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मंगलवार, 10 मार्च 2026

क्रिकेट कंमेट्री भोजपुरी में, जिया हो बिहार के लाला 😍

भोजपुरी को 2023 के IPL के दौरान आजमाया गया ! लोगों ने इसका तहे दिल से स्वागत किया। इसी से प्रोत्साहित हो 2025 की चैंपियन ट्रॉफी और उसकी अभूतपूर्व लोकप्रियता के चलते इसने हालिया T-20 में भी अपना स्थान बना लिया ! भोजपुरी की सफलता को देखते हुए साल 2024 के IPL में हरियाणवी ने भी प्रवेश ले लिया और अब अगले IPL में क्रिकेट के दीवाने राजस्थानी भाषा के लिए कहेंगे ''पधारो म्हारे घर'', जी हाँ अब राजस्थानी भाषा भी अपना जलवा बिखेरेगी क्रिकेट कमेंट्री के जरिए ! स्वागत के लिए तैयार रहें..........!

#हिन्दी-ब्लॉगिंग 

क्रि केट ! 1877 में शुरू हुए इस अजीबोगरीब नाम वाले खेल को आँखों देखा हाल मिलने करीब पचास साल लग गए ! वह ऐतिहासिक दिन था 14 मई 1927 का ! इंग्लैंड के एक क्रिकेट खिलाड़ी कम चर्च के पादरी  फ़्रैंकगिलिंगहैम से इंग्लैण्ड के लेटन शहर में चल रहे न्यूजीलैंड और मेजबान एसेक्स काउंटी के बीच चल रहे क्रिकेट मैच की कमेंट्री करने को कहा गया ! कारण यह महाशय एक लोकप्रिय वक्ता थे और उनका सेन्स ऑफ ह्यूमर शानदार था ! जब वे अपना भावहीन चेहरा लेकर प्रवचन करते थे तो सुननेवाले लोटपोट हो जाते थे। बीबीसी पर यह पहली क्रिकेट कमेंट्री थी जो चार किस्तों में आधे घंटे के लिए प्रसारित हुई ! कुछ लोगों ने इसका काफी मजाक बनाते हुए इसका काफी मजाक बनाते हुए शतरंज और बिलियर्ड्स की कमेंट्री शुरू करने की बात भी कह दी। 

शुरुआत हुई 

जो भी हो यहां से शुरू हुई क्रिकेट कंमेंट्री ने एक बहुत लंबा सफर तय किया है ! साठ के दशक के हमारे श्रोताओं को टेस्ट मैचों के दौरान उसका ब्यौरा देने वाले विवरण प्रसारकों, सुरेश सरैया, आनंद सीतलवाड़, ए.एफ.एस. तल्यारखान, पियर्सन सुरिटा, विजी, सुभाष मशरूवाला, नरोत्तम पुरी  जैसे नाम भूले नहीं होंगे ! फिर धीरे से यहां प्रवेश हुआ हिंदी का ! इसको लोकप्रिय बनाने में सुशील दोषी और जसदेव सिंह जी को पूरा श्रेय जाता है ! 

आवाज के जादूगर 
स समय रेडिओ पर सुनाया जाने वाला आँखों देखा हाल अलग तरीके का था ! प्रस्तोता को खेल के साथ-साथ ही मैदान पर चल रही एक-एक बात बतानी पड़ती थी, धन्य थे वे लोग, जो सुनने वालों को एक तरह से अपने साथ मैदान में ले आते थे ! समय बदला टी.वी. की सहायता से श्रोता दर्शक बन गए ! अब कथा वाचकों को अपना ढंग बदलना पड़ा, क्योंकि जो वहां हो रहा है, वह सभी देख पा रहे हैं, इसलिए कमेंटेटर को, अपने प्रस्तुतिकरण में इतिहास, कीर्तिमान, हल्की-फुल्की बातें, व्यंग्य जैसी और बहुत कुछ अन्य विषयों का समावेश करना पड़ता है !

मैदान का विकल्प 

इनकी बिक्री बढ़ जाती थी 
स खेल की शुरुआत से अब तक, करोड़ों रन, लाखों चौके, हजारों छक्के लग चुके हैं ! तीन-तीन स्वरूप आ चुके हैं ! नियम-कायदों-पोशाकों, खेलने के समय, तरीकों, उसके उपकरणों, सब में अभूतपूर्व बदलाव आ गए हैं ! तो जाहिर है कमेंट्री में भी कुछ नयापन आना ही था ! हिंदी और बंगला भाषा में तो तकरीबन पचास के दशक में ही शुरुआत हो चुकी थी। पर खेल की निरंतर बढ़ती लोकप्रियता ने इसका आँखों देखा हाल क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध करवा दिया !

