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शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

कहनी है इक बात हमें इस देश के पहरेदारों से

खालसा पंथ में दिक्षित लोग जात-पांत के भेदभाव से दूर, आत्मज्ञानी, सरल चित्त, समाजसेवी होने के साथ-साथ किसी के बहकावे में ना आने वाले हैं ! वे जानते हैं कि हिंदू-सिख एक ही माँ की संतानें हैं ! एक ही शरीर के अंग हैं ! एक ही परिवार के सदस्य हैं ! सो यहां किसी की दाल गल नहीं रही थी ! पर भारत को  खंड-खंड करने का स्वप्न देखने वाले लोग भी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हम कुछ जल्दी ही भावुक हो जाते हैं...........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हिंदुस्तान ! हिंदुओं के रहने का स्थान। संपंन्न, शांतिप्रिय, जो है उसी में खुश रहने वाले लोगों का देश। कई आए, कई गए ! कुछ अपना मतलब सिद्ध कर लौट गए कुछ यहीं के हो कर रह गए। दुनिया में मंदी का दौर आया तो बाहर के देशों के लोगों की गिद्ध दृष्टि इस सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश पर पड़ी। बहुतेरे आए पर अंग्रेजों ने अपनी कुटिलता से बाकी अतिक्रमणकारियों को हाशिए पर धकेल दिया। पर सिर्फ चार हजार अंग्रेजों के द्वारा इतनी बड़ी आबादी पर काबू पाना आसान नहीं था। इसीलिए षड़यन्त्र पूर्वक धर्म के नाम पर फूट फैला कर आपसी नफरत को जन्म दिया ! फिर एक से दूसरे को बचाने के नाम पर संरक्षण देने के बहाने उन्हें वश में किया ! अपनी शर्तें रखीं और धीरे-धीरे अपने शिकजे को जकड़ते चले गए। यहां तक की जाते-जाते भी उसी के सहारे देश के दो टुकड़े तो कर ही गए साथ ही अपनी कुटिल बुद्धि से देश को और भी गारत करने के लिए जाति, भाषा, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब जैसे मुद्दों द्वारा फूट डाल राज करने की नीतियां हमारे राजनेताओं को विरासत में दे गए। जिससे उपजे विद्वेष का परिणाम आज सबके सामने है।

कभी सोच के देखा जाए तो ऐसा क्या हुआ जो देश की आजादी के बाद से ही हिंदुओं, खासकर ब्राह्मणों के खिलाफ दलित मोर्चा खोला गया ! उसके पहले हजार साल तक ऐसी बात क्यों नहीं उठी ? क्या इन्हीं तीस-चालीस सालों में ही ब्राह्मणों के द्वारा ज्यादतियां हुईं ? जबकी इन्हीं ब्राह्मणों की वजह से ही ईसाईयों या मुस्लिमों द्वारा धर्मांतरण सफल नहीं हो पाया था ! नहीं तो किसी भी विधर्मी शासक ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जब यह देखा गया कि बाकी हिंदू जब तक ब्राह्मणों के संपर्क में रहेंगे तब तक उनको बहकाया नहीं जा सकता, तो इसीलिए जात-पांत का चक्रव्यूह रचा गया, पैसों का लालच और सम्मान की हड्डी फेंकी गयी ! यह दांव कुछ हद तक सफल रहा और समाज में विद्वेष की खाई गहरा गयी। वैसे सच तो यह है कि ब्राह्मण या मनुवाढ तो सिर्फ बहाना ही है, असल में हिंदुओं को बांट-काट कर किसी भी तरह सत्ता हासिल करना मकसद है।  

विडंबना ही रही कि पहले हिंदू मुस्लिम के बीच द्वेष के बीज बोए गए। फिर द्रविड़-आर्य का खेल खेला गया। उन्हें एक-दूसरे का दुश्मन जैसा बना दिया गया। पर इससे कइयों का मकसद सिद्ध नहीं हो पाया। सत्ता पाने की लालसा में कुकुरमुत्तों की तरह नए-नए छत्रप उगते गए और समाज को जाति, भाषा, क्षेत्र के हिसाब से बांट कर अपना उल्लू सीधा करते चले गए। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा से त्रस्त लोगों को कभी मनु, कभी हिंदू, कभी ब्राह्मण, कभी दलित जैसे निरर्थक जुमलों में उलझाए रखने में ही उनकी बादशाहत जो कायम रहने वाली थी। और चूँकि ब्राह्मण समाज की नींव की तरह थे सो पहले उन्हीं पर हमला किया गया। उन पर इल्जाम लगाने वाले तथाकथित समाजसेवी और अपने आप को बुद्धिजीवी कहलाने वालों को क्यों दलितों के मसिहाओं की कारस्तानियां नजर नहीं आतीं ? क्या किसी एक भी दलित नेता के किसी सर्वहारा परिवार को सहारा दिया है ? परिवार को तो जाने दें किसी बच्चे के भविष्य को संवारने का जिम्मा लिया है ?

अब तक पडोसी या घर के ही कुटिल लोगों की लाख कोशिशों के बावजूद हिंदुओं और सिखों में दरार नहीं डाली जा सकी थी। इसके कुछ मुख्य कारण भी थे ! जैसे सिख धर्म का इतिहास अभी नया-नया होने के कारण उसके बारे में जानने और बताने वाले बहुत से लोग समाज को सही जानकारी देते आए थे। गुरु साहिबान की वाणियों में ऋषि-मुनियों की बातें समाहित थीं। ऐसे सैंकड़ों हिंदू घर थे जिन्होंने अपने एक पुत्र को खालसा पंथ की दीक्षा दिलवाई थी। फिर इस पंथ में दिक्षित लोग जात-पांत के भेदभाव से दूर, आत्मज्ञानी, सरल चित्त, समाजसेवी होने के साथ-साथ किसी के बहकावे में ना आने वाले थे। वे जानते थे कि हिंदू-सिख एक ही माँ की संतानें हैं ! एक ही शरीर के अंग हैं ! एक ही परिवार के सदस्य हैं ! इन्हीं सच्चाइयों के कारण यहां किसी की दाल गल नहीं रही थी। पर विरोधी ताकतें भी चुप नहीं बैठीं थीं ! धीरे-धीरे उन्होंने जहर उगलना जारी रखा ! जिसके तहत दोनों धर्मों को जुदा जताने की साजिश शुरू हो गयी। नयी सिख पीढ़ी को इतिहास की गलत जानकारी दे बहकाने की कोशिश की जाने लगी। बार-बार यह फैलाया जाता रहा कि सिखों ने हिंदुओं की रक्षा की ! पर ज्ञातव्य है कि खालसा पंथ की स्थापना के समय ब्राह्मण, क्षत्रिय ही आगे आए थे। यह खुला सत्य है कि हर  परिवार ने अपना एक बेटा खालसा फौज के लिए दिया था। एक ओर जहां मराठे मुगलों से लड़ रहे थे वहीं राजपूतों और ब्राह्मणों ने भी मुग़ल साम्राज्य की नाक में दम कर रखा था। जब पहली खालसा फौज बनी तो उसका नेतृत्व भाई प्राग दास जी, जो एक ब्राह्मण थे, उनके हाथों में था। उनके बाद उनके बेटे भाई मोहन दास जी ने कमान सम्हाली। उनके अलावा सती दास जी, मति दास जी, दयाल दास जी जैसे ब्राह्मण वीरों ने गुरु जी की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे डाली। इतना ही नहीं गुरु जी को शस्त्रों की शिक्षा देने वाले भी पंडित कृपा दत्त जी जैसा योद्धा पंजाब में दुसरा नहीं हुआ। एक बैरागी ब्राह्मण लक्ष्मण दास और उनके किशोर पुत्र अजय ने सरहिंद में गुरु परिवार की रक्षा के लिए दुश्मनों से लोहा लिया और चप्पड़ चिड़ी की लड़ाई में विजय प्राप्त की। यही लक्ष्मण दास आगे चल कर बंदा बहादुर कहलाए।

