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बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

एक रेलवे स्टेशन, जो ग्रामीणों के चंदे से चलता है

स्टेशन को बंद करने से होने वाली असुविधा को देखते हुए जालसू गांव के रिटायर्ड फौजियों और ग्रामीणों ने इस फैसले के विरुद्ध धरना व विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया तो रेलवे को इनकी बात माननी पड़ी और ग्यारहवें दिन फिर स्टेशन को शुरू तो  कर दिया पर वहां के लोगों के सामने एक शर्त भी रख दी कि यहां टिकट वितरण के लिए रेलवे का कोई कर्मचारी नहीं होगा और ग्रामीणों को ही इसे संभालना और हर महीने 1500 यानी प्रतिदिन 50 टिकट की बिक्री का भी प्रबंध करना होगा.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

हमारे देश में जहां रेल में बिना टिकट यात्रा करने वालों और उनसे जुर्माना वसूला जाना एक आम बात है ! रेलवे की सम्पत्ति को नुक्सान पहुंचाने वालों की भी कोई कमी नहीं है ! वहीं बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि हमारे ही देश में एक ऐसा रेलवे स्टेशन भी है, जिसके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वहां के ग्रामीण हर महीने चंदा जुटा कर 1500 रूपए का टिकट खरीदते हैं, जिससे कि रेलवे उस स्टेशन को बंद ना कर दे !

राजस्थान के बीकानेर और जोधपुर के बीच बसा है नागौर शहर। इसी शहर के डेगाना जिले का एक गांव जालसू ! शुरू से ही यह गांव फौजियों का रहा है ! इसके हर घर से एक व्यक्ति फौज में हैं। उनकी सुविधा के लिए सरकार ने 1976 में गांव को स्टेशन की सौगात दी। नाम दिया जालसू नानक हाल्ट। तब जोधपुर रेलवे विभाग ने वहां एक कुटिया बना कर ट्रेनों का ठहराव शुरू कर दिया। हालांकि इसे स्टेशन का दर्जा तो मिल गया था, परन्तु वर्षों तक फिर उसको और कोई ख़ास सुविधा नहीं मिली ! तब ग्रामीणों ने खुद ही, खुद की सहायता करने की ठानी और पंचायत मद से एक हॉल और बरामदे का निर्माण करवाया, साथ ही चंदा जुटाकर एक प्याऊ और फूलों का बगीचा भी तैयार करवा डाला ! वर्तमान में गांव के 160 से ज्यादा  जवान सेना, बीएसएफ, नेवी, एयरफोर्स और सीआरपीएफ में हैं। जबकि 200 से ज्यादा रिटायर्ड फौजी हैं।

पर ना ही रेलवे के निजीकरण को ले कर विलाप करने वाले मतलबपरस्त, ना हीं मानवाधिकार का रोना रोने वाले मौकापरस्त और ना हीं सबको समानाधिकार देने को मुद्दा बनाने वाले सुविधा भोगी कोई भी तो इधर ध्यान नहीं दे रहा ! शायद उनके वोटों को ढोने वाली रेल गाडी इस स्टेशन तक नहीं आती  

2005 में अचानक जोधपुर रीजन में कम आमदनी वाले स्टेशनों को बंद करने का फैसला किया गया ! जालसू का नाम भी उस सूचि में था, सो उसे भी बंद कर दिया गया ! स्टेशन को बंद करने से होने वाली असुविधा को देखते हुए जालसू गांव के रिटायर्ड फौजियों और ग्रामीणों ने इस फैसले के विरुद्ध धरना व विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया तो रेलवे को इनकी बात माननी पड़ी और ग्यारहवें दिन फिर स्टेशन को शुरू तो  कर दिया पर वहां के लोगों के सामने एक शर्त भी रख दी कि यहां टिकट वितरण के लिए रेलवे का कोई कर्मचारी नहीं होगा और ग्रामीणों को ही इसे संभालना और हर महीने 1500 यानी प्रतिदिन 50 टिकट की बिक्री का भी प्रबंध करना होगा।  