आँखों देखा हाल 
भी हाल में ही क्रिकेट के T-20 विश्व कप की कीर्तिमान जीत के साथ ही दर्शकों-श्रोताओं को एक नया अनुभव देते हुए, देश की सात भाषाओं में इस खेल का विवरण सुनने को मिला ! पर जहां अन्य पांच भाषाओं के वक्ता एक चले आ रहे दायरे में ही बात करते थे, जहां गंभीरता कुछ ज्यादा होती है, वहीं हरियाणवी और भोजपुरी ने एक सुखद बयार की तरह इस माध्यम को अपने चुटीले अंदाज में एक नया आयाम दे और भी मनोरंजक बना दिया ! 
रवि किशन 
भो जपुरी को 2023 के IPL के दौरान आजमाया गया, जिसे प्रस्तुत किया भोजपुरी सिनेमा और भाजपा के सांसद रवि किशन के साथ सौरभ यानी रोबिन सिंह, रवि किशन, शिवम सिंह, सत्य प्रकाश, गुलाम अली, मोहम्मद सैफ ! लोगों ने इसका तहे दिल से स्वागत किया। भोजपुरी में कहें तो इसमें सौरभ सिंह ने गर्दा उड़ा कर रख दिया है ! इसी से प्रोत्साहित हो 2025 की चैंपियन ट्रॉफी और उसकी अभूतपूर्व लोकप्रियता के चलते इसने हालिया T-20 में भी अपना स्थान बना लिया ! भोजपुरी की सफलता को देखते हुए साल 2024 के IPL में हरियाणवी ने भी प्रवेश ले लिया और अब अगले IPL में क्रिकेट के दीवाने राजस्थानी भाषा के लिए कहेंगे ''पधारो म्हारे घर'', जी हाँ अब राजस्थानी भाषा भी अपना जलवा बिखेरेगी क्रिकेट कमेंट्री के जरिए ! स्वागत के लिए तैयार रहें !
सौरभ सिंह 
भो जपुरी व हरियाणवी की कंमेट्री का उद्भव न केवल क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक सुखद, आनंदप्रद व रोमांचक अनुभव है, बल्कि दोनों भाषाओं और संस्कृति के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि है। इनको लोकप्रिय बनाने में सबसे बड़ा योगदान इसके प्रस्तुतकर्ताओं का है ! जिस तरह वे जिंदादिली, सकारात्मकता, अपने खिलाडियों के प्रति सम्मान और विश्वास को ले कर चल रहे खेल का वर्णन करते हैं वह अद्भुत है ! किसी विधा के विभिन्न आयामों की आपस में तुलना करना सही नहीं होता ना हीं न्यायोचित ! पर अभी देखा जाए तो #भोजपुरी की प्रस्तुति सबका मन मोह, सबसे लोकप्रिय हो रही है ! जिसका सारा श्रेय इसके प्रस्तुतकर्ताओं को जाता है।  जिया हो बिहार के लाला 😍

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

भाषाएं, हमें गर्व है इन पर

हर स्कूल में शुरूआती दौर से ही उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के अलावा दो अन्य क्षेत्रों की भाषाएं सीखाने का भी प्रावधान निश्चित तौर पर हो ! देशवासी जितना हो सके अपनी भाषा के अलावा दूसरे प्रांतों की भाषा को भी सीखें ! इंसान तो जितनी भाषाएं सीख सके उतना ही अच्छा है ! हिंदी भाषी तमिल सीखे ! कन्नड़ भाषी पंजाबी जाने ! बांग्ला बोलने वाला पंजाबी समझे ! ओड़िसा में रहने वाले के लिए भोजपुरी समझना मुश्किल ना हो, तो एक दूसरे को समझने का मौका और भाईचारा बढ़ने के साथ-साथ रोजगार के अवसरों में भी निश्चित तौर पर बढ़ोत्तरी होगी.............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

