pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: Satire
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शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

एक ठो खेला है, नाम है ''कौबक''..... यानी कौन बनेगा करोड़पति

कुछेक हिंदी के शब्द, नाम या चीजें अंग्रेजी में ज्यादा प्रचलित, सहज स्वीकार्य और कुछ-कुछ कर्णप्रिय सी हो जाती हैं। उदाहरण स्वरुप जैसे ''महाशयां दी हट्टी,'' एम.डी.एच. के रूप में ज्यादा प्रचलित और जाना-माना है। युवाओं द्वारा बहु प्रयोगी  ''शिट, हगीज, बम'' जैसे शब्दों को शायद ही कोई भद्र-लोक  हिंदी में सुनना या बोलना पसंद करे ! इसीलिए टी.वी. पर चल रहे एक खेल ''कौन बनेगा करोड़पति'' के हिंदी में संक्षिप्त रूप ''कौबक'' को लोग बुडबक ना कहने लगें इसलिए उसे अंग्रेजी के अक्षरों से उच्चारित कर केबीसी के नाम से प्रचारित किया जाता है। अब किसी को अच्छा लगे या बुरा पर एक बात तो साफ़ है कि साधारण मनई लोग अमीर बने ना बने पर चैनल, खेल की टीम और बच्चन साहब, इन सब की तकदीर तो इस खेल ने बदल ही दी है। अच्छी बात है ! इसमें कोई खराबी भी नहीं है, आज के समय में हर कोई पहले अपना  फटा कुर्ता सीना चाहता है.....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
KBC, कभी-कभी तो लगता है कि यह खिलाड़ी के खिलाफ रचा गया एक षड्यंत्र है ! खेल में येन-केन-प्रकारेण जब कोई इस लायक होता है कि वह दूसरे प्रतियोगियों की बद्दुआओं और चैनल की ढेर सारी हिदायतों यथा, आपको कब उछलना है, कितनी देर रोना है, पैर छूना है या गले लगना है, क्या कहना है, बच्चन जी की कब प्रशंसा करनी है, उन्हें कैसे संबोधित करना है इत्यादि, इत्यादि के साथ जब सहमा हुआ प्रतियोगी बीच मंच तक पहुंचता है तो सामने बैठे, तेजोमय प्रभामंडल, भव्य व्यक्तित्व, सिनेमा जगत की सबसे बड़ी और महान हस्ती की धीर-गंभीर वाणी से और भी हतप्रभ, भौंचक्क व ऐंड बैंड हो जाता है ! फिर ऊपर से टिकटिकाती घडी से रिसते समय का डर उसका ध्यान भटकाए रखता है ! तिस पर  गर्म सीट की बेचैनी सर पर हावी रहती है ! फिर ऐसे में वो क्या तो सवाल सुनेगा, उसे समझेगा, कब सोचेगा और क्या उत्तर देगा ! एक बात और जो समझदानी के बाहर है कि प्रतिभागी जब झटपट ऊँगली वाला बैरियर पार कर जब खेल में शरीक होता है तो उसको ''गरम आसन'' क्यों सौंपा जाता है ! देश में किसी-किसी जगह किसी अविश्वसनीय इंसान को ले कर एक कहावत है कि वह ''गर्म तवे पर बैठ कर बोलेगा तो भी उसका विश्वास नहीं है !''  खैर यहां गर्म सीट पर होने के बावजूद उसका कहा मान लिया जाता है। इसके बावजूद कई मंच-वल्लभ तमाम कठिनाइयों के बावजूद भी यहां परचम लहरा जाते हैं।

जैसे हर चीज में कोई न कोई अच्छाई भी जरूर होती है, उसी तरह इस खेल का शुक्रवार को प्रसारित होने वाला कर्मवीर एपिसोड एक सार्थक पहल है जो दिल को छू जाता है ¡ इसमें कर्मठ, समर्पित, दृढ प्रतिज्ञ, अभावों के बावजूद संघर्षरत, देश समाज के लिए कुछ भी कर जाने को उद्यत, निरपेक्ष, किसी चाहत-लालसा-कामना से परे सिर्फ जनहित में जुटे लोगों को मंच प्रदान किया जाता है। उसके लिए सारी टीम को साधुवाद ¡¡
कर्मवीर 
वैसे मामला एकदम्मे ना उखड जाए, इसलिए थोड़ा-बहुत हेल्प करने का भी यहां इंतजाम किया गया है वह अलग बात है कि उसमें इक्के-दू ठो ही थोड़ा काम लायक हैं। उसी हेल्पाइन में एक है वहां उपस्थित महानुभाव लोगों की राय ! पर इसके लिए कहा गया और दिया गया समय वर्षों से दर्शक वगैरह को आंकड़ों के ''पंभलपुस्से'' में डालता आ रहा है। सालों-साल से चली आ रही एक ऐसी चूक, जिस पर अयोजकों, संचालकों, उपस्थित दर्शकों, प्रतिभागियों यहां तक कि अमिताभ बच्चन जी का भी ध्यान या तो गया नहीं है या फिर कोई देना ही नहीं चाहता ! जबकि ऐसे प्रोग्राम काफी जांच-पड़ताल के बाद प्रस्तुत किए जाते हैं। इस बात पर ध्यान दिलाने की कोशिश सालों पहले भी की थी पर सबका ध्यान सिर्फ उपार्जन में ही है, यही प्रतीत होता है -
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
जैसा कि बहुत से लोग जानते ही होंगे कि इस खेल की ''गरम कुर्सी'' पर बैठने वाले को सही उत्तर ना मालुम होने पर सहायता के रूप में शुरु में तीन "हेल्प लाईनों" की सुविधा दी जाती है जिनमें से एक है "आडियंस पोल" इसके लिए दर्शकों को उत्तर देने के लिए दस सेकेण्ड का समय दिया जाता है। पर #अमिताभ_जी हर बार "इसके लिए आपको मिलेंगे तीस सेकेण्ड" कहते आ रहे हैं।  
शुक्रवार, 11-10-2019      
आज नौ साल बाद स्थिति कुछ सुधरी है ! "आडियंस पोल" में दर्शकों को तो अभी भी दस सेकेण्ड ही मिलते हैं पर #अमित_जी तीस की बजाए पंद्रह सेकेण्ड कहने लगे हैं ! शायद अगले साल तक दस के लिए दस मिलने लग जाऐं..............! 
चलिए छोड़िये ! अपुन ने कौन सा इसमें हिस्सा लेना है या कोई आस लगा रखी है ! खेल चल रहा है, अवाम सम्मोहित है ! गरीब देश का मनई लोगन को जबरिया करोड़पति बनाने, देश को खुशहाल बनाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है ! अब ये तो समझ के बाहर की बात भी नहीं है कि कौन खुशहाल हो रहा है ! कोई तो हो ही रहा है ना ! अच्छी बात है ! जितने ज्यादा लोग अमीर होंगे, उतने और टी.वी. बिकेंगे ! और ज्यादा लोग उसे  देखेंगे ! और ज्यादा विज्ञापन झोंका जाएगा ! और ज्यादा बेकार, प्रयोजनहीन चीजों की बिक्री बढ़ेगी ! बाज़ार की सुरसा रूपी भूख को और ज्यादा खुराक मिलेगी ! पैसा बरसेगा ! एक करोड़, पांच करोड़, सात करोड़................
इस बार की धन राशि है दस करोड़ !!!