सरहद पर लोहा लेने वाले यहां के जांबाज लोगों ने यह शर्त भी मंजूर कर ली। अब सवाल था पूंजी का ! पंचायत जुटी और उसके अनुसार सभी से चंदा ले इस समस्या को हल करने का निर्णय लिया गया ! सबने अपने मान-सम्मान और सुविधा बनाए रखने के लिए हर तरह का सहयोग किया ! देखते-देखते डेढ़ लाख रूपए एकत्रित हो गए। इस राशि को गांव में ब्याज पर दिया जाने लगा, जिससे हर महीने तीन हजार रूपए ब्याज रूप में मिलने लगे। उसी रकम से 1500 टिकटों की खरीदी होने लगी और उसी से बुकिंग संभालने वाले ग्रामीण को भी 15% मानदेय भुगतान किया जाने लगा। इस तरह यह देश का इकलौता रेलवे स्टेशन बन गया है जहां कोई रेलवे अधिकारी या कर्मचारी नहीं है, इसके बावजूद भी यहां 10 से ज्यादा ट्रेनें रुकती हैं। गांव के लोग ही टिकट काटते हैं और हर माह करीब 1500 टिकट खरीदते भी हैं। 

जालसू गांव के लोगों की अपने हक के लिए लड़ाई, कर्मठता, उनकी दृढ़ता के लिए तो जो भी कहा जाए कम है ! पर रेलवे वालों को क्या कहा जाए ! क्या जवानों से ज्यादा अहमियत कमाई की होनी चाहिए ! क्या लकीर के फकीर उन अफसरों को उन 160 जवानों का जरा भी ध्यान नहीं आया, जिनके अपने घर आने-जाने के जरिए पर वे मुश्किलात खड़ी करने जा रहे थे ! रेलवे में कार्यरत रहते हुए उन्हें जापानी रेल सेवा के उस निर्णय की भी खबर जरूर होगी जिसके तहत उसने जापान के एक छोटे से आइलैंड ''होकाइडो'' के दुर्गम और दूरस्थ गांव ''क्यूशिराताकी'' की स्कूल जाने वाली सिर्फ एक बालिका के लिए तब तक ट्रेन सेवा जारी रखी जब तक उसने स्कूल पास नहीं कर लिया। यहां तो देश के लिए मर-मिटने वाले सैंकड़ों जवानों की बात थी !

ऐसा भी नहीं है कि ग्रामीणों के योगदान और सहयोग से चलने वाले इस स्टेशन की बात ऊपर तक ना पहुंची हो ! इस बात का पता रेलवे को तो है ही, पीएमओ तक इसकी खबर है ! पर ना ही रेलवे के निजीकरण को ले कर विलाप करने वाले मतलबपरस्त, ना हीं मानवाधिकार का रोना रोने वाले मौकापरस्त और ना हीं सबको समानाधिकार देने को मुद्दा बनाने वाले सुविधा भोगी कोई भी तो इधर ध्यान नहीं दे रहा ! शायद उनके वोटों को ढोने वाली रेल गाडी इस स्टेशन तक नहीं आती। 

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

सवाल पूछना हक है, तो जवाब सुनने का धैर्य भी रखिए

थापर जी यदि आपकी दृष्टि में अशोक इसलिए महान नहीं है क्योंकि उसके द्वारा लडे गए कलिंग युद्ध में एक लाख सैनिक हताहत हुए थे, तो क्या अकबर ने जो दसियों युद्ध लड़े उसमें सैनिकों से गलबहियां डाली गई थीं या उनमें कुश्ती से फैसला हुआ था ! उसमें मरे सैनिकों की मौत क्या आपके लिए कोई मायने नहीं रखती  ? आपकी कसौटी के अनुसार तो फिर उसे भी महान नहीं होना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा लडे गए युद्धों में मरने वाले सैनिकों की संख्या  कहीं ज्यादा थी .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जब सफलता, सम्मान और प्रतिष्ठा कुछ लोगों के सर पर पालथी मार कर जम जाते हैं, तब उन्हें संभालना सब के बस की बात नहीं रह जाती ! ऐसे में उन्हें हर इंसान गौण नजर आने लगता है। अपनी अक्ल और ज्ञान के गुमान के सामने उन्हें दूसरों की हर बात गलत लगने लगती है। इनके विचार, इनके ख्याल, इनकी मान्यताएं इनकी अपनी श्रेष्ठता की भावना के साथ घुल-मिल कर इनके दिलो-दिमाग पर बुरी तरह काबिज हो इन्हें विवेकहीन बना डालती हैं। इन्हें अच्छे-बुरे, सही-गलत का भान ही नहीं हो पाता। या कहा जाए तो दूसरों की बात काट कर ऐसे लोग अपने आप को बेहतर साबित कर आत्मसुख की अनुभूति करने लगते हैं। ऐसा इंसान यदि पत्रकार हो तो वह करेले के स्वाद सरीखा हो जाता है और यदि खुदा ना खास्ता संपन्न पृष्ठभूमि से हो तब तो ''वह'' कहावत भी चरितार्थ हो जाती है ! आजकल ऐसे बहुतेरे अखबारनवीस बोलने की आजादी की आड़ का गलत फ़ायदा उठा, किसी पर भी कुछ भी छींटाकसी कर अपनी दूकान चलाने में मशगूल हैं।  

