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सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

कोलकाता का अद्भुत फोर्ट विलियम, अब विजय दुर्ग 😇

किला शब्द सुनते ही ऊंचाई पर बनी एक व्यापक, विशाल संरचना की तस्वीर दिमाग में बनती है ! ऊँची-ऊँची, अभेद्य, मजबूत दीवारें ! उन पर हथियारों के लिए बने झरोखे ! दीर्घकाय, कीलों मढ़े दरवाजे ! उन तक पहुंचने के लिए अनगिनत सीढ़ियां ! पर फोर्ट विलियम यानी विजय दुर्ग में ऐसा कुछ नहीं है, यह बिलकुल अलग है ! ऊंचाई की तो छोड़ें, कुछ दूरी से तो यह दिखलाई भी नहीं पड़ता, क्योंकि इसका निर्माण भूमि-तल से नीचे किया गया है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग      

कलकत्ता, अब का कोलकाता ! महलों के शहर की ख्याति के बावजूद, एक धीर-गंभीर शहर ! इसने कभी भी औरों की तरह शोर नहीं मचाया कि मेरा क़ुतुब मीनार देखो, मेरा ताजमहल देखो, मेरा गेटवे ऑफ इंडिया देखो, मेरा गोल्डन बीच देखो या मेरा चार मीनार देखो ! इसने कभी गर्वोक्ति नहीं की कि देखो, देश में पहली बार मेरे यहां यह-यह हुआ ! जबकि इसके पास ऐसा बताने को, दिखाने को कई दर्जन उदाहरण मौजूद हैं ! 

विक्टोरिया मेमोरियल 

हावड़ा ब्रिज 

आज उन्हीं में से एक की बात ! वह है 1781 के कलकत्ता में अंग्रेजों द्वारा करीब 170 एकड़ में निर्मित एक अद्भुत किला, फोर्ट विलियम। जिसका नामकरण ब्रिटिश सम्राट विलियम III के नाम पर किया गया था। यह भारतीय सेना के पूर्वी कमान का मुख्यालय है। उसकी चर्चा इसलिए भी सामयिक है, क्योंकि पिछले साल दिसम्बर में उसका नाम बदल कर, महाराष्ट्र के सिंधु-दुर्ग तट पर स्थित शिवाजी के मजबूत नौसैनिक अड्डे से प्रेरणा ले विजय दुर्ग कर दिया गया है। जो भारतीय इतिहास और राष्ट्रवाद के प्रतीक छत्रपति शिवाजी को श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित है। इसके साथ ही अपनी सेना के नायकों को सम्मान देने हेतु,  इसके भीतर की कुछ इमारतों  के नाम भी बदल दिए गए हैं ! 

किले का एक प्रवेश द्वार 

अंदरूनी भाग 

फोर्ट विलियम ! कोलकाता के दिल धर्मतल्ला से विक्टोरिया मेमोरियल की तरफ बढ़ें, तो इस महानगर का इकलौता हरियालियुक्त स्थान, मैदान शुरू हो जाता है, जो कि किले का ही एक हिस्सा है ! उसी मैदान और हुगली (गंगा) नदी के पूर्वी किनारे के बीच के इलाके पर, जो उस समय के बंगाल के गवर्नर जनरल वैरेन हेस्टिंग के नाम पर हेस्टिंग कहलाता है, वहीं खिदिरपुर रोड़ पर यह किला स्थित है। जो कोलकाता के प्रसिद्ध व विख्यात स्थानों में से एक है। 

खिदिरपुर रोड का बाहरी हिस्सा 

अंदर की भव्य ईमारत 

किला शब्द सुनते ही ऊंचाई पर बनी एक व्यापक, विशाल संरचना की तस्वीर दिमाग में बनती है जिसके सामने हर चीज बौनी नजर आती हो ! ऊँची-ऊँची, अभेद्य, मजबूत दीवारें ! उन पर हथियारों के लिए बने झरोखे ! दीर्घकाय, कीलों मढ़े दरवाजे ! उन तक पहुंचने के लिए अनगिनत सीढ़ियां ! पर फोर्ट विलियम यानी विजय दुर्ग इससे बिलकुल अलग है ! ऊंचाई की तो छोड़ें, कुछ दूरी से तो यह दिखलाई भी नहीं पड़ता, क्योंकि इसका निर्माण भूमि-तल से नीचे किया गया है। जब तक इसके पास ना पहुंचो, पता ही नहीं चलता कि यहां कोई विशाल परिसर भी बना हुआ है ! 

