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गुरुवार, 31 अक्टूबर 2019

लेडिकेनी ! यह कैसा नाम है मिठाई का !

लेडिकेनि ! कुछ अजीब सा नाम नहीं लगता, वह भी जब यह किसी मिठाई का हो ! लेकिन यह सच है कि पश्चिम बंगाल में इस नाम की एक मशहूर मिठाई पाई जाती है जो काफी लोकप्रिय भी है। छेने और मैदे के मिश्रण को तल कर फिर चाशनी में सराबोर कर तैयार किए गए इस मिष्टान का नाम, 1856 से 1862 तक भारत के गवर्नर-जनरल रहे, चार्ल्स कैनिंग की पत्नी चार्लोट कैंनिंग के नाम पर रखा गया था.....!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 
उन दिनों देश में फिरंगियों के विरुद्ध गंभीर माहौल था। उन्हें दुश्मनी की नज़रों से देखा जाता था ! विद्रोह की संभावना बढ़ती जा रही थी ! ऐसे में भी एक अंग्रेज महिला ने ऐसी ख्याति अर्जित की, इतना स्नेह जुटाया कि उनके नाम पर एक मिठाई का नामकरण कर दिया गया ! ऐसा होने का भी एक बड़ा कारण था ! उन दिनों देश का माहौल अत्यंत खराब और भयप्रद होने के बावजूद लेडी चार्लोट देश भ्रमण कर लोगों से मिलती-जुलती रहीं। जनता के करीब रह उनका हाल-चाल जानने के लिए प्रस्तुत रहीं। इसी कारण अवाम में वे काफी लोकप्रिय हो गयीं, आम आदमी उन्हें अंग्रेज होने के बावजूद पसंद करने और चाहने लगा। वे भी शायद इस देश से प्रेम व लगाव रखने लगी थीं इसीलिए शायद उन्होने इसी धरा में दफ़न होना उचित समझा हो ! उनकी कब्र कोलकाता के नजदीक बैरकपुर में आज भी मौजूद है। उनकी इसी लोकप्रियता के कारण उनकी अभ्यर्थना स्वरुप एक नयी मिठाई की ईजाद कर उसका नाम उनके नाम पर रखा गया।  


मिष्टी प्रेम 



वैसे लेडिकेनि के उद्भव के बारे में तरह-तरह के लोकमत हैं। कोई कहता है कि कलकत्ता के मशहूर हलवाई भीम चंद्र नाग, जिनकी छठी पीढ़ी अभी भी कलकत्ते में अत्यंत सफलता पूर्वक अपना कारोबार चला रही है, द्वारा इसे खासकर लेडी कैंनिग के भारत प्रवास पर इसे बनाया था ! कोई इसे उनके जन्मदिन के उपहार स्वरुप निर्मित किया मानता है ! कोई उनके आगमन पर उनके स्वागत हेतु प्रस्तुत किए गए व्यंजन के रूप में देखता है तो कोई इसका जन्म बरहमपुर में लॉर्ड कैंनिग के आगमन के समय बनाया गया बताता है। कहानी कोई भी हो पर यह सच है कि इसका नाम लेडी कैनिंग को ही समर्पित है। इसी समर्पण की वजह से ही इसे इतनी अधिक ख्याति मिली बजाए इसके स्वाद के ! उस दौरान यह इतनी लोकप्रिय हो चुकी थी कि 1861 में उनकी मृत्यु के पश्चात भी इसको सम्मलित किए बगैर, मिष्टी प्रिय सभ्रांत बंगाली परिवारों का कोई भी महाभोज पूरा नहीं हो पाता था। पर समय के साथ धीरे-धीरे इसका नाम लेडी कैनिंग से बदल कर लेडिकेनि होता चला गया !  


बैरकपुर में स्थित ग्रेव 
देखने में और कुछ-कुछ स्वाद में भी यह अपने चचेरे भाई गुलाब जामुन के बहुत करीब है। पर दोनों में एक बुनियादी फर्क है, गुलाबजामुन जहां खोये से बनाया जाता है, वहीं लेडिकेनि के लिए छेने का प्रयोग किया जाता है। बाकि बनाने की विधि और रूप-रंग तक़रीबन समान ही होते हैं। जो भी हो, है तो यह भी एक जिह्वाप्रिय मिष्टान ! तो जब कभी भी मौका मिले, चूकना नहीं चाहिए इसका स्वाद लेने को ! 