स्वतंत्रता के बाद भी देश में एक जमात ऐसी बची रह गई, जो कभी भी अंग्रेजियत के मोह से उबर नहीं पाई ! इनमें से ज्यादातर की तालीम कॉन्वेंटों में उस भाषा हुई, जो दुनिया के सिर्फ चार-या पांच देशों की भाषा है या फिर हमारे और पाकिस्तान जैसे कुछ गुलाम मानसिकता वाले देशों की ! जहां वही पढ़ाया-सिखाया जाता था जिसमें अंग्रेजों की सहूलियत और मर्जी होती थी ! इतिहास भी उनके अनुसार ही चलता चला आ रहा है, जो विदेशियों द्वारा अपने आकाओं की स्तुति में लिखा गया ! जिसमें आक्रांताओं को नायक बनाया गया, देश के वीरों को बदनामी सौंपी गई ! दशकों तक ऐसी ही विचारधारा देश के सिंहासन पर भी काबिज रही ! आज जब सच्चाई पर से सैंकड़ों सालों से जमा धूल को हटाए जाने की कोशिश हो रही है, तो उस विचारधारा द्वारा पोषित कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, जो अब तक अपना एक गुट बना चुके हैं और जिनका एकमात्र एजेंडा सिर्फ विरोध का है, उन्हें यह सब नागवार गुजरने लगा ! 

अभी पिछले दिनों उत्तर-प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री आदित्यनाथ योगी जी ने बताया कि आगरा में निर्माणाधीन मुगल म्यूजियम, छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर स्थापित होगा। उन्होंने कहा कि गुलामी की मानसिकता के प्रतीक चिन्हों को छोड़, राष्ट्र के प्रति गौरवबोध कराने वाले विषयों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। हमारे नायक मुगल नहीं हो सकते ! शिवाजी महाराज हमारे नायक हैं, इसलिए यह म्यूजियम छत्रपति शिवाजी के नाम पर होगा।   

इस बात पर कुछ लोगों का भड़कना लाजिमी था। ऐसा ही एक नाम है करन थापर का। जो मुख्य मंत्री को उनका काम समझाने में आ जुटे। उनके अनुसार मुख्य मंत्री के पास हमें शासित करने का अधिकार हो सकता है लेकिन हमारे मूल्यों को निर्धारित करने और हमारे आदर्शों को आकार देने का नहीं। यह उनकी ओर से अहंकार है कि हमें यह बताएं कि किसको देखना है और हमारे अतीत के शासकों को महान मानना ​​है। उनका काम सिर्फ गवर्नमेंट चलाना है, हमारे मूल्यों और हमारे आदर्शों के बारे में दखलंदाजी का नहीं ! ये महाशय आगे कहते हैं कि हालाँकि मैं योगी को नहीं जानता (?) फिर भी मैं एक कदम आगे जाऊँगा। मुझे संदेह है कि उनके सवाल से या तो पूर्वाग्रह या अज्ञानता का पता चलता है, संभवतः दोनों। अगर मैं सही हूं, तो यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है और एक मुख्यमंत्री के रूप में असंतुलित है। 

