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सोमवार, 26 फ़रवरी 2024

मैनिकिन (पुतले) राजनीति के

सच तो यह है कि जैसे कपड़ों की दुकानों के बाहर मानवाकार पुतलों (Mannequins) को कपड़े पहना कर ग्राहकों को आकृष्ट करने का उपक्रम किया जाता है कुछ वैसे ही राजनीतिक पार्टियां इन प्रसिद्ध हस्तियों को अपना चिन्ह दे वोटरों को लुभाने की चेष्टा करती रहती हैं। उनके माथे पर अपने दल का चिन्ह अंकित कर, किसी भी आड़ी-टेढ़ी गली से प्रवेश दिला, उन्हें देश के सदनों में ला कर शो-पीस की तरह सजा दिया जाता है ! ऐसी मूर्तियों को इससे कोई मतलब नहीं होता कि जिस दल का ये प्रतिनिधित्व कर रही हैं उसके नेता और उनका सिद्धांत देश और समाज के लिए हितकर हैं भी कि नहीं ..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज अखबार में एक खबर थी कि आगामी चुनावों में दिल्ली की एक सीट पर फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को उतारा जा सकता है ! पता नहीं क्यों ऐसे अनगिनत नकारात्मक प्रयोगों के बावजूद फिल्म वालों से राजनीतिक दलों का मोह भंग नहीं होता ! आजादी के बाद से ही यह सिलसिला जारी है ! शो जगत के वाशिंदे सदा चर्चा में बने रहने के लिए अपने करियर के अवसान को भांप राजनीति की ओर उन्मुख होने लगते हैं ! जोड़-तोड़ और अपने विगत की लोकप्रियता की बैसाखियों के सहारे उन्हें राजदरबार में प्रवेश भी मिल जाता है ! पर इक्के-दुक्के अपवाद को छोड़ आजादी के बाद से ऐसे लोग सिर्फ अपना भविष्य ही सुधारने में सफल रहे हैं, देश तो दूर समाज के हित के लिए कभी कोई उपलब्धि हासिल नहीं करवा पाए !   

मैनिकिन

सब जानते-बूझते भी सिर्फ उनकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए हर राजनीतिक दल अपने पलक-पांवड़े बिछाए रहता है ! उनके माथे पर अपने दल का चिन्ह अंकित कर, किसी भी आड़ी-टेढ़ी गली से प्रवेश दिला, देश के सदनों में ला कर शो-पीस की तरह सजा दिया जाता है ! ऐसी मूर्तियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता या मतलब होता कि जिस दल का ये प्रतिनिधित्व कर रही हैं, उसके नेता और उनका सिद्धांत देश और समाज के लिए हितकर हैं भी कि नहीं ! इनको तो सिर्फ अपनी फोटो खिंचवाने, छुटभैयों को औटोग्राफ देने और अपने रसूख का प्रदर्शन कर, चर्चा में बने रहने का सुख लेना होता है। सच तो यह है कि जैसे कपड़ों की दुकानों के बाहर मानवाकार पुतलों (Mannequins) को कपड़े पहना कर ग्राहकों को आकृष्ट करने का उपक्रम किया जाता है कुछ वैसे ही राजनीतिक पार्टियां इन प्रसिद्ध हस्तियों को अपना चिन्ह दे वोटरों को लुभाने की चेष्टा करती रहती हैं ! 

ऐसे दसियों नाम हैं जिन्होंने सदनों में शायद ही कभी मुंह खोला हो ! कई तो सत्र में आते ही नहीं ! बहुतेरे ऐसे हैं जो अपने संसदीय क्षेत्रों में जाने से गुरेज करते हैं ! इस सब के बावजूद राजनीतिक दल उनके तथाकथित आभा मंडल से चौंधिया कर बार-बार उन्हें अपना टिकट थमाते रहते हैं ! अभी एक नेत्री को अपने चार कार्यकालों में कोई भी उपलब्धि न होने के बावजूद पांचवीं बार टिकट दिए जाने पर काफी बहसबाजी हुई थी ! इस वर्ग में अधिकांश लोग ऐसे ही हैं जो देश के इन सम्मानित सदनों में, आम इंसान की गाढ़ी कमाई के एवज में सिर्फ अपने चेहरे, अपने कपड़ों, अपने आभूषणों, अपने रसूख का प्रदर्शन करने आते हैं ! 

