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शुक्रवार, 15 मई 2020

एक अनोखा कीर्तिमान, दारा सिंह और पुनीत इस्सर के नाम

एक ही कलाकार द्वारा किसी अति लोकप्रिय कथा के अहम् पात्र का किरदार, उस कथानक पर बनने वाली दो विभिन्न फिल्मों या टी.वी. सीरियलों में, चाहे संयोगवश या किसी और कारण के तहत, निभाया हो ऐसे उदाहरण बहुत कम या ना के बराबर ही हैं। पर दारा सिंह जी और पुनीत इस्सर को ऐसे कीर्तिमान गढ़ने का मौका मिल चुका है............!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की मूल रचना में हजारों साल का फासला था। जो अलग-अलग युगों में रचा गया था।  कथानक का स्वरुप भी भिन्न था। उनके रचयिताओं के परिवारों में भी दूर-दूर तक कोई आपसी संबंध नहीं था। फिर भी एक महान पात्र की अहम् मौजूदगी दोनों ही ग्रंथों में दर्ज है ! वे हैं पवनपुत्र श्री हनुमान ! रामायण तो उनके बिना अधूरी है ही ! महाभारत में भी उनका प्रसंग पांडवों के वनवास काल में अपने छोटे भाई भीम के गर्व को मिटाने के लिए आता है ! इन दोनों कथाओं पर बने सीरियलों में हनुमान जी की भूमिका दारा सिंह जी ने निभाई थी, इस तरह दोनों सीरियलों में काम करने वाले वो एकमात्र अभिनता बन गए थे। 

महाभारत में भीम और हनुमान 
इसके अलावा बी. आर. चोपड़ा द्वारा 1988 में निर्मित महाभारत सीरियल के बाद 2013 में फिर एक बार महाभारत कथा को टी.वी. सीरियल के रूप में स्वास्तिक प्रोडक्शंस के सिद्धार्थ तिवारी द्वारा भव्य रूप में पेश किया गया। दोनों महाभारत सीरियलों में काम करने का अवसर सिर्फ एक कलाकार पुनीत इस्सर को ही प्राप्त हुआ था। बी.आर. चोपड़ा वाले पहले महाभारत सीरियल में तो उन्होंने दुर्योधन के किरदार को उसके अवगुणों, उसकी लालसा, उसकी छटपटाहट, उसके आक्रोश को एक तरह से जीवंत बना दिया था। करीब पच्चीस साल बाद जब महाभारत को दोबारा बनाया गया तो यह उनके डील-डौल, असरदार अभिनय और गहरी आवाज का ही परिणाम था कि उन्हें इस बार उन्हें परशुराम जी के किरदार के लिए चुना गया। जिसमें वे कर्ण का पात्र निभाने वाले अपने साथी अभिनेता पर बीस ही साबित हुए।    

महाभारत में पुनीत इस्सर 
दूसरी बार परशुराम के किरदार में 



ये चाहे संयोग हो या कोई और कारण ! इस तरह के उदाहरण फिल्म या टी.वी. जगत में बहुत कम या कहें कि ना के बराबर ही मिलेंगे।                                                                                                                  

सोमवार, 22 जुलाई 2019

"जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे".......... कौन था यह छज्जू !


''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे।'' यह छज्जू कौन है जिसके चौबारे का जिक्र इस कहावत में किया गया है ! ऐसा ही समझा जाता रहा है कि बात को समझाने के लिए एक काल्पनिक नाम जोड़ दिया गया होगा। जबकि यह कोई काल्पनिक नाम नहीं है ! तक़रीबन साढ़े चार सौ साल पहले लाहौर में एक सज्जन रहा करते थे जिनका नाम छज्जू भगत था। कहीं-कहीं उनका नाम छज्जू भाटिया भी मिलता है। वे सर्राफे के एक नेक, सहृदय, दानशील व परोपकारी व्यापारी थे। उन्होंने ही लाहौर के अनारकली बाज़ार के इलाके में एक खूबसूरत व भव्य चौबारा बनवाया था। जहाँ दिन भर लोगों की महफ़िल जमी रहती थी ! एक दूसरे का दुःख-सुख बंटता था............!