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मुझे या मुझ जैसों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका विचार क्या है या आपका चहेता कौन है ! आप जैसों की पसंद-नापसंद से भी हमें कोई लेना-देना नहीं है ! ना हीं हम जैसों को आप लोगों के अकबर, हुमायूं या औरंगजेब जैसों को नायक मानने से कोई दिक्कत है ! क्योंकि इस देश में हर इंसान को, बोलने की आजादी के दुष्परिणाम देखते हुए भी, अपनी बात कहने-मानने का पूरा हक़ दिया गया है ! परन्तु यदि पूर्वाग्रहों से ग्रसित और कुंठित हो अपनी ही बात का औचित्य ठहराते रहेंगे, तब दिक्कत आएगी और फिर जवाब तो देना ही पडेगा  !

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इसके बाद थापर जी अपनी पसंद बताते हुए अकबर का नाम लेते हैं जो उनके अनुसार देश का और उनका सर्वकालीन महान शासक था और रहेगा ! फिर योगी जी की अकबर के बारे में जानकारी बढ़ाने हेतु अपने जैसी एक लेखिका इरा मुखोटी का उद्धहरण  देते हुए अकबर की दसियों खूबियां भी गिनाते हैं। पर कहीं ना कहीं उनको दाढ़ी में तिनके का आभास जरूर होता है जिसकी वजह से उनको सम्राट अशोक का नाम लेना पड़ जाता है पर तुरंत उस नाम को इसलिए नापसंद कर खारिज भी कर देते हैं क्योंकि उसने कलिंग के युद्ध में एक लाख के ऊपर सैनिकों की ह्त्या की थी ! 

ऐसे लोग एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सिर्फ सवाल पूछना पसंद करता है ! कोई इनसे पलट कर कुछ पूछ ले तो इन सब की भृकुटियां तन जाती हैं ! इन्होंने योगी जी से अनेकों सवाल पूछे ! पर क्या ये कुछ सवालों का जवाब देंगे ! इन्होंने जिस विस्तार से अकबर की बात की है क्या उतनी गहराई से अशोक को पढ़ा है ? अकबर तो भारत तक में ही सिमित रहा, उस पर भी पूरा राज नहीं कर पाया ! जबकि अशोक ने ईरान की सीमा के साथ-साथ अफगानिस्तान के हिन्दूकश में भी मौर्य सम्राज्य का सिक्का चलवाया। विदेशों तक में बौद्ध धर्म की अहिंसा का ज्ञान फैलाया ! अशोक तो फिर भी कलिंग के युद्ध के बाद शांतिप्रिय हो गया था पर अकबर को युद्धों में लिप्त रहना ही पड़ा था ! अशोक ने अपने पुत्रों को दूसरे देशों में अहिंसा और ज्ञान के प्रसार के लिए भेजा, जबकि अकबर के बेटे-पोते आपस में ही लड़ने मरने में लगे रहे। थापर जी यदि आपकी दृष्टि में अशोक इसलिए महान नहीं है क्योंकि उसके द्वारा लडे गए कलिंग युद्ध में एक लाख सैनिक हताहत हुए थे, तो क्या अकबर ने जो दसियों युद्ध किए उसमें सैनिकों से गलबहियां डाली गई थीं या उनमें कुश्ती से फैसला था ? उसमें मरे सैनिकों की मौत क्या आपके लिए कोई मायने नहीं रखती ? आपकी कसौटी के अनुसार तो फिर उसे भी महान नहीं होना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा लडे गए युद्धों में मरने वाले सैनिकों की संख्या  कहीं ज्यादा होगी !  

मुझे या मुझ जैसों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका विचार क्या है या आपका चहेता कौन है ! आप जैसों की पसंद-नापसंद से भी हमें कोई लेना-देना नहीं है ! ना हीं हम जैसों को आप लोगों के अकबर, हुमायूं या औरंगजेब जैसों को नायक मानने से कोई दिक्कत है ! क्योंकि इस देश में हर इंसान को, बोलने की आजादी के दुष्परिणाम देखते हुए भी, अपनी बात कहने-मानने का पूरा हक़ दिया गया है ! परन्तु यदि पूर्वाग्रहों से ग्रसित और कुंठित हो अपनी ही बात का औचित्य ठहराते रहेंगे, तब दिक्कत आएगी और फिर जवाब तो देना ही पडेगा  !