कहने का तात्पर्य यही है कि भारत को खंड-खंड करने का स्वप्न देखने वालों से हमें होशियार रहने की जरुरत है। किसी के प्रलोभन, दरियादिली या झूठी सहानुभूति से भ्रमित न होकर अपने देश और समाज के लिए ही अपने आप को सजग रखना है। फिर चाहे वह पाकिस्तान द्वारा किसी धर्मस्थली तक जाने की इजाजत दे बहलाने की मंशा हो या फिर चीन द्वारा उसके यहां बेहतर व्यापार का प्रलोभन ! क्योंकि वे लोग भी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हम कुछ जल्दी ही भावुक हो जाते हैं। 

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

तो फिर..... ऐसे में रावण का मरना भी असंभव है

आज, भले ही सांकेतिक रूप से ही सही, रावण को मारने, उसका दहन करने का जिम्मा किसको दिया जाता है ? आज पार्कों में, चौराहों पर, कालोनियों में या मैदानों में जो रावण के पुतले फूंके जाते हैं उनको फूंकने में अगुवाई करने वाले अधिकांश तो खुद बुराइयों के पुतले होते हैं ! उनकी तो खुद की अपनी लंकाऐं होती हैं, काम-क्रोध-मद-लोभ जैसी बुराइयों से भरपूर ! तो बुराई ही बुराई पर क्योंकर विजय पाएगी ? आज बुराई पर अच्छाई की विजय निश्चित करने के लिए किसीको उसके गुणों का आकलन कर के नहीं बल्कि उसकी हैसियत देख कर चुना जाता है। आज रावण दहन के लिए उसे ''धनुष'' थमाया जाता है जो अपने क्षेत्र में येन-केन-प्रकारेण अगुआ हो................!

#हिन्दी_ब्लागिंग              
अभी-अभी दशहरा हो कर गया है। शायद ही कोई माध्यम ऐसा होगा जिसमें किसी कवि, लेखक, संत, दार्शनिक, पंडित, कथावाचक, कलाकार या स्वयंभू बुद्धिजीवी ने साल दर साल रावण के पुतले के दहन के बावजूद उसके ना मरने, हर साल आ धमकने की बात कह-कह कर अपनी सलाह दूसरों यानी आम अवाम पर जबरन ना थोपी हो ! वैसे ऐसा कहने वालों में अधिकांश वही हैं जिन्हें हिंदुओं के हर त्यौहार में कोई न कोई खामी नज़र आती है। त्यौहार आते ही इनकी विद्वता भी कुलांचें मारने लगती है दूसरों पर हावी होने के लिए !  

पर ऐसा कहने वाले और दूसरों को सलाह देने वाले कभी यह सोचते हैं कि आज, भले ही सांकेतिक रूप से ही सही रावण को मारने, उसका दहन करने का जिम्मा कौन लेता है या किसको दिया जाता है ? आज पार्कों में, चौराहों पर, कालोनियों में या मैदानों में जो रावण के पुतले फूंके जाते हैं उनको फूंकने में अगुवाई करने वाले अधिकांश तो खुद बुराइयों के पुतले होते हैं ! उनकी तो खुद की अपनी लंकाऐं होती हैं, काम-क्रोध-मद-लोभ जैसी बुराइयों से भरपूर, तो बुराई ही बुराई पर क्योंकर विजय पाएगी ? आज बुराई पर अच्छाई की विजय निश्चित करने के लिए किसीको उसके गुणों का आकलन कर के नहीं बल्कि उसकी हैसियत देख कर चुना जाता है। आज रावण दहन के लिए उसे ''धनुष'' थमाया जाता है जो अपने क्षेत्र में येन-केन-प्रकारेण अगुआ हो ! फिर चाहे वह राजनीतिज्ञ हो, चाहे कलाकार हो, चाहे व्यापारी हो या फिर अपने इलाके का प्रमुख ही हो, जैसे किसी कॉलोनी या हाऊसिंग सोसायटी का प्रेजिडेंट ! अगुआ होना ही उसकी लियाकत है भले ही कर्मों से वह दुर्योधन ही क्यों न हो ! 

रावण अपने आप में ज्ञानी-ध्यानी, सबसे बड़ा शिव भगत, पुरातत्ववेता, ज्योतिष का जानकार, विद्वान तथा युद्ध विशारद, महाबली योद्धा था। उससे बड़ा महा पंडित उस युग में कोई दूसरा नहीं था। ऐसा नहीं होता तो क्या श्री राम उसे अपने यज्ञ का पुरोहित बनाते ! उस पर राम जो सारे जगत के पालनहार हैं, नियोजक हैं, सर्व शक्तिमान हैं, सारे चराचर के स्वामी हैं, उन्हें भी उस रावण पर विजय पाने में ढाई महीने लग गए थे ! तब जा कर कहीं उसका वध हुआ था। रावण को मारने के लिए राम का होना जरुरी है और राम ऐसे ही कोई नहीं बन जाता ! उसके लिए उसमें प्रबल शक्ति का होना तो अवश्यंभावी है ही, साथ ही उसे कर्त्वयनिष्ठ, सत्यनिष्ठ, दृढ़निश्चयी, करुणामय, ज्ञानी, वचन पालक, संयमी, ईर्ष्या मुक्त, विवेकी, निरपेक्ष, शरणागत वत्सल, दयालु, समदर्शी, काम-क्रोध-मोह विहीन होना भी बहुत जरुरी है ! क्या आज एक ही इंसान में इतने गुणों  होना संभव है ? 
नहीं ! 
तो रावण का मरना भी असंभव है !  

बुधवार, 15 मई 2019

व्यथा एक सरोवर की !

वर्षों से काठ की हांडी में खिचड़ी के सपने दिखाने वालों को किनारे कर दिया गया। सबकी समझ में आ गया था कि इंसान रहेगा तभी धर्म-जाति भी रह पाएगी ! मुफ्तखोरों को भी इशारों से समझा दिया गया कि मेहनत सभी को करनी पड़ेगी, यह नहीं कि सरोवर की काया पलट हम करें और तुम बर्तन ले कर पानी भरने आ जाओ ! अब अवाम ''देखिएगा, हम करेंगें, हमें करना है'' की बजाए ''देखें, हमने कर दिया है'' कहने वाले को तरजीह देने लगी ! चौधरी भी समझ गए थे कि हवाबाजी के दिन हवा हुए ! अब कुछ ना किया तो चौधराहट तो क्या बिस्तर भी गोल करना पड़ जाएगा .......!           