सत्ता पक्ष समेत अन्य समस्त पार्टियां भी चुनाव के समय इस पहलू पर विचार करते हुए अपने ऐसे ही उम्मीदवार का चयन करें जो देश, समाज के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला रखता हो ना कि सिर्फ अपने को स्थापित करने का ! जनता का क्या ठिकाना, ऐसा न हो कि आगामी कुछ सालों में जनहित की गुहार लगाते हुए कोई सिरफिरा सर्वोच्च न्यायालय में इस विषय पर अर्जी ही दाखिल कर दे.....................! 

--सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

अथ रसगुल्ला कथा

रसगुल्ले की प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों, बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओड़िसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। 2017 में सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो। इस मिठाई की प्रसिद्धि का यह आलम था कि इसके आविष्कारक नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

"नोवीन दा !  किछू नोतून कोरो, डेली एकई धरनेर मिष्टी आर भालो लागे ना."    

"हें, चेष्टा कोच्छि (कोरछि), दैखो की होय."   
 
1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था। तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा, कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा ! किछू नोतून कोरो)।  नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। और सच में वे कोशिश कर भी रहे थे कुछ नया बनाने की जिसमें उनका भरसक साथ दे रही थीं उनकी पत्नी, खिरोदमोनी । उसी कुछ नया के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में "कुछ" मिलाया, अब जो चीज सामने आई, उसका स्वाद अद्भुत था ! खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।
नवीन चंद्र दास 
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जहां अपनी आँखों से ज्यादा आपकी आँखों का ख्याल रखा जाता है 
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कलकत्ता वासियों ने जब इस नयी चीज का स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गई। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह  "चीज"  जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन को छोड़ उनके कारिगरों को भी नहीं था।
रस के गोले 
नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम "टच" देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को कभी भी गिरने नहीं दिया है।  

खीरमोहन 
बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रोशोगोल्ले" का जवाब नहीं। इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूडिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है। 
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जो भी हो रसगुल्ले का जन्म तब के ईस्ट इंडिया का ही माना जाता है, जिसे आज बंगाल और ओड़िसा के नाम से जानते हैं। वैसे 2017 में सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो। इस मिठाई की प्रसिद्धि का यह आलम था कि इसके आविष्कारक नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है !  
रसगोल्ला फिल्म का पोस्टर 
उजान गांगुली, जिन्होंने नवीन चंद्र का किरदार निभाया 
यह है इस मिठाई का ''क्रेज़''। हालांकि आजकल बदलते समय के साथ कई लोग इसके नाम का सहारा ले उल्टी-सीधी मिठाइयां, जैसे पान रसगुल्ला, मिर्ची रसगुल्ला, गुलाब रसगुल्ला, चॉकलेट रसगुल्ला जैसे सौ स्वादों वाले रसगुल्ले बनाने का दावा कर नाम और दाम कमाने से नहीं हिचकिचा रहे। यह सही है कि किसी को कुछ बनाने की रोक नहीं है पर किसी की ख्याति को भुनाना भी उचित नहीं होता। देखना है कि बंगाल का, अपनी परंपराओं से लगाव रखने वाला, भद्रलोक किसे सर-माथे पर बिठाए रखता है।   
तो यदि कभी कोलकाता जाना हो तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में बिना पड़े, बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।

@लेख के सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

जब फिल्म ''मदर इंडिया'', ''दिस लैंड इज माईन'' बनते-बनते रह गई

पर दिलीप कुमार तो दिलीप कुमार ! उन्हें पता था कि फिल्म नायिका पर केंद्रित है, सारा श्रेय उसे ही मिलने वाला है ! तो भाई ने जगह-जगह कहानी में ज़रा-ज़रा सा बदलाव लाने का सुझाव देना शुरू कर दिया ! फिर इतने से भी काम नहीं बनता दिखा, तो उन्होंने अपने लिए डबल रोल की फरमाइश कर डाली। पहले नायिका का पति और फिर उसका लड़का ! जो सुक्खी लाला से अपनी जमीन हासिल करने के लिए लड़ता और जीतता है। यहां तक कि फिल्म का नाम तक भी सुझा दिया  ''दिस लैंड इज माईन''...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कई बार ऐसा होता है कि कोई इंसान जो समाज में बहुत लोकप्रिय होता है, अवाम का चहेता या आदर्श होता है ! जिसे लोग चाहते हों, प्यार करते हों ! जिसके बारे में उनकी धारणा सिर्फ भले मानुष की हो, ऐसे आदमी को अपनी छवि बनाए रखने के लिए काफी जतन करने पड़ते हैं। अपनी नकारात्मकता को छुपाने के लिए कई-कई सच्ची-झूठी कहानियां घडनी पड़ती हैं ! ''मिथ'' रचना पड़ता है !