शस्त्र म्यूजियम 
वास्तुकला 
ब्लैक होल त्रासदी ! अब किला है तो उसका ताल्लुक युद्ध, नर संहार, विभीषिका से भी होना ही है ! इसके साथ भी एक ऐसी किवदंती जुडी हुई है। 1756 में नवाब सिराज्जुदौला ने अंग्रेजों पर हमला कर इस किले को अपने कब्जे में ले, 146 बंदियों को एक 18 x 15 (लगभग) के कमरे में बंद कर दिया था ! तीन दिन बाद जब उसे खोला गया तो सिर्फ 23 लोग ही जिंदा बचे थे ! वैसे इस घटना को इतिहासकार प्रमाणिक नहीं मानते उनके अनुसार यह मनघड़ंत घटना अंग्रेजों द्वारा प्लासी के युद्ध का कारण और उसका औचित्य बनाए रखने के लिए गढ़ी गई थी ! बात चाहे झूठी ही हो पर किले के साथ उसकी चर्चा जरूर होती है।
ब्लैक होल, स्मारक 

खूबसूरत परिसर 

विजय दुर्ग में दस हजार जवानों के रहने की सर्वसुविधा युक्त व्यवस्था है ! जिनमें स्विमिंग पूल, फायरिंग रेंज, बॉक्सिंग स्टेडियम, कई गोल्फ कोर्स, सिनेमा इत्यादि शामिल हैं। इसके छह मुख्य द्वार हैं ! आम नागरिक इजाजत पत्र लेकर किले के कुछ चुनिंदा स्थानों को देख सकते हैं ! प्रवेश नि:शुल्क है और समय सुबह 10 बजे से शाम 5.30 तक निर्धारित है। कभी समय और मौका हो तो इस ऐतिहासिक धरोहर को जरूर देखना चाहिए।

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

अथ रसगुल्ला कथा

रसगुल्ले की प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों, बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओड़िसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। 2017 में सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो। इस मिठाई की प्रसिद्धि का यह आलम था कि इसके आविष्कारक नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

"नोवीन दा !  किछू नोतून कोरो, डेली एकई धरनेर मिष्टी आर भालो लागे ना."    

"हें, चेष्टा कोच्छि (कोरछि), दैखो की होय."   
 
1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था। तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा, कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा ! किछू नोतून कोरो)।  नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। और सच में वे कोशिश कर भी रहे थे कुछ नया बनाने की जिसमें उनका भरसक साथ दे रही थीं उनकी पत्नी, खिरोदमोनी । उसी कुछ नया के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में "कुछ" मिलाया, अब जो चीज सामने आई, उसका स्वाद अद्भुत था ! खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।
नवीन चंद्र दास 
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कलकत्ता वासियों ने जब इस नयी चीज का स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गई। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह  "चीज"  जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन को छोड़ उनके कारिगरों को भी नहीं था।
रस के गोले 
नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम "टच" देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को कभी भी गिरने नहीं दिया है।  

खीरमोहन 
बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रोशोगोल्ले" का जवाब नहीं। इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूडिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है। 
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जो भी हो रसगुल्ले का जन्म तब के ईस्ट इंडिया का ही माना जाता है, जिसे आज बंगाल और ओड़िसा के नाम से जानते हैं। वैसे 2017 में सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो। इस मिठाई की प्रसिद्धि का यह आलम था कि इसके आविष्कारक नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है !  
रसगोल्ला फिल्म का पोस्टर 
उजान गांगुली, जिन्होंने नवीन चंद्र का किरदार निभाया 
यह है इस मिठाई का ''क्रेज़''। हालांकि आजकल बदलते समय के साथ कई लोग इसके नाम का सहारा ले उल्टी-सीधी मिठाइयां, जैसे पान रसगुल्ला, मिर्ची रसगुल्ला, गुलाब रसगुल्ला, चॉकलेट रसगुल्ला जैसे सौ स्वादों वाले रसगुल्ले बनाने का दावा कर नाम और दाम कमाने से नहीं हिचकिचा रहे। यह सही है कि किसी को कुछ बनाने की रोक नहीं है पर किसी की ख्याति को भुनाना भी उचित नहीं होता। देखना है कि बंगाल का, अपनी परंपराओं से लगाव रखने वाला, भद्रलोक किसे सर-माथे पर बिठाए रखता है।   
तो यदि कभी कोलकाता जाना हो तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में बिना पड़े, बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।