#हिन्दी_ब्लागिंग
कोई भी कहावत, मुहावरा या लोकोक्ति यूं ही नहीं बन जाती या लोकप्रिय हो जाती, उसके पीछे जन-साधारण के अनुभव, अनुभूतियों और तजुर्बों या फिर जगह विशेष का पूरा हाथ होता है। कुछ लोग, वस्तुएं, घटनाएं अपने आप में इतने असाधारण होते हैं कि वे खुद एक मिसाल बन किंदवंती बन जाते हैं ! समय के साथ-साथ मूल बातें या चीजें तो काल के गर्त में समा जाती हैं, रह जाती हैं उक्तियां ! पर जब कभी ऐसी ही कहावत का स्रोत सामने आ जाता है या उसकी सच्चाई पता चलती है तो चौंकना, स्वाभाविक रूप से हो जाता है ! आज ऐसी ही एक कहावत की बात ''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे'' !

आज की पीढ़ी को तो शायद चौबारे का अर्थ भी मालुम ना हो, क्योंकि अब चौबारे नहीं होते। फ्लैट होते हैं उनकी बालकनी होती है। कभी-कभार किसी फिल्म में भले ही यह नाम सुनने को मिल जाए पर सच्चाई यही है कि चौबारा अब बीते युग की बात हो गया है ! जो कि कभी घर के एक विशेष स्थान का नाम होता था जो प्रायः घर के मुख्य द्वार या दहलीज़ के ऊपर पहली मंजिल पर बने एक छोटे कमरे को कहा जाता था। इस के एक दरवाज़े अथवा खिड़की का रुख सड़क की तरफ होता था। इस का उपयोग खासकर मनोरंजन इत्यादि के लिए किया जाता था। आज भी छज्जू का चौबारा कुछ-कुछ अच्छी हालत में अपनी कहानी कहता लाहौर में खड़ा है, पर कब तक ! क्योंकि उस पर भी रसूखदारों की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है ! ये अलग बात है कि अब वैसा सुख या चैन भी वहां मयस्सर नहीं है।