#हिन्दी_ब्लागिंग   
प्रकृति की सुरम्य घाटियों में एक अति विशाल, सुंदर, क़ुदरत की नेमतों से घिरा हुआ झीलनुमा सरोवर था। दूर-दूर के लोग, पशु-पक्षी सब उस पर आश्रित थे। बिना भेद-भाव के मिल-जुल कर सब अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप उसका उपयोग किया करते थे। धीरे-धीरे उसके शुद्ध-निर्मल जल, फलदार वृक्ष, उपजाऊ जमीन, स्वच्छ पर्यावरण के कारण उसकी ख्याति इतनी फ़ैल गयी कि देश तो देश, विदेशों से भी लोगों ने आ-आ कर उसके पास डेरा जमा लिया ! अब जैसा कि होता आया है, भीड़ बढ़ने के साथ-साथ वहां कई चौधरी भी पैदा हो गए ! सरोवर उनकी पीढ़ियों को तारने का जरिया बन गया ! वे अपने मतलब के लिए लोगों को भरमा, तरह-तरह के हथकंडे अपना कर सरोवर के विभिन्न हिस्सों पर अपना बर्चस्व कायम करने की जुगत भिड़ाने लगे। कइयों ने अपनी चौधराहट कायम रखने के लिए अपने पूर्वजों की गाथाएं बयान करनी शुरू कर दीं ! कइयों ने ग्रामीणों को ही बेवकूफ बना, सरोवर के सौंदर्यीकरण के नाम पर उन्हीं के पैसे से सरोवर के चारों ओर अपना प्रशस्ति गान करते निर्माण करवा दिए ! तो कोई अति चतुर अपने को सर्वहारा का सच्चा हितैषी बता, सरोवर से ही धंधे का जुगाड़ कर, अपने परिवार का भविष्य संवारने लगा। कुछ ने आस-पास के जीवन देने वाले, वातावरण को स्वच्छ रखने वाले, बरसात का पानी संजोने वाले पेड़-पौधों को काट अपने विशाल महलों का निर्माण कर डाला। वहां एक डाली तक नहीं छोड़ी ! तो किसी ने नहा-धो कर वहीं पूजा-अर्चना की व्यवस्था करने की गोटी चल दी। पर सरोवर की ओर ध्यान देने, उसके रखरखाव, उसकी सुरक्षा की किसी को कोई परवाह नहीं थी ! परिणामस्वरूप अवाम के जीवन का सहारा, जीव-जंतुओं का पालनहार वह सरोवर सिमटता गया, पर्यावरण दूषित होता गया ! कभी गर्मी की भरी दोपहरी में भी शीतल छाया देने वाले वृक्षों के कट जाने से सरोवर की गहराई पर भी बुरा असर पड़ने लगा ! जल कम और दूषित हो गया ! पशु-पक्षी दूर चले गए ! जमीन ऊसर होने लगी ¡ लोगों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को  पूरा करने में भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ने लगा ! पर स्वार्थी चौधरीगण इसकी ओर ध्यान देने, इसकी बेहतरी के लिए कुछ करने की बजाय एक-दूसरे पर आरोप, नीचा दिखाने में ही जुटे रहे ! उन्हें इतना भी इल्म नहीं रहा कि इस सरोवर के ना रहने पर वे भी मिटटी में मिल जाएंगे ! 

इधर अवाम किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी खड़ी यह सारा तमाशा देखती तो थी, उसे कुछ-कुछ एहसास भी हो रहा था कि उसे धीरे-धीरे उसी के सरोवर से दूर कर दिया गया है पर वह बहकावों से, परंपराओं से, जाति से, धर्म से इतर अपनी भलाई का रास्ता अभी भी नहीं खोज पा रही थी ! यदि कुछ लोग सरोवर की दुर्दशा की गुहार ले कर किसी के पास चले भी जाते तो उनकी बात अनसुनी कर उन्हें यह समझाया जाता कि हम तो तुम्हारे साथ हैं, सदा तुम्हारा भला चाहते हैं ! पर तुम्हारी इस हालत का जिम्मेदार फलाना चौधरी है ! वही यहां का पानी निकाल अपने घर ले जाता है ! कोई कहता देखो वह अपनी गंदगी यहीं धो कर इसके पानी को दूषित कर रहा है ! कोई कहता कि फलाने ने वर्षों से इस पर कब्जा कर तुम्हारी यह हालत बनाई है ! कोई किसी के कर्मकांड को जल दूषित होने का कारण बता देता ! सरोवर को बचाने की जगह सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने, उस पर दोषारोपण कर खुद को पाक-साफ़ बताने में जुटे हुए थे ! दुर्भावना, पूर्वाग्रहों, कुंठाओं, विद्वेष ने हालात इतने जहरीले बना दिए थे कि यदि कोई सरोवर की ढलती कगार को बचाने के लिए घाट बनाने की कोशिश करता भी तो उसके विरुद्ध मिटटी चोरी का इल्जाम लगाते हुए सारे चौधरी अपने मतभेद भुला, अपने स्वार्थ किनारे कर एकजुट हो जाते, उसे बदनाम करने में !

पर यह सब कितने दिन चलता ! कितने दिन जनता अपने भाग्य के सहारे बैठी रहती ! कब तक सामने वालों की नौटंकी देखती रहती ! समय बदला ! नई पीढ़ी साक्षर हुई ! लोगों में, समाज में जागरूकता आई ! वर्षों से काठ की हांडी में खिचड़ी के सपने दिखाने वालों को किनारे कर दिया गया। सबकी समझ में आ गया था कि इंसान रहेगा तभी धर्म-जाति भी रह पाएगी ! मुफ्तखोरों को भी इशारों से समझा दिया गया कि मेहनत सभी को करनी पड़ेगी, यह नहीं कि सरोवर की काया पलट हम करें और तुम बर्तन ले कर पानी भरने आ जाओ ! अब अवाम ''देखिएगा, हम करेंगें, हमें करना है'' की बजाए ''देखें, हमने कर दिया है'' कहने वाले को तरजीह देने लगी ! सरोवर को हरा-भरा बनाने में एकजुट हुए लोगों का साथ, जाति, धर्म, भाषा को पैमाना बनाए बिना दिया जाने लगा। वृक्ष लगाए जाने लगे, लोगों को काम मिला, रोजगार बढ़ा। जेब में पैसा आया तो खुशहाली बढ़नी ही थी ! चौधरी भी समझ गए थे कि हवाबाजी के दिन हवा हुए ! अब कुछ ना किया तो चौधराहट तो क्या बिस्तर भी गोल करना पड़ जाएगा !             

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

जब तक देर है, तब तक तो अंधेर का रहना तय ही है !

जहां बाकी त्योहारों में अवाम अपने आराध्य की पूजा-अर्चना कर उसे खुश करने की कोशिश करता है, वहीं  इस उत्सव में  ''आराध्य'' दीन-हीन बन  अपने भक्तों को रिझाने में जमीन-आसमान एक करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मजे की बात यह है कि आम जिंदगी में लोगों को अलग-अलग पंथों, अलग-अलग मतों को मानने की पूरी आजादी होती है और इसमें उनके आराध्य की कोई दखलंदाजी नहीं होती पर इस त्यौहार के ''देवता'' साम-दाम-दंड-भेद हर निति अपना कर यह पुरजोर कोशिश करते रहते हैं कि उनके मतावलंबी का प्रसाद किसी और को ना चढ़ जाए...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारा देश तो सदा से उत्सव प्रिय रहा है। हफ्ते, महीने या साल में आने वाले ऐसे मौकों पर आम इंसान अपनी बेहतरी के लिए सारे रंजो-गम भूल-भूला कर उन्हें मनाने में कोई कोताही नहीं बरतता। ऐसा ही एक पंचसाला उत्सव आजकल अपने पूरे शबाब पर है। पर इसमें और बाकी त्योहारों में मूल फर्क यह है कि जहां बाकियों में अवाम अपने आराध्य की पूजा-अर्चना कर उसे खुश करने की कोशिश करता है, वहीं इसमें ''आराध्य'' दीन-हीन बन  अपने भक्तों को रिझाने में जमीन-आसमान एक करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मजे की बात यह है कि आम जिंदगी में लोगों को अलग-अलग पंथों, अलग-अलग मतों को मानने की पूरी आजादी होती है और इसमें उनके आराध्य की कोई दखलंदाजी नहीं होती पर इस त्यौहार के ''देवता'' साम-दाम-दंड-भेद हर नीति अपना कर यह पुरजोर कोशिश करते रहते हैं कि उनके मतावलंबी का प्रसाद किसी और को ना चढ़ जाए। 