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

ढाक ने अपनी रीत बताई, तीन पात ही रहेंगें भाई !

चौथा स्थान फिलहाल खाली है, शायद उसके लिए तैयारी चल रही है। अब पांचवें पायदान पर तकरीबन पचास लोग, गिरने से अपने को बचाने, अपने अस्तित्व को संभालने, अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जोर आजमाइश में जुटे हुए हैं। यह जानते हुए भी कि तीन के बाद सब तृण हो जाते हैं ! दुनिया को तीन तक ही कुछ याद रह पाता है, स्वर्ण-रजत-कांस्य ! उसके बाद तू कौन, तो मैं कौन..............!


#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना काल में दूरदर्शन के रेट्रो चैनल पर आ रहे पुराने दिलचस्प  की तरह कल कांग्रेस की भी एक नाटिका का पुनर्मंचन हुआ ! जाने-माने कथानक का अंत वैसे तो सबको मालुम ही था, पर कुछ कलाकारों की नई गतिविधियों से कुछ अलग होने का क्षीण सा अनुमान भी लगाया जा रहा था पर ढाक ने अपनी रीत बताई, तीन पात ही रहेंगें भाई ! पद छोड़ने का खतरा तो कभी भी नहीं लिया जा सकता ! खासकर आज के परिवेश में ! क्योंकि क्या ठिकाना कि कल जिस स्वामिभक्त को कुर्सी सौंपी, वही स्वामी ना बन जाए ! अब बार-बार देवकांत बरुआ या मनमोहन सिंह जैसे लोग तो मिलने से रहे ! फिर इसका भी क्या पता कि शिखर से पद छोड़ने का संदेश सिर्फ स्वामिभक्ति के परीक्षार्थ ही जारी किया जाता हो ! पिछले दिनों का पत्र काण्ड इसका ठोस उदाहरण है ! जिसे पार्टी में दिग्गज समझे जाने वाले 23 नेताओं ने अपने को तुर्रम खां समझ, कांग्रेस में सुधार लाने के लिए सोनिया जी को कुछ लिख डाला। राहुल की एक घुड़की ने सभी की हवा निकाल दी ! पतझड़ में वृक्ष से चिपके इन पीले पत्तों की अब घिघ्घी बंधीं हुई है !      

अब वे दिन तो लद गए जब इस पार्टी में एक से बढ़ कर एक नेता हुआ करते थे ! जिन्हें सारा देश जानता-मानता था। अब तो सब कुछ सिमट कर तीन जनों पर आ सिमटा है। सोनिया जी, राहुल तथा प्रियंका ! दल के प्रथम तीन स्थानों पर इन्हीं का बर्चस्व है और होना भी चाहिए, पार्टी के यही तीन सदस्य ऐसे हैं जिनकी देश भर में पहचान है। कहीं भी जाएं देश के हर हिस्से में इनका संगठन अभी भी मौजूद है। कमोबेस इनके समर्थक सभी जगह मिल ही जाएंगें। फिलहाल चौथा स्थान अभी खाली है ! ऐसी हवा है कि शायद उसके लिए तैयारी चल रही है। अब पांचवें पायदान पर तकरीबन पचास लोग, गिरने से अपने को बचाने, अपने अस्तित्व को संभालने, अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एक दूसरे को धकियाते-लतियाते जोर आजमाइश में जुटे हुए हैं। यह जानते हुए भी कि तीन के बाद सब तृण हो जाते हैं ! दुनिया को तीन तक ही कुछ याद रह पाता है, स्वर्ण-रजत-कांस्य ! उसके बाद तू कौन तो मैं कौन !

सच्चाई तो यह है कि जनता भले ही किसी बात से परेशान हो, उसे लगता है कि उस मुसीबत से मोदी ही उबार सकता है और कोई नहीं ! संकट आया है तो मोदी ही कोशिश कर रहा है उससे उबारने की ! क्योंकि अवाम भी आज देख रहा है कि जो काम वर्षों-वर्ष टाले जाते रहे, जिनको पिछली सरकारें विषम, असंभव, नामुमकिन बताती रहीं वे कैसे एक झटके में पूरे हो गए। बड़े-बड़े राष्ट्र जो आए दिन आंखें दिखाने से बाज नहीं आते थे, आज आगे बढ़ कर हाथ मिलाने की कोशिश कर रहे हैं !

