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गुरुवार, 21 मई 2020

फिल्में, जो बाॅटल मूवीज कहलाती हैं

हम सब ने हॉलीवुड मूवीज, बॉलीवुड मूवीज, टॉलीवुड मूवीज के साथ-साथ छोटे परदे यहां तक की मोबाइल के लिए बनने वाली वेब सीरीज जैसी मूवीज का नाम भी सुन रखा है। जिनमें रहस्य, रोमांच, विज्ञान, एक्शन, फिक्शन पर आधारित फ़िल्में बनती आ रही हैं। पर बॉटल मूवीज ! यह कौन सी बला है, जिसके बारे में आजकल अक्सर सुनने को मिल रहा है ! जबकि सुनील दत्त जी ने 1964 में ही ऐसी फिल्म बना दी थी.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
बॉटल मूवीज, यह फिल्म बनाने की सस्ती, तथा दिनों-दिन लोकप्रिय होती विधा है। इसकी पूरी शूटिंग एक ही लोकेशन, घर या कमरे, किसी कार या पनडुब्बी या छोटी सी जगह में पूरी कर ली जाती है। वैसे पहले भी ऐसी फ़िल्में बनती रही हैं, जैसे हिचकॉक की ''डायल एम फॉर मर्डर'', ''रोप''। ''टेप'', ''मिस्ट'' या हमारी सुनील दत्त जी द्वारा बनाई ''यादें'', या फिर बासु चटर्जी का ''एक रुका हुआ फैसला'' या फिर राम गोपाल वर्मा की ''कौन'' या बी.आर. चोपड़ा की ''इत्तेफाक''। सुनील दत्त जी की यादें तो इसलिए भी ख़ास है क्योंकि उसमें पर्दे पर के किरदार में सिर्फ एक ही कलाकार था, जसका साथ निभा रहे थे सिर्फ आवाजें और कैमरा ! अपने समय से बहुत आगे की फिल्म थी वह ! 


देश दुनिया में सैकड़ों ऐसी फ़िल्में बनती रही हैं ! पहले ऐसी मूवीज को प्रयोगात्मक फिल्मों का नाम दिया जाता था। कुछेक को छोड़ दर्शकों की पसंद भी मिली-जुली ही होती थी। कम ही लोग ऐसी फ़िल्में पसंद करते थे, खासकर हमारे देश में। पर आजकल बढती मंहगाई, फिल्म निर्माण में आने वाला अनाप-शनाप खर्च, पैसे की तंगी, ब्याज की उच्च दरें, नायक-नायिकाओं के आकाश छूते पारश्रमिक, टी.वी. जैसे अन्य साधनों की वजह से सिनेमा घरों से दूर होते दर्शकों ने उन निर्माताओं का, खासकर जो वेब सीरीज जैसे मनोरंजन गढ़ते हैं, ध्यान इस ओर दिलाया है। टी.वी. पर दिखने वाले रियल्टी या तथाकथित कॉमेडी शो भी इसी श्रेणी में आते हैं।
एक रुका हुआ फैसला 

कौन 

इत्तेफाक 
फिल्म निर्माण, शो बिजनेस के नाम से भी जाना जाता है ! जहां दिखावा, चकाचौंध, कुछ नवीनता, अनोखापन तथा कुछ अलग सा कर गुजरने की कोशिश अनवरत चलती रहती है। उसी के तहत किसी चतुर, व्यापारपटु व्यक्ति द्वारा लोगों को आकर्षित करने हेतु पुरानी बोतल के लिए एक नया नाम गढ़ फ़िल्मी दर्शकों में उत्सुकता बढ़ा दी हो। पर इसके साथ सच्चाई यह भी है कि पहले की अपेक्षा अब लोगों की रूचि काफी बदल चुकी है और हर तरह की फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग बन चुका है। कई बार तो ऐसी फ़िल्में भारी-भरकम, लक-दक फिल्मों पर भी भारी पड़ जाती हैं।    

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