इसी चेष्टा में यह उत्सव, उत्सव ना रह कर झूठोत्सव बन एक ऐसा संग्राम बन जाता है जिसमे सब कुछ जायज है। सब कुछ, गाली-गलौच, मार-पीट, धोखा-धड़ी, मौकापरस्ती, वायदे, विश्वासघात, झूठ, लालच, अपमान ! नहीं है तो सिर्फ अवाम की भलाई ! जिसकी गरीबी उसके परिवार का अभिन्न अंग बन चुकी है। जिसका अतीत भी आज है और भविष्य भी ! जिसके लिए बीमार पड़ जाना किसी अपराध से कम नहीं है ! उसे यह नहीं पता कि हाड-तोड़ मेहनत के बावजूद वह क्यों नहीं एक वक्त भी भरपेट भोजन कर पाता जबकि उसका ''आका'' बिन कुछ किए ही अपनी स्वर्ण नगरी स्थापित कर लेता है ! 

विचित्र हैं हमारे देशवासी ! जिस तरह वे हर अच्छाई, सौभाग्य, सुख का श्रेय भगवान को देते हैं और दुर्भाग्य को अपनी किस्मत का दोष मानते हैं ! खुद भूखे पेट भले ही हों धर्मस्थलों में भरसक दक्षिणा देने में नहीं हिचकिचाते ! इनके सामने ही इनके त्यागमय दान से धर्मस्थल ऐसी अकूत संपत्ति का ठीहा बन जाते रहे हैं जिसका कोई उपयोग नहीं होता। ठीक वैसे ही वर्षों से जाति, धर्म, भाषा, पंथ की भूलभुलैया में भटकाने वाले अपने आधुनिक देवताओं को ये कभी दोष नहीं देते ! सालों साल खुद एक झोपड़ी में पड़े-पड़े ही ये अपने आराध्यों के महल स्वर्णमंडित होता देख उसे भी उनका भाग्य और प्रभू का आशीर्वाद मान इसी बात पर निहाल होते रहते हैं कि अगला इनकी जाति का है ! उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं होता कि उसकी जाति-धर्म वाले ने उसका ''मनोरंजन'' करने के सिवा कुछ नहीं किया बल्कि उसे इस बात की ख़ुशी होती है कि उसके उसने फलांनी जाति और धर्म वाले को नीचा दिखा दिया। और यह नीचा दिखाने पर खुश होने की अफीम का डोज़ उसे सालों-साल दिया जाता रहा है और रहेगा !

शायद आसमान पर रहने वाला कभी जमीन की ओर देखे ! सद्बुद्धि वितरित करे ! शिक्षा बढे ! जन जागरण हो ! तब कहीं जा कर दिन बदलें ! कहने को तो कहा जाता है कि घूरे के भी दिन बदलते हैं ! पर अभी तो पता नहीं कितनी देर है ! पर जब तक देर है, तब तक तो अंधेर का रहना तय ही है ! 

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

अरे ! अब तो जागो, आधा विश्व हो तुम !!

एक ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है, किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या ये कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है  ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना यह है कि वे और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है ! समाज के इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया गया है कि कुछेक को छोड़ वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं........

पुरानी पोस्ट, फिर एक बार  !

#हिन्दी_ब्लागिंग 
आज #आठ_मार्च है, #महिलाओं _को_समर्पित_एक_दिन ! उन महिलाओं को जो विश्व का आधा हिस्सा हैं ! उन्हें बराबरी का एहसास करवाने, अपने हक़ के लिए जागरूक करने का दिन। पर सोचने की बात है कि क्या                                                                                                                                     
संसार का यह आधा भाग इतना कमजोर है कि उस पर किसी विलुप्त होती नस्ल की तरह ध्यान  दिया जाए ! सबसे बड़ी बात, क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को बराबरी का हकदार मानता है ? क्या वह दिल से चाहता है कि ऐसा हो, या सिर्फ उन्हें मुगालते में रखने का नाटक है ?  क्या यह पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन उनको समर्पित कर दिया जाए ?  वैसे ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।

आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। कभी हनुमान जी को उनकी शक्तियों की याद दिलाने में जामवंत ने सहायता की थी ! पर आज कोई भी ऐसा करने वाला नहीं है ! उन्हें खुद ही प्रयास 
करने होंगे, खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी, खुद को ही सक्षम-सशक्त बनाना होगा !  हाँ,  कुछ तो बर्फ टूटी है पर गति बहुत धीमी है, ऐसे में तो वर्षों-वर्ष लग जाएंगे ! क्योंकि यह इतना आसान नहीं है ! हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन उन्हें परोस कर अपना मतलब साधा जाता है। 

पहले तो उन्हें यह निश्चित करना होगा कि उनका लक्ष्य क्या है ! उन्हें क्या चाहिए ! सिर्फ मनचाहे कपडे पहनने और कहीं भी कुछ भी बोल सकने की छूट, ध्येय नहीं होना चाहिए है, वह भी सिर्फ बड़े शहरों में ! दूर-
दराज के गांवों-कस्बों में आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है। आश्चर्य होता है, इस और ध्यान ना देकर इस दिन वे कुछ, अपने आपको प्रबुद्ध, आधुनिक व खुद को महिलाओं का संरक्षक मान बैठी तथाकथित समाज सेविकाएं जो खुद किसी महिला का सरे-आम हक मारे बैठी होती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए,  आरामदेह वातानुकूलित कक्षों में कुछ ज्यादा ही मुखर हो जाती हैं।  

आज पुरुष केंद्रित समाज ने अपने इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया है कि कुछेक को छोड़, वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की, अपने सोए हुए जमीर को जगाने की....और यह सब उसे खुद ही करना है ! आसान नहीं है यह सब, पर करना तो पड़ेगा ही.......! 