संस्कृत ! हजारों साल पुरानी भाषा ! जिसका अभी भी अस्तित्व है ! पर विडंबना है कि उसी के बारे में तमिलनाडु के उप-मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने कह दिया कि ''संस्कृत एक मृत भाषा है !'' उस कथन को लेकर व्यर्थ सर खपाने से कोई फायदा नहीं है, ऐसे कुंठित और पूर्वाग्रही लोग अपने हित, अपने स्वार्थ के लिए देश, समाज, धर्म, भाषा को बदनाम करते ही रहते हैं ! इनके अलावा दसियों भाषाएं और भी हैं, यदि उनको बोलने वाले भी अपनी-अपनी भाषा को श्रेष्ठ तथा दूसरी को हीन बताने लग जाएं तो ?  उलटे हमें तो गर्व होना चाहिए कि हमारे पास इतनी समृद्ध और सक्षम भाषाएं हैं, जिनमें संसार की सबसे पुरानी तथा जीवित भाषाएं भी सम्मिलित हैं ! 

बात संस्कृत की, जो एक ऐसी “परिमार्जित” भाषा है जिसे भारत के प्राचीन ऋषियों ने अपने विचारों को बेहद सटीक और परिष्कृत तरीके से लोगों तक पहुंचाने के लिए विकसित किया था। संस्कृत वेदों, उपनिषदों और भगवद गीता सहित भारतीय साहित्य के कई महान कार्यों की भाषा रही है। आज वैज्ञानिक इसे कम्प्यूटर और AI के लिए सबसे उपयुक्त भाषा मानते हैं ! ऐसा भी नहीं है कि लोगों ने इसका उपयोग करना बिलकुल बंद कर दिया है, 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में हजारों लोग अभी भी संस्कृत को अपनी मातृभाषा के रूप में प्रयोग करते हैं तथा इसे मुख्य भाषा भी मानते हैं ! 


संसार की सबसे पुरानी दो भाषाएं हैं, पहली संस्कृत तथा दूसरी तमिल ! शोध बताते हैं कि संसार में हाल के वर्षों में संस्कृत के अध्ययन में लोगों की रुचि और ध्यान बढ़ रहा है, क्योंकि दुनिया भर के लोगों में इसके सांस्कृतिक महत्व में दिलचस्पी बढ़ी है। इससे संस्कृत बोलने वालों का एक नया वर्ग उभरा है जो भाषाओं को संरक्षित और बढ़ावा देने का काम कर रहा है ! दूसरी सबसे पुरानी जीवित भाषा है तमिल, जो आज भी करोड़ों लोगों द्वारा उपयोग में लाई जा रही है ! हमें तो इन दोनों पर तो क्या, अपनी हर भाषा पर गर्व है, होना भी चाहिए, इतनी विविधता तथा व्यापकता और कहां है ! 

🙏🙏

पर कुछ लोग इन्हीं बातों को विवादित बना समाज में द्वेष फैलाने का काम करते हैं ! ऐसे लोगों का षड्यंत्र खत्म करने का एक सटीक उपाय यह है कि हर स्कूल में शुरूआती दौर से ही उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के अलावा दो अन्य क्षेत्रों की भाषाएं सीखाने का भी प्रावधान निश्चित तौर पर हो ! देशवासी जितना हो सके अपनी भाषा के अलावा दूसरे प्रांतों की भाषा को भी सीखें ! 

भाषाएं 
इंसान तो जितनी भाषाएं सीख सके, उतना ही अच्छा है ! हिंदी भाषी तमिल सीखें ! कन्नड़ भाषी पंजाबी जाने ! बांग्ला बोलने वाला पंजाबी समझे ! ओड़िसा में रहने वाले के लिए भोजपुरी समझना मुश्किल ना हो ! ऐसा हो जाए तो एक दूसरे को समझने का मौका और भाईचारे के बढ़ने के साथ-साथ रोजगार के अवसरों में भी निश्चित तौर पर बढ़ोत्तरी होगी ! सरकार और शिक्षा विभाग यदि इस बात पर गौर कर कोई ठोस कदम उठाए, तो कई परेशानियां अपने आप खत्म हो जाएंगी !