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

एक बोध कथा का एक्सटेंशन


क्या किया जाए कुछ समझ नहीं आ रहा था। रास्ते से गुजरने वाले वाहनों से गाडी को ''टो'' करने की गुजारिश की गयी पर एक तो बैल गाडी, ऊपर से पुरानी, कोई भी साथ ले चलने को राजी नहीं हुआ ! इनको नकारा देख, साथ के संगी-साथी भी एक-एक कर, जिसको जहां, जैसे, जो सुविधा मिली उसे ले, इनको छोड़ आगे बढ़ गए। अब काफिले में वो ही मजबूर लोग रह गए जिनका व्यापारी को छोड़ और कोई ठौर-ठिकाना या उपार्जन का अन्य साधन नहीं था। सूरते हाल यह था कि मालिक खड़े हो, आँखों पर हाथ रखे दूर-दूर तक नजर दौड़ा रहा था कि कोई घोड़ा-गदहा-टट्टू दिख जाए जिससे गाडी आगे रेंग सके..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
एक बार कारोबार में अत्यंत नुक्सान होने की वजह से अपना सब कुछ गंवा बैठे एक बड़े व्यापारी ने, मजबूरी में दूसरे ठाँव, अपने जान-पहचान के लोगों के पास जा कर भाग्य आजमाने निश्चय किया। प्रस्थान वाले दिन अपना बचा-खुचा सामान एक बैल गाडी पर लाद, अपने परिवार, सेवकों और अपने पर आश्रित कुछ लोगों के साथ उसने अपनी यात्रा शुरू की। इनके साथ इनके दो-तीन पालतु कुत्ते भी थे।

रुकते-चलते जब दोपहर सर पर चढ़ आई तो मालिक ने कुत्तों को धूप से बचाने के लिए उन्हें बैल गाडी के नीचे छाया में कर दिया। ा नीचे छाया में चलते हुए कुत्तों को यह लगा कि मालिक ने गाडी की सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी है और अब वे ही गाडी को चला रहे हैं। ऐसा ख्याल आते ही वे फूल कर कुप्पा हो गए ! अचानक मिले इस तथाकथित सम्मान से गर्वित हो उनका सारा शरीर तन गया और वे ऐंठ कर गाडी के नीचे चलने लगे।

शाम के बाद जब अंधियारा घिरने लगा तो काफिले को रोक दिया गया। सब अपनी थकान दूर करने और भोजन=पानी का इंतजाम करने में जुट गए। बैलों को भी गाडी से खोल कुछ दूर बांध, चारा-पानी दे दिया गया। इसी बीच अंगड़ाइयां लेते कुत्ते भी गाडी के नीचे से बाहर आ इधर-उधर घूमने लगे। अचानक उन्होंने कुछ दूरी पर बैलों को चारा-पानी खाते देखा तो इनका पारा चढ़ गया कि सारे रास्ते गाडी हम ढ़ोते आए और मजा ये कर रहे हैं। बस फिर क्या था ! दोनों-तीनों लपक कर बैलों के पास पहुंचे और लगे भौंक-भौंक कर अपना गुस्सा जताने ! पहले तो कुछ देर बैल शांत रहे पर आखिर उनको भी तैश आ गया और उन्होंने फुंफकार कर जोर से अपना सर इनकी तरफ घुमाया, कुत्ते तो खैर बच लिए पर बैलों के जोर के झटके से उनका पगहा टूट गया ! बंधन से आजाद होते ही दोनों बैल ये गए वो गए ! और हमारे वीर श्वान पुत्र अपनी जीत के घमंड में इतराते वापस आ गए।

सुबह हुई। जब नित्य-कर्मों से फारिग हो चलने का समय आया, तो बैल गायब ! सब परेशान ! चारों ओर तलाशा गया पर कहीं कोई सुराग नहीं ! खोज-खाज कर सब जने हार-थक कर बैठ गए ! क्या किया जाए कुछ समझ नहीं आ रहा था। रास्ते से गुजरने वाले वाहनों से गाडी को ''टो'' करने की गुजारिश की गयी पर एक तो बैल गाडी, ऊपर से पुरानी, कोई भी साथ ले चलने को राजी नहीं हुआ। कुत्तों को समझ नहीं आ रहा था कि परेशानी क्या है वे गाडी के नीचे खड़े थे उसे ले चलने के लिए ! मालिक ने जब उन्हें नीचे छिपते देखा तो उसे उनका रात का भौंकना भी याद आ गया ! वह समझ गया कि बैल इनके परेशान करने की वजह से ही भागे हैं ! उसने इनको पकड़ा और उसी चाबुक से, जिससे बैलों को हांका जाता था, वो छितरैल की, वह छितरैल की, कि तीनों की भौं-भौं, क्याऊं-क्याऊं में बदल गयी और तो और अब वे बैठने के लायक भी नहीं रहे !

