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शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

कहनी है इक बात हमें इस देश के पहरेदारों से

खालसा पंथ में दिक्षित लोग जात-पांत के भेदभाव से दूर, आत्मज्ञानी, सरल चित्त, समाजसेवी होने के साथ-साथ किसी के बहकावे में ना आने वाले हैं ! वे जानते हैं कि हिंदू-सिख एक ही माँ की संतानें हैं ! एक ही शरीर के अंग हैं ! एक ही परिवार के सदस्य हैं ! सो यहां किसी की दाल गल नहीं रही थी ! पर भारत को  खंड-खंड करने का स्वप्न देखने वाले लोग भी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हम कुछ जल्दी ही भावुक हो जाते हैं...........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हिंदुस्तान ! हिंदुओं के रहने का स्थान। संपंन्न, शांतिप्रिय, जो है उसी में खुश रहने वाले लोगों का देश। कई आए, कई गए ! कुछ अपना मतलब सिद्ध कर लौट गए कुछ यहीं के हो कर रह गए। दुनिया में मंदी का दौर आया तो बाहर के देशों के लोगों की गिद्ध दृष्टि इस सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश पर पड़ी। बहुतेरे आए पर अंग्रेजों ने अपनी कुटिलता से बाकी अतिक्रमणकारियों को हाशिए पर धकेल दिया। पर सिर्फ चार हजार अंग्रेजों के द्वारा इतनी बड़ी आबादी पर काबू पाना आसान नहीं था। इसीलिए षड़यन्त्र पूर्वक धर्म के नाम पर फूट फैला कर आपसी नफरत को जन्म दिया ! फिर एक से दूसरे को बचाने के नाम पर संरक्षण देने के बहाने उन्हें वश में किया ! अपनी शर्तें रखीं और धीरे-धीरे अपने शिकजे को जकड़ते चले गए। यहां तक की जाते-जाते भी उसी के सहारे देश के दो टुकड़े तो कर ही गए साथ ही अपनी कुटिल बुद्धि से देश को और भी गारत करने के लिए जाति, भाषा, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब जैसे मुद्दों द्वारा फूट डाल राज करने की नीतियां हमारे राजनेताओं को विरासत में दे गए। जिससे उपजे विद्वेष का परिणाम आज सबके सामने है।

कभी सोच के देखा जाए तो ऐसा क्या हुआ जो देश की आजादी के बाद से ही हिंदुओं, खासकर ब्राह्मणों के खिलाफ दलित मोर्चा खोला गया ! उसके पहले हजार साल तक ऐसी बात क्यों नहीं उठी ? क्या इन्हीं तीस-चालीस सालों में ही ब्राह्मणों के द्वारा ज्यादतियां हुईं ? जबकी इन्हीं ब्राह्मणों की वजह से ही ईसाईयों या मुस्लिमों द्वारा धर्मांतरण सफल नहीं हो पाया था ! नहीं तो किसी भी विधर्मी शासक ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जब यह देखा गया कि बाकी हिंदू जब तक ब्राह्मणों के संपर्क में रहेंगे तब तक उनको बहकाया नहीं जा सकता, तो इसीलिए जात-पांत का चक्रव्यूह रचा गया, पैसों का लालच और सम्मान की हड्डी फेंकी गयी ! यह दांव कुछ हद तक सफल रहा और समाज में विद्वेष की खाई गहरा गयी। वैसे सच तो यह है कि ब्राह्मण या मनुवाढ तो सिर्फ बहाना ही है, असल में हिंदुओं को बांट-काट कर किसी भी तरह सत्ता हासिल करना मकसद है।  

विडंबना ही रही कि पहले हिंदू मुस्लिम के बीच द्वेष के बीज बोए गए। फिर द्रविड़-आर्य का खेल खेला गया। उन्हें एक-दूसरे का दुश्मन जैसा बना दिया गया। पर इससे कइयों का मकसद सिद्ध नहीं हो पाया। सत्ता पाने की लालसा में कुकुरमुत्तों की तरह नए-नए छत्रप उगते गए और समाज को जाति, भाषा, क्षेत्र के हिसाब से बांट कर अपना उल्लू सीधा करते चले गए। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा से त्रस्त लोगों को कभी मनु, कभी हिंदू, कभी ब्राह्मण, कभी दलित जैसे निरर्थक जुमलों में उलझाए रखने में ही उनकी बादशाहत जो कायम रहने वाली थी। और चूँकि ब्राह्मण समाज की नींव की तरह थे सो पहले उन्हीं पर हमला किया गया। उन पर इल्जाम लगाने वाले तथाकथित समाजसेवी और अपने आप को बुद्धिजीवी कहलाने वालों को क्यों दलितों के मसिहाओं की कारस्तानियां नजर नहीं आतीं ? क्या किसी एक भी दलित नेता के किसी सर्वहारा परिवार को सहारा दिया है ? परिवार को तो जाने दें किसी बच्चे के भविष्य को संवारने का जिम्मा लिया है ?