वैसे भी अभी जो तीन या तेरह में हैं, उनकी पहचान तभी तक है जब तक सर पर टोपी और पीठ पर हाथ है ! उसके बिना उनके शहर में भी शायद ही कोई उन्हें पहचाने। अधिकतर को पता है कि वे किसी भी चुनाव में कभी भी जीत ही नहीं सकते सिर्फ पार्टी की बदौलत ही उनकी पहचान है। ऐसे जनाधार हीन लोगों का एक ही लक्ष्य सदा रहा है कि गांधी परिवार का कोई सदस्य सर्वोच्च पद पर आसीन रहे। इसीलिए जब भी मीटिंग-मीटिंग का खेल होता है, हर सदस्य के संवाद पहले से तय होते हैं। किसको क्या और कब बोलना है, सब पूर्वनिर्धारित रहता है, और अंत सुखान्त ! इसके अलावा यहां हर कोई अपना अहम्, अपनी अहमियत, अपना गरूर का भार सदा अपने कंधों पर टांगे रहता है जिसका बोझ इनआत्मश्लाघियों को किसी और की हथेली-तले काम करना तो दूर वैसी सोच को भी निकट नहीं फटकने देता ! 

नियति ने राहुल को राजनीती में ला फंसाया है। उनकी मजबूरी है कि लाख चाहते हुए भी वह यहां से अब निकल नहीं सकते ! वे चाहेंगे तो भी लोग अपने स्वार्थवश उन्हें निकलने नहीं देंगे ! इसलिए अब वहां टिके रहने के लिए यह निहायत जरुरी है कि वे अपनी व्यक्तिगत मोदी विरोधी सोच बदलें ! परिपक्व हों ! चाटुकार, चापलूस, छुटभइए घाघ लोगों से छुटकारा पा पढ़े-लिखे, समझदार साथ ही अनुभवी लोगों को अपना सलाहकार बनाएं, जो देश-समाज-लोगों के हित में सोचें और उसी दिशा में काम करें ! मोदी जी के कपड़ों, उनकी चाल-ढाल या उनके दैनन्दिनी कार्यों पर उलटी-सीधी टिपण्णी कर या उनका मखौल बना, अपने आप को पार्टी और नेतृत्व का हितैषी सिद्ध करने वाले मतलबपरस्तों से बचें और उनको दूर ही रखें ! इसी में भलाई होगी। भले ही उनकी ऐसी हरकतें फौरी तौर पर ''दरबार'' में खूब वाह-वाही बटोर रही हों पर यह निहायत जरुरी है कि वक्त रहते इस धीमे विष से छुटकारा पा लिया जाए !  

जैसे बिना अंकुश के हाथी और बिन ड्राइवर के गाडी का जो हाल होता है वही बिना विपक्ष की किसी भी सरकार का हो जाता है। इसीलिए लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरुरी होता है ! पर आज देश में विपक्ष सिर्फ खानापूर्ति के लिए ही रह गया है ! वो चाहे जितना भी दम भर ले ! कितना भी हाथ-पैर पटक ले ! कितना भी चीख-चिल्ला ले ! कैसा भी जोड़-तोड़ लगा ले ! उसे एक बात समझनी और माननी ही पड़ेगी कि दूर-दूर तक कोई ऐसा नेता नजर नहीं आता जो मोदीजी को हराना तो दूर उनके सामने कोई छोटी-मोटी चुन्नौती ही खड़ी कर सके। खामियां तो आज कोई भी राह चलता निकाल देता है पर उसका पर्याय तो बताए ! हर बात में खामियां खोजने वाले उसका हल तो बताएं ! सच्चाई तो यह है कि जनता भले ही किसी बात से परेशान हो, उसे लगता है कि उस मुसीबत से मोदी ही उबार सकता है और कोई नहीं ! संकट आया है तो मोदी ही कोशिश कर रहा है उससे उबारने की ! क्योंकि अवाम भी आज देख रहा है कि जो काम वर्षों-वर्ष टाले जाते रहे, जिनको पिछली सरकारें विषम, असंभव, नामुमकिन बताती रहीं वे कैसे एक झटके में पूरे हो गए। बड़े-बड़े राष्ट्र जो आए दिन आंखें दिखाने से बाज नहीं आते थे, आज आगे बढ़ कर हाथ मिलाने की कोशिश कर रहे हैं ! दुनिया में एक नई पहचान बन रही है। ऐसे में हारे-थके-लुटे-पिटे हाशिए पर सिमटा दिए गए दलों और उनके लगभग गुमनाम होते आकाओं की नजर, बार-बार राहुल पर ही जा टिकती है, बलि का बकरा बनाने के लिए ! लगता तो यही है कि फिर इस बंदे को दूसरों की लड़ाई में ना चाहते हुए भी भाग लेना और अपना कुछ ना कुछ होम करना पडेगा ! 