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

देश-समाज के प्रति समर्पित लोगों को मिडिया में तवज्जो मिले

मीडिया नौटंकीबाजों को नहीं, देश-समाज के प्रति समर्पित लोगों को तवज्जो दे ! क्या यह जरुरी नहीं है कि जावेद-शबाना की तथाकथित पाक यात्रा को महिमामंडित करने की बजाय देवाशी माणेक और अहमदाबाद के उन व्यापारियों के निर्णय को अवाम के सामने लाया जाए जिन्होंने पाक विरोध में अपने करोड़ों रुपयों की परवाह नहीं की ............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
पुलवामा के हादसे से लोग अभी भी आक्रोशित हैं। समझ नहीं पा रहे हैं कि कैसे दिलों में घुमड़ते क्रोध को अमली जामा पहनाया जाए ! हजारों लोग अपने दिल की आवाज पर, जिसके जैसे समझ में आ रहा है वह अपने तौर पर पाकिस्तान के प्रति विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें कुछ ऐसे हैं जिनका मजबूरी में किया गया काम भी सुर्खियां बन जाता है और कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें देश के नाम पर करोड़ों गंवाने के बावजूद लोग जान नहीं पाते। कितने लोगों को पता है कि इस हादसे के बाद सूरत के हीरा व्यापारी श्री देवाशी माणेक ने अपनी बिटिया की शादी में दिए जाने वाले भोज समारोह को रद्द कर उसमें खर्च होने वाले करीब ग्यारह लाख रुपये पुलवामा हादसे के शहीदों के परिवारों को अर्पित कर दिए ! इसके अलावा सहायता कोष में भी पांच लाख रुपयों का योगदान दिया। वहीं अहमदाबाद के व्यापारियों ने एकजुट हो पाकिस्तान से व्यापार ना करने की घोषणा तो की ही साथ ही वहां होने जा रहे कार्यक्रम का भी बहिष्कार कर दिया जिससे उन्हें तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपये का नुक्सान भी झेलना पड़ा जो उन सब ने अपनी यात्रा के किराए के लिए खर्च किया था। ये तो भला हो श्री एन रघुरामन जी का जो वे इस बात को प्रकाश में लाए। हमारे चाटुकार मीडिया को कहां फुरसत है ऐसे लोगों और उनकी भावनाओं को तवज्जो देने की ! वह तो पिला पड़ा है, जावेद-शबाना जैसों को महिमामंडित करने में, जो परिस्थिति और मजबूरीवश अपनी पाक यात्रा को रद्द करने के कारण मशहूरियत को प्राप्त हो रहे हैं ! अभी दो-एक दिन पहले ही एक अखबार में शबाना को स्वाइन फ्लू से ग्रस्त होने की बात छपी थी ! क्या ऐसे में वह यात्रा करने लायक है भी ? दूसरी बात, क्या सिद्धू का हश्र देखने के बाद भी ये पकिस्तान जाते ? इतने तो कम-अक्ल नहीं हैं दोनों ! ऐसे में तो गंगा ही उनके घर आ गयी हाथ-मुंह धुलवाने !

उधर मीडिया कोई भी हो, दर्शनीय या छपनीय, उसे बुरा तो जरूर लगता होगा जब लोग उस पर बिकाऊ का लेबल चस्पा करते हैं, बिका हुआ कहते हैं ! पर फिर भी वह अपनी हरकतों से बाज कहां आता है ! अभी दो दिन नहीं हुए जब राजधानी की एक अंग्रेजी अखबार की उसके मुख्य पृष्ट पर हादसे से संबंधित हेडिंग को ले कर लानत-मलानत की गयी थी ! क्या वह ऐसे ही छप गयी थी ? ऐसे ही कुछ दिन पहले एक अखबार के मालिक को कठघरे में खड़ा करवाया गया था ! पर क्या हुआ ?

चौबीस घंटे चलने वाले टी.वी. चैनलों का हाल सबके सामने है ! अब वे भी क्या करें ! उन्हें अपनी सुरसाई भूख का शमन करना होता है यदि वे ''किसी'' की शरण न लें तो दूसरे दिन ही माइक नहीं कटोरा थामे नजर आएंगे ! अब जिसकी शरण ली है उसकी बात टाली जा सकती है भला ! इसके अलावा इनको यह भी पता है कि इनकी एक गलत बात पर यदि सौ जने उंगली उठाएंगे तो दस पक्ष में भी खड़े हो जाएंगे ! उन्हीं दस लोगों की शह पर ये कोई भी कुकर्म करने से बाज नहीं आते। ये तो अवाम के ही ऊपर है जो इन्हें ढंग का सबक सिखाए, उनकी जिम्मेवारी की याद दिलाए, उनको अपने फर्ज से अवगत करवाए ! सोनी का कदम एक ताजा उदाहरण है !      

शनिवार, 5 जनवरी 2019

हम वाकई में असहिष्णु हैं !

यह सब लिखने-बोलने की तनिक भी इच्छा नहीं करती, क्योंकि ऐसा करना बर्रे के छत्ते पर पत्थर फेंकने के समान है !पर जब कुछ लोग रोज-रोज सोशल मिडिया पर आ बकवास कर दूसरों पर सही-गलत इल्जाम मढ़ने से बाज नहीं आते तो ना चाहते हुए भी रोष प्रकट हो जाता है ! कई दिनों से घुमड़ता आक्रोश आज ना चाहते हुए भी सहिष्णुता का बाना त्याग असहिष्णुता का आकार पा ही गया ! पर यह भी सच है कि जिस दिन देश के अवाम के सामने सारी असलियत आ जाएगी, उस दिन ऐसे लोगों की तक़रीबन बंद हो चुकी दुकानें, ढहा भी दी जाएंगी। क्योंकि अति तो किसी भी चीज की खतरनाक होती है और सच का सूर्य कितने भी घने बादलों से ढका हो अपने तेज व प्रकाश से सामने आ ही जाता है और तब सहिष्णु और असहिष्णुता का फर्क भी किसी को समझाना नहीं पडेगा ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
हमारे देश में कुछ लोग ऐसे हैं जो ना हीं देश को अपना मानते हैं और नाहीं भगवान को ! ऐसे लोगों को भी हमने सर माथे पर बैठा रखा है, क्योंकि हम असहिष्णु जो हैं ! यहां रह कर, यहां का खा-पी कर विदेशों का गुण-गान करने वालों को भी हम अपने देश के सम्मानों से सम्मानित करते नहीं अघाते, क्योंकि हम असहिष्णु हैं ! अपने देवी-देवताओं की, अपनी आस्थाओं की ऐसी की तैसी करने वालों को भी हमने माननीय बना रखा है, क्योंकि हम असहिष्णु हैं ! अपने नेताओं को, अपने शहीदों को, अपने सुरक्षा बलों को गालियां देने वालों, उनको नीचा दिखाने वालों, उनका अपमान करने वालों की बातों को भी हम टाल जाते हैं क्योंकि हम असहिष्णु जो ठहरे। ऊपर से विडंबना यह है कि ऐसे लोग भक्क से मुंह खोल खुद तो रोज विष-वमन करते हैं, पर अपना जरा सा विरोध होते ही अपने जामे से बाहर हो जाते हैं, सामने वाले को तरह-तरह के अलंकारों से विभूषित करते हुए ! इन्हें हमारे रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान, आस्था-धर्म, परंपरा-विश्वास यानी हर चीज से शिकायत है ! पर असहिष्णु कौन ?... हम !