इधर चलने की कोई सूरत नजर ना आने पर, इनको नकारा देख, साथ के संगी-साथी भी एक-एक कर, जिसको जहां, जैसे, जो सुविधा मिली उसे ले, इनको छोड़ आगे बढ़ गए। अब काफिले में वो ही मजबूर लोग रह गए जिनका व्यापारी को छोड़ और कोई ठौर-ठिकाना या उपार्जन का अन्य साधन नहीं था। सूरते हाल यह था कि मालिक खड़े हो, आँखों पर हाथ रखे दूर-दूर तक नजर दौड़ा रहा था कि कोई घोड़ा-गदहा-टट्टू दिख जाए जिससे गाडी आगे रेंग सके ! साथ के लोग इसलिए खड़े थे क्योंकि मालिक खड़ा था और कुत्ते इसलिए क्योंकि वे तो बैठने से ही मजबूर थे !

शनिवार, 3 अगस्त 2019

मिलना ''मैं गाय जैसे'' (मैग्सेसे) पुरस्कार का

''भैया; बताइये ना ! भले ही उतना समझ ना पाएं पर गर्व से अपना छाती तो फुल्लइये सकते हैं  ! ई तो हमरे देशो के लिए गर्व का बात जो है।'' 
चैतू मुंह बाए सब सुनता रहा ! कुछ देर बाद उसने पूछा , ''तो भैया ! जो आज सब नाच रहा है, ई लोग भी तो इसी देश का आदमी है ! तो ई लोग तब काहे नहीं खुस हुआ ?

#हिन्दी_ब्लागिंग  
सुबह -सुबह चाय वगैरह से निपटा ही था कि ठाकुर जी की रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की दूकान से घर-पहुँच सेवा के तहत उनका सहायक चैतू कुछ सामान पहुंचाने आ गया। सामान रखने के बाद जाते समय मेरे पास आ खड़ा हुआ। मैंने उसे देखा और पूछा ''क्यों चैतू कैसे हो ?''

''ठीक हूँ भईया ! आपसे एकठो बात पूछना था !''

''बोलो ! क्या बात है ?''
   
''भैया, ये ''मैं गाय जैसे'' पुरस्कार क्या होता है ?

मेरा एक बार तो चौंकना स्वाभाविक था, पर इतने दिनों से चैतू को जानने, उससे बतियाते रहने के कारण जल्दी ही समझ में आ गया उसका प्रश्न !

फिर भी पूछ लिया "कहां देखा यह सब ?"

"फेसबुक पर। बहुते लोग एकर बारे में बतिया रहा है।"

''अरे बुड़बक ! वो मैग्सेसे पुरस्कार है ! जो हमारे एक पत्रकार को मिला है। फिलीपींस देश का नाम सुने हो ? वहीं से इसका विजेता चुना जाता है।''

''अरे वाह भईया जी ! बहार का देश हमरे आदमी को समानित किया ! ई तो बहुते अच्छा बात है। ई का बहुत बड़ा इनाम होता है ?''

"हाँ, भाई ! एशिया के लोगों और वहां की संस्थाओं को बढ़िया और उल्लेखनीय काम करने पर उन्हें  इस इनाम के लिए चुना जाता है। दुनिया का सबसे प्रसिद्ध नोबेल पुरुस्कार सुने हो ? समझो, यह एशिया का नोबेल पुरस्कार की तरह है। इसका मिलना हम सबके लिए बड़े गर्व की बात है।''

''तभिएं !! हरदम दुखी और गरियाने वाला लोग भी आज बहुते खुस नज़र आ रहा है। बद्धियो दे रहा है सबको। अच्छा भैया; का पहले भी ऐसा पुरूस्कार हम लोगन को मिला है ?''

''अरे, बहुत बार। हमारे देश में गुणी, ज्ञानी, प्रतिभाशाली लोगों की कोई कमी नहीं है। हमें दुनिया भर के तरह-तरह के सम्मान मिलते रहे हैं। अभी तो हमारे एक ही माननीय को दसियों देश अपना सबसे बड़ा पुरूस्कार दे चुके हैं।'' 

''दसियों ? कऊन-कऊन सा ?"

''अरे, तुम अपना नाम तो बोल नहीं पाते ! वह सब कहां समझोगे !''

''नहीं भैया; बताइये ना ! भले ही बोल ना पाएं पर छाती तो फुल्लइये सकते हैं ! ई तो हमरे देशो के लिए गर्व का बात जो है।''

मजबूरन उसे बताना पड़ा कि बहुत कम समय में हमारे देश के एक ही आदमी को दुनिया के अलग-अलग देशों ने अपने-अपने सर्वोच्च पुरुस्कारों, जैसे, *जायेद मैडल पुरुस्कार, *फिलिप कोटलर पुरूस्कार, *सियोल शांति पुरूस्कार, *चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरुस्कार, *सेंट एंड्रूयज़ पुरूस्कार, *फिलिस्तीन ग्रैंड कॉलर पुरूस्कार, *आमिर अमानुल्लाह खान पुरूस्कार, *किंग अब्दुल सैश पुरूस्कार इत्यादि इत्यादि, से नवाजा है ! कई पुरूस्कार तो पहली बार किसी भारतीय को मिले हैं।  यह भी एक रेकॉर्ड ही है !'' 