गुरुवार, 4 जुलाई 2019

कहै घाघ सुन भड्डरी,..... कौन थे ये दोनों

''घाघ'' जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं ''भड्डरी'' की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार से विशेष रूप से संबद्ध हैं।घाघ के समान ही लोकजीवन से संबंधित कहावतों में कही गई भड्डरी की भविष्यवाणियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं। दोनों समकालीन तो हैं साथ ही यह समानता भी है कि घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृतांत भी निर्विवाद नहीं है। अनेकानेक किंवदंतियां दोनों के साथ जुडी हुई हैं। पर साथ ही यह भी सच है कि जितनी ख्याति जनकवि घाघ को मिली उतनी प्रसिद्धि भड्डरी को नहीं मिल पाई !आज की वर्तमान पीढ़ी इनके बारे में शायद ज्यादा न जानती हो, फिर भी बरसात द्वारे पर है, इसलिए समीचीन होगा, उससे जुड़े इन दोनों विलक्षण और अद्भुत व्यक्तित्वों के बारे कुछ जानना ...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग      
हमारा देश सदियों से कृषि प्रधान रहा है और भरपूर फसल के लिए अति आवश्यक है अच्छी वर्षा ! इसीलिए हर किसान के लिए इस बात का ज्ञान होना बहुत जरुरी होता है कि वर्षा कब होगी, होगी कि नहीं या कितनी मात्रा में होगी ! पुराने जमाने में नाहीं विज्ञान ने इतनी तरक्की की थी और नाहीं ही कोई मौसम विभाग हुआ करता था ,जो बरसात की सटीक जानकारी दे सके ! तो सब कुछ पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे अनुभव पर ही निर्भर हुआ करता था। हालांकि हमारे ऋषियों-मुनियों ने यह सब बातें विस्तार से सदियों पूर्व लिपिबद्ध कर दी थीं पर वह सब संस्कृत में होने की वजह से अधिकांश लोगों के लिए अगम्य सी ही थीं ! इसी समस्या के निदान के लिए लोकभाषा में कहावतों के रूप में सूक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ और इन्हीं कहावतों, भविष्यवाणियां के आधार पर वर्षों-वर्ष से हमारे किसान अपनी खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान करते चले आए हैं। इन भविष्यवाणियों के जनक के रूप में करीब चार सौ सालों से निर्विवाद रूप से ''घाघ'' और 'भड्डरी'' का नाम लिया जाता रहा है। घाघ जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं भड्डरी की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार के लिए प्रख्यात हैं। 

घाघ और भड्डरी के विषय में अनेक किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। पर दोनों के बारे में बहुत विस्तृत रूप से जानकारी उपलब्ध नहीं है ! चूँकि इनकी कहावतें एक ही शैली की होती हैं, इसलिए अनेक लोगों का विश्वास है कि ये दो अलग-अलग इंसान ना होकर एक ही आदमी के नाम हैं ! यहां तक कि कुछ लोग तो इनके दोहों की शुरुआत, ''कहै घाघ सुनु भड्डरी'' को देख इन्हें पति-पत्नी तक मानते हैं। कुछ लोगों के अनुसार उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र-बिहार, बंगाल एवं असम प्रदेश में ''डाक'' नामक कवि की भी घाघ जैसी ही कृषि सम्बन्धी कहावतें मिलती हैं जिसके आधार पर उन विद्वानों का अनुमान है कि डाक और घाघ भी एक ही थे। 

घाघ के बारे में मान्यता है कि बचपन से ही वे कृषि विषयक समस्याओं के निदान में दक्ष थे। छोटी उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गयी थी कि दूर-दूर से लोग अपनी खेती सम्बन्धी समस्याओं को लेकर इनके पास आया करते थे। चाहे बैल खरीदना हो या खेत जोतना, बीज बोना हो अथवा फसल काटना, घाघ के पास उनकी हर मुश्किल का समाधान हुआ करता था। इस सब के बावजूद इनके बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि घाघ नाम है या उपनाम इसमें भी मतभेद हैं ! पर पं. राम नरेश त्रिपाठी जी ने अपनी खोजों के आधार पर इनका नाम देवकली दुबे माना है। उनका जन्म, निर्विवाद रूप से तो नहीं फिर भी सोलहवीं शताब्दी में अकबर बादशाह के जमाने में उत्तर-प्रदेश के कन्नौज शहर के पास के एक गांव चौधरी सराय में हुआ माना जाता है। इस बात को इससे भी पुष्टि मिलती है कि, इनकी प्रतिभा से प्रभावित और प्रसन्न हो अकबर ने इन्हें प्रचुर धन, जमीन और चौधरी की उपाधि प्रदान की थी, जिस पर इन्होंने कन्नौज से कुछ ही दूरी पर सराय घाघ नामक गांव की स्थापना की थी। जिसका अस्तित्व आज भी है। इनकी सातवीं-आठवीं पीढ़ी के कुछ परिवार आज भी वहां रहते हैं। जो भी हो घाघ अपने कृषि संबंधी ज्ञान के लिए उत्तर तथा मध्य भारत के सबसे बड़े विद्वान, पर्यावरणविद, खगोल ज्ञानी, कृषि गुरु और दार्शनिक कवि माने जाते हैं। जिनकी सरल, सुगम्य स्थानीय भाषा आज भी सीधे-सादे, अशिक्षित किसानों का मार्गदर्शन कर रही है। 

सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै।


गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।


वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा। 

भड्डरी कौन थे, किस प्रांत के थे, किस भाषा में उन्होने कहावतों का सृजन किया, यह आज भी विद्वानों में चर्चा का विषय है। भड्डरी के जन्म के सम्बन्ध में ग्रामीण अंचलों में अनेक किंवदंतियां चलन में हैं। कुछ उन्हें राजस्थान से जोड़ते हैं तो कुछ काशी से। और चूँकि घाघ की कविताओं में उनका अक्सर जिक्र आया है तो उनका काशी निवासी होना ज्यादा तर्क-सम्मत लगता है। ऐसी मान्यता है कि इनमें दैवीय प्रतिभा थी जिससे वे सटीक भविष्यवाणी किया करते थे। 

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।

तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।
:
भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।। 

जो भी हो पर इतना तो सत्य जरूर है कि घाघ और भड्डरी दोनों में दैवी प्रतिभा थी। उनकी जितनी भी कहावतें हैं, सभी प्रायः खरी उतरती हैं। घाघ जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं भड्डरी की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार से विशेष रूप से संबद्ध हैं। आज भी देश के सुदूर गांवों-कस्बों में किसानों को इनकी कहावतें कंठस्थ हैं और खेती-खलिहानी में पथ-प्रदर्शक का काम करते हुए खादों के विभिन्न रूपों, गहरी जोत, मेंड़ बाँधने, फसलों के बोने के समय, बीज की मात्रा, दालों की खेती के महत्व इत्यादि हर मसले पर सहायक होती हैं। हालाँकि घाघ का लिखा हुआ  कुछ भी उपलब्ध नहीं है पर उनका दृढ अभिमत था कि कृषि सबसे उत्तम व्यवसाय है। 

उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान।
:
उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो सँग रहा।
:
खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत।
गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै। 

दोनों में यह समानता भी है कि घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृतांत भी निर्विवाद नहीं है। दोनों  समकालीन थे।घाघ के समान ही लोकजीवन से संबंधित कहावतों में कही गई भड्डरी की भविष्यवाणियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं। पर जितनी ख्याति जनकवि घाघ को मिली उतनी प्रसिद्धि भड्डरी को नहीं मिली।  

सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय।

घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।
:
सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय।

महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।

जो भी हो दोनों ही व्यक्ति अत्यंत कुशल, बुद्धिमान, नीतिमान तथा भविष्य का ज्ञान रखने वाले थे। आज के समय में यदि कोई इंसान नीतिनिपुण, चालाक व गहरी सूझबूझ वाला हो तो उस ''घाघ'' कहकर बुलाया जाने लगता है ! इसीसे उसकी व्यक्तित्व की गहराई का अंदाजा लग जाता है।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

अथ रसगुल्ला कथा

इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों, बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूधिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

"नोवीन दा किछू  नोतून कोरो, डेली ऐक रोकोमेर मिष्टी आर भालो लागे ना."

"हेँ, चेष्टा कोच्ची (कोरची), दैखो की होय."    
1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था।तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा किछू नुतून कोरो)।
नवीनचंद्र दास 

नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। और सच में वे कोशिश कर भी रहे थे कुछ नया बनाने की जिसमें उनका भरसक साथ दे रही थीं उनकी पत्नी, खिरोदमोनी । उसी कुछ नये के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में "कुछ" मिलाया, अब जो चीज सामने आयी उसका स्वाद अद्भुत था। खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।



कलकत्ता वासियों ने जब इसका स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गयी। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह  "चीज"  जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन की दुकान के कारिगरों को भी नहीं था।

नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम "टच" देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को गिरने नहीं दिया है। नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है।  


बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रोशोगोल्ले" का जवाब नहीं। इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूडिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है। 
ओडिसा का और बंगाल का रसगुल्ला 