इन जैसे सहिष्णु जानते हैं कि इस देश में कैसा भी अपराध करने, अराजकता फ़ैलाने, दुष्कर्म करने, वैमनस्य फैलाने यानी किसी भी प्रकार का गलत काम करने पर यदि उसका हजार लोग विरोध करेंगे तो दस लोग पक्ष में भी खड़े हो जाएंगे, इन्हीं दस लोगों का साथ, इनका हौसला और हिमाकत सदा बनाए रखता है। यह बात समाज के हर क्षेत्र में होने वाले दुष्कर्मों पर लागू होती है। ताजा उदहारण है, सिर्फ हठधर्मिता के कारण ऐसी दो महिलाओं ने सबरीमाला के मंदिर में प्रवेश किया जिन्हें शायद ही यह पता भी हो कि अय्यप्पा कौन थे ? पर सिर्फ करोड़ों लोगों को नीचा दिखाने की गरज से आठ सौ साल से चली आ रही परंपरा को तोड़ने की हिमाकत कर डाली गयी। भगवान के लिए उसके सारे बच्चे बिना भेदभाव के बराबर होते हैं ; हरेक को पूरा हक़ है उसके पास जाने का, उसे अपने सुख-दुःख का भागीदार बनाने का, उससे अपने कष्टों से निजात दिलाने की प्रार्थना करने का, क्योंकि मनुष्य का अंतिम सहारा तो वही होता है ! यदि कहीं कोई मतभेद है तो उसे सुलझाया भी जा सकता है ! पर इस तरह की हेकड़ी और अक्खड़ता तो कतई स्वीकार करने योग्य नहीं है। यह जो हुआ वह आस्था की बात ही नहीं है उसका ध्येय समाज में आपस में दरार डालने का था, अराजकता फैलाने का था और वह सफल हुआ ! क्योंकि उन महिला रूपी मोहरों का किसी भी तथाकथित आजादी वाले अभियान से या किसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से या किसी आस्था से कोई लेना-देना नहीं था ! उनका संबंध उस पंथ से है, जो देवी-देवता-भगवान् आदि पर विश्वास ही नहीं करता। जब किसी पर तुम्हारा विश्वास ही नहीं है, आस्था ही नहीं है तो तुम मंदिर में कौन सी पूजा कर लोगों के सामने कोई आदर्श रखने जा रहे हो ? पर हम तो यह पूछ ही नहीं सकते क्योंकि हम तो असहिष्णु हैं !

ये वही लोग हैं जो सदा ग़रीबों की गरीबी का रोना रो-रो कर अपने वर्तमान-भविष्य को हंसाते रहे हैं। एक तिहाई शताब्दी तक एक प्रदेश पर राज करने के बावजूद उस प्रदेश का आज भी यह हाल है कि वहां भिखारियों की तादाद देश में सबसे ज्यादा है ! गरीब-गुरबों को बराबरी का सपना दिखाने वाले इनके नेताओं के अपने परिवार में जब कोई ''उत्सव'' होता है तो उसमें करोड़ों की राशि पानी की तरह बहा दी जाती है ! और असहिष्णु हम हो जाते हैं। इनसे कभी बात कर के देखिए, लगेगा किसी पड़ोसी दुश्मन देश के प्रवक्ता से बात हो रही है। पर असहिष्णुता हम पर थोप दी जाती है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1962 के युद्ध में हमारी बुरी तरह हार हुई थी ! हजारों जवान मारे और घायल हुए थे ! उसी समय कलकत्ता में घायल जवानों के उपचार के दौरान खून की जरुरत को लेकर रक्त-दान की अपील की गयी, एक पार्टी सदस्य ने अपना खून देने की इच्छा जाहिर की तो उसे पार्टी विरोधी हरकतों के इल्जाम के साथ बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, पर असहिष्णु हम कहलाते हैं !

अपने कालेज के दौरान यह विचार बहुत अच्छा लगता था कि देश में हर इंसान को बराबरी का हक़ होना चाहिए। सबकी जिंदगी में खुशहाली होनी चाहिए। सब को अपने काम का उचित पारश्रमिक मिलना चाहिए। शोषण ख़त्म होना चाहिए इत्यादि इत्यादि ! पर नौकरी के दौरान जब हकीकत सामने आई तो दृश्य कुछ और ही था ! अधिकाँश नेताओं का किसी से कोई लेना-देना नहीं था ! हड़ताल, विरोध, हंगामें के बाद इन नेताओं के घर और बड़े और पक्के होते जाते थे, पैरों के बीच गाड़ियां आ जाती थीं, चेहरे की लुनाई और बढ़ जाती थी ! और जिसके बल पर यह होता था वह अपनी हफ्ते की तीन-चार रूपए की बढ़ोत्तरी पर ही संतुष्ट हो, अपने इन्हीं आकाओं के झंडे कंधों पर उठाए, उनका स्तुति गान करते हुए, अपनी कभी ख़त्म ना होने वाली सदाबहार गरीबी को ढोता रहता था, ढोता रहता था ! उसकी वह नियति आज भी वैसी ही है। धीरे-धीरे सड़क छाप लोग नेता बन अवाम को डरा-धमका कर पंथ के नाम पर उनकी मेहनत की कमाई की छिनताई करने लगे। धंधा अच्छा था बिना मेहनत-मजदूरी किए सब कुछ हासिल हो जाता था। त्यौहार के दिनों में तो खाते-पीते लोग घर से बाहर निकलने से घबराने लगे थे। यह सब देख बहुतेरों का गरीबों के इन छद्म मसीहाओं से मोह-भंग हो गया।

कौन नहीं चाहता कि गरीब, सर्वहारा भी दो समय का भोजन पा रात को एक छत के नीचे चैन की नींद सो सके ?  उसके बच्चे ढंग की शिक्षा पा सकें, हारी-बिमारी में उसे दूसरों का मोहताज ना होना पड़े !  पर इसके लिए किसी और की, दिन-रात मेहनत कर कमाई गयी कमाई को तो छीना नहीं जाना चाहिए ! बराबरी का हक़ जरूर मिले पर इसका मतलब यह तो नहीं कि आप किसी के घर में घुस कर उस पर कब्ज़ा कर लें ! एक सवाल और कि यह जितने भी अपने आप को गरीबों का मसीहा साबित करने में जुटे हुए शातिर हैं उनका खुद का क्या योगदान है ग़रीबों की सहायता करने में ? दूसरों का धन तो कोई भी किसी को दे सकता है ! पर इन्होंने खुद अपनी जेब से क्या दिया, कभी किसी को, सिर्फ भाषणों, आश्वासनों के अलावा ! कितने दरियादिल लोग हैं इनमें, जो किसी एक भी गरीब परिवार का जिम्मा लिए हुए है ? कड़वी सच्चाई यह है कि किसी को अवाम से नहीं सिर्फ उसके मत से मतलब है, जिससे येन-केन-प्रकारेण: साम-दाम-दंड-भेद, निति-अनीति कुछ भी अपनाते हुए सत्ता हासिल करने या उसके नजदीक मंडराते रह कर, लोगों को बेवकूफ बना अपनी दूकान में रोटियां सेकी जा सकें ! यह किसी एक दल की बात नहीं है: देश में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हर दल में ऐसे अनेकों मौकापरस्त-अवसरवादी लोग घुसे बैठे हैं।

कई दिनों से घुमड़ता आक्रोश आज ना चाहते हुए भी सहिष्णुता का बाना त्याग असहिष्णुता का आकार पा ही गया ! पर यह भी सच है कि जिस दिन देश के अवाम के सामने असलियत आ जाएगी उस दिन ऐसे लोगों की तक़रीबन बंद हो चुकी दुकानें, ढहा भी दी जाएंगी। क्योंकि अति तो किसी भी चीज की खतरनाक होती है और सच का सूर्य कितने भी घने बादलों से ढका हो अपने तेज व प्रकाश से सामने आ ही जाता है और तब सहिष्णु और असहिष्णुता का फर्क भी किसी को समझाना नहीं पडेगा !

