रियता की बैसाखियों के सहारे उन्हें राजदरबार में प्रवेश भी मिल जाता है ! पर इक्के-दुक्के अपवाद को छोड़ आजादी के बाद से ऐसे लोग सिर्फ अपना भविष्य ही सुधारने में सफल रहे हैं, देश तो दूर समाज के हित के लिए कभी कोई उपलब्धि हासिल नहीं करवा पाए !   

मैनिकिन

सब जानते-बूझते भी सिर्फ उनकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए हर राजनीतिक दल अपने पलक-पांवड़े बिछाए रहता है ! उनके माथे पर अपने दल का चिन्ह अंकित कर, किसी भी आड़ी-टेढ़ी गली से प्रवेश दिला, देश के सदनों में ला कर शो-पीस की तरह सजा दिया जाता है ! ऐसी मूर्तियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता या मतलब होता कि जिस दल का ये प्रतिनिधित्व कर रही हैं, उसके नेता और उनका सिद्धांत देश और समाज के लिए हितकर हैं भी कि नहीं ! इनको तो सिर्फ अपनी फोटो खिंचवाने, छुटभैयों को औटोग्राफ देने और अपने रसूख का प्रदर्शन कर, चर्चा में बने रहने का सुख लेना होता है। सच तो यह है कि जैसे कपड़ों की दुकानों के बाहर मानवाकार पुतलों (Mannequins) को कपड़े पहना कर ग्राहकों को आकृष्ट करने का उपक्रम किया जाता है कुछ वैसे ही राजनीतिक पार्टियां इन प्रसिद्ध हस्तियों को अपना चिन्ह दे वोटरों को लुभाने की चेष्टा करती रहती हैं ! 

ऐसे दसियों नाम हैं जिन्होंने सदनों में शायद ही कभी मुंह खोला हो ! कई तो सत्र में आते ही नहीं ! बहुतेरे ऐसे हैं जो अपने संसदीय क्षेत्रों में जाने से गुरेज करते हैं ! इस सब के बावजूद राजनीतिक दल उनके तथाकथित आभा मंडल से चौंधिया कर बार-बार उन्हें अपना टिकट थमाते रहते हैं ! अभी एक नेत्री को अपने चार कार्यकालों में कोई भी उपलब्धि न होने के बावजूद पांचवीं बार टिकट दिए जाने पर काफी बहसबाजी हुई थी ! इस वर्ग में अधिकांश लोग ऐसे ही हैं जो देश के इन सम्मानित सदनों में, आम इंसान की गाढ़ी कमाई के एवज में सिर्फ अपने चेहरे, अपने कपड़ों, अपने आभूषणों, अपने रसूख का प्रदर्शन करने आते हैं ! 

सत्ता पक्ष समेत अन्य समस्त पार्टियां भी चुनाव के समय इस पहलू पर विचार करते हुए अपने ऐसे ही उम्मीदवार का चयन करें जो देश, समाज के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला रखता हो ना कि सिर्फ अपने को स्थापित करने का ! जनता का क्या ठिकाना, ऐसा न हो कि आगामी कुछ सालों में जनहित की गुहार लगाते हुए कोई सिरफिरा सर्वोच्च न्यायालय में इस विषय पर अर्जी ही दाखिल कर दे.....................! 

--सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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