जो हो इसका जन्म तब के ईस्ट इंडिया का ही माना जाता है जिसे आज
बंगाल और ओडिसा के नाम से जानते हैं। वैसे 2017 में सरकार द्वारा बनाई गयी कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को  Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत  हो।  यह है इस मिठाई का ''क्रेज़''। हालांकि आजकल बदलते समय के साथ कई लोग इसके नाम का सहारा ले उल्टी-सीधी मिठाइयां, जैसे पान रसगुल्ला, मिर्ची रसगुल्ला, गुलाब रसगुल्ला, चॉकलेट रसगुल्ला जैसे सौ स्वादों वाले रसगुल्ले बनाने का दावा कर नाम और दाम कमाने से नहीं हिचकिचा रहे। यह सही है कि किसी को कुछ बनाने की रोक नहीं है पर किसी की ख्याति को भुनाना भी उचित नहीं होता। देखना है कि बंगाल का, अपनी परंपराओं से लगाव रखने वाला, भद्रलोक किसे सर-माथे पर बिठाए रखता है।    
तो यदि कभी कोलकाता जाना हो तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में ना पड़ बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

बॉक्सिंग डे यानी डिब्बा दिवस

अब वहां विदेशों में छुट्टी कभी भी हो पर अपने देश के क्रिकेट प्रेमी तो इस बार यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। आमीन ! 

 भारत ने अब तक 14 बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच खेले हैं और इनमें से दस में उसे हार का सामना करना पड़ा. उसने केवल एक मैच जीता है जबकि तीन अन्य ड्रॉ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में वह सात बॉक्सिंग डे टेस्ट का हिस्सा रहा और इनमें से पांच मैचों में उसे हार झेलनी पड़ी. जबकि दो मैच का कोई रिजल्‍ट नहीं निकला.
#हिन्दी_ब्लागिंग   
भारत ऑस्ट्रेलिआ के बीच तीसरा क्रिकेट टेस्ट मैच कल, यानी 26 दिसंबर 2018 को खेला जाना है। क्रिसमस के बाद का दूसरा दिन योरोप में "बॉक्सिंग दिवस'' के रूप में जाना जाता है। इसलिए इस दिन खेले गए मैच को बॉक्सिंग डे मैच कहते हैं। भारत ने अपने विदेशी दौरों पर 14 बॉक्सिंग डे मैच खेले हैं। जिनमें दस में हार मिली है, तीन ड्रॉ रहे हैं तथा सिर्फ एक मैच ही जीत पाया है वह भी साऊथ अफ्रीका से !  ऑस्ट्रेलिआ में बॉक्सिंग डे के मैच मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड पर ही खेले जाते हैं। अब तक हम ने इस दिन वहां सात टेस्ट खेले हैं, जिनमें पांच में हार का सामना करना पड़ा है और बाकी दो ड्रॉ रहे हैं। इस तरह देखें तो तस्वीर निराशाजनक ही रही है। 
 मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड 
अब रही इस दिन के नाम की बात ! बॉक्सिंग दिवस एक धर्मनिरपेक्ष उत्सव दिवस है। जो 26 दिसम्बर को मनाया जाता है, अर्थात बड़े दिन के अगले दिन, जो कि सेंट स्टीफेन दिवस भी है इसलिए यह एक धार्मिक अवकाश भी है। पर इसी दिन कई देशों में तरह-तरह के खरलों की शुरुआत होने के कारण ऐसा लगता है कि इस दिन का संबंध शायद बॉक्सिंग के खेल से हो, जबकी ऐसा नहीं है। हालांकि इस के बारे में कुछ ज्यादा स्पष्ट नहीं है। पर हर जगह ग़रीबों, जरूरतमंदों को धन या अन्य दान दे कर उनकी सहायता करने का चलन रहा है तो ऐसा मन जाता है कि तक़रीबन रोमन काल से यह परिपाटी चली आ रही है जब जरुरत का सामान और खाद्यपदार्थ डिब्बों में बंद कर उन्हें जरुरत मंद-बेसहारा लोगों के लिए चर्चों के बाहर रख दिए जाता था। वहीं कुछ खाली बॉक्स भी सेंट स्टीफेन की दावत के नाम पर कुछ रकम इकट्ठी करने के लिए रख दिए जाते थे। इन्हीं डिब्बों या बाक्सों के लेन-देन के कारण इस दिन का नाम बॉक्सिंग डे पड़ गया। 
इसको मनाने का कोई बहुत ही कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो बॉक्सिंग दिवस अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है।
अब वहां विदेशों में छुट्टी कभी भी हो पर अपने देश के क्रिकेट प्रेमी तो इस बार यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। आमीन ! 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...