अब तक पडोसी या घर के ही कुटिल लोगों की लाख कोशिशों के बावजूद हिंदुओं और सिखों में दरार नहीं डाली जा सकी थी। इसके कुछ मुख्य कारण भी थे ! जैसे सिख धर्म का इतिहास अभी नया-नया होने के कारण उसके बारे में जानने और बताने वाले बहुत से लोग समाज को सही जानकारी देते आए थे। गुरु साहिबान की वाणियों में ऋषि-मुनियों की बातें समाहित थीं। ऐसे सैंकड़ों हिंदू घर थे जिन्होंने अपने एक पुत्र को खालसा पंथ की दीक्षा दिलवाई थी। फिर इस पंथ में दिक्षित लोग जात-पांत के भेदभाव से दूर, आत्मज्ञानी, सरल चित्त, समाजसेवी होने के साथ-साथ किसी के बहकावे में ना आने वाले थे। वे जानते थे कि हिंदू-सिख एक ही माँ की संतानें हैं ! एक ही शरीर के अंग हैं ! एक ही परिवार के सदस्य हैं ! इन्हीं सच्चाइयों के कारण यहां किसी की दाल गल नहीं रही थी। पर विरोधी ताकतें भी चुप नहीं बैठीं थीं ! धीरे-धीरे उन्होंने जहर उगलना जारी रखा ! जिसके तहत दोनों धर्मों को जुदा जताने की साजिश शुरू हो गयी। नयी सिख पीढ़ी को इतिहास की गलत जानकारी दे बहकाने की कोशिश की जाने लगी। बार-बार यह फैलाया जाता रहा कि सिखों ने हिंदुओं की रक्षा की ! पर ज्ञातव्य है कि खालसा पंथ की स्थापना के समय ब्राह्मण, क्षत्रिय ही आगे आए थे। यह खुला सत्य है कि हर  परिवार ने अपना एक बेटा खालसा फौज के लिए दिया था। एक ओर जहां मराठे मुगलों से लड़ रहे थे वहीं राजपूतों और ब्राह्मणों ने भी मुग़ल साम्राज्य की नाक में दम कर रखा था। जब पहली खालसा फौज बनी तो उसका नेतृत्व भाई प्राग दास जी, जो एक ब्राह्मण थे, उनके हाथों में था। उनके बाद उनके बेटे भाई मोहन दास जी ने कमान सम्हाली। उनके अलावा सती दास जी, मति दास जी, दयाल दास जी जैसे ब्राह्मण वीरों ने गुरु जी की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे डाली। इतना ही नहीं गुरु जी को शस्त्रों की शिक्षा देने वाले भी पंडित कृपा दत्त जी जैसा योद्धा पंजाब में दुसरा नहीं हुआ। एक बैरागी ब्राह्मण लक्ष्मण दास और उनके किशोर पुत्र अजय ने सरहिंद में गुरु परिवार की रक्षा के लिए दुश्मनों से लोहा लिया और चप्पड़ चिड़ी की लड़ाई में विजय प्राप्त की। यही लक्ष्मण दास आगे चल कर बंदा बहादुर कहलाए।

कहने का तात्पर्य यही है कि भारत को खंड-खंड करने का स्वप्न देखने वालों से हमें होशियार रहने की जरुरत है। किसी के प्रलोभन, दरियादिली या झूठी सहानुभूति से भ्रमित न होकर अपने देश और समाज के लिए ही अपने आप को सजग रखना है। फिर चाहे वह पाकिस्तान द्वारा किसी धर्मस्थली तक जाने की इजाजत दे बहलाने की मंशा हो या फिर चीन द्वारा उसके यहां बेहतर व्यापार का प्रलोभन ! क्योंकि वे लोग भी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हम कुछ जल्दी ही भावुक हो जाते हैं। 

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने...! कौन थी ये भानुमती ?

भानुमती ! कहीं की ईंट कहीं के रोडे को इकठ्ठा कर अपना कुनबा बना लेने वाली भानुमती ! किसी जादुयी पिटारे की स्वामिनी भानुमति ! दुर्योधन, कर्ण तथा अर्जुन के साथ अनोखे सम्बन्ध बनाने वाली भानुमति ! कौन थी ये महिला, जिसके नाम के मुहावरे उससे ज्यादा प्रसिद्ध हैं ? उसके बारे में विस्तार से जानने के लिए महाभारत काल में ताक-झांक करनी पड़ेगी, जहां उसके बारे में अच्छी-खासी जानकारी उपलब्ध है.......! 

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प्राचीन काल में भारत के महाजनपदों में से एक था कंबोज। जिसका क्षेत्र आधुनिक पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान से मिलता था। उस समय कंबोज पर राजा चन्द्रवर्मा का राज था। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम था भानुमती। उसके रूप और गुणों के सामने स्वर्ग की अप्सराएं भी कहीं नहीं ठहरती थीं। उसके विवाह योग्य होने पर राजा चंद्र्वर्मा ने भानुमती के विवाह के लिए स्वयंबर का आयोजन किया। भानुमती ना सिर्फ बहुत रूपवान थी, अत्यंत बुद्धिमती होने के साथ-साथ वह शारीरिक रूप से भी अति बलिष्ठ थी। इन्हीं गुणों की ख्याति सुन उसके स्वयंबर में दुर्योधन, कर्ण, जरासंध, शिशुपाल जैसे पराक्रमी, वीर और ख्यातिप्रद राजा उससे विवाह की अभिलाषा लेकर आये थे।

जब स्वयंबर स्थल पर भानुमती पूरे श्रृंगार के साथ आई तो वहां उपस्थित सभी राजाओं के मुंह खुले के खुले रह गए। ऐसा अप्रितम सौन्दर्य ना किसी ने देखा था ना किसी ने सोचा था। जब दुर्योधन की नज़र भानुमती पर पड़ी तो उसका मन मचल उठा और उसने ठान लिया कि भानुमती से वही विवाह करेगा। परंतु भानुमती को दुर्योधन पसंद नहीं था। इसीलिए वह वरमाला ले उससे आगे बढ़ गयी। यह देख दुर्योधन अत्यंत क्रोधित हो गया और भानुमती को पकड कर जबरन उससे माला अपने गले में डलवा ली। वहां उपस्थित बाकी राजाओं में आक्रोश फ़ैल गया तथा उन्होंने इस बात का विरोध किया तो दुर्योधन ने सभी योद्धाओं को कर्ण से युद्ध करने की चुनौती दे डाली ! कुछ ने युद्ध की चुनौती स्वीकार की भी तो उन्हें कर्ण ने पलक झपकते ही हरा दिया। उसके इस शौर्य से भानुमती भी बहुत प्रभावित हुई। इसी कारण विवाहोपरांत हस्तिनापुर आने पर उसे कर्ण के साथ समय व्यतीत करना बहुत भाता था। 