औरत 

एक ऐसा ही मिथ, जो पिछले तिरसठ सालों से सच का रूप धरे था, उसका अब जा कर खुलासा हुआ है ! अब तक यही कहा जाता रहा है कि फिल्म मदर इंडिया में दिलीप कुमार ने बिरजू का रोल करने से इस लिए इंकार कर  दिया था क्योंकि वह अपनी अब तक की नायिका रही नर्गिस के बेटे का किरदार नहीं करना चाहते थे। पर सच्चाई इसके विपरीत थी ! उन्हें एक तरह से इस फिल्म से निकाला गया था। पर उनके चाहने वालों पर इस बात का विपरीत असर ना पड़े इसलिए उपरोक्त कहानी गढ़ी गई थी। 

जब नर्गिस को पता चला कि दिलीप कुमार उनके बेटे का रोल कर रहे हैं तो उन्होंने इतनी बड़ी उपलब्धि को भी यह कहते हुए साफ़ इंकार कर दिया कि ''मैं पर्दे पर जिनके साथ रोमांस कर चुकी, उनके साथ माँ-बेटे जैसा रिश्ता निभाना मुझे कतई मंजूर नहीं। अगर दिलीप कुमार बिरजू का रोल करते हैं तो मैं इस फिल्म में काम नहीं कर पाऊंगी।'' 

हुआ यह था कि जब महबूब खान ने अपनी यादगार फिल्म ''औरत'' को दोबारा ''मदर इंडिया'' के नाम से बनाने की सोची, तो कास्टिंग के समय उनके जेहन में बिरजू के रोल के लिए अपने गहरे मित्र दिलीप कुमार का नाम छाया हुआ था। उनको कहानी सुनाई गई ! वे मान भी गए ! पर दिलीप कुमार तो दिलीप कुमार ! उन्हें पता था कि फिल्म नायिका पर केंद्रित है, सारा श्रेय उसे ही मिलने वाला है ! तो भाई ने जगह-जगह कहानी में ज़रा-ज़रा सा बदलाव लाने का सुझाव देना शुरू कर दिया ! फिर इतने से भी काम नहीं बनता दिखा तो उन्होंने अपने लिए डबल रोल की फरमाइश कर डाली। पहले नायिका का पति और फिर उसका लड़का ! जो सुक्खी लाला से अपनी जमीन हासिल करने के लिए लड़ता और जीतता है। यानी पूरी फिल्म  की ! यहां तक कि उन्होंने इस फिल्म का नाम तक भी सुझा दिया ''दिस लैंड इज माईन'' ! महबूब एक सरल ह्रदय इंसान थे, तिस पर दिलीप कुमार के दोस्त, वे इन सब बदलावों के लिए तैयार भी हो गए। उन्हें इस बात का ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ कि उनके दोस्त ने उनकी कहानी की आत्मा को मार, फिल्म को पूर्णतया अपनी बना लिया है और इसकी पूरी तैयारी भी शुरू कर दी है जिसके लिए अपने बाप और बेटे के रोल के लिए स्पेशल विग बनवाने लंदन भी चले गए हैं। 

औरत 

पर विधि को कुछ और ही मंजूर था। ''औरत'' के लेखक वजाहत मिर्जा को यह सब बदलाव बेहद नागवार गुजर रहे थे। उनके अनुसार इस तरह तो कहानी की मूल भावना और उद्देश्य ही ख़त्म हो रहे थे। उन्होंने जब इस बात का पुरजोर विरोध किया तो यूनिट के बाकी लोग भी उनके साथ आ खड़े हुए। इधर जब नर्गिस को, जिन्हें ऐसे ही रोल की सदा से तलाश थी जो उनकी फ़िल्मी जिंदगी का मील का पत्थर साबित हो सके, पता चला कि दिलीप कुमार उनके बेटे का रोल कर रहे हैं तो उन्होंने इतनी उपलब्धि को भी यह कहते हुए साफ़ इंकार कर दिया कि ''मैं पर्दे पर जिनके साथ रोमांस कर चुकी, उनके साथ माँ-बेटे जैसा रिश्ता निभाना मुझे कतई मंजूर नहीं। अगर दिलीप कुमार बिरजू का रोल करते हैं तो मैं इस फिल्म में काम नहीं कर पाऊंगी।'' 