@लेख के सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

बुधवार, 13 सितंबर 2023

बेगुनकोदर, एक भूतिया रेलवे स्टेशन

सच्चाई क्या है यह तो पता नहीं ! पर लगभग 42 सालों तक भूतिया डर के चलते बेगुनकोदर रेलवे स्टेशन बंद पड़ा रहा। यहाँ कोई भी नहीं आता था। पर फिर समय कुछ बदला ! लोगों की परेशानियों को देखते हुए 2009 में तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने अफवाहों के शिकार इस बदनसीब रेलवे स्टेशन को दुबारा से हरी झंडी दिखा दी। लेकिन आज भी सूरज ढलने के बाद वहाँ शायद ही कोई व्यक्ति दिखाई पड़ता हो........!     

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भूत, इनके बारे में दावे तो बड़े-बड़े किए जाते हैं, पर ठीक या अच्छी तरह से देखा शायद ही किसी ने हो ! हमारे गांवों में ऐसे कुछ लोग जरूर मिल जाएंगे, जिन्होंने भूतों से कुश्ती लड़ी हो या उनसे भूत ने बीड़ी मांगी हो ! पर वे लोग यह नहीं बता पाते कि उस अशरीरी ने बीड़ी कैसे पी या कुश्ती में कौन सा दांव लगाया ! पर इसके साथ ही भूतों पर एक सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि दुनिया में करीब 45% लोग इन पर विश्वास करते हैं ! इसका कारण भी है, इस विस्मय भरे संसार में हजारों चीजें, बातें, घटनाएं, वारदातें ऐसी हैं या होती रहती हैं, जिनका कोई तर्कसम्मत जवाब या हल नहीं मिल पाता ! जिन्हें महसूस तो किया जाता है पर परिभाषित नहीं किया जा सकता ! विदेशों की बात नाहीं करें, अपने देश में ऐसी दसियों जगहें हैं जो भूतिया नाम से विख्यात हैं ! उन्हीं में से एक है पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में बेगुनकोदर नाम का एक रेलवे स्टेशन !  


पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से करीब 260 किमी दूर, पुरुलिया जिले में 1960 में भारतीय रेलवे ने एक सुनसान व वीरान सी जगह में अपना एक स्टेशन बनाया जिसका नाम रखा गया बेगुनको
दर रेलवे स्टेशन ! हालांकि यह पैसेंजर हॉल्ट था, इसलिए यहां टिकट घर तथा प्रतीक्षालय तो था पर प्लेटफॉर्म नहीं था ! पर पहले स्थानीय लोगों को शहर जाने के लिए तक़रीबन पचास किमी चल कर ट्रेन पकड़नी पड़ती थी, इसके बनने पर इस मुसीबत से उन्हें छुटकारा मिला और समय की बचत भी हुई ! कुछ सालों तक सब ठीक-ठाक चलता रहा पर इसके बनने के करीब सात साल के बाद 1967 में वहाँ तरह-तरह की अफवाहें फैलने लगीं ! दरअसल एक रेलवे कर्मचारी के वहां एक महिला भूत होने के दावे पर लोगों ने विश्वास नहीं किया ! कुछ दिनों बाद ही उस कर्मचारी की मौत हो गई ! लोगों ने उसका संबंध उस भूत से जोड़ दिया ! जिसके बाद कहा जाने लगा कि शाम ढलने के बाद मुसाफिरों को यहां सफ़ेद साड़ी पहने एक महिला नजर आती है, जो ट्रैन के साथ दौड़ लगाती है ! कभी-कभी तो वह गाड़ी से भी तेज दौड़ कर आगे निकल जाती है ! कुछ लोगों ने ट्रैन के सामने पटरी पर भी उसे चलते देखने का दावा किया ! हालांकि किसी भी बात की कभी भी कोई पुष्टि नहीं हुई !