भानुमती को हस्तिनापुर ले आने के बाद दुर्योधन ने भानुमती के अपहरण को यह कह कर, अप ने आप को सही ठहराया, कि भीष्म पितामह भी अपने सौतेले भाइयों के लिए अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का हरण करके ले आए थे। इस तर्क से भानुमती भी मान गई और दोनों ने विवाह कर लिया। इनके लक्ष्मण तथा लक्ष्मणा नामक एक पुत्र तथा एक पुत्री हुई। कालांतर से लक्ष्मणा ने कृष्ण पुत्र साम्ब से भाग कर विवाह कर लिया और लक्ष्मण युद्ध में अभिमन्यु द्वारा मारा गया। फिर भी  भानुमती ने युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु के बाद अर्जुन से विवाह कर लिया था। 

भानुमती ! जिसने दुर्योधन को पति नहीं चुनना चाहा था ! स्वयंबर के समय वह किसी और को वरमाला पहनाना चाहती थी ! पर उसे मजबूरन दुर्योधन से ब्याह रचाना पड़ा ! भले ही बाद में वह राजी हो गयी हो ! स्वयंबर के वक्त हुए युद्ध में वह कर्ण से भी प्रभावित थी ! हस्तिनापुर आने के बाद उसे कर्ण के साथ समय व्यतीत करना पसंद था ! फिर महाभारत युद्ध के पश्चात दुर्योधन की मृत्यु के उपरांत उसने अर्जुन से विवाह कर लिया ! समय, परिस्थियों और मौकापरस्ती के चलते, समयानुसार अपना मतलब सिद्ध करते रहने और दुर्योधन, कर्ण, अर्जुन के साथ अनोखे सम्बन्ध बना बार-बार अपने अलग-अलग कुनबे गढने की वजह से ही शायद यह कहावत चलन में आई - 
''कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा'' !

सोमवार, 22 जुलाई 2019

"जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे".......... कौन था यह छज्जू !


''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे।'' यह छज्जू कौन है जिसके चौबारे का जिक्र इस कहावत में किया गया है ! ऐसा ही समझा जाता रहा है कि बात को समझाने के लिए एक काल्पनिक नाम जोड़ दिया गया होगा। जबकि यह कोई काल्पनिक नाम नहीं है ! तक़रीबन साढ़े चार सौ साल पहले लाहौर में एक सज्जन रहा करते थे जिनका नाम छज्जू भगत था। कहीं-कहीं उनका नाम छज्जू भाटिया भी मिलता है। वे सर्राफे के एक नेक, सहृदय, दानशील व परोपकारी व्यापारी थे। उन्होंने ही लाहौर के अनारकली बाज़ार के इलाके में एक खूबसूरत व भव्य चौबारा बनवाया था। जहाँ दिन भर लोगों की महफ़िल जमी रहती थी ! एक दूसरे का दुःख-सुख बंटता था............!


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कोई भी कहावत, मुहावरा या लोकोक्ति यूं ही नहीं बन जाती या लोकप्रिय हो जाती, उसके पीछे जन-साधारण के अनुभव, अनुभूतियों और तजुर्बों या फिर जगह विशेष का पूरा हाथ होता है। कुछ लोग, वस्तुएं, घटनाएं अपने आप में इतने असाधारण होते हैं कि वे खुद एक मिसाल बन किंदवंती बन जाते हैं ! समय के साथ-साथ मूल बातें या चीजें तो काल के गर्त में समा जाती हैं, रह जाती हैं उक्तियां ! पर जब कभी ऐसी ही कहावत का स्रोत सामने आ जाता है या उसकी सच्चाई पता चलती है तो चौंकना, स्वाभाविक रूप से हो जाता है ! आज ऐसी ही एक कहावत की बात ''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे'' !

आज की पीढ़ी को तो शायद चौबारे का अर्थ भी मालुम ना हो, क्योंकि अब चौबारे नहीं होते। फ्लैट होते हैं उनकी बालकनी होती है। कभी-कभार किसी फिल्म में भले ही यह नाम सुनने को मिल जाए पर सच्चाई यही है कि चौबारा अब बीते युग की बात हो गया है ! जो कि कभी घर के एक विशेष स्थान का नाम होता था जो प्रायः घर के मुख्य द्वार या दहलीज़ के ऊपर पहली मंजिल पर बने एक छोटे कमरे को कहा जाता था। इस के एक दरवाज़े अथवा खिड़की का रुख सड़क की तरफ होता था। इस का उपयोग खासकर मनोरंजन इत्यादि के लिए किया जाता था। आज भी छज्जू का चौबारा कुछ-कुछ अच्छी हालत में अपनी कहानी कहता लाहौर में खड़ा है, पर कब तक ! क्योंकि उस पर भी रसूखदारों की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है ! ये अलग बात है कि अब वैसा सुख या चैन भी वहां मयस्सर नहीं है।