मदर इंडिया 

इन सब के बीच महबूब बुरी तरह उलझ कर रह गए ! एक तरफ जिगरी दोस्त दिलीप कुमार और दूसरी तरफ नर्गिस और उनकी अपनी पूरी टीम ! आखिर फिल्म के हित के लिए उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा। नरगिस को नायिका का रोल सौंपा गया।  दिलीप को समझा-बुझा कर और उनकी इज्जत के लिए नर्गिस की बात को उनकी बता, एक मिथ रच कर उन्हें फिल्म से अलग किया गया। सारे बदलाव रद्द कर पुरानी कहानी को बरकरार रखते हुए ''दिस लैंड इज माईन'' को ''मदर इंडिया'' का नाम दे इतिहास रचा गया। 

@संदर्भ, आभार - राजकुमार केसवानी, पुस्तक-नर्गिस, बन्नी रूबेन  

गुरुवार, 18 जून 2020

कुनबा-परस्ती, स्वजन पक्षपात, भाई-भतीजावाद के गह्वर में सुशांत सिंह

रही बात नेपोटिस्म की ! तो यह बुराई है तो जरूर, पर किसी के संरक्षण से कोई बुलंदियां नहीं छू पाता ! फिल्म हो, खेल हो, व्यवसाय हो या राजनीति ! इनमें किसी की सहायता से ''इंट्री'' भले ही मिल जाए, टिकाव और सफलता तो अपनी लियाकत से ही मिल पाती है। यदि ऐसा ना होता तो एकता कपूर के भाई तुषार के पास आज काम की वजह से दम लेने तक की फुरसत न होती। अभिषेक बच्चन से ज्यादा पॉवर-फुल और कौन होता ! दो साल से इंडस्ट्री पर राज करने वाला शाहरुख, जिसके बारे में यही जौहर कहा करता था कि उसके बिना वह फिल्म ही नहीं बनाएगा, आज घर बैठा हुआ है। गोविंदा, जिसके पीछे लोग चिरौरियां करते घूमते थे, उसे आज कोई पूछ नहीं रहा ! बहुत से ऐसे कलाकार हुए हैं जिनके पास बहुत दिनों तक काम नहीं होता ! ऐसे लोगों पर लिखने बैठें तो ग्रंथ बन जाए ! पर इन लोगों ने आत्महत्या तो नहीं कर ली ....................!      
 
#हिन्दी_ब्लागिंग
टी.वी. से फिल्मों में आए सुशांत सिंह ने किन्हीं अज्ञात कारणों से ख़ुदकुशी कर ली। एक हसमुख उभरते कलाकार का ऐसा अंत सभी को हिला कर रख गया ! पर साथ ही यह मार्मिक व दुखद घटना हमारे फिल्म जगत की चकाचौंध के पीछे छिपी उसकी व्यवस्था, उसकी मानसिकता, उसकी संवेदनशीलता पर भी कई प्रश्न चिन्ह लगा गई ! उनकी मृत्यु के दिन से ही लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आई हुई है। हर कोई विशेषज्ञ बना अपनी राय, अपने विचार थोपे जा रहा है ! जिनमें संवेदनाएं कम अपनी पसंद-नापसंद के लोगों पर कुंठायुक्त पूर्वाग्रही आक्षेप ज्यादा सामने आने लगे हैं। कुछ अपने नाम को सुर्ख़ियों में रखने के लिए इस पर शोध की बातें करने लगे हैं !
 
यह बात बिल्कुल सही है कि मुंबईया फ़िल्मी जगत में स्वजन-पक्षपात बहुत ज्यादा है ! वहां अपनी-अपनी पसंद है !अपने-अपने गिरोह हैं ! अपने-अपने खेमे हैं ! जिसके खोल में हर कोई सुरक्षित रहना चाहता है। फिल्म निर्माण इतना खर्चीला हो गया है कि अधिकांश फिल्मों की लागत भी नहीं निकल पाती। एक फिल्म का पिटना कई घरों का दिवाला निकाल देता है ! इसीलिए सभी निरापद और सक्षम घोड़े पर दांव लगाना पसंद करते हैं। पर इसके साथ-साथ यह भी सच है कि यहां रिश्ते तभी तक निभाए जाते हैं जब तक अपना फ़ायदा हो रहा हो। दुनिया में इतना निष्ठुर, मतलबी, बेमुरौवत, बेवफा, तोताचश्म व्यवसाय शायद ही कोई और हो ! यहां सदा से ही चढ़ते सूरज को सलाम ठोका जाता रहा है। पर यह तो सदा से ही रहा है। कोई नई बात नहीं है।