इन सब बातों से डर इतना फैल गया कि लोग शाम होते ही स्टेशन और उसके पास के इलाके से ही दूर चले जाते थे ! सुरज ढलने के बाद यहां कोई रुकना नहीं चाहता था ! शाम पांच-छह बजे के बाद वहां कोई भी इंसान नजर नहीं आता था ! बेगुनकोद रेलवे स्टेशन पर भूत का खौफ धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि कोई भी व्यक्ति सूरज ढलने के बाद वहाँ नहीं उतरता था, चढ़ने की तो बात ही दूर ! गाड़ियां वहाँ से जरूर गुजरती थीं पर उनकी रफ़्तार बढ़ा दी जाती थी ! स्टेशन आने के पहले यात्री ट्रेन की खिड़कियाँ बंद कर लिया करते थे, उनका मानना था कि इस स्टेशन को देखना भी खतरे से खाली नहीं है ! वहाँ काम करने वाले कर्मचारी भी विभाग में अपना ट्रांसफर करने की अर्जी देने लग गए। कोई भी कर्मचारी बेगुनकोदर रेलवे स्टेशन पर काम करने को तैयार नहीं था। जो भी नए कर्मचारी यहाँ आते वो भी जल्दी ही वापस लौट जाते थे । कर्मचारियों के बिना किसी भी रेलवे स्टेशन को चलाना कैसे संभव हो पाता सो इन सबके चलते स्टेशन को ही बंद कर दिया गया ! बेगुनकोदर भूतिया रेलवे स्टेशन के रूप में कुख्यात हो चुका था ! 



ऐसे
ही लगभग 42 सालों तक अफवाहों के चलते बेगुनकोद
 रेलवे स्टेशन बंद पड़ा रहा। यहाँ कोई भी नहीं आता था। पर फिर समय कुछ बदला ! लोगों की परेशानियों को देखते हुए 2009 में तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने अफवाहों के शिकार इस बदनसीब रेलवे स्टेशन को दुबारा से हरी झंडी दिखा दी। लेकिन आज भी सूरज ढलने के बाद वहाँ शायद ही कोई व्यक्ति दिखाई पड़ता हो ! 

@सौजन्य अंतर्जाल 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

कोलकाता की रसगुल्ले वाली चाय

कुछ सालों पहले एक उद्यमी ने सौ विभिन्न स्वादों में रसगुल्ले बनाए थे ! उत्सुकतावश कुछ दिन तो बहुत हो-हल्ला रहा फिर धीरे-धीरे उनके प्रति लोगों का रुझान कम होता चला गया ! कुछ लोग समोसे में आलू की जगह मटर, चने, काजू इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं पर जो सनातन बात आलू भरे समोसे की होती है वह दूसरी चीजों से नहीं बन पाती ! वही बात रसगुल्ले की भी है ! जो बात कोमल, मुलायम, दूधिया रसगुल्ले के स्वाद में है वह और कहाँ..........!