जय हिंद 
आज भाषा की बात उठी है, तो क्या किसी का ध्यान एक ऐसी विदेशी भाषा की तरफ भी गया है जिसे हमारे देश में कोई नहीं जानता, फिर भी उसका उपयोग धड़ल्ले से डॉक्टरों के नुस्खों में होता है ! जिसे समझना आम इंसान के वश की बात ही नहीं है ! जिसे तकनीकी रूप से एक मृत भाषा मान लिया गया है ! जिसे अब कोई भी अपनी पहली भाषा (mother tongue) के रूप में नहीं बोलता ! जी हाँ ! लैटिन ! इस भाषा का अपने देश में क्या औचित्य है, कोई नहीं बता सकता ! फिर भी जो चला आ रहा है, वह चला आ रहा है ! स्टालिन जैसे लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते ? या फिर अपनी भाषा को दूसरे राज्यों में पढ़वाने के लिए उद्यम क्यों नहीं करते ? 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

विडंबना या समय का फेर

भइया जी एक अउर गजबे का बात निमाई, जो बंगाली है और आप पाटी में है, ऊ बोल रहा था कि किसी को हराने, अलोकप्रिय करने या अप्रभावी करने का बहुत सा रास्ता है। ऐसा कि करे एक और दुसरा समझता रहे कि उसका नुक्सान किसी तीसरे ने किया है.... ! आक्रांत जब तक समझे कि दुश्मन कउन है, तब तक खेला खत्म ! भइया जी उसका बात हमारे पल्ले नहीं पड़ा ! हमको कुच्छो समझे नहीं आया ! इसका का मतलब हो सकता है ?मैं चुप रहा ! सोच रहा था निमाई बहुत आगे जाएगा.................!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कल शाम बालकनी में खड़ा था तभी देखा सामने से बिनोद जा रहा है।  बहुत दिन हो गए थे उसका आता-पता नहीं था, सो आवाज दे डाली। उसने घूम कर देखा, नमस्ते की और घर आ गया। उसके अंदर आते ही मैंने पूछा कि क्या बात है, बहुत दिनों से दिखे नहीं ! उसने कहा ऐसे ही कुछ काम में फंसा था ! मैंने यूंही पूछ लिया कि क्या चुनावों के काम में ?  

''अरे नहीं भइया, ई सब से हम दूरे रहते हैं ! बस थोड़ा-बहुत खोज-खबर रखते हैं ! वइसे इस बार तो सब कुछ बहुते ही गजबे का हो रहा है !

'' क्या ! कैसा गजब ?    

''अरे भइया, आपको तो सब्बे खबर पहले ही मिल जाता है ! वह हंस दिया। 

''अरे फिर भी ! मैंने कुरेदा। 

''भइया जी ! हम चार ठो बचपन का दोस्त हैं ! अभिहें हम सब सुदामा का चा का गुमटी पर बइठे थे। ऊ तीनों निठल्ला हैं। कोई काम-काज नहीं है पर अभी चुनाव में तीनों को अलग-अलग पाटी में काम मिल गया है। थोड़ा पइसा मिला तो चा पाटी कर रहे थे। उनमें एक भगत बन गया है, एक चमचा और एक आपिया............

वह कुछ और बोले उसके पहले ही मैंने टोक दिया, ''कैसी भाषा बोल रहे हो ! सभ्य और समझदार लोग ऐसे शब्दों में बात नहीं करते ! 

मेरी आवाज से बिनोद अपनी गलती समझ तो गया फिर भी सफाई में बोला ''ऊ लोग ऐसे ही बतियाता है !

''कोई गलती करेगा तो तुम भी करोगे ? गलत बात है ! नाम ले कर बात किया करो ! उनको भी समझाओ !

''जी, भइया !

तभी अंदर से चाय आ गई ! माहौल सामान्य हुआ ! मैं अपनी जिज्ञासा रोक नहीं पा रहा था ! पूछ ही लिया !

''इस बार कौन सा गजब का बात देख रहे हो ?

''बहुते है ! पर सबसे बड़का अचरज तो अपना दिल्ली में ही है ! चा का टपरी पर उसी का बात हो रहा था ! देखिए, देश का सबसे बलशाली कुनबा ! जहां का तीन-तीन, चार-चार परधान मंत्री बना ! देश का दूसरा सबसे बड़ा पाटी ! अभी भी सबसे जोरावर परिवार ! पर दिल्ली का जउन सा निर्वाचन छेत्र का सीट का लिस्ट में इन लोगन का नाम है, जहां इ लोग वोट देगा, ऊ छेत्र का वोटिंग मशीन पर इनका पाटी का निशाने ही नहीं है ! तो ई लोग कउन चिन्ह का बटन दबाएगा ? इसी पर सब बहिसिया रहे थे ! 