कहा जा रहा है कि सुशांत की करण जौहर गाहे-बगाहे बेइज्जती करता, करवाता रहता था ! उसके एक कॉफी वाले शो में भी उसका काफी मजाक वगैरह बनाया गया था ! जौहर और उसके दोस्त उसे काम देने में भी काफी टाल-मटोल किया करते थे ! तो ऐसा क्या था जो इस ''गैंग'' को ना छोड़ पाने को उसे मजबूर कर रखा था ! इतने सबके बावजूद फिर क्यों उसकी ही स्तर हीन फिल्म ''ड्राइव'' में काम करने का लोभ संवरण नहीं हो पाया ! ऐसे कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं !  
   
इधर आज फिर कुछ लोग भाई-भतीजा वाद को लेकर कुछ लोगों को निशाना बना रहे हैं। आज फिर कुछेक को मौका मिल गया है अपनी नापसंदगी पर आक्रोषित होने का ! जिन पर आरोप लग रहे हैं वे कोई बहुत महान फिल्मकार नहीं हैं ! ना हीं उन्होंने इस विधा का कुछ भला किया है । वे कला के बल पर नहीं सिर्फ अपने रिश्तों और भाग्य के कारण मशहूर हो पाए हैं। जो पांच-छह नाम लिए जा रहे हैं, उनमें कोई एक भी अपनी ऐसी उपलब्धि दिखा दे जिसे गौरव के साथ फिल्मों के इतिहास में जगह मिल सकती हो। जिसे लोग वर्षों बाद भी याद रख सकें। फिर ऐसा भी नहीं है कि मुंबई में सिर्फ यह लोग फिल्म बनाते हों ! ये लोग सत्यजीत रे, हृषिकेश मुखर्जी या राजकपूर के पासंग भी नहीं हैं कि इनकी फिल्म में काम कर के गौरवान्वित महसूस किया जाए या इनके साथ काम कर के कोई विशेष सम्मान या पहचान बन जाती हो ! तो फिर यदि ऐसे लोग किसी का बहिष्कार करते हैं तो करें, क्यूँ मरे जाना उनके ही साथ काम करने को ! लियाकत है, खुद पर विश्वास है तो काम देर-सबेर खुद चल कर आता है और सफलता मिलते ही ऐसे लोग आगे-पीछे घूमते हुए दुम हिलाने लगते हैं। दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं ! 

रही बात नेपोटिस्म की ! तो यह बुराई है तो जरूर, पर किसी के संरक्षण से कोई बुलंदियां नहीं छू पाता ! फिल्म हो, खेल हो, व्यवसाय हो या राजनीति ! इनमें किसी की सहायता से ''इंट्री'' भले ही मिल जाए, टिकाव और सफलता तो अपनी लियाकत से ही मिल पाती है। यदि ऐसा ना होता तो एकता कपूर के भाई तुषार के पास आज काम की वजह से दम लेने तक की फुरसत न होती। अभिषेक बच्चन से ज्यादा पॉवर-फुल और कौन होता ! दो साल से इंडस्ट्री पर राज करने वाला शाहरुख, जिसके बारे में यही जौहर कहा करता था कि उसके बिना वह फिल्म ही नहीं बनाएगा, आज घर बैठा हुआ है। गोविंदा, जिसके पीछे लोग चिरौरियां करते घूमते थे, उसे आज कोई पूछ नहीं रहा ! बहुत से ऐसे कलाकार हुए हैं जिनके पास बहुत दिनों तक काम नहीं होता ! ऐसे लोगों पर लिखने बैठें तो ग्रंथ बन जाए ! पर इन लोगों ने आत्महत्या तो नहीं कर ली !!