अपने यहां, ख़ास कर उत्तर भारत में एक कहावत पुराने समय से अत्यंत प्रचलित रही है, ''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे।'' जिसका मूल अर्थ यह है कि परदेस में भले ही कितना ऐशो-आराम हो, सुविधाएं हों पर जो सुख -चैन अपने घर में मिलता है वह अन्यत्र नहीं ! कहावत में बल्ख और बुखारे के उल्लेख से ऐसा लगता है जैसे कि ये दो शहर आस-पास ही स्थित हों और युग्म शब्द बन गए हों ! हमारे कोटा-बूंदी, कुल्लू-मनाली, लुधियाना-जालंधर, दमन-दीव की तरह ! पर अपनी पूरी भव्यता और संपन्नता के साथ एक ही सिल्क रूट पर स्थित होने के बावजूद, जहां बल्ख अफगानिस्तान के उत्तरी प्रांत का एक शहर है वहीं बुखारा उज्बेकिस्तान का एक शहर ! अलग-अलग देशों में, एक-दूसरे से सैंकड़ों की.मी. दूर। फिर यह छज्जू कौन है ! जिसके चौबारे का जिक्र कहावत में किया गया है ! क्या सम्बंध है इनका आपस में ! तो ऐसा समझा जाता रहा, कि बात को समझाने के लिए एक काल्पनिक नाम जोड़ लिया गया होगा। जबकि यह कोई काल्पनिक नाम नहीं है।
तक़रीबन साढ़े चार सौ साल पहले लाहौर में एक सज्जन रहा करते थे जिनका नाम छज्जू भगत था। कहीं-कहीं उनका नाम छज्जू भाटिया या छज्जू मल भाटिया भी मिलता है। वे एक नेक, सहृदय, दानशील व परोपकारी सर्राफा व्यापारी थे। जो लोगों की सेवा और प्रभु भक्ति में लीन रहा करते थे। उन्होंने ही लाहौर के अनारकली बाज़ार के इलाके में एक खूबसूरत व भव्य चौबारा बनवाया था। जहां दिन भर लोगों की महफ़िल जमी रहती थी, एक दूसरे का दुःख-सुख बंटता था ! हंसी-ठठा होता था। खाने-पीने की कोई चिंता नहीं होती थी, हर चीज का इंतजाम छज्जू भगत की ओर से किया जाता था। वहीं बैठ कर वह स्थानीय लोगों की भरसक-यथासंभव मदद किया करते थे। सारे लोग जैसे किसी अदृश्य प्रेम धागे से बंध गए थे।
उन दिनों बल्ख और बुखारे की ख्याति अपनी खूबसूरती और भव्यता के कारण दुनिया में दूर-दूर तक फैली हुई थी। इसी के चलते छज्जू मल जी के एक मित्र सूरज मल नामक सज्जन का मन वहां घूमने जाने का हुआ। वे एक महीने का कह कर गए भी ! पर लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ जब वे सप्ताह भर में ही लौट आए ! लोगों ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि, कहीं मन ना लगने के कारण वे बुखारा गए ही नहीं: बल्ख से ही वापस लौट आए ! क्योंकि यहां जैसा, प्यार, अपनत्व, भाईचारा कहीं दिखा ही नहीं ! उन का मन उचाट हो गया और वे बीच में ही यात्रा ख़त्म कर लौट आए। तब उन्होंने यह पंक्ति कही कि ‘वो बल्ख ना बुखारे – जो बात छज्जू के चौबारे’ और तब से यह बात कहावत के रूप में प्रसिद्ध हो गयी।
इन सब बातों की कोई पुष्टि तो नहीं हो पाती पर जो कुछ इधर-उधर पढ़ने को मिलता है उसके अनुसार छज्जू भगत का असली नाम छज्जू भाटिया या छज्जू मल भाटिया था। वे लाहौर के रहने वाले थे। मुगल बादशाह जहांगीर के समय वे सोने का व्यापार किया करते थे। 1640 में उनके निधन के बाद उनके अनुयायियों ने लाहौर के पुरानी अनारकली स्थित डेरे में उनकी समाधि बना दी।


*संदर्भ - दैनिक भास्कर व अंतरजाल

सोमवार, 8 जुलाई 2019

''आशा व बाला'' का एक और रूप, वोडाफोन के नए अवतार में

विज्ञापनों में दादा-दादी बने ये दोनों पति-पत्नी कोई मामूली कलाकार नहीं हैं। वोडाफोन के विज्ञापन के आशा और बाला के रूप में प्रसिद्ध हुए, 73साल की शांता धनंजयन और 78साल के वी.पी. धनंजयन दोनों पति-पत्नी, दिग्गज नृत्य कलाकार हैं, जो चेन्नई के अड्यान में 1968 से भरतनाट्यम सिखाने के लिए भारत कलांजलि स्कूल चला रहे हैं। जिसके लिए उन्हें 2009 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।  #वोडाफोन वाले बधाई के पात्र हैं जो फूहड़ता के इस  युग में भी इतने साफ़-सुथरे , दिल को छूने वाले, सार्थक, पारिवारिक विज्ञापनों की रचना करने का हौसला रखते हैं ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दिन-ब-दिन फूहड, छिछोरे और स्तरहीन होते जाते, बकवास इश्तिहारों के बीच कुछ ऐसे विज्ञापन भी देखने को मिल जाते हैं, जो दिल को छू लेते हैं। इनमें वोडाफोन एक आदर्श उदाहरण है। जो बिना किसी ''स्टार'' की बैसाखी के भी अपने विज्ञापनों को, दर्शकों के दिलो-दिमाग में पैवस्त कर, लोकप्रिय बनाने में माहिर हैं। सच कहा जाए तो इनके ''बुजुर्ग दम्पति या पग या जुजु सेना'' अपनी मासूमियत, भोलेपन और सरलता के कारण कई-कई सुपर स्टारों पर भारी पड़ते हैं।