''पर भइया जी एक अउर गजबे का बात निमाई, जो बंगाली है और आप पाटी में है, ऊ बोल रहा था कि किसी को हराने, अलोकप्रिय करने या अप्रभावी करने का बहुत सा रास्ता है। ऐसा कि करे एक और दुसरा समझता रहे कि उसका नुक्सान किसी तीसरे ने किया है.... ! आक्रांत जब तक समझे कि दुश्मन कउन है, तब तक खेला खत्म ! भइया जी उसका बात हमारे पल्ले नहीं पड़ा ! हमको कुच्छो समझे नहीं आया ! इसका का मतलब हो सकता है ?

मैं चुप रहा ! सोच रहा था निमाई राजनीति में बहुत आगे जाएगा। 

बुधवार, 6 जुलाई 2022

विडंबना, हमारी........देश की

उसे पता ही नहीं चलता कि कब उनमें से ही एक लगने वाले के नीचे से सायकिल की गद्दी खिसक कर हवाई जहाज की सीट आ जाती है ! कब उन्हीं से मांग कर बीड़ी-चाय पीने वाले की दसियों फैक्ट्रियां बन जाती हैं ! कब उसके और "उसके अपने" के बीच कमांडो की फौज आ खड़ी हो जाती है ! वह जुमलों, आश्वासनों और दिखाए जा रहे दिवास्वप्नों से ऐसा सम्मोहित हो जाता है कि उसे आभास ही नहीं होता कि उसकी एकलौती कमीज तो चीथड़ों में बदल गई है पर उसके खेवनहार के शरीर को रेशम सहलाने लगा है.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे देश में कुछ लोग सदा से अनपढ़, अर्धशिक्षित, मूढ़ व भोले-भाले लोगों के अज्ञान और उनकी सरलता का लाभ उठा, उन्हें जाति-धर्म-वर्ण के मायाजाल में उलझा, वर्षों से अपना उल्लू सीधा करते आए हैं। अपनी परिस्थितियों को अपनी नियति मान लेने वाले उनके पिछ्ल्गुओं को कभी यह ख्याल तक नहीं आता कि हमारा भला चाह-चाह कर "दुबले" होने वाले हमारे किसी एक नेता ने भी आज तक क़भी अपने बेटे या बेटी की शादी किसी सर्वहारा से कर उसके परिवार से नाता क्यों नहीं जोड़ा ?  क्यों किसी नेता की औलाद आज तक सेना में नहीं गई ? क्यों नहीं उनके परिवार किसी सदस्य को आम इंसान की तरह किसी नौकरी की तलाश में जूतियां घिसनी पड़तीं ? क्यों जरा सी छींक आने पर भी ये विदेश भागने लगते हैं ? क्यों इनकी संतानें, लायक ना भी हों तो भी, विदेशों में शिक्षा पाने पहुँच जाती हैं ? क्यों इनकी नस्लें देश को अपनी बपौती मान लेती हैं ? क्यों इनके शहजादे ही राजा बनने का हक पा जाते हैं ? क्यों तो बहुत सारे हैं पर धर्म, जाती, भाषा की अफीम में उनको ऐसा गाफिल कर दिया जाता है कि वह सामने वाले की तरक्की को ही अपनी सफलता समझने लगता है !     

उस एक वोट की शक्ति वाले को आश्वासनों के सुनहरे संसार में ऐसा दिग्भर्मित कर दिया जाता है कि वह कुछ देख-समझ ही नहीं पाता ! उसे पता ही नहीं चलता कि कब उनमें से ही एक लगने वाले के नीचे से सायकिल की गद्दी खिसक कर हवाई जहाज की सीट आ जाती है ! कब उन्हीं से मांग कर बीड़ी-चाय पीने वाले की दसियों फैक्ट्रियां बन जाती हैं ! कब उसके और "उसके अपने" के बीच कमांडो की फौज आ खड़ी हो जाती है ! वह अपने नेता के जुमलों, उसके आश्वासनों, उसके द्वारा दिखाए जा रहे दिवास्वप्नों में ऐसा सम्मोहित हो जाता है कि उसे आभास ही नहीं होता कि उसकी एकलौती कमीज तो चीथड़ों में बदल गई है पर उसके खेवनहार के शरीर को रेशम सहलाने लगा है !   