सुशांत ! काश तुमने कर्मठ लोगों के जीवन से सबक लिया होता ! तुम्हारे सामने तो सबसे बड़ा उदाहरण अमिताभ बच्चन का था ! क्या-क्या नहीं सहा, देखा, उन्होंने यहां ! काम मिलना बंद हो गया था ! कर्ज के मारे दिवालिया होने तक की नौबत आ गई थी ! पर अगले ने हर समस्या का सामना किया और आज इस उम्र में उनको केंद्र में रख फ़िल्में रची जा रही हैं। उसी एकता कपूर, जिसने तुम्हें अपने सीरियल में काम दिया और तुम उसके इस एहसान के बदले पता नहीं क्या-क्या सहते रहे, उसी के पिता को जब यहां सबने नकार दिया था तो उसने हार ना मानते हुए मद्रास का रुख किया और बाद की बात सभी जानते हैं ! काश तुम देखते कि तकरीबन हर बड़े कलाकार ने कैसी-कैसी मुसीबतों का सामना करने के पश्चात अपना मुकाम हासिल किया ! ऐसे एक नहीं दर्जनों नाम हैं, जिन्हें इस निष्ठुर नगरी ने दुत्कारा पर जब उनने अपनी जीजीविषा की बदौलत सफलता पाई तो यही उनके चरणों में लोटने को मजबूर हो गई। काश ! तुम देखते कि आज अपनी चमक बिखेरने वाले सितारों को कभी किसी ''गॉड फादर'' की जरूरत महसूस नहीं हुई। उन्होंने जो हासिल किया अपने बलबूते पर किया। काश ! तुमने अपने पर, अपनी लियाकत पर और विश्वास किया होता ! कुछ और धैर्य रखा होता ! लोगों के जीवन से सबक लिया होता ! भावनाओं से निकल यथार्थ को स्वीकार किया होता !

सोमवार, 15 जून 2020

गुलाबो-सिताबो खूब लड़े हैं, आपस मा

किसी समय घुमंतू जातियों के लोगों के उपार्जन के विभिन्न जरियों में कठपुतली का तमाशा भी एक करतब हुआ करता था। इसमें ज्यादातर दो महिला किरदारों के आपसी पारिवारिक झगड़ों के काल्पनिक रोचक किस्से बना अवाम का मनोरंजन किया जाता था। किरदारों को कभी सास-बहू, कभी ननद-भौजाई, कभी देवरानी-जेठानी या फिर कभी सौतों का रूप दे दिया जाता था। उन किरदारों को ज्यादातर गुलाबो-सिताबो के नाम से बुलाया जाता था..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

अभी पिछले दिनों अमिताभ-आयुष्मान की एक फिल्म प्रदर्शित हुई है, नाम है गुलाबो-सिताबो। फिल्म चाहे जैसी भी बनी हो पर उसने दो महत्वपूर्ण कार्यों को तो अंजाम दिया ही है। इस फिल्म ने OTT (Over The Top) पर प्रदर्शित होने वाली पहली हिंदी फिल्म के रूप में अपना नाम तो दर्ज करवाया ही साथ ही साथ गुमशुदगी के अंधेरे में विलोपित होती उस कठपुतली कला का नाम भी आमजन को याद दिलवा दिया, जिसे कम्प्यूटर गेम्स जैसे साधनों के आने के बाद लोग तकरीबन भूल ही गए थे। गुलाबो-सिताबो इसी कला की दो महिला दस्ताना कठपुतलियों (Glove Puppets) के नाम हैं, जिन्होंने एक समय उत्तर प्रदेश में धूम मचा रखी थी और वहां की कला व संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गयी थीं।   

गुलाबो-सिताबो, किसी समय घुमंतू जातियों के लोगों के उपार्जन के विभिन्न जरियों में कठपुतली का तमाशा भी एक करतब हुआ करता था। इसमें ज्यादातर दो महिला किरदारों के आपसी पारिवारिक झगड़ों के काल्पनिक रोचक किस्से बना अवाम का मनोरंजन किया जाता था। किरदारों को कभी सास-बहू, कभी ननद-भौजाई, कभी देवरानी-जेठानी या फिर कभी सौतों का रूप दे दिया जाता था। उन किरदारों को ज्यादातर गुलाबो-सिताबो के नाम से बुलाया जाता था। इनके किस्से प्रदेश में एक लम्बे अरसे तक छाए रहे थे। 