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जितनी विविधता हमारे रहन-सहन में है उतनी ही हमारे खान-पान में भी है ! वैसे तो आज हर चीज हर जगह उपलब्ध है फिर भी किसी-किसी व्यंजन विशेष का अपने प्रदेश में स्वाद कुछ और ही होता है ! इस खासियत को बचाए रखने के साथ-साथ उसमें और भी बढ़ोत्तरी के लिए खान-पान की दुनिया में तरह-तरह के प्रयोग चलते ही रहते हैं ! जिससे भोजन प्रेमियों को कुछ और नया जायका या स्वाद मिल सके ! इन्हीं प्रयोगों के चलते कभी-कभी अचानक कुछ ऐसा बन जाता है जिसकी विशेषता व नवीनता उसे रातोंरात भोजन प्रेमियों का चहेता बना देती है ! जैसा वर्षों पहले रसगुल्ले की ईजाद पर हुआ था ! कभी कभी खाद्य निर्माता पुरानी चीजों के साथ भी प्रयोग करते रहते हैं जो कमोबेश लोकप्रिय भी हो जाती हैं ! उदाहरण स्वरूप समोसे को लिया जा सकता है जिसमें आलू की जगह तरह-तरह की अन्य सामग्रियों को भर उसे नया स्वाद देने की कोशिश की जाती रहती है ! 
इसी संदर्भ में, आजकल कोलकाता में रसगुल्ले वाली चाय ''वायरल'' हो रही है ! हालांकि दोनों का कोई मेल नहीं है फिर भी जो चल जाए वही सफल ! यह अलग बात है कि ऐसे प्रयोग धूमकेतु ही सिद्ध होते हैं फिर भी जब तक हैं, तो हैं ! अब बात आती है कि इसकी ईजाद कैसे हुई ! तो एक बंगाली भद्रलोक, जिनकी अपनी एक अच्छी-खासी चाय की दूकान कोलकाता के साउथ सिटी मॉल के पास है, कहीं जा रहे थे तो एक जगह गर्मागर्म रसगुल्ले बनते देखे ! ज्ञातव्य है कि रसगुल्ला गर्म और ठंडा दोनों स्थितियों में स्वादिष्ट लगता है ! तो वे सज्जन अपने को रोक नहीं सके और रसगुल्ले का सेवन करते हुए चाय भी ले ली  ! टेस्ट अच्छा लगा,  तभी उनके दिमाग में इस ''फ्युजन'' का विचार आया ! दूसरे दिन अपनी दूकान में उन्होंने अपने मित्रों को अपना आयडिआ पेश किया जो ''वायरल'' हो गया ! बंगाल के भद्र लोगों का प्यार रसगुल्ला और चाय ! एक साथ !
कुछ एक उत्पादों को छोड़ दिया जाए, जैसे राजभोग, तो इस तरह के प्रयोग मूल वस्तु के सामने ज्यादा दिन नहीं टिकते ! कुछ सालों पहले एक उद्यमी ने सौ विभिन्न स्वादों में रसगुल्ले बनाए थे ! भले आदमी ने एक में तो मिर्ची का स्वाद भी डाल दिया था ! उत्सुकतावश कुछ दिन तो बहुत हो-हल्ला रहा फिर धीरे-धीरे उनके प्रति लोगों का रुझान कम होता चला गया ! कुछ लोग समोसे में आलू की जगह मटर, चने, काजू इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं पर जो सनातन बात आलू भरे समोसे की होती है वह दूसरी चीजों से नहीं बन पाती ! वही बात रसगुल्ले की भी है ! जो बात कोमल, मुलायम, दूधिया रसगुल्ले के स्वर्गिक स्वाद में है, वह और कहाँ ! फिर भी स्वाद बदलने के लिए कुछ दिन, कुछ और सही !  

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

कब और कैसे भारत, इंडिया हो गया

ये तो सिर्फ एक बानगी है कि कैसे, ऐसे कुछ ज्ञानियों ने दूध का दही और दही का रायता बना दिया होगा ! क्यूँ-कब-कैसे धीरे-धीरे कुछ का कुछ हो जाता है, क्या से क्या हो जाता है, महसूस ही नहीं हो पाता ! कब असल एक किनारे हो नए को जगह दे देता है, एहसास ही नहीं होता ! और एक बार चलन में आने के बाद वही असली लगने लगता है ! पुराने को कोई याद भी नहीं करता ! अंग्रेंजों ने अपनी सहूलियत के लिए, कुटिलता से कब, क्यूँ और कैसे भारत को इंडिया बना दिया, हम भारतवासियों को भी यह कहां पता चल पाया..............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

अपने देश में हजारों ऐसे स्थानों या जगहों के नाम सुनने-जानने को मिल जाएंगे जिनका उस स्थान से दूर-दूर का रिश्ता नहीं होता। ना हीं उस नाम के अर्थ से उसका कोई संबंध होता है। फिर ऐसा क्यों ! एक संभावना यह लगती है कि ऐसा जाने-अंजाने, जुबान पर ना चढ़ने वाले कलिष्ट शब्दों के सहजीकरण और बोलने की सहूलियतानुसार हो गया होगा। ऐसी जगहों पर शोध किया जाए तो एक ग्रंथ ही बन जाए। पिछली पोस्ट में दो-तीन अजीबोगरीब शब्दों वाले मुहावरों की बात उठी थी ! उसी बहाव में कुछ ऐसी जगहों के नाम याद आ गए जिनसे मेरा संबंध रह चुका है ! ऐसे ही मेरे दो प्रत्यक्ष-प्रमाणित उदाहरण पेश हैं - 