ऐसा नहीं है कि किसी ने इनको समझाने की कोशिश नहीं की या ऐसा पहली बार लिखा जा रहा है ! कोशिशें तो बेशुमार हुईं, पर उनको नाकाम करने की पुरजोर कोशिश भी साथ-साथ हुई ! अपना दबदबा, अपनी सियासत, अपना रुआब, अपना राजपाट कौन छोड़ना चाहता है ! गाहे-बगाहे इस टकराव का भीषण परिणाम देश-समाज को झेलना पड़ता रहा है ! उधर जिनके हित के लिए प्रयास किए जाते हैं उन पर धर्म-भाषा-जाति की कॉकटेल का नशा इतना हावी है कि उनकी समझने-विचारने की क्षमता लुप्तप्राय हो गई है ! मदमत्त यही देख-सुन कर आह्लादित होता रहता है कि उसकी जाती-धर्म वाले की हैसियत राज करने वाली है !   

हर बार विभिन्न मंचों से घोषणाएं होती रहती हैं कि अशिक्षा का अंधकार दूर होना चाहिए, किया जाएगा ! पर ऐसा बोलने वाला भी कब चाहता है कि अँधेरा दूर हो ! क्योंकि तम हटते ही उसके खम जगजाहिर हो जाएंगे ! पर कोई भी चीज-समय-परिस्थिति स्थाई नहीं होती ! इसीलिए उस सुबह का आना भी तय है, जब अज्ञानता का अँधेरा छंटेगा, ज्ञान का सूरज सभी दिशाओं को आलोकित करेगा ! शायद थोड़ा सा और इंतजार करना पड़े पर बदलाव आना निश्चित है.......!

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

अपनी भाषा को पहले हमें ही सम्मान देना है

विश्व में केवल संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें सिर्फ  "एक अक्षर, दो अक्षर या केवल तीन ही अक्षरों" से पूरा वाक्य बनाया जा सकता है। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान-सार्थकता" मिलती है। यानी किसी वस्तु की संज्ञा या नाम क्यों पड़ा यह विस्तार से बताती है। जैसे इस विश्व का नाम संसार इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है ! पर विडंबना है कि ऐसी सरल और समृद्ध भाषा को अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लडनी पड़ रही है.............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भाषा अभिव्यक्ति का वह सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम या जरिया है, जिसके द्वारा हम आपस में अपने मनोभावों को, विचारों को व्यक्त करते हैं, एक-दूसरे से जुड़ पाते हैं। यह हमारे समाज के निर्माण, विकास, अस्मिता, सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण साधन है। इसके लिये हमारी वाचिक ध्वनियां सहायक होती हैं, जो शब्दों और वाक्यों का समूह बन एक-दूसरे को अपने मन की बात बताती-समझाती हैं। इसके बिना मनुष्य व समाज सर्वथा अपूर्ण हैं !  

हमारे शोषण के साथ-साथ हमारी धरोहरों, हमारी संस्कृति, हमारे शिक्षण संस्थानों, हमारे इतिहास के अलावा हमारी प्राचीनतम व समृद्धतम भाषा को, भी कमतर आंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई 

जाहिर है समय, परिवेश, स्थितियों के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न तरह की भाषाओं का उद्भव हुआ। मानव के उत्थान के साथ-साथ उसका आरंभिक ''नाद'' विकास करते हुए संपन्न भाषाओं में बदलता चला गया। इस समय सारे संसार में हजारों (अनुमानत: 6809) प्रकार की भाषाएँ, वर्षों से अपनी-अपनी जरुरत के अनुसार बोली जाती रही हैं। इनमें से कई तो हजारों-हजार साल से अपना अस्तित्व बनाए रखे हुए हैं। बहुतेरे देशों ने सिर्फ अपनी भाषा का उपयोग करते हुए भी ज्ञान-विज्ञान, पठन-पाठन में असाधारण प्रगति की है। उन्हें अपनी वाक्संपदा पर नाज है। थोड़ी-बहुत कमी-त्रुटि तो हर चीज में होती ही है, पर इसका मतलब यह नहीं कि दूसरी बोलियां हेय हैं, दोयम हैं ! 