सोमवार, 10 अगस्त 2020

समयानुसार अहम्, कुंठा व पूर्वाग्रहों को तिलाजंलि दे देनी चाहिए

आडवाणी जी की अनुपस्थिति में दुबले होते लोगों को पहले स्वतंत्रता दिवस के झंडोतोलन पर आजादी के पुरोधा गांधी जी की याद क्यों नहीं आती। जो उस दिन भी कलकत्ते में बैठे आंसू बहा रहे थे !  तब तो उनकी उम्र भी आज के अडवानी जी से काफी कम थी और ना ही कोई अडचन थी ! जबकि देश की आजादी, बाबरी से आजादी से कहीं बड़ा मायने रखती  थी ! किसी को यह समझ क्यों नहीं आता कि गलत समय में सही बात भी कहर ढा सकती है ! आज जब जनता की नब्ज परखने की जरुरत है ! समय के आकलन की आवश्यकता है ! आत्ममंथन की सख्त अपरिहार्यता है ! प्रजा की भावनाओं को समझने का प्रयोजन है ! असंयमित बयानों पर लगाम कसने की जरुरत है तब भी तथाकथित विज्ञ प्रवक्ता (तियाँ) यह ना समझते हुए कि उनके प्रलाप से पार्टी धंसती जा रही है, लगे रहते है विषवमन पर ! इन कुछ सालों में हुआ पराभव भी उन्हें चेता नहीं पा सक रहा ................................! 

#हिन्दी_ब्लागिंग   

जब से राम मंदिर के भूमिपूजन के उत्सव पर आमंत्रित हुए लोगों की सूचि आम हुई तभी से सोशल मीडिया पर हर चौथी पोस्ट आडवाणी जी की अनुपस्थिति को लेकर अफ़सोस करती दिखने लगी। ऐसा नहीं है कि यह सब उनकी अनुपस्थिति की वजह से दुखी हों, या उनके प्रति इनके दिलों में बहुत सम्मान हो ! यह सब दिल की भड़ास निकालने का कोई भी और कैसा भी मौका खोजने वाले कुतर्की लोग हैं। इनके कुतर्क उनकी उम्र और फैली हुई बिमारी का हवाला भी शांत नहीं कर सकता ! क्योंकि शतरंज की बिसात पर हर दांव में मात पा कर इनके आका तो अब किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर रह गए हैं उन्हें तो भरी दुपहरिया में भी अब कोई राह नहीं सूझ रही तो उन्होंने अपने प्यादों को खुली छूट तो दे दी है, पर छूट पाने वाले सिर्फ बगलें झाँक कर रह जा पा रहे हैं। चिल्ला-चिल्ला कर अपनी बात को आगे करने की नाकाम कोशिश भर कर किसी तरह शाम की डांट  से बचने की जुगत भर भिड़ा पा रहे हैं। अभी हाल ही में इनकी एक बड़बोली ''प्रवक्ति'' को एक चैनल पर नायक से खलनायक बना अयोध्या के लोगों ने ऐसा लताड़ा कि अब वह राम या अयोध्या पर बोलने से पहले दस बार सोचेगी।   