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

ऐसे लोगों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए

यह सब देखने के बाद मैंने कैटरिंग के मालिक की खोज की तो पता चला कि वह घर चला गया है, फ्लोर मैनेजर पर जिम्मेदारी छोड़। मैंने उसी को घेरा, ''इतनी ठंड है पर आपके काम करने वालों के पास उचित कपडे नहीं हैं !'' पहले तो वह चौंका, फिर बोला, ''इनमें ज्यादातर परमानेंट नहीं हैं, काम और जरुरत के अनुसार इन्हें रखा जाता है।'' मैंने कहा, ''वह तो ठीक है, पर वे भी तो इंसान हैं, जैसे ये पोशाकें इन्हें उपलब्ध करवाते हैं, वैसे ही मौसम के अनुसार कपडे दिए जा सकते हैं !'' 
''अब ये तो भैया जी ही कर सकते हैं, मैं क्या बोलूँ !'' 

#हिन्दी_ब्लागिंग     
कल हरियाणा के रेवाड़ी नगर में एक विवाह समारोह में जाने का अवसर मिला। खुले पार्क में भव्य आयोजन था। तरह-तरह की सजावट, बिजली की चकाचौंध, ढेर सारे स्टॉल, छोटे-बड़े-बच्चे-बुजुर्ग सब के लायक भिन्न-भिन्न तरह के ढेरों भोजन-व्यंजनों की व्यवस्था। पर सब खुले में ! जाहिर है दिसंबर का महीना, रात का समय, बढती ओस की मौजूदगी, हल्की सी बयार उस खुले-खुले वातावरण में सिहरन ला दे रही थी। पर भले ही ठंड ज्यादा थी पर उसके बावजूद घराती-बाराती-मेहमान सभी मौसमानुसार शीतकालीन पोशाकों में प्रकृति के इस रूप का भी भरपूर आनंद ले रहे थे। हल्का-फुल्का खुशनुमा माहौल था। पता ही नहीं चला कब घडी की सूई ग्यारह के आंकड़े को पार कर गयी। हमें दिल्ली वापस भी लौटना था। सो उदर-पूर्ती के लिए निर्दिष्ट जगहों की ओर रुख किया ! इसी रुख को इस ब्लॉग पोस्ट का कारण बनना था !

मैं कुछ ज्यादा ही मिष्टान प्रिय इंसान हूँ। इसलिए जहां लोग मुख्य भोजन के बाद जाते हैं मैं उल्टे तौर पर वहीं से शुरु करता हूँ, भले एक-एक चम्मच ही लूँ। शुरुआत में वहां लोग भी कम ही होते हैं ! जैसा कि आजकल आम चलन है, खाना बड़े-बड़े डोंगों में किसी ताप-प्रदत्त यंत्र पर रखा रहता है और उसके साथ ही आपकी सहायता के लिए कैटरर का कर्मचारी एक आकर्षक वेश भूषा में वहां तैनात रहता है। यहां भी वही दस्तूर था। मैंने वहां जा एक चम्मच गाजर के हलुए की फरमाइश की ! वहां तैनात इंसान ने बड़ी शालीनता से मुझे पेश भी किया, तभी मैंने गौर किया कि उसका हाथ काँप रहा है। जानते हुए भी मेरे मुंह से निकल गया, ''ठंड लग रही है ?" उसने हौले से सिर हिलाया और धीरे से कहा, ''हाँ ! सर, ठंड तो है !''  
खाने से मेरा मन कुछ उचट गया और अब पूरा ध्यान विवाह के उल्लासपूर्ण माहौल से हट वहां खातिरदारी करने में जुटे तीस-चालीस लोगों पर जा अटका ! उनकी पोशाक पर गौर किया तो पाया कि कोट नुमा वस्त्र, सूती है और कइयों ने तो सिर्फ बनियान के ऊपर ही पहन रखा है ! जो इस ठंड में बिल्कुल नाकाफी था, खासकर मैदान में घूम-घूम कर सर्व करने वालों के लिए। पर स्टॉल के पीछे खड़े होने वालों की हालत भी खराब ही थी, तंदूर के पास काम करने वालों को छोड़ कर। उसी समय एक और बात दिखी कि तंदूर के पास के स्टॉल के कर्मचारी कुछ-कुछ देर बाद किसी ना किसी बहाने तंदूर के पास 10-20 सेकेंड के लिए जा खड़े होते हैं,  जितनी भी गर्मी मिल जाए !

यह सब देखने के बाद मैंने कैटरिंग के मालिक की खोज की तो पता चला कि वह घर चला गया है। फ्लोर मैनेजर पर जिम्मेदारी छोड़। मैंने उसी को घेरा, ''इतनी ठंड है पर आपके काम करने वालों के पास उचित कपडे नहीं हैं !'' पहले तो वह चौंका, फिर बोला, ''इनमें ज्यादातर परमानेंट नहीं हैं, काम और जरुरत के अनुसार इन्हें रखा जाता है।'' मैंने कहा, ''वह तो ठीक है, पर वे भी तो इंसान हैं, जैसे ये पोशाकें इन्हें उपलब्ध करवाते हैं, वैसे ही मौसम के अनुसार कपडे दिए जा सकते हैं !'' 
''अब ये तो भैया जी ही कर सकते हैं, मैं क्या बोलूँ !'' 

बहरहाल बात यहीं ख़त्म हो गयी, पर कुछ सवाल जरूर छोड़ गयी कि क्या यह भी शोषण नहीं है ? ऐसे ताम-झाम पर तक़रीबन तीस-पैंतीस लाख यानी एक चौथाई करोड़ से भी ऊपर का बिल थमा दिया जाता है, जिसमें कम से कम पच्चीस-तीस प्रतिशत की बचत तो होती ही होगी ! तो क्या उसमें से सिर्फ दस-पंद्रह हजार अपने लिए ही काम कर रहे लोगों पर खर्च नहीं किए जा सकते ? चलिए उतना बड़ा दिल नहीं है तो कम से कम काम के दौरान जरुरत के अनुसार तो कुछ सुविधा दी ही जा सकती है ! ठंड में ढंग की यूनिफार्म तो उपलब्ध करवाई जा ही सकती है ! इससे अपरोक्ष रूप से संस्था को ही फायदा होगा, जब कर्मचारी मन से काम करेगा। यह ठीक है कि काम के बदले वेतन दिया जाता है ! पर किसी मजबूरीवश उसके उपस्थित ना हो पाने पर किसी और की उपलब्धता भी तो सदैव बनी रहती है ! जब सक्षम हैं तो सामाजिकता, मानवता, इंसानियत पर भी तो कुछ ध्यान दिया जाना चाहिए ! 
इसी उहापोह में था की श्रीमती जी की आवाज से तंद्रा लौटी, ''साढ़े ग्यारह बज गए हैं, कुछ लिया कि नहीं ? वापस नहीं जाना है ? पहुंचते-पहुंचते दो बज जाएंगे''     

