शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

कहनी है इक बात हमें इस देश के पहरेदारों से

खालसा पंथ में दिक्षित लोग जात-पांत के भेदभाव से दूर, आत्मज्ञानी, सरल चित्त, समाजसेवी होने के साथ-साथ किसी के बहकावे में ना आने वाले हैं ! वे जानते हैं कि हिंदू-सिख एक ही माँ की संतानें हैं ! एक ही शरीर के अंग हैं ! एक ही परिवार के सदस्य हैं ! सो यहां किसी की दाल गल नहीं रही थी ! पर भारत को  खंड-खंड करने का स्वप्न देखने वाले लोग भी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हम कुछ जल्दी ही भावुक हो जाते हैं...........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हिंदुस्तान ! हिंदुओं के रहने का स्थान। संपंन्न, शांतिप्रिय, जो है उसी में खुश रहने वाले लोगों का देश। कई आए, कई गए ! कुछ अपना मतलब सिद्ध कर लौट गए कुछ यहीं के हो कर रह गए। दुनिया में मंदी का दौर आया तो बाहर के देशों के लोगों की गिद्ध दृष्टि इस सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश पर पड़ी। बहुतेरे आए पर अंग्रेजों ने अपनी कुटिलता से बाकी अतिक्रमणकारियों को हाशिए पर धकेल दिया। पर सिर्फ चार हजार अंग्रेजों के द्वारा इतनी बड़ी आबादी पर काबू पाना आसान नहीं था। इसीलिए षड़यन्त्र पूर्वक धर्म के नाम पर फूट फैला कर आपसी नफरत को जन्म दिया ! फिर एक से दूसरे को बचाने के नाम पर संरक्षण देने के बहाने उन्हें वश में किया ! अपनी शर्तें रखीं और धीरे-धीरे अपने शिकजे को जकड़ते चले गए। यहां तक की जाते-जाते भी उसी के सहारे देश के दो टुकड़े तो कर ही गए साथ ही अपनी कुटिल बुद्धि से देश को और भी गारत करने के लिए जाति, भाषा, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब जैसे मुद्दों द्वारा फूट डाल राज करने की नीतियां हमारे राजनेताओं को विरासत में दे गए। जिससे उपजे विद्वेष का परिणाम आज सबके सामने है।

कभी सोच के देखा जाए तो ऐसा क्या हुआ जो देश की आजादी के बाद से ही हिंदुओं, खासकर ब्राह्मणों के खिलाफ दलित मोर्चा खोला गया ! उसके पहले हजार साल तक ऐसी बात क्यों नहीं उठी ? क्या इन्हीं तीस-चालीस सालों में ही ब्राह्मणों के द्वारा ज्यादतियां हुईं ? जबकी इन्हीं ब्राह्मणों की वजह से ही ईसाईयों या मुस्लिमों द्वारा धर्मांतरण सफल नहीं हो पाया था ! नहीं तो किसी भी विधर्मी शासक ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जब यह देखा गया कि बाकी हिंदू जब तक ब्राह्मणों के संपर्क में रहेंगे तब तक उनको बहकाया नहीं जा सकता, तो इसीलिए जात-पांत का चक्रव्यूह रचा गया, पैसों का लालच और सम्मान की हड्डी फेंकी गयी ! यह दांव कुछ हद तक सफल रहा और समाज में विद्वेष की खाई गहरा गयी। वैसे सच तो यह है कि ब्राह्मण या मनुवाढ तो सिर्फ बहाना ही है, असल में हिंदुओं को बांट-काट कर किसी भी तरह सत्ता हासिल करना मकसद है।  

विडंबना ही रही कि पहले हिंदू मुस्लिम के बीच द्वेष के बीज बोए गए। फिर द्रविड़-आर्य का खेल खेला गया। उन्हें एक-दूसरे का दुश्मन जैसा बना दिया गया। पर इससे कइयों का मकसद सिद्ध नहीं हो पाया। सत्ता पाने की लालसा में कुकुरमुत्तों की तरह नए-नए छत्रप उगते गए और समाज को जाति, भाषा, क्षेत्र के हिसाब से बांट कर अपना उल्लू सीधा करते चले गए। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा से त्रस्त लोगों को कभी मनु, कभी हिंदू, कभी ब्राह्मण, कभी दलित जैसे निरर्थक जुमलों में उलझाए रखने में ही उनकी बादशाहत जो कायम रहने वाली थी। और चूँकि ब्राह्मण समाज की नींव की तरह थे सो पहले उन्हीं पर हमला किया गया। उन पर इल्जाम लगाने वाले तथाकथित समाजसेवी और अपने आप को बुद्धिजीवी कहलाने वालों को क्यों दलितों के मसिहाओं की कारस्तानियां नजर नहीं आतीं ? क्या किसी एक भी दलित नेता के किसी सर्वहारा परिवार को सहारा दिया है ? परिवार को तो जाने दें किसी बच्चे के भविष्य को संवारने का जिम्मा लिया है ?