चैतू मुंह बाए यह सब सुन रहा था ! कुछ देर बाद उसने पूछा ''तो भैया ! जो आज सब नाच रहा है, ई लोग भी तो इसी देश का आदमी है ! तो ई लोग तब काहे नहीं खुस हुआ ?''

अब मेरी बारी थी चैतू का मुंह तकने की !     

बुधवार, 15 मई 2019

व्यथा एक सरोवर की !

वर्षों से काठ की हांडी में खिचड़ी के सपने दिखाने वालों को किनारे कर दिया गया। सबकी समझ में आ गया था कि इंसान रहेगा तभी धर्म-जाति भी रह पाएगी ! मुफ्तखोरों को भी इशारों से समझा दिया गया कि मेहनत सभी को करनी पड़ेगी, यह नहीं कि सरोवर की काया पलट हम करें और तुम बर्तन ले कर पानी भरने आ जाओ ! अब अवाम ''देखिएगा, हम करेंगें, हमें करना है'' की बजाए ''देखें, हमने कर दिया है'' कहने वाले को तरजीह देने लगी ! चौधरी भी समझ गए थे कि हवाबाजी के दिन हवा हुए ! अब कुछ ना किया तो चौधराहट तो क्या बिस्तर भी गोल करना पड़ जाएगा .......!           

#हिन्दी_ब्लागिंग   
प्रकृति की सुरम्य घाटियों में एक अति विशाल, सुंदर, क़ुदरत की नेमतों से घिरा हुआ झीलनुमा सरोवर था। दूर-दूर के लोग, पशु-पक्षी सब उस पर आश्रित थे। बिना भेद-भाव के मिल-जुल कर सब अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप उसका उपयोग किया करते थे। धीरे-धीरे उसके शुद्ध-निर्मल जल, फलदार वृक्ष, उपजाऊ जमीन, स्वच्छ पर्यावरण के कारण उसकी ख्याति इतनी फ़ैल गयी कि देश तो देश, विदेशों से भी लोगों ने आ-आ कर उसके पास डेरा जमा लिया ! अब जैसा कि होता आया है, भीड़ बढ़ने के साथ-साथ वहां कई चौधरी भी पैदा हो गए ! सरोवर उनकी पीढ़ियों को तारने का जरिया बन गया ! वे अपने मतलब के लिए लोगों को भरमा, तरह-तरह के हथकंडे अपना कर सरोवर के विभिन्न हिस्सों पर अपना बर्चस्व कायम करने की जुगत भिड़ाने लगे। कइयों ने अपनी चौधराहट कायम रखने के लिए अपने पूर्वजों की गाथाएं बयान करनी शुरू कर दीं ! कइयों ने ग्रामीणों को ही बेवकूफ बना, सरोवर के सौंदर्यीकरण के नाम पर उन्हीं के पैसे से सरोवर के चारों ओर अपना प्रशस्ति गान करते निर्माण करवा दिए ! तो कोई अति चतुर अपने को सर्वहारा का सच्चा हितैषी बता, सरोवर से ही धंधे का जुगाड़ कर, अपने परिवार का भविष्य संवारने लगा। कुछ ने आस-पास के जीवन देने वाले, वातावरण को स्वच्छ रखने वाले, बरसात का पानी संजोने वाले पेड़-पौधों को काट अपने विशाल महलों का निर्माण कर डाला। वहां एक डाली तक नहीं छोड़ी ! तो किसी ने नहा-धो कर वहीं पूजा-अर्चना की व्यवस्था करने की गोटी चल दी। पर सरोवर की ओर ध्यान देने, उसके रखरखाव, उसकी सुरक्षा की किसी को कोई परवाह नहीं थी ! परिणामस्वरूप अवाम के जीवन का सहारा, जीव-जंतुओं का पालनहार वह सरोवर सिमटता गया, पर्यावरण दूषित होता गया ! कभी गर्मी की भरी दोपहरी में भी शीतल छाया देने वाले वृक्षों के कट जाने से सरोवर की गहराई पर भी बुरा असर पड़ने लगा ! जल कम और दूषित हो गया ! पशु-पक्षी दूर चले गए ! जमीन ऊसर होने लगी ¡ लोगों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को  पूरा करने में भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ने लगा ! पर स्वार्थी चौधरीगण इसकी ओर ध्यान देने, इसकी बेहतरी के लिए कुछ करने की बजाय एक-दूसरे पर आरोप, नीचा दिखाने में ही जुटे रहे ! उन्हें इतना भी इल्म नहीं रहा कि इस सरोवर के ना रहने पर वे भी मिटटी में मिल जाएंगे ! 

इधर अवाम किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी खड़ी यह सारा तमाशा देखती तो थी, उसे कुछ-कुछ एहसास भी हो रहा था कि उसे धीरे-धीरे उसी के सरोवर से दूर कर दिया गया है पर वह बहकावों से, परंपराओं से, जाति से, धर्म से इतर अपनी भलाई का रास्ता अभी भी नहीं खोज पा रही थी ! यदि कुछ लोग सरोवर की दुर्दशा की गुहार ले कर किसी के पास चले भी जाते तो उनकी बात अनसुनी कर उन्हें यह समझाया जाता कि हम तो तुम्हारे साथ हैं, सदा तुम्हारा भला चाहते हैं ! पर तुम्हारी इस हालत का जिम्मेदार फलाना चौधरी है ! वही यहां का पानी निकाल अपने घर ले जाता है ! कोई कहता देखो वह अपनी गंदगी यहीं धो कर इसके पानी को दूषित कर रहा है ! कोई कहता कि फलाने ने वर्षों से इस पर कब्जा कर तुम्हारी यह हालत बनाई है ! कोई किसी के कर्मकांड को जल दूषित होने का कारण बता देता ! सरोवर को बचाने की जगह सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने, उस पर दोषारोपण कर खुद को पाक-साफ़ बताने में जुटे हुए थे ! दुर्भावना, पूर्वाग्रहों, कुंठाओं, विद्वेष ने हालात इतने जहरीले बना दिए थे कि यदि कोई सरोवर की ढलती कगार को बचाने के लिए घाट बनाने की कोशिश करता भी तो उसके विरुद्ध मिटटी चोरी का इल्जाम लगाते हुए सारे चौधरी अपने मतभेद भुला, अपने स्वार्थ किनारे कर एकजुट हो जाते, उसे बदनाम करने में !