गोवा भ्रमण  
टी.वी. दर्शक और खेल प्रेमी, वोडाफोन के करीब दो साल पहले 2017 में हुई IPL क्रिकेट स्पर्द्धा के खेलों के बीच आने वाले उन विज्ञापनों को भूले नहीं होंगे, जिनमें एक प्यारे, भोले-भाले, साठ पार के बुजुर्ग दम्पति, ''बाला और आशा'' के गोवा भ्रमण को केंद्र बना एक बहुत सुंदर विज्ञापन श्रृंखला रची गयी थी। आनन-फानन में, बिना किसी शोर-शराबे के दोनों ने लोगों के मनों को जीत उनके घर के सदस्य के रूप में जगह बना ली थी ! विज्ञापनों में दादा-दादी बने ये दोनों पति-पत्नी कोई मामूली कलाकार नहीं हैं। वोडाफोन के विज्ञापन के आशा और बाला के रूप में प्रसिद्ध हुए, 73 साल की शांता धनंजयन और 78 साल के वी.पी. धनंजयन दोनों दिग्गज नृत्य कलाकार हैं जो चेन्नई के अड्यान में 1968 से भरतनाट्यम सिखाने के लिए भारत कलांजलि स्कूल चला रहे हैं। जिसके लिए उन्हें 2009 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। यह उनकी जिजीविषा ही है, जो अपने गोवा वाले विज्ञापन के लिए धनंजयन जी ने अठहत्तर पार की उम्र में पहली बार धोती के बदले पैंट-टी शर्ट पहनी, स्कूटर चलाना सीखा तथा युवाओं की तरह के हाव-भाव, करतब करते हुए विश्वसनीयता व सहजता से इंटरनेट का उपयोग कर जीवन का आनंद लेते  दिखे थे।  



अब फिर एक बार दोनों वोडाफोन की एक नयी विज्ञापन श्रृंखला ''The Future is exciting. Ready ?''  के साथ फिर एक बार परदे पर अवतरित हुए हैं। इस बार विदेश भ्रमण में रोमिंग की खासियतें, फोन पर डॉक्टर की सलाह या अपने खुद के किचन के व्यवसाय में वोड़ाफोन की सहूलियतों का उपयोग करते-बताते नजर आएंगे। फिलहाल अभी तो आशा जी की रसोई में सहयोगी बने बालाजी की अपनी पत्नी के साथ मासूमियत भरी प्यारी सी नोकझोंक देखते ही बनती है। इस बार भी यह बात तय है कि निर्मल हास्य का पुट लिए इस विज्ञापन श्रृंखला में भी दोनों पति-पत्नी अपने सहज, सरल, स्वाभाविक अभिनय से अपना पिछ्ला जादू जगाने में जरूर सफल होंगे ! 


नए अवतार में 
#वोडाफोन और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है, जो उन्होंने फूहड़ता के इस युग में भी इतने साफ़-सुथरे, दिल को छूने वाले, सार्थक, पारिवारिक विज्ञापनों की रचना करने का हौसला दिखाया। इनसे उन विज्ञापन निर्माताओं और कंपनियों को सबक लेना चाहिए जो आए दिन बड़े नामों की लोकप्रियता, ओछे दृश्यों या अतिश्योक्ति भरे फिल्मांकन से दर्शकों को लुभाने की फूहड़ कोशिश में वक्त और पैसा दोनों बर्बाद करते रहते हैं ! पर होता अक्सर उनकी सोच का उल्टा है ! ज्यादातर ऐसे विज्ञापन दर्शकों को "बोर" करने लगते है। हजार की जगह लाखों फूँके हुए रुपये भी कोई जादू नहीं जगा पाते। काश, वे वोडाफोन से कुछ सबक ले पाते ! 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...