सबसे पहले तो एक आपबीती ! जिसके याद आते ही आज भी हंसी आ जाती है ! बंगाल के साउथ चौबीस परगना जिले के बज बज इलाके में कैलेडोनियन (Caledonian) नाम की जूट मील थी (आज भी है) । तब मैं नार्थ चौबीस परगना में स्थित कमरहट्टी जूट मील में कार्यरत था। एक बार मैंने अपने क्लर्क को वहां के लिए एक ऑफिशियल पत्र का मजमून बता उसका ड्राफ्ट बनाने को कहा। जब वह लेटर टाइप कर लाया तो उसमें कैलेडोनियन की जगह कालीदुनिया लिखा हुआ था ! मैंने विस्मित हो पूछा, तो वह बोला कि यह नाम कभी सुना नहीं था और आपका उच्चारण समझ नहीं पाया, तो मैंने सोचा यह कालीदुनिया होगा सो......! उस दिन तो ना गुस्सा होते बना ना हीं हँसते, पर आज उस लम्हे को याद कर मुस्कराहट जरूर आ जाती है।

बज बज वही जगह है, जिसके फेरी घाट पर, 19 फरवरी 1897 में शिकागो की अपनी इतिहासिक यात्रा के बाद स्वामी विवेकानंद ने भारत भूमि पर पग धरे थे ! यहीं पर कोमागाटामारु जहाज आ किनारे लगा था 
ऐसा ही एक और उदाहरण ! कोलकाता से लगभग पन्द्रह की.मी. की दूरी पर टीटागढ नामक एक जगह है। यहां एक पेपर मिल भी है। सडक से यह स्थान कोलकाता से जुडा हुआ है। इसी के बाद अगला कस्बा बैरकपुर का है। वही बैरकपुर जो ब्रिटिश काल में अंग्रेजी फौजों का केंद्र हुआ करता था। आज यहां भारतीय सेना की छावनी है। बैरकपुर से कोलकाता के लिए अच्छी-खासी सरकारी व निजी बस-सेवा उपलब्ध है। इनमें निजी बसों के साथ चलने वाले सहायक लडके यात्रियों की सुविधा के लिए बस-स्टापों के नाम जोर-जोर से बोलते रहते हैं। बैरकपुर और टीटागढ के बीच एक बस स्टाप है जिसे ये लडके 'बडा मस्तान' के नाम से पुकारते हैं। जिसका अर्थ होता है, कोई बलशाली या दबंग इंसान या फिर कोई मशहूर पीर या सिद्ध बाबा ! समय के साथ मरणोंपरांत उसकी समाधी या मजार बना दी जाती है। छुटपन में इन सब बातों पर ध्यान कहां जाता है ! पर होश संभालने पर जब कुछ खोज-खबर लेनी चाही तो उस बस-स्टॉप के आस-पास कोई समाधी या मजार का पता नहीं लग पाया। लोगों से जानकारी ली तो भी यही पता चला कि ''ऐसा कोई फकीर यहां हुआ ही नहीं। हां, बस-स्टाप से थोडी दूरी पर एक छोटे से अहाते में एक मंदिर है। उस जगह को ब्रह्म-स्थान के नाम से जाना जाता है।'' तब जाकर ज्ञान-चक्षुओं ने यह रहस्य खोला कि यह ब्रह्म-स्थान ही धीरे-धीरे अनपढ़, नासमझ लडकों की 'नीम-हकीमी' के कारण बडा मस्तान का रूप लेता चला गया।

ये तो सिर्फ एक बानगी है कि कैसे ऐसे कुछ ज्ञानियों ने दूध का दही और दही का रायता बना दिया होगा ! क्यूँ-कब-कैसे धीरे-धीरे कुछ का कुछ हो जाता है, क्या से क्या हो जाता है, महसूस ही नहीं हो पाता ! कब असल एक किनारे हो नए को जगह दे देता है, एहसास ही नहीं होता ! और एक बार चलन में आने के बाद वही असली लगने लगता है पुराने को कोई याद भी नहीं करता ! अंग्रेंजों ने अपनी सहूलियत के लिए कुटिलता से कब, क्यूँ और कैसे भारत को इंडिया बना दिया, हम भारतवासियों को भी कहां पता चल पाया !!!

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जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...