अपने यहां, ख़ास कर उत्तर भारत में एक कहावत पुराने समय से अत्यंत प्रचलित रही है, ''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे।'' जिसका मूल अर्थ यह है कि परदेस में भले ही कितना ऐशो-आराम हो, सुविधाएं हों पर जो सुख -चैन अपने घर में मिलता है वह अन्यत्र नहीं ! कहावत में बल्ख और बुखारे के उल्लेख से ऐसा लगता है जैसे कि ये दो शहर आस-पास ही स्थित हों और युग्म शब्द बन गए हों ! हमारे कोटा-बूंदी, कुल्लू-मनाली, लुधियाना-जालंधर, दमन-दीव की तरह ! पर अपनी पूरी भव्यता और संपन्नता के साथ एक ही सिल्क रूट पर स्थित होने के बावजूद, जहां बल्ख अफगानिस्तान के उत्तरी प्रांत का एक शहर है वहीं बुखारा उज्बेकिस्तान का एक शहर ! अलग-अलग देशों में, एक-दूसरे से सैंकड़ों की.मी. दूर। फिर यह छज्जू कौन है ! जिसके चौबारे का जिक्र कहावत में किया गया है ! क्या सम्बंध है इनका आपस में ! तो ऐसा समझा जाता रहा, कि बात को समझाने के लिए एक काल्पनिक नाम जोड़ लिया गया होगा। जबकि यह कोई काल्पनिक नाम नहीं है।
तक़रीबन साढ़े चार सौ साल पहले लाहौर में एक सज्जन रहा करते थे जिनका नाम छज्जू भगत था। कहीं-कहीं उनका नाम छज्जू भाटिया या छज्जू मल भाटिया भी मिलता है। वे एक नेक, सहृदय, दानशील व परोपकारी सर्राफा व्यापारी थे। जो लोगों की सेवा और प्रभु भक्ति में लीन रहा करते थे। उन्होंने ही लाहौर के अनारकली बाज़ार के इलाके में एक खूबसूरत व भव्य चौबारा बनवाया था। जहां दिन भर लोगों की महफ़िल जमी रहती थी, एक दूसरे का दुःख-सुख बंटता था ! हंसी-ठठा होता था। खाने-पीने की कोई चिंता नहीं होती थी, हर चीज का इंतजाम छज्जू भगत की ओर से किया जाता था। वहीं बैठ कर वह स्थानीय लोगों की भरसक-यथासंभव मदद किया करते थे। सारे लोग जैसे किसी अदृश्य प्रेम धागे से बंध गए थे।
उन दिनों बल्ख और बुखारे की ख्याति अपनी खूबसूरती और भव्यता के कारण दुनिया में दूर-दूर तक फैली हुई थी। इसी के चलते छज्जू मल जी के एक मित्र सूरज मल नामक सज्जन का मन वहां घूमने जाने का हुआ। वे एक महीने का कह कर गए भी ! पर लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ जब वे सप्ताह भर में ही लौट आए ! लोगों ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि, कहीं मन ना लगने के कारण वे बुखारा गए ही नहीं: बल्ख से ही वापस लौट आए ! क्योंकि यहां जैसा, प्यार, अपनत्व, भाईचारा कहीं दिखा ही नहीं ! उन का मन उचाट हो गया और वे बीच में ही यात्रा ख़त्म कर लौट आए। तब उन्होंने यह पंक्ति कही कि ‘वो बल्ख ना बुखारे – जो बात छज्जू के चौबारे’ और तब से यह बात कहावत के रूप में प्रसिद्ध हो गयी।
इन सब बातों की कोई पुष्टि तो नहीं हो पाती पर जो कुछ इधर-उधर पढ़ने को मिलता है उसके अनुसार छज्जू भगत का असली नाम छज्जू भाटिया या छज्जू मल भाटिया था। वे लाहौर के रहने वाले थे। मुगल बादशाह जहांगीर के समय वे सोने का व्यापार किया करते थे। 1640 में उनके निधन के बाद उनके अनुयायियों ने लाहौर के पुरानी अनारकली स्थित डेरे में उनकी समाधि बना दी।


*संदर्भ - दैनिक भास्कर व अंतरजाल

गुरुवार, 4 जुलाई 2019

कहै घाघ सुन भड्डरी,..... कौन थे ये दोनों

''घाघ'' जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं ''भड्डरी'' की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार से विशेष रूप से संबद्ध हैं।घाघ के समान ही लोकजीवन से संबंधित कहावतों में कही गई भड्डरी की भविष्यवाणियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं। दोनों समकालीन तो हैं साथ ही यह समानता भी है कि घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृतांत भी निर्विवाद नहीं है। अनेकानेक किंवदंतियां दोनों के साथ जुडी हुई हैं। पर साथ ही यह भी सच है कि जितनी ख्याति जनकवि घाघ को मिली उतनी प्रसिद्धि भड्डरी को नहीं मिल पाई !आज की वर्तमान पीढ़ी इनके बारे में शायद ज्यादा न जानती हो, फिर भी बरसात द्वारे पर है, इसलिए समीचीन होगा, उससे जुड़े इन दोनों विलक्षण और अद्भुत व्यक्तित्वों के बारे कुछ जानना ...........! 

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हमारा देश सदियों से कृषि प्रधान रहा है और भरपूर फसल के लिए अति आवश्यक है अच्छी वर्षा ! इसीलिए हर किसान के लिए इस बात का ज्ञान होना बहुत जरुरी होता है कि वर्षा कब होगी, होगी कि नहीं या कितनी मात्रा में होगी ! पुराने जमाने में नाहीं विज्ञान ने इतनी तरक्की की थी और नाहीं ही कोई मौसम विभाग हुआ करता था ,जो बरसात की सटीक जानकारी दे सके ! तो सब कुछ पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे अनुभव पर ही निर्भर हुआ करता था। हालांकि हमारे ऋषियों-मुनियों ने यह सब बातें विस्तार से सदियों पूर्व लिपिबद्ध कर दी थीं पर वह सब संस्कृत में होने की वजह से अधिकांश लोगों के लिए अगम्य सी ही थीं ! इसी समस्या के निदान के लिए लोकभाषा में कहावतों के रूप में सूक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ और इन्हीं कहावतों, भविष्यवाणियां के आधार पर वर्षों-वर्ष से हमारे किसान अपनी खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान करते चले आए हैं। इन भविष्यवाणियों के जनक के रूप में करीब चार सौ सालों से निर्विवाद रूप से ''घाघ'' और 'भड्डरी'' का नाम लिया जाता रहा है। घाघ जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं भड्डरी की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार के लिए प्रख्यात हैं। 