निरंजन लाल श्रीवास्तव और उनकी कठपुतलियां 

नवाब वाजिद अली शाह के समय ये कठपुतलियां कला का पर्याय बन गईं थीं। गुलाबो-सिताबो का सफर भले ही आजादी से पहले शुरू हुआ था, लेकिन इन्हें पुख्ता पहचान 1950 के दशक में जा कर मिल पाई, जब प्रतापगढ़ निवासी राम निरंजनलाल श्रीवास्तव, बी.आर. प्रजापति और जुबोध लाल श्रीवास्तव सरीखे कलाकारों ने कठपुतली कला का भलीभांति प्रशिक्षण ले उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचा, उसका देश के विभिन्न नगरों में प्रदर्शन कर उसे व्यापक ख्याति दिलवाई। हालांकि इनकी कठपुतलियों के पहरावे, रंग-रोगन में काफी बदलाव आया था पर उन किरदारों का नाम स्थाई रूप से गुलाबो-सिताबो कर दिया गया। कारण भी था, इन नामों की प्रसिद्धि और लोकप्रियता लगातार बढ़ती ही जा रही थी। लोग उन्हीं नामों को देखना-सुनना पसंद करने लगे थे। इनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई थी कि गुलाबो-सिताबो के जरिए सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार होने लगा था। यहां तक कि अग्रिम मोर्चों पर तैनात जवानों के मनोरंजन के लिए भी इनको भेजा जाने लगा था।


शूजित सरकार द्वारा निर्देशित इस फिल्म का नाम गुलाबो-सिताबो प्रतीतात्मक है, क्योंकि इसमें झगड़ने वाले पात्र महिला न हो कर पुरुष हैं और उनकी भाषा भी व्यंग्यात्मक होने के बावजूद बहुत संयमित और सधी हुई है। पर क्या यह मात्र एक संयोग है या कुछ और कि उत्तर प्रदेश के जिस प्रतापगढ़ जिले के एक कायस्थ परिवार ने गुलाबो-सिताबो को देश-विदेश में व्यापक पहचान और प्रसिद्धि दिलवाई; उन्हीं किरदारों के नाम से जब एक फिल्म बनी तो उसमें मुख्य किरदार निभाने वाले कायस्थ कलाकार के पूर्वजों का संबंध भी उसी जिले से है ! चलो चाहे जो हो मतलब तो गुलाबो-सिताबो की नोक-झोंक और उनकी तनातनी से है, -

''जहां साग लायी पात लायी और लायी चौरैया, दूनौ जने लड़ै लागीं, पात लै गा कौआ'' 

गुरुवार, 21 मई 2020

फिल्में, जो बाॅटल मूवीज कहलाती हैं

हम सब ने हॉलीवुड मूवीज, बॉलीवुड मूवीज, टॉलीवुड मूवीज के साथ-साथ छोटे परदे यहां तक की मोबाइल के लिए बनने वाली वेब सीरीज जैसी मूवीज का नाम भी सुन रखा है। जिनमें रहस्य, रोमांच, विज्ञान, एक्शन, फिक्शन पर आधारित फ़िल्में बनती आ रही हैं। पर बॉटल मूवीज ! यह कौन सी बला है, जिसके बारे में आजकल अक्सर सुनने को मिल रहा है ! जबकि सुनील दत्त जी ने 1964 में ही ऐसी फिल्म बना दी थी.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
बॉटल मूवीज, यह फिल्म बनाने की सस्ती, तथा दिनों-दिन लोकप्रिय होती विधा है। इसकी पूरी शूटिंग एक ही लोकेशन, घर या कमरे, किसी कार या पनडुब्बी या छोटी सी जगह में पूरी कर ली जाती है। वैसे पहले भी ऐसी फ़िल्में बनती रही हैं, जैसे हिचकॉक की ''डायल एम फॉर मर्डर'', ''रोप''। ''टेप'', ''मिस्ट'' या हमारी सुनील दत्त जी द्वारा बनाई ''यादें'', या फिर बासु चटर्जी का ''एक रुका हुआ फैसला'' या फिर राम गोपाल वर्मा की ''कौन'' या बी.आर. चोपड़ा की ''इत्तेफाक''। सुनील दत्त जी की यादें तो इसलिए भी ख़ास है क्योंकि उसमें पर्दे पर के किरदार में सिर्फ एक ही कलाकार था, जसका साथ निभा रहे थे सिर्फ आवाजें और कैमरा ! अपने समय से बहुत आगे की फिल्म थी वह ! 