हमारे देश पर सैंकड़ों सालों तक गैरों ने राज किया ! सालों-साल गुलाम रहने का असर हमारे दिलो-दिमाग पर भी पड़ना ही था ! हम अपना सुनहरा अतीत बिसारते चले गए ! हमें शासक और उनके कारिंदों की बातों में ही सच्चाई नजर आने लगी ! इस कुचक्र में कुछ हमारे अपने मतलबपरस्त लोगों का भी योगदान रहा है ! हमार शोषण के साथ-साथ हमारी धरोहरों, हमारी संस्कृति, हमारे शिक्षण संस्थानों, हमारे इतिहास के अलावा हमारी उस प्राचीनतम व समृद्धतम भाषा को, जिसमें हजारों साल पहले हमारे ऋषि-मुनियों ने ज्ञान-विज्ञान तथा जीवन के सार को लिपिबद्ध कर दिया था, उसे भी कमतर आंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई !

हम शुरू से ही सहिष्णु रहे हैं। हमने दुनिया को ही अपना परिवार माना है ! हर अच्छी चीज का स्वागत किया है। दूसरे धर्मों, संस्कृतियों, मान्यताओं को भी अपने में सहर्ष समो लिया है। हमारे इसी विवेक, सहनशीलता, सामंजस्य को कमजोरी मान लिया गया ! अच्छाइयों के साथ बुराइयां भी थोपी जाने लगीं। सबसे ज्यादा नुक्सान अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हुआ, जब उन्होंने अंग्रेजी को कुछ ऐसा आभामंडित कर दिया जैसे वह विश्व की सर्वोपरि भाषा हो ! उसके बिना कोई भी उपलब्धि हासिल ना की जा सकती हो ! देश में उसे रोजगार हासिल करने का मुख्य जरिया बना दिया गया। वर्षों-वर्ष यह गलतफहमी पलती रही ! पर फिर समय आ ही गया जब उन्हें बताना जरुरी हो गया कि समृद्ध भाषा कैसी होती है !

उदाहरण स्वरूप अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर होते हैं। जिन्हें दर्शाने के लिए एक बहुत प्रसिद्ध वाक्य गढ़ उसमें वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित किए गए हैं "THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG" पर वाक्य को पूरा करने के लिए O को चार बार और  A, E, U तथा R को दो-दो बार सम्मिलित करना पड़ा है। इस तरह इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है। भले ही ''टाइप'' करने की सुविधा के लिए ऐसा किया गया हो !

अब संस्कृत का उदहारण लें, 

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:। तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।। 

जिसका अर्थ है कि, पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करने वाला कौन ? राजा मय ! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

इस श्लोक में संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन तो हैं ही वे भी पूरे क्रमानुसार। यह खूबसूरती संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा को छोड़ अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकती ! 

संस्कृत में श्लोक सुनिए, मंत्र सुनिए, भजन सुनिए ! इसके उच्चारणों में वह शक्ति है जो किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकती है ! एकाकार कर सकती है ! सम्मोहित कर किसी और लोक में पहुंचा सकती है। यही अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें केवल "एक अक्षर" से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है। महाकवि भारवि ने अपने काव्य संग्रह किरातार्जुनीयम् में केवल “न” व्यंजन का प्रयोग कर अद्भुत श्लोक की रचना की है जो थोड़े में ही बहुत कह जाती है -

 न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु। नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥

यानी, जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। 

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः। दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः॥ 

अर्थात, दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खंडन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

इसक अलावा सिर्फ दो और तीन अक्षरों से पूरा वाक्य बनाना सिर्फ संस्कृत भाषा में ही संभव है -

कवि माघ ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक की रचना कर डाली -

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे। भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।।

अर्थात, निर्भय हाथी जो कि भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां। दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।।

अर्थात - वह परमात्मा जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव को मारा था। 

ऐसे सैंकड़ों उदहारण मिल जाएंगें जो निर्विवाद रूप से संस्कृत को विश्व की सर्वश्रेष्ठ, व्याकरणिक, तर्कसंगत, वैज्ञानिक, त्रुटिहीन भाषा सिद्ध कर सकते हों। इसीलिए जब संस्कृत को सर्वोपरि कहा जाता है तो उसके पीछे इस तरह के अद्भुत साक्ष्य होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान-सार्थकता" मिलती है। यानी किसी वस्तु की संज्ञा या नाम क्यों पड़ा यह विस्तार से बताती है। जैसे इस विश्व का नाम संसार इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है ! पर विडंबना है कि ऐसी सरल और समृद्ध भाषा को अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लडनी पड़ रही है !

@संदर्भ - अंतरजाल 

विशिष्ट पोस्ट

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