एक मान्यता है कि दुनिया में ऐसा कुछ नहीं है जो महाभारत में नहीं है, उसी तरह स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा कुछ नहीं है जो अधेड़ावस्था को पहुँच चुकी पार्टी में ना हो ! इनसे कोई पूछे कि जब येन-केन-प्रकारेण पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडे की डोर थामी गई थी तो आजादी के पुरोधा गांधी जी कलकत्ते में क्यों बैठे हुए थे। क्यों नहीं उनको दिल्ली लाने की जरुरत महसूस हुई। जबकि बाबरी मुक्ति से तो उनका देश मुक्ति का अभियान तो कोई तुलना ही नहीं रखता। वैसे भी आडवाणी जी का पाकिस्तान जा कर जिन्ना की प्रशंसा करना कई सवाल खड़े कर जाता है। 

आज ढाई-तीन लोग ऐसे भी हैं राजीव जी का नाम राम मंदिर से जोड़ भ्रम पैदा करने की तिकड़म में लगे हुए हैं जब कि पूरी बात बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे कि उस समय ताला कोर्ट के निर्देश पर मजबूरन खोलना पड़ा था जबकि सरकारी वकील से यह कहलवाया जा रहा था कि ताला खोलने से स्थितियां बिगड़ सकती हैं ! जज के आदेश पर ताला तो खुला पर जज महोदय का तबादला दूसरे प्रदेश में कर दिया गया था ! इस आदेश और उस आदेश में भी जमीन आसमान का फर्क है ! तब सरकार मंदिर खोलना नहीं चाहती थी, कोर्ट ने खुलवाया और अभी सरकार खोलना चाहती थी, परिस्थियाँ विपरीत थीं तब कोर्ट ने खुलवाया !

पर आज सब ऐसा राममय हो गया है, स्थिति ऐसी बन गई है, अवाम के गुस्से का डर ऐसा तारी हो गया है कि राम को काल्पनिक कहने वाले, उनकी जन्म स्थली पर सवाल उठाने वाले, राम सेतु का विध्वंस करने का षड़यत्र रचने वाले, ग्रंथों का मजाक उड़ाने वाले, धर्म को अफीम कहने वाले लोग भी अपने घरों में पूजा का आयोजन कर जनता को अपने धार्मिक होने का संदेश देने में जुट गए हैं या यूं कहें कि अपने राहू ग्रसित भविष्य का आभास पा मजबूरन जुटना पड़ रहा है ! पर साथ ही वोट के लिए बाहर आ तरह-तरह के प्रपंच और बोल बच्चन रचने से भी बाज नहीं आ रहे हैं ! पता नहीं इनकी दो नावों की सवारी का क्या हश्र होगा ! सबसे बड़ी बात यह है कि ये नीम हकीम अवाम की नब्ज नहीं समझ पा रहे हैं ! अब नहीं समझ पा रहे, तो खामियाजा तो भुगतना ही पडेगा !!

अधेड़ावस्था के पार जा चुकी अति अनुभवी पार्टी के लंबरदारों को यह क्यों नहीं समझ में आता कि गलत समय में सही बात भी कहर ढा सकती है ! फिर यहां तो बातें ही ऊल-जलूल की जा रही हैं। अपना इतिहास भूल, लंका विजय के समय आप रावण का गुणगान करोगे ! देश की आवश्यकता पूर्ती पर आप सवाल खड़े करोगे ! जिससे तनातनी चल रही हो उसी के घर जा कर गलबहियां डालोगे ! सिर्फ विरोध के लिए विरोध करोगे ! सच को झूठ साबित करने से बाज नहीं आओगे ! अपने घर के सदस्यों के विरोध पर दूसरों को दोष दोगे और फिर कहोगे कि जनता को बरगलाया गया है ! आज जब जनता की नब्ज परखने की जरुरत है ! समय के आकलन की आवश्यकता है ! आत्ममंथन की सख्त अपरिहार्यता है ! अवाम की भावनाओं को समझने का प्रयोजन है ! असंयमित बयानों पर लगाम कसने की जरुरत है तब भी तथाकथित समर्पित, विज्ञ प्रवक्ता (तियाँ) यह ना समझते हुए कि उनके प्रलाप से पार्टी धंसती जा रही है, लगे रहते है विषवमन पर ! इन कुछ सालों में हुआ पराभव भी उन्हें चेता नहीं पा सक रहा ! क्या इसे ही विनाश काले, विपरीत बुद्धि कहते हैं ! सोचने की बात है !!

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