शनिवार, 8 सितंबर 2018

कुछ मंदिरों में प्रवेश निषेध जैसे नियमों का औचित्य

उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में फूहड़ता प्रदर्शित करती युवती जैसे लोग अच्छी तरह जानते हैं कि उनके कर्म-कुकर्म के विरोध में यदि हजार आवाजें उठेंगीं तो पक्ष में भी सौ लोग खड़े हो जाएंगे ! यही सौ लोग सदा ऐसे सिरफिरों की ताकत और ढाल बन उनका मंतव्य पूरा करवाने का जरिया बन जाते हैं। । कुछ दिनों पहले तक कौन इस युवती को जानता था ! आज वह घर-घर में पहचानने वाली "चीज'' हो गयी है। उसका उद्देश्य पूरा हो गया है; देख लीजिएगा आने वाले कुछ ही दिनों में हमारे किसी ''पारखी-जौहरी'' फिल्म निर्माता ने उसे अपनी फिल्म ऑफर कर देनी है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
तकरीबन साल भर पहले चुनिंदा मंदिरों में कुछ लोगों के लिए प्रतिबंध होने पर बहुत गुल-गपाड़ा मचा था। इसको ले कर काफी बहस-बाजी भी होती रही, विरोध दर्ज करवाया जाता रहा, आंदोलन होते रहे, और यह सब उन लोगों द्वारा ज्यादा किया गया जिन पर कोई पाबंदी लागू नहीं थी। कुछ लोग जरूर ऐसे हैं जो इंसान की बराबरी के सच्चे दिल से हिमायती हैं, जो अच्छी बात है; पर विडंबना यह भी है कि ज्यादातर प्रतिवाद करने वालों को प्रतिबंधित वर्ग से उतनी हमदर्दी नहीं थी, जितना वे दिखावा करते रहे !! तब ऐसे ही एक विचार मन में आया था कि ऐसा क्यों है ? जबकि पूजास्थलों की व्यवस्था संभालने वाले लोग, विद्वान, धर्म को समझने वाले, धर्म-भीरु होते हैं। उनको क्या यह पता नहीं होता कि उनका वैसा रवैया गलत है ? क्या वे नहीं जानते कि प्रभू के यहां सब बराबर होते हैं ? क्या उन्हें मालुम नहीं कि ऊपर वाले के यहाँ कोई भेद-भाव नहीं होता ! फिर क्यों भगवान् के घर में ही इंसान और इंसान में फर्क किया जाता है ? कोई तो कारण होगा ?

जो कुछ समझ आता है, उसमें पहला तो यही है कि भले ही हम कितना भी कहें पर कड़वी सच्चाई और इतिहास गवाह है अलग-अलग संप्रदायों के अलग-अलग मतों में, विरोधी मान्यताओं, अपने पंथ को श्रेष्ठ मनवाने की जिद, अपने इष्ट को सर्वोपरि मानने के हठ के कारण अक्सर टकराव होते रहे हैं। एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में जन-धन-स्थल को हानि पहुंचाने के उपक्रमों को भी मौके-बेमौके, जानबूझ कर अंजाम दिया जाता रहा है। हो सकता है ऐसी मानसिकता वाले लोग दूसरे पंथ के पूजा-स्थल में जा गैर-वाजिब हरकतें करते हों ! शुचिता का ध्यान ना रखते हों ! स्थल के सम्मान में कोताही बरती जाती हो ! पूजा-अर्चना में बाधा उत्पन्न करते हों, और वैसे कुछ अवांछनीय, असमाजिक, गैरजिम्मेदाराना लोगों की हरकतों का खामियाजा औरों को भी भुगतना पड़ गया हो। 

दूसरे दुनिया में ऐसे लोग भरे पड़े हैं, जिनका ध्येय किसी न किसी तरह खबरों में बने रहना होता है ! अपने को कुछ अलग दिखाने की लालसा, तुरंत प्रसिद्ध होने की कामना ! अपने को ख़ास मनवाने की इच्छा ! अप्राप्य को येन-केन-प्रकारेण हासिल करने की लालसा उनसे कुछ भी करवा लेती है ! इन्हें ना किसी शुचिता की परवाह होती है, ना हीं किसी तरह की परंपराओं की, ना किसी की आस्था की, ना हीं वर्षों से चली आ रही व्यवस्थाओं की; ऐसे लोग पहले नाम फिर उससे दाम पाने के लिए कुछ भी नैतिक-अनैतिक करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं ! ये लोग अच्छी तरह जानते हैं कि इनके कर्म-कुकर्म के विरोध में यदि हजार आवाजें उठेंगीं तो पक्ष में भी सौ लोग खड़े हो जाएंगे ! यही सौ लोग सदा ऐसे सिरफिरों की ताकत और ढाल बनते आए हैं। दो दिन पहले उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में फूहड़ता प्रदर्शित करती एक युवती ने फिर इस बात को सिद्ध कर दिया। कुछ दिनों पहले तक कौन इसे जानता था ! पर आज वह घर-घर में पहचानने वाली "चीज'' हो गयी है। उसका मंतव्य सफल हो गया है; देख लीजिएगा आने वाले कुछ ही दिनों में हमारे किसी ''पारखी-जौहरी'' फिल्म निर्माता ने उसे अपनी फिल्म ऑफर कर देनी है ! 

महाकाल मंदिर में यह जो कुछ घटा, यह हिन्दू पूजा स्थलों पर पहली बार नहीं हुआ था ! उस कन्या को लोग भूले नहीं होंगे, जिसने जबरदस्ती शिंगणापुर के शनि-चबूतरे पर चढ़ने को ले कर हंगामा मचाया था ! उसके भी पहले एक फोटो अक्सर दिख जाती थी जिसमें एक लड़का किसी मंदिर में शिवलिंग पर जूते समेत एक पैर रखे दिखाई पड़ता था। भले ही वह सच हो ना हो या फोटो से छेड़-छाड़ की गयी हो; पर वैसा या ऐसा करने वाले की दूषित मानसिकता का तो पता चलता ही था ना !! इसी दौरान सोशल मीडिया पर कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने गर्व से यह स्वीकारा था कि माह के अपने कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जाती हैं ! जबकि समाज के कई परिवारों में शुद्धता को ध्यान में रखते हुए इन दिनों में रसोई में भी जाना अनुचित समझा जाता है। यह कैसी आजादी है ? यह कैसी आधुनिकता है ? ये कैसे संस्कार हैं ?

आश्चर्य होता है कि साल भर पहले मंदिरों में कुछ लोगों के प्रवेश निषेद्ध को ले कर गुल-गपाड़ा मचाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, आजादी (?) के पक्षकार, मानवाधिकार के स्वयंभू एक पक्षीय झंडावदार, जो उन दिनों जामे से बाहर हो अपन राशन-पानी ले पिले पड़ रहे थे; वे लोग क्या कोमा में चले गए हैं आज ! उनकी सांस की भी आवाज नहीं आ रही ! क्यों नहीं ऐसे लोग उन तथाकथित बाबाओं के विरुद्ध मोर्चा खोलते जो भगवान के नाम पर ज्यादातर महिलाओं का ही शोषण करते हैं ! क्यों नहीं उन पंथों के खिलाफ आवाज उठाते जो जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का दुःसाहस करते हैं ! क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां नाम मिले ना मिले पर जान को जरूर खतरा होता है !! और यहां तालियां बजती हैं, सम्मान मिलता है ! ऐसे लोगों यह समझ नहीं आता कि अगला तो इनके कंधे पर बंदूक रख इन्हें माध्यम बना अपना काम निकाल गया और यह जूतियों में दाल बाँट-बाँट कर पीते रहे। 

इंसान की बराबरी की हिमायत अच्छी बात है पर वह यदि वही चीज उच्श्रृंखल हो जाए तो ? शायद ऐसे ही कुछ कारण रहे होंगे जब पवित्र स्थानों की सुचिता को बरकरार रखने के लिए कठोर कदम उठाते हुए कुछ इसी प्रकार के अलोकप्रिय निर्णय लेने पड़े होंगे और जैसे गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है उसी प्रकार कुछ लोगों के अनैतिक कार्यों के परिणाम का खामियाजा कई लोगों को भोगने पर मजबूर होना पड़ा होगा !    

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