पर यह सब कितने दिन चलता ! कितने दिन जनता अपने भाग्य के सहारे बैठी रहती ! कब तक सामने वालों की नौटंकी देखती रहती ! समय बदला ! नई पीढ़ी साक्षर हुई ! लोगों में, समाज में जागरूकता आई ! वर्षों से काठ की हांडी में खिचड़ी के सपने दिखाने वालों को किनारे कर दिया गया। सबकी समझ में आ गया था कि इंसान रहेगा तभी धर्म-जाति भी रह पाएगी ! मुफ्तखोरों को भी इशारों से समझा दिया गया कि मेहनत सभी को करनी पड़ेगी, यह नहीं कि सरोवर की काया पलट हम करें और तुम बर्तन ले कर पानी भरने आ जाओ ! अब अवाम ''देखिएगा, हम करेंगें, हमें करना है'' की बजाए ''देखें, हमने कर दिया है'' कहने वाले को तरजीह देने लगी ! सरोवर को हरा-भरा बनाने में एकजुट हुए लोगों का साथ, जाति, धर्म, भाषा को पैमाना बनाए बिना दिया जाने लगा। वृक्ष लगाए जाने लगे, लोगों को काम मिला, रोजगार बढ़ा। जेब में पैसा आया तो खुशहाली बढ़नी ही थी ! चौधरी भी समझ गए थे कि हवाबाजी के दिन हवा हुए ! अब कुछ ना किया तो चौधराहट तो क्या बिस्तर भी गोल करना पड़ जाएगा !             

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

मंगता कौन ?

भिखारी तो दोनों ही थे, फर्क सिर्फ इतना था कि एक मजबूर हो कर मांग रहा था और दूसरा मजबूर करवा कर ! एक को देख मन में करुणा, दया का भाव जागृत होता था तो दूसरे को देख नफ़रत, घृणा और क्षोभ ! एक को कुछ दे कर किसी की जेब पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ रहा था जबकि दूसरे को देने से पूरे देश की अर्थ व्यवस्था डांवाडोल हो रही थी ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
प्रदेश से आरक्षण की मांग को ले कर रैली को राजधानी तक जाना था। उन तीनों ने भी मुफ्त में खाने-पीने और राजधानी की सैर का मौका लपक लिया। शहर पहुंचते ही पुलिस से मुठभेड़ हुई ! ट्रैक्टर-ट्रालियां, दो पहिया, छोटी गाड़ियां, टपरे-छकड़े सब रोक दिए गए ! नतीजतन नारेबाजी, चक्का जाम. आगजनी, तोड़-फोड़ आदि तो होनी ही थी ! इस सब से मची अफरातफरी के बाद सरकार कसमसाई ! आरक्षण पर आश्वासन और फौरी तौर पर मुफ्त का राशन-पानी-बिजली-मंहगाई भत्ते की घोषणा हुई। भीड़ वापस !

ये तीनों भी रैली और अपनी सफल यात्रा पर इतराते अपने वाहन की खोज में मटरगस्ती कर रहे थे कि एक भिखारी ने अपनी भूख का हवाला दे कर उनसे कुछ देने का अनुरोध किया ! एक-दो बार टालने के बाद तीनों भड़क उठे, ''शर्म नहीं आती भीख मांगते ? कुछ काम क्यों नहीं करते ? मुफ्त में खाने की आदत पड़ गयी है ! चलो आगे जाओ !!''

 भिखारी तो दोनों ही थे, फर्क सिर्फ इतना था कि एक मजबूर हो कर मांग रहा था और दूसरा मजबूर करवा कर ! एक को देख मन में करुणा, दया का भाव जागृत होता था तो दूसरे को देख नफ़रत, घृणा और क्षोभ ! एक को कुछ दे कर किसी की जेब पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ रहा था जबकि दूसरे को देने से पूरे देश की अर्थ व्यवस्था डांवाडोल हो रही थी !!

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

यदि पौराणिक काल में आज जैसी संस्थाएं होतीं तो ?

असली बवाल मचता शूर्पणखा के नाक-कान काटने पर ! सारी गलती राक्षस कुमारी की होने पर भी पहले तो बिना कुछ कहे-सुने सारा दोष राम-लक्ष्मण पर ही मढ़ दिया जाता। बेगुनाही साबित करते-करते महीनों लग जाते ! और फिर कहते हैं ना कि विपदाएं एक साथ आती हैं, यह मामला ख़त्म भी नहीं होता कि बाली-सुग्रीव के प्रकरण का सामना हो जाता। उस समय शायद खून-खराबा ना हीं होता क्योंकि तारा को यह हक़ मिला होता कि वह अपनी मर्जी से किसीके साथ भी रह सकती थी...........!