देश दुनिया में सैकड़ों ऐसी फ़िल्में बनती रही हैं ! पहले ऐसी मूवीज को प्रयोगात्मक फिल्मों का नाम दिया जाता था। कुछेक को छोड़ दर्शकों की पसंद भी मिली-जुली ही होती थी। कम ही लोग ऐसी फ़िल्में पसंद करते थे, खासकर हमारे देश में। पर आजकल बढती मंहगाई, फिल्म निर्माण में आने वाला अनाप-शनाप खर्च, पैसे की तंगी, ब्याज की उच्च दरें, नायक-नायिकाओं के आकाश छूते पारश्रमिक, टी.वी. जैसे अन्य साधनों की वजह से सिनेमा घरों से दूर होते दर्शकों ने उन निर्माताओं का, खासकर जो वेब सीरीज जैसे मनोरंजन गढ़ते हैं, ध्यान इस ओर दिलाया है। टी.वी. पर दिखने वाले रियल्टी या तथाकथित कॉमेडी शो भी इसी श्रेणी में आते हैं।
एक रुका हुआ फैसला 

कौन 

इत्तेफाक 
फिल्म निर्माण, शो बिजनेस के नाम से भी जाना जाता है ! जहां दिखावा, चकाचौंध, कुछ नवीनता, अनोखापन तथा कुछ अलग सा कर गुजरने की कोशिश अनवरत चलती रहती है। उसी के तहत किसी चतुर, व्यापारपटु व्यक्ति द्वारा लोगों को आकर्षित करने हेतु पुरानी बोतल के लिए एक नया नाम गढ़ फ़िल्मी दर्शकों में उत्सुकता बढ़ा दी हो। पर इसके साथ सच्चाई यह भी है कि पहले की अपेक्षा अब लोगों की रूचि काफी बदल चुकी है और हर तरह की फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग बन चुका है। कई बार तो ऐसी फ़िल्में भारी-भरकम, लक-दक फिल्मों पर भी भारी पड़ जाती हैं।    

शुक्रवार, 15 मई 2020

एक अनोखा कीर्तिमान, दारा सिंह और पुनीत इस्सर के नाम

एक ही कलाकार द्वारा किसी अति लोकप्रिय कथा के अहम् पात्र का किरदार, उस कथानक पर बनने वाली दो विभिन्न फिल्मों या टी.वी. सीरियलों में, चाहे संयोगवश या किसी और कारण के तहत, निभाया हो ऐसे उदाहरण बहुत कम या ना के बराबर ही हैं। पर दारा सिंह जी और पुनीत इस्सर को ऐसे कीर्तिमान गढ़ने का मौका मिल चुका है............!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की मूल रचना में हजारों साल का फासला था। जो अलग-अलग युगों में रचा गया था।  कथानक का स्वरुप भी भिन्न था। उनके रचयिताओं के परिवारों में भी दूर-दूर तक कोई आपसी संबंध नहीं था। फिर भी एक महान पात्र की अहम् मौजूदगी दोनों ही ग्रंथों में दर्ज है ! वे हैं पवनपुत्र श्री हनुमान ! रामायण तो उनके बिना अधूरी है ही ! महाभारत में भी उनका प्रसंग पांडवों के वनवास काल में अपने छोटे भाई भीम के गर्व को मिटाने के लिए आता है ! इन दोनों कथाओं पर बने सीरियलों में हनुमान जी की भूमिका दारा सिंह जी ने निभाई थी, इस तरह दोनों सीरियलों में काम करने वाले वो एकमात्र अभिनता बन गए थे। 

महाभारत में भीम और हनुमान 
इसके अलावा बी. आर. चोपड़ा द्वारा 1988 में निर्मित महाभारत सीरियल के बाद 2013 में फिर एक बार महाभारत कथा को टी.वी. सीरियल के रूप में स्वास्तिक प्रोडक्शंस के सिद्धार्थ तिवारी द्वारा भव्य रूप में पेश किया गया। दोनों महाभारत सीरियलों में काम करने का अवसर सिर्फ एक कलाकार पुनीत इस्सर को ही प्राप्त हुआ था। बी.आर. चोपड़ा वाले पहले महाभारत सीरियल में तो उन्होंने दुर्योधन के किरदार को उसके अवगुणों, उसकी लालसा, उसकी छटपटाहट, उसके आक्रोश को एक तरह से जीवंत बना दिया था। करीब पच्चीस साल बाद जब महाभारत को दोबारा बनाया गया तो यह उनके डील-डौल, असरदार अभिनय और गहरी आवाज का ही परिणाम था कि उन्हें इस बार उन्हें परशुराम जी के किरदार के लिए चुना गया। जिसमें वे कर्ण का पात्र निभाने वाले अपने साथी अभिनेता पर बीस ही साबित हुए।    

महाभारत में पुनीत इस्सर 
दूसरी बार परशुराम के किरदार में 



ये चाहे संयोग हो या कोई और कारण ! इस तरह के उदाहरण फिल्म या टी.वी. जगत में बहुत कम या कहें कि ना के बराबर ही मिलेंगे।                                                                                                                  

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अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...