अब तक पडोसी या घर के ही कुटिल लोगों की लाख कोशिशों के बावजूद हिंदुओं और सिखों में दरार नहीं डाली जा सकी थी। इसके कुछ मुख्य कारण भी थे ! जैसे सिख धर्म का इतिहास अभी नया-नया होने के कारण उसके बारे में जानने और बताने वाले बहुत से लोग समाज को सही जानकारी देते आए थे। गुरु साहिबान की वाणियों में ऋषि-मुनियों की बातें समाहित थीं। ऐसे सैंकड़ों हिंदू घर थे जिन्होंने अपने एक पुत्र को खालसा पंथ की दीक्षा दिलवाई थी। फिर इस पंथ में दिक्षित लोग जात-पांत के भेदभाव से दूर, आत्मज्ञानी, सरल चित्त, समाजसेवी होने के साथ-साथ किसी के बहकावे में ना आने वाले थे। वे जानते थे कि हिंदू-सिख एक ही माँ की संतानें हैं ! एक ही शरीर के अंग हैं ! एक ही परिवार के सदस्य हैं ! इन्हीं सच्चाइयों के कारण यहां किसी की दाल गल नहीं रही थी। पर विरोधी ताकतें भी चुप नहीं बैठीं थीं ! धीरे-धीरे उन्होंने जहर उगलना जारी रखा ! जिसके तहत दोनों धर्मों को जुदा जताने की साजिश शुरू हो गयी। नयी सिख पीढ़ी को इतिहास की गलत जानकारी दे बहकाने की कोशिश की जाने लगी। बार-बार यह फैलाया जाता रहा कि सिखों ने हिंदुओं की रक्षा की ! पर ज्ञातव्य है कि खालसा पंथ की स्थापना के समय ब्राह्मण, क्षत्रिय ही आगे आए थे। यह खुला सत्य है कि हर  परिवार ने अपना एक बेटा खालसा फौज के लिए दिया था। एक ओर जहां मराठे मुगलों से लड़ रहे थे वहीं राजपूतों और ब्राह्मणों ने भी मुग़ल साम्राज्य की नाक में दम कर रखा था। जब पहली खालसा फौज बनी तो उसका नेतृत्व भाई प्राग दास जी, जो एक ब्राह्मण थे, उनके हाथों में था। उनके बाद उनके बेटे भाई मोहन दास जी ने कमान सम्हाली। उनके अलावा सती दास जी, मति दास जी, दयाल दास जी जैसे ब्राह्मण वीरों ने गुरु जी की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे डाली। इतना ही नहीं गुरु जी को शस्त्रों की शिक्षा देने वाले भी पंडित कृपा दत्त जी जैसा योद्धा पंजाब में दुसरा नहीं हुआ। एक बैरागी ब्राह्मण लक्ष्मण दास और उनके किशोर पुत्र अजय ने सरहिंद में गुरु परिवार की रक्षा के लिए दुश्मनों से लोहा लिया और चप्पड़ चिड़ी की लड़ाई में विजय प्राप्त की। यही लक्ष्मण दास आगे चल कर बंदा बहादुर कहलाए।

कहने का तात्पर्य यही है कि भारत को खंड-खंड करने का स्वप्न देखने वालों से हमें होशियार रहने की जरुरत है। किसी के प्रलोभन, दरियादिली या झूठी सहानुभूति से भ्रमित न होकर अपने देश और समाज के लिए ही अपने आप को सजग रखना है। फिर चाहे वह पाकिस्तान द्वारा किसी धर्मस्थली तक जाने की इजाजत दे बहलाने की मंशा हो या फिर चीन द्वारा उसके यहां बेहतर व्यापार का प्रलोभन ! क्योंकि वे लोग भी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हम कुछ जल्दी ही भावुक हो जाते हैं। 

4 टिप्‍पणियां:

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(०६-१२-२०१९ ) को "पुलिस एनकाउंटर ?"(चर्चा अंक-३५४२) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनीता जी
आपका और चर्चा मंच का हार्दिक आभार

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सार्थक लेख।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुशील जी
बहुत-बहुत धन्यवाद

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