#हिन्दी_ब्लागिंग      

यदि एनिमल वेलफेयर एसोसिएशन या पशु-पक्षी संरक्षण समिति, महिला आजादी, मानवाधिकार जैसी संस्थाएं पौराणिक काल में ही अस्तित्व में आ गयी होतीं, तो संसार भर की तो छोड़िए हमारे देश के पौराणिक गंर्थों की कथाएं कैसी होतीं ? उनका तो सारा खाका ही बदल गया होता ! हमारे दोनों महान महाकाव्यों का क्या रूप होता ? परिदृष्य कैसा होता ? इसकी तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है !   

हमारे सारे धर्म-ग्रन्थों की तस्वीर ही अलग होती। शायद धरा पर असुरों का ही राज होता। क्योंकि सारे देवी-देवताओं ने अपने वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को ही प्रमुखता दे रखी है। तीनों महाशक्तियों को देखिए, शिवजी के परिवार में, बैल शंकरजी का वाहन है, मां पार्वती का वाहन सिंह है, कार्तिकेयजी मोर पर सवार हैं तो गणेशजी को चूहा पसंद है। विष्णुजी का भार गरुड़जी उठाते हैं तो मां लक्ष्मी की सवारी उल्लू है। ब्रह्माजी तथा मां सरस्वती माता  हंस पर आते-जाते हैं। उधर देवताओं में इंद्र को हाथी प्यारा है तो सूर्यदेव ने सात-सात घोड़े अपने रथ में जोड़ रखे हैं ! यमराज भैंसे पर सवार हो घूमते हैं तो ग्रहों ने भी तरह-तरह के जीव-जंतुओं को अपना वाहन बना रखा है ! कहां तक गिनायेंगे ! दूसरी ओर बेचारे असुर पैदल ही दौड़ते-भागते रह कर ही लड़ते-भिड़ते रहते थे। कोई बड़ा ओहदेदार हुआ तो उसे रथ वगैरह मिल जाते थे, वह भी स्वचालित। अब यदि आज जैसी कोई संस्था होती तो लड़ाईयां बराबरी पर लड़ी जातीं । तब शायद देवताओं की तो बोलती बंद होती और असुरों की तूती का शोर मचा होता !


सारा कुछ खंगालेंगे तो इस पर ग्रंथ ही बन जाएगा। यदि सिर्फ त्रेता युग की ही बात करें तो शायद रामायण लिखी ही न जाती ! क्योंकि महर्षि वाल्मिकी ना तो हिरण-वध करवा पाते, ना हीं सीता हरण होता ! तो फिर युद्ध काहे का ! यदि कोई और बहाने से युद्ध छिड़ भी जाता तो रामजी लड़ते भी कैसे ? वानर, भालुओं की सेना तो बनने नहीं दी जाती, और वरदान के अनुसार बिना उनके रावण वध हो नहीं पाता ! 


चलिए शुरू से ही देखते हैं, चलते हैं मिथिला, जहां शिव जी का प्राचीन धनुष संभाल कर रखा गया था ! इतनी पुरानी, महत्वपूर्ण, विलक्षण वस्तु तो सारे जगत की धरोहर थी, उसे जनक जी द्वारा प्रतियोगिता में रखवा कर तुड़वाने पर ही सैकड़ों सवाल खड़े हो जाते ! फिर राम जी पर भी बात उठती कि ऐसी अनमोल वस्तु को उन्होंने तोड़ डाला ! वैसे उस समय भी परशुराम जी ने सवाल उठाए थे पर उन्हें शायद समर्थन नहीं मिल पाया। शुक्र है, राम-सीताजी का विवाह निर्विघ्न संपन्न हो गया, सब अयोध्या लौट आए। सब ठीक-ठाक चल रहा था पर अचानक समय पलटा, शनि सक्रिय हुए और राम जी को वनवास जाना पड़ा।

वनवास के दौरान तो पग-पग पर पंगा पड़ने की नौबत आ जाती ! जब केवट ने उनके पैर पखारे थे ! काकभुशंडि की आँख में तिनका जा लगा था ! अनगिनत राक्षसों को मार गिराया था ! पर असली बवाल मचता शूर्पणखा के नाक-कान काटने पर ! सारी गलती राक्षस कुमारी की होने पर भी पहले तो बिना कुछ कहे-सुने सारा दोष राम-लक्ष्मण पर ही मढ़ दिया जाता। बेगुनाही साबित करते-करते महीनों लग जाते ! और फिर कहते हैं ना कि विपदाएं एक साथ आती हैं, यह मामला ख़त्म भी नहीं होता कि बाली-सुग्रीव के प्रकरण का सामना हो जाता। उस समय शायद खून-खराबा ना हीं होता क्योंकि तारा को यह हक़ मिला होता कि वह अपनी मर्जी से किसीके साथ भी रह सकती थी। उस समय बाली या सुग्रीव कौन राम जी का साथ देता है सबको इस बात की उत्सुकता रहती। वैसे शायद सुग्रीव का ही पलड़ा भारी पड़ता क्योंकि हनुमान जी उसके साथ थे।    

पर हनुमान जी ही कहां शांति से रह पाते ! यदि किसी तरह अपने आराध्य से मिल भी जाते तो बेचारे तरह-तरह के आरोपों से परेशान रहते। संजीवनी के लिए द्रोणगिरी पर्वत हटाने से उत्तरांचल के लोग तो आज तक खफा हैं उनसे। बिना उचित कागजात के लंका प्रवेश और फिर वहां अग्निकांड के कारण पता नहीं किस-किस आयोग को जवाब देना पड़ता। अशोक वाटिका में हजारों पेड़-पौधे तहस नहस कर दिए थे उसका हिसाब अलग से मांगा जाता। विदेश का मामला था, और रावण चतुर कूटनीतिज्ञ ! अपनी जान बचाने और लंका पर छाई युद्ध की विभीषिका से बचने के लिए उसने किसी सक्षम और ताकतवर देश के राजा के यहां गुहार लगा देनी थी ! बस शुरू हो जाते हस्तक्षेप ! 