घाघ और भड्डरी के विषय में अनेक किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। पर दोनों के बारे में बहुत विस्तृत रूप से जानकारी उपलब्ध नहीं है ! चूँकि इनकी कहावतें एक ही शैली की होती हैं, इसलिए अनेक लोगों का विश्वास है कि ये दो अलग-अलग इंसान ना होकर एक ही आदमी के नाम हैं ! यहां तक कि कुछ लोग तो इनके दोहों की शुरुआत, ''कहै घाघ सुनु भड्डरी'' को देख इन्हें पति-पत्नी तक मानते हैं। कुछ लोगों के अनुसार उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र-बिहार, बंगाल एवं असम प्रदेश में ''डाक'' नामक कवि की भी घाघ जैसी ही कृषि सम्बन्धी कहावतें मिलती हैं जिसके आधार पर उन विद्वानों का अनुमान है कि डाक और घाघ भी एक ही थे। 

घाघ के बारे में मान्यता है कि बचपन से ही वे कृषि विषयक समस्याओं के निदान में दक्ष थे। छोटी उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गयी थी कि दूर-दूर से लोग अपनी खेती सम्बन्धी समस्याओं को लेकर इनके पास आया करते थे। चाहे बैल खरीदना हो या खेत जोतना, बीज बोना हो अथवा फसल काटना, घाघ के पास उनकी हर मुश्किल का समाधान हुआ करता था। इस सब के बावजूद इनके बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि घाघ नाम है या उपनाम इसमें भी मतभेद हैं ! पर पं. राम नरेश त्रिपाठी जी ने अपनी खोजों के आधार पर इनका नाम देवकली दुबे माना है। उनका जन्म, निर्विवाद रूप से तो नहीं फिर भी सोलहवीं शताब्दी में अकबर बादशाह के जमाने में उत्तर-प्रदेश के कन्नौज शहर के पास के एक गांव चौधरी सराय में हुआ माना जाता है। इस बात को इससे भी पुष्टि मिलती है कि, इनकी प्रतिभा से प्रभावित और प्रसन्न हो अकबर ने इन्हें प्रचुर धन, जमीन और चौधरी की उपाधि प्रदान की थी, जिस पर इन्होंने कन्नौज से कुछ ही दूरी पर सराय घाघ नामक गांव की स्थापना की थी। जिसका अस्तित्व आज भी है। इनकी सातवीं-आठवीं पीढ़ी के कुछ परिवार आज भी वहां रहते हैं। जो भी हो घाघ अपने कृषि संबंधी ज्ञान के लिए उत्तर तथा मध्य भारत के सबसे बड़े विद्वान, पर्यावरणविद, खगोल ज्ञानी, कृषि गुरु और दार्शनिक कवि माने जाते हैं। जिनकी सरल, सुगम्य स्थानीय भाषा आज भी सीधे-सादे, अशिक्षित किसानों का मार्गदर्शन कर रही है। 

सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै।


गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।


वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा। 

भड्डरी कौन थे, किस प्रांत के थे, किस भाषा में उन्होने कहावतों का सृजन किया, यह आज भी विद्वानों में चर्चा का विषय है। भड्डरी के जन्म के सम्बन्ध में ग्रामीण अंचलों में अनेक किंवदंतियां चलन में हैं। कुछ उन्हें राजस्थान से जोड़ते हैं तो कुछ काशी से। और चूँकि घाघ की कविताओं में उनका अक्सर जिक्र आया है तो उनका काशी निवासी होना ज्यादा तर्क-सम्मत लगता है। ऐसी मान्यता है कि इनमें दैवीय प्रतिभा थी जिससे वे सटीक भविष्यवाणी किया करते थे। 

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।

तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।
:
भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।। 

जो भी हो पर इतना तो सत्य जरूर है कि घाघ और भड्डरी दोनों में दैवी प्रतिभा थी। उनकी जितनी भी कहावतें हैं, सभी प्रायः खरी उतरती हैं। घाघ जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं भड्डरी की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार से विशेष रूप से संबद्ध हैं। आज भी देश के सुदूर गांवों-कस्बों में किसानों को इनकी कहावतें कंठस्थ हैं और खेती-खलिहानी में पथ-प्रदर्शक का काम करते हुए खादों के विभिन्न रूपों, गहरी जोत, मेंड़ बाँधने, फसलों के बोने के समय, बीज की मात्रा, दालों की खेती के महत्व इत्यादि हर मसले पर सहायक होती हैं। हालाँकि घाघ का लिखा हुआ  कुछ भी उपलब्ध नहीं है पर उनका दृढ अभिमत था कि कृषि सबसे उत्तम व्यवसाय है। 

उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान।
:
उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो सँग रहा।
:
खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत।
गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै। 

दोनों में यह समानता भी है कि घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृतांत भी निर्विवाद नहीं है। दोनों  समकालीन थे।घाघ के समान ही लोकजीवन से संबंधित कहावतों में कही गई भड्डरी की भविष्यवाणियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं। पर जितनी ख्याति जनकवि घाघ को मिली उतनी प्रसिद्धि भड्डरी को नहीं मिली।  

सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय।

घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।
:
सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय।

महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।

जो भी हो दोनों ही व्यक्ति अत्यंत कुशल, बुद्धिमान, नीतिमान तथा भविष्य का ज्ञान रखने वाले थे। आज के समय में यदि कोई इंसान नीतिनिपुण, चालाक व गहरी सूझबूझ वाला हो तो उस ''घाघ'' कहकर बुलाया जाने लगता है ! इसीसे उसकी व्यक्तित्व की गहराई का अंदाजा लग जाता है।

सोमवार, 22 अप्रैल 2019

अपने इतिहास को जानना भी जरुरी है

बहुत खेद हुआ जब हल्दीघाटी के बारे में एक दसवीं के छात्र ने अनभिज्ञता दर्शाई ! हल्दीघाटी तो एक मिसाल भर है। ऐसी  शौर्य, साहस , निडरता, देशप्रेम की याद दिलाने वाली सैंकड़ों जगहें हैं जो हमारे गौरवशाली इतिहास की प्रतीक है ! पर दुःख इसी बात का है कि हमारी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्रणाली में ऐसे विषयों की कोई अहमियत नहीं रह गयी है। जिसके फलस्वरूप आज के बच्चों को तो छोड़िए उनके अभिभावकों तक को इनके बारे में पूरी और सही जानकारी नहीं है ! इसमें उनका कोई दोष भी नहीं है, जब आप किसी चीज के बारे में बताओगे ही नहीं तो उसके बारे में किसी को क्या जानकारी होगी ......... !

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हल्दीघाटी, नाम सुनते ही जो पहली तस्वीर दिमाग में बनती है वह एक पर्वतीय घाटी में राणा प्रताप और मुगलों के बीच हुए भीषण युद्ध का खाका खींच देती है। अधिकांश लोगों को यही लगता है कि यह पहाड़ियों के बीच स्थित बड़ी सी जगह होगी जहां प्रताप ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिए थे। पर सच्चाई कुछ और है। हल्दी घाटी उदयपुर से तक़रीबन 48 की.मी. की दूरी पर अरावली पर्वत शृंखला में खमनोर और बलीचा गांवों के बीच लगभग एक की.मी. लंबा और लगभग 17-18 फुट चौड़ा, एक दर्रा (pass) मात्र है। जहां 18 जून 1576 में राणा प्रताप ने गोरिल्ला युद्ध लड़ते हुए अपने से चौगुनी अकबर की सेना को तीन की.मी. तक पीछे धकेल भागने को मजबूर कर दिया था। इस जगह की मिट्टी का रंग बिल्कुल हल्दी की तरह होने के कारण इसका नाम हल्दीघाटी पड़ा, पर उस दिन तो महाराणा ने खून का अर्ध्य दे कर इसे लाल कर दिया था ! उस निर्जन सी जगह में खड़े हो यदि आप पांच-छह सौ पहले की कल्पना करने की कोशिश भी करें तो रोमांच हावी हो जाएगा। श्रद्धा से उन राण बांकुरों के प्रति सर झुक जाएगा जिन्होंने विकट और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आज जरुरत है ऐसी व्यवस्था की जो आधुनिक पीढ़ी को उनके बारे में जानकारी दे सके ! 

शौर्य, साहस, निडरता, देशप्रेम की याद दिलाने वाली यह जगह हमारे गौरवशाली इतिहास की प्रतीक है ! पर यह अत्यंत खेद का विषय है कि हमारी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्रणाली में ऐसे विषयों की कोई अहमियत नहीं रह गयी है। जिसके फलस्वरूप आज के बच्चों को तो छोड़िए उनके अभिभावकों तक को पूरी और सही जानकारी नहीं है। आजकी शिक्षा-पद्दति सिर्फ और सिर्फ एक कागज का प्रमाण पत्र हासिल कर उसकी सहायता से किसी नौकरी को लपकने का जरिया मात्र रह गयी है। क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि स्कूलों में प्रथमिक शिक्षा के दौरान ज्यादा ना सही कम से कम हफ्ते या पंद्रह दिनों में एक बार अपने इतिहास, उसके महानायकों, उनकी उपलब्धियों, उनके योगदान की सच्चाई के बारे में, बिना किसी कुंठा और पूर्वाग्रह के, बताया जाए ! ठीक उसी तरह जैसे पिछले जमाने में दादी-नानी की किस्से-कहानियां बच्चों में नैतिकता, त्याग, प्रेम, संस्कार इत्यादि के साथ-साथ पौराणिक तथा ऐतिहासिक जानकारीयां भी रोपित कर देती थीं।   

अभी पिछले दिनों उदयपुर जाने का अवसर मिला तो हल्दीघाटी तो जाना ही था ! वहां पहुंचने के दौरान जब साथ के बच्चे से, जो दिल्ली के एक नामी ''क्रिश्चियन स्कूल'' की दसवीं कक्षा का छात्र है, वहां के बारे में पूछ तो उसने पूरी तरह अनभिज्ञता दर्शाई ! यहां तक की उसकी ''मम्मी'' को भी सिर्फ आधी-अधूरी जानकारी थी, जबकि वह खुद एक स्कुल में अध्यापक हैं। विडंबना यही है कि अपने बच्चों के भविष्य, उनके कैरियर की चिंता में आकंठ डूबे अभिभावकों को आजके समय की गला काट पर्टियोगिताओं के चलते इतना समय ही नहीं मिलता कि वे इस तरह की बातों पर ध्यान दें। इसकी जिम्मेवारी तो पाठ्यक्रम बनाने वालों पर होनी चाहिए ! शिक्षा पद्यति कुछ ऐसी हो जो सिर्फ जानकारियां ही न दे बच्चों के ज्ञान में भी बढ़ोत्तरी करे। 

इसी यात्रा के दौरान होटल में केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर जी से मुलाकात का संयोग बना था पर यह समय ऐसी गंभीर बातों के लिए उचित नहीं था। चुनावी समय के अलावा और कोई वक्त होता तो यह बात उनके कानों में जरूर डाल दी जा सकती थी। वैसे सूना जा रहा ही कि केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति पर काम कर रही है। अब शिक्षा नीति पर गठित सलाहकार समिति क्या सलाह देती है यह देखने की बात होगी। 

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

एक मंदिर जहां वहीं के राजा का प्रवेश वर्जित है

धीरे-धीरे राजा प्रतापमल्ल को रोज-रोज इतनी दूर मंदिर में आना-जाना अखरने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक मूर्ति राजमहल में ही स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने स्वप्न में आ राजा को श्राप दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा ! तब से सैकड़ों सालों के बाद आज भी  राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है.......!

#हिन्दी-ब्लागिंग 

पिछले दिनों हमारे यहां मंदिर  प्रवेश को लेकर काफी गुल-गपाड़ा मचा रहा। जिसमें इसकी-उसके अधिकार की बातें, कोर्ट-कचहरी, धर्म-अधर्म, राजनीती-सियासत सब तरह के रंग सामने आते रहे। ऐसे में एक ऐसे मंदिर की भी बात सामने आई, जहां खुद वहाँ के राजा का भी प्रवेश निषेद्ध है ! जी हाँ ! नेपाल में विष्णु भगवान का एक ऐसा मंदिर है जिसमें वहां के राजा को भी प्रवेश की मनाही है। जिसका कारण राजा खुद ही था !




राजधानी काठमांड़ू से नौ-दस की.मी. की दूरी पर शिवपुरी पहाड़ी के पास बूढ़ा नीलकंठ मंदिर स्थित है। प्रवेश-द्वार के सामने ही विशाल जलकुंड बना  हुआ है। जिसमें शेषनाग के ग्यारह फणों के छत्र वाली शेष शैय्या पर शयन कर रहे भगवान विष्णु की चर्तुभुजी प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा का निर्माण काले पत्थर की एक ही शिला से हुआ है।प्रतिमा की लम्बाई 5 मीटर है एवं जलकुंड की लम्बाई करीब 13 मीटर की है। जिसे बूढा नीलकंठ के नाम से जाना जाता है। मंदिर का नाम नीलकंठ है जो भगवान शिव का एक नाम है। द्वार पर भी श्री कार्तिकेय और गणेश जी की प्रतिमाएं लगी पर यहां मूर्ति भगवान विष्णु जी की है ! तब इसका नाम बूढ़ा नीलकंठ कैसे हो गया ? इसके पीछे जनश्रुति है कि समुद्र-मंथन के समय विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होंने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे एक झील का निर्माण हुआ। मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में वहीं से जल आता है, जिसको गोसाईंकुंड के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में विष्णु प्रतिमा के साथ भगवान शिव के विग्रह का प्रतिबिंब भी जल में दिखाई देता है। 

इसकी स्थापना की किंवदन्ती के अनुसार एक किसान खेत की जुताई कर रहा था तभी उसका हल एक पत्थर से टकराया तो वहां से रक्त निकलने लगा। जब उस भूमि को खोदा गया तो बूढ़ा नीलकंठ की यह प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसके पश्चात उसे यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। तभी से नेपाल के निवासी बूढ़ा नीलकंठ का अर्चन-पूजन करते आ रहे हैं। पर एक विचित्र बात जो यहां से जुडी हुई है कि राजा, जो खुद भगवान का प्रतिनिधि होता है, उसी का यहां प्रवेश निषेद्ध है ! वैसे इसका जिम्मेवार राजा खुद ही था। 

बात तक़रीबन 17वीं शताब्दी की है। जब नेपाल के तत्कालीन नरेश राजा प्रतापमल्ल रोज भगवान के दर्शन करने हनुमान ढोका स्थित अपने महल से यहां आया करते थे। पर मतिभ्रम के चलते उन्होंने खुद को ही विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। धीरे-धीरे उन्हें रोज इतनी दूर आना-जाना अखरने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक मूर्ति राजमहल में ही स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने स्वप्न में आ राजा को श्राप दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा। तब से आज तक राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है।

वैसे भगवान विष्णु के इसी स्वरूप की एक और मूर्ती राजधानी के निकट बालाजू उद्यान में भी स्थित है जो असली मूर्ति से कुछ छोटी है। राजपरिवार के सदस्य यहीं प्रभू के दर्शन करने जाते हैं। नवम्बर माह में मुख्य मंदिर के साथ ही देव उठनी एकादशी को यहां भी बड़ा भारी मेला लगता है, दूर-दूर से लोग अपनी मनौतियां ले कर आते हैं। इस मंदिर की भी काफी मान्यता है।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