इधर राम-लक्ष्मण भी चले आए थे बिना किसी सेना के ! जिसको भारत के इस अंतिम छोर पर संगठित करने की योजना थी ! तो वह कैसे पूरी होती ? वानर-भालुओं पर तो बंदिश लगी होनी थी ! येन-केन-प्रकारेण उनके रसूख वगैरह से सेना का गठन हो भी जाता तो सागर से पार पाना तो लगभग असंभव ही होता ! सेतु-बंध करते समय जो सागर किनारे की भूमि को समतल करना पड़ता, छोटी-मोटी पहाड़ियां, टिले, विशाल वृक्ष, पेड़-पौधों को हटाने के साथ-साथ पर्वत शिलाओं को सागर में फेंकने से प्रकृति का संतुलन  बिगाड़ने का आरोप लग जाता ! उसका जांच आयोग के सामने जवाब देना मुश्किल हो जाता कि रावण वध जरुरी है कि प्रकृति को बचाना ! लगता नही कि इन सब पचड़ों के बीच युद्ध हो पाता। और अगर महासमर ना होता तो रावण और उसका साम्राज्य तो यथावत ही रहते !
फिर ! फिर क्या ? देख ही रहे हैं आज का माहौल ! 

सोमवार, 24 सितंबर 2018

जलोटा कहां और मैं यहां ! ऐसा क्यों ? फिर सोचता हूँ.....

आज हारमोनियम ने पंजाब के एक छोटे से शहर के, एक छोटे से मोहल्ले के, एक छोटे से घर में रहने वाले अपने प्रियजन, पुरषोत्तम दास जलोटा के सुपुत्र अनूप जलोटा को, उनकी पकी उम्र के बावजूद, ऐसा सम्मान, ऐसी शोहरत, ऐसी मित्र मंडली फिर दिलवाई, जिसके लिए युवा लोग तरसते रह जाते हैं। आज अनूप जी के जलवे देख लोग दांतों के नीचे ऊँगली रख चबाए जा रहे हैं। चबाने से ध्यान आया कि उंगली तो मेरी भी दर्द कर रही है; और क्यों ना करे ! पंजाब के उसी शहर फगवाड़े के उसी हांड़ों के मोहल्ले, उसी गली में मेरा भी तो निवास था ! मेरे घर पर भी हारमोनियम था ! भजनों से मेरा भी नाता था ! आज मेरी भी उम्र हो गयी है ! तो; जलोटा कहां और मैं यहां !ऐसा क्यों ? फिर सोचता हूँ.....

#हिन्दी_ब्लागिंग  
पंजाबी में एक कहावत है, ''कख्ख दी बी लोड़ पै जांदी ऐ'' ! यानी तिनके की भी जरुरत पड़ जाती है, उसे भी बेकार नहीं समझना चाहिए। ऐसी कहावतें, मुहावरे या लोकोक्तियाँ यूं हीं नहीं बन जातीं, इनके पीछे जन-साधारण के अनुभवों, अनुभूतियों, तजुर्बों का पूरा हाथ रहता है। इसी मुहावरे को लें तो इसकी सच्चाई का प्रमाण तो रामायण काल में ही मिल गया था, जब सीताजी ने अशोक वाटिका में रावण के आने पर एक तृण की ओट ली थी। महाभारत में भी इसी की सहायता से श्री कृष्ण जी ने द्रौपदी को दुर्वासा के क्रोध से बचाया था। पर हम समझते कहां हैं ! अक्ल तो तब आती है जब उस चीज की जरुरत पड़ती है जिसे बेकार समझ हम फेंक चुके होते हैं ! जैसे मुझे आज एक अदद हारमोनियम की आवश्यकता आन पड़ी है और विडंबना देखिए कि यह सौगात मेरे पास थी, पर आज जब जरुरत है तब नहीं है ! चलिए पहेली ना बुझा कर सारी बात बताता हूँ।

बात अंग्रेजों के शासनकाल के कलकत्ते की है। मेरी दादीजी स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ आर्यसमाज की बड़ी नेत्री भी थीं। जहां अक्सर हारमोनियम पर भजनों की ओट में देश प्रेम के गीत भी गाये-बजाये जाते थे। देश स्वतंत्र हुआ; परिवार उस हारमोनियम के साथ पंजाब के फगवाड़ा शहर के मध्य में स्थित ''हांडेयों के मौहल्ले'' में आ बसा। उसी मौहल्ले में हिंदुस्तानी शास्त्रीय और भक्ति गायक, पुरषोत्तम दास जी जलोटा भी रहते थे। जो अपनी भजन गायकी के लिए देश भर में प्रसिद्ध थे। सतलुज में और पानी बहने के साथ ही परिवार उस हारमोनियम को साथ ले दिल्ली आ गया; पर वह बेचारा साज बदलते माहौल के साथ ताल ना मिला पाने की वजह से उपेक्षित सा हो कर रह गया। फिर वही हुआ जो आज लगता है कि नहीं होना चाहिए था ! धूल-मिट्टी के कारण बदरंग होते उस हीरे को बिना मोल एक मंदिर में दान स्वरुप दे दिया गया, ताकि वहां उसकी कुछ तो कद्र हो सके !

आज फिर सब कुछ बदला है ! फिर हारमोनियम की पूछ-गूछ होने लगी है ! कहते हैं ना कि घूरे के दिन भी बदलते हैं; वो तो फिर भी साज-ए-जहां था। किसी जमाने में सारे साजों का सिरमौर। लोग भले ही उसे भूल गए पर उसने अपने लोगों को नहीं भुलाया ! जब उसका समय आया तो बिना गिला-शिकवा किए, बिना किसी मान के, पंजाब के एक छोटे से शहर के एक छोटे से मौहल्ले के एक छोटे से घर में रहने वाले अपने प्रियजन, पुरषोत्तम दास जलोटा के सुपुत्र अनूप जलोटा को, उनकी पकी उम्र के बावजूद, ऐसा सम्मान, ऐसी शोहरत, ऐसी मित्र मंडली फिर दिलवाई, जिसके लिए युवा लोग तरसते रह जाते हैं। आज अनूप जी के जलवे देख लोग दांतों के नीचे ऊँगली रख चबाए जा रहे हैं। चबाने से ध्यान आया कि उंगली तो मेरी भी दर्द कर रही है; और क्यों ना करे ! पंजाब के उसी शहर फगवाड़े के उसी हांड़ों के मौहल्ले में मेरा भी तो निवास था ! मेरे घर पर भी हारमोनियम था ! भजनों से मेरा भी नाता था ! और आज मेरी भी उम्र हो गयी है ! तो फिर जलोटा कहाँ और मैं यहां ! ऐसा क्यों ? फिर सोचता हूँ पता नहीं ऐसा मौका मिलता, तो मैं क्या करता ! क्या यह सब मुझसे हो पाता ? क्या पैसे के लालच से इस कीचड़ में उतरने के पहले मेरे सामने मेरी दादी जी, बाबूजी, माँ के दिए गए संस्कार आकर खड़े नहीं हो जाते ? क्या मेरी आँखों का पानी मर जाता ? क्या अपने परिवार, अपने बच्चों, अपने इष्ट मित्रों का सामना मैं कर पाता ? सबसे बड़ी बात क्या मेरी ही अंतरात्मा मानती ? या अपने भविष्य के लिए पैसा और शोहरत (?) बटोरने में मुझे कुछ गलत नहीं लगता ! और भविष्य भी कौन सा ? और कितने दिन ? कितनी लालसा ? ये सारे सवाल जलोटे के सामने भी तो आ कर खड़े हुए होंगे !!   


तो फिर सवाल यह उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है ? क्यों कुछ लोग अपनी जीवन भर की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा, बदनामी मोल ले, इस तरह की ओछी, असामाजिक व गैर जिम्मेदाराना हरकतें करने पर उतारू हो जाते हैं ? जवाब साफ़ है कि इन सब के पीछे नाम (?) के साथ चल कर आने वाले दाम हैं ! वे लोग जिन्होंने अपने आस-पास कभी हर तरह की चकाचौंध देखी हो और आज कोई पहचान ना रहा हो, वे इस तरह के मौके को भुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पाते और पैसे के साथ-साथ नाम, चाहे वह बद ही हो, लपकने से बाज नहीं आते ! देखा जाए तो इस तरह के कर्मों में अधिकतर वे ही महिला-पुरुष लिप्त होते हैं जो येन-केन-प्रकारेण किसी भी तरह खबरों में सुर्खियां बटोरने को लालायित रहते हैं, उनके लिए नैतिक-अनैतिक कुछ भी नहीं होता ! अमर्यादित बयान व वस्त्र, अनर्गल वार्तालाप, तथाकथित आजादी के छद्म हिमायती, स्थापित परंपराओं का अपने मतलब से विरोध आदि, इनके हथकंडे हैं, हर तरह के मीडिया में आने और छाने के ! और मीडिया !! जिसकी नकेल या तो नेताओं के हाथ में है या पूँजीपतियों के, उसकी तो बात ही करना बेकार है ! दृशव्य हो या प्रिंट उसे सिर्फ और सिर्फ अपने से मतलब है ! उनके लिए देश, समाज, संस्कृति, परंपराएं, मान्यताएं सब दकियानूसी बातें हैं। दिल्ली का एक मुख्य अंग्रेजी अखबार है #Times_of_India उसके साथ आता है #Delhi_times उसके गुणी सम्पादक महिलाओं की ऐसी-ऐसी तस्वीरें रोज परोसते हैं, जिनके बारे में बात भी नहीं की जा सकती ! आश्चर्य भी होता है कि इनका घर-परिवार कैसा होता होगा ? क्या वहां बच्चे नहीं होते ? क्या माँएं-बहनें नहीं होतीं ? क्या बुजुर्ग नहीं होते ? कैसे ये लोग नग्नता की वकालत कर उसे जायज ठहरा देते हैं ? और क्यों इन्हें ऐसा लगता है कि इन्हीं तस्वीरों से इनका अखबार चलता है ?   

फिर एक आखीरी नजर उपरोक्त काण्ड पर ! आज जलोटे की सभी भर्त्सना कर रहे हैं पर उस "'नासमझ-अबोध-मासूम'' कन्या पर कोई ऊँगली नहीं उठा रहा, जिसके बिना सारा प्रकरण अधूरा रह जाता है ! क्या वह भी उतनी ही दोषी नहीं है जितना उसका पुरुष साथी ? क्या इस तरह के कर्म में उसकी कोई भी महत्वकांक्षा नहीं है ? क्या इस शो के द्वारा वह फिल्म निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न नहीं कर रही ? या उसको दोष नहीं देने का कारण यह है कि ऐसा करने वाला महिला विरोधी हो जाएगा ? पुरुष प्रधान समाज की वकालत हो जाएगी ? नारी की प्रगति में अड़चने आने लगेंगी ? और फिर जलोटा ही अकेला दोषी क्यों ? शो के अन्य दसियों प्रतिभागी क्यों नहीं ? वह चैनल क्यों नहीं ? उसे संचालित करने वाले क्यों नहीं ? कानों में रूई और आँखों पर पट्टी बांधे बैठे नियंता क्यों नहीं ? धर्म के तथाकथित ठेकेदार क्यों नहीं ? उसे सफल बना वर्षों-वर्षों से हिमाकत करने देने की छूट देने वाले हम क्यों नहीं ?    

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