रणथंभौर दुर्ग, उसमें स्थित भवन तथा मंदिर

इस अभेद्य दुर्ग के अंदर गणेश जी के मंदिर के अलावा एक रघुनाथ मंदिर, एक जैन मंदिर, एक माँ काली का शक्ति पीठ, बाइस खंबा छतरी के नीचे एक गुफा में एक विशाल शिव लिंग भी स्थापित है। इन सब के साथ ही यहां एक मस्जिद भी निर्मित है। परन्तु इनके साथ ही जिसकी भरमार है जो सैंकड़ों की तादाद में यहां, वहाँ, दाएं, बाएं, ऊपर, नीचे सब जगह मौजूद है, वे हैं लंगूर ! पर एक बात है वे किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते। शिमला के जाकू या मथुरा-वृन्दावन के शरारती वानर युथों से उनकी कोई तुलना नहीं है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग  
रणथंभौर दुर्ग, राजस्थान के सवाई माधोपुर शहर से करीब से 12-13 कि.मी. की दुरी पर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच रणथम्भौर अभ्यारण्य के बीच में स्थित यह एक अभेद्य दुर्ग है। हालांकि इसका निर्माण चौहान वंश के राजाओं द्वारा 944 ईस्वी शुरू हो गया था पर इसकी पहचान प्रमुखता से राव हम्मीर देव चौहान के साथ की जाती है। मुहम्मद गौरी से पृथ्वी राज चौहान के हार जाने के बाद उनके पुत्र गोविंदराज ने रणथम्भौर को अपनी राजधानी बनाया था। उनके अलावा विभिन्न राजाओं का यहां आधिपत्य रहा। पर इसको सबसे ज्यादा ख्याति मिली हम्मीर देव के, 1282-1301, शासन काल में। उनके 19 वर्षो का शासन इस दुर्ग का स्वर्णिम युग रहा था। उनके द्वारा लडे गए 17 युद्धों में से उन्हें 13 में विजय प्राप्त हुई थी। फिर बाद में सवाई माधो सिंह ने फिर से पास के गांव और इस इलाके का विकास किया और इस किले को और भी सुदृढ़ करवाया। इसीलिए इस पूरे इलाके का नाम उनके नाम पर सवाई माधोपुर रखा गया।



हम्मीर कुंड 









आज भी इस दुर्ग की मजबूती और बेहतर हालत को देख कर इसके स्वर्ण काल का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। किले के अंदर बड़ी मात्रा में दीवारें देखने को मिलती है। यहां सात द्वार भी है जिनके नाम हैं, नवलखा पोल, हाथिया पोल, गणेश पोल, अंधेरी पोल, दिल्ली गेट, सत्पोल, सूरज पोल। इन द्वारों की विशालता-भव्यता और सुरक्षता देखते ही बनती है। 


हम्मीर महल 
छत्तीस खंबा छतरी 

दुर्ग के पश्चिमी दिशा में भी कई भवन और इमारतें अपनी उत्कृष्ट अवस्था में खड़े हैं। जिनमें प्रमुख हैं, हम्मीर पैलेस, बत्तीस खम्भा छत्री, हैमर, बडी कच्छारी,  छोटी कछारी इत्यादि। पर इन सब में जो स्थान सबसे लोकप्रिय, विश्व-प्रसिद्द, आस्था और मान्यता प्रद है, जिससे जन-जन की भावनाएं जुडी हुई हैं, वह है यहां का त्रिनेत्र गणेश या प्रथम गणेश मंदिर। इसमें गणपति अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। इनके साथ एक कथा भी जुडी हुई है। बात तब की है जब राजा हम्मीर अल्लाउद्दीन खिलजी के साथ युद्ध रत थे। युद्ध के पहले ही किले में प्रचुर खाद्य सामग्री एकत्रित कर ली गयी थी। पर लड़ाई लंबी खिंच जाने के कारण अनाज के गोदाम खाली होने लगे। गणेश जी के महान भक्त राजा को चिंता ने घेर लिया। उसी समय एक रात उन्हें सपने में गणेश जी ने दर्शन दिए और कहा तुम्हारी सारी चिंताएं और मुसीबतें जल्द ही ख़त्म हो जाएंगीं। सुबह किले की एक दीवाल में तीन नेत्रों वाली मूर्ति चिपकी पाई गयी और सारे अन्न भंडार भी भरे-पुरे हो गए। युद्ध के समाप्त होने पर राजा हम्मीर ने वहीँ गणेश जी का मंदिर बनवा दिया। जहां गणेश चतुर्थी पर लाखों की भीड़ जुटती है। इसके साथ ही देश-विदेश से भक्तजन अपने किसी भी पुण्य कार्य को आरंभ करने के पहले श्री गणेश को पत्र लिख आमंत्रित करते हैं, जिससे उनका कार्य निर्विघ्न और सुखमय हो। इस काम के लिए डाक विभाग द्वारा एक पत्र वाहक सिर्फ मंदिर के लिए निमंत्रण पत्र ले जाने के लिए नियुक्त किया हुआ है। 


रघुनाथ मंदिर प्रवेश द्वार 


शक्ति पीठ, माँ काली मंदिर 
गणेश मंदिर 

गणेश जी के मंदिर के अलावा किले में एक रघुनाथ मंदिर, एक जैन मंदिर, एक माँ काली का शक्ति पीठ, बाइस खंबा छतरी के नीचे एक गुफा में एक विशाल शिव लिंग भी स्थापित है। इन सब के साथ ही यहां एक मस्जिद भी निर्मित है। परन्तु इनके साथ ही जिसकी भरमार है जो सैंकड़ों की तादाद में यहां, वहाँ, दाएं, बाएं, ऊपर, नीचे सब जगह मौजूद है, वे हैं लंगूर ! पर एक बात है वे किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते। शिमला के जाकू या मथुरा-वृन्दावन के शरारती वानर युथों से उनकी कोई तुलना नहीं है। 


जैन मंदिर 
गणेश मंदिर की ओर 


वानर परिवार 



वैसे रणथम्भौर का सबसे बड़ा आकर्षण तो यहां का वन्य अभ्यारण्य ही है। जहां बाघों के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करवाया गया है। उनकी बढ़ती संख्या के  सुखद परिणाम भी मिले है। बाघों के अलावा जंगली सूअर, भालू, वैन भैंसे, हिरणों की कई प्रजातियों के साथ-साथ अनेक प्रकार के पक्षियों का भी यहां बसेरा है। जंगल सफारी के लिए सबसे अच्छा तथा अनुकूल मौसम ऑक्टूबर से मार्च-अप्रैल तक का होता है। वर्षा के मौसम में सफारी दो महीने के लिए बंद रहती है। यहां वायु या थल मार्ग से कहीं से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है। रहने खाने के लिए भी बहुत सारे अच्छे और बजट वाले होटल वगैरह उपलब्ध हैं। 

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अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...