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मंगलवार, 10 मार्च 2026

क्रिकेट कंमेट्री भोजपुरी में, जिया हो बिहार के लाला 😍

भोजपुरी को 2023 के IPL के दौरान आजमाया गया ! लोगों ने इसका तहे दिल से स्वागत किया। इसी से प्रोत्साहित हो 2025 की चैंपियन ट्रॉफी और उसकी अभूतपूर्व लोकप्रियता के चलते इसने हालिया T-20 में भी अपना स्थान बना लिया ! भोजपुरी की सफलता को देखते हुए साल 2024 के IPL में हरियाणवी ने भी प्रवेश ले लिया और अब अगले IPL में क्रिकेट के दीवाने राजस्थानी भाषा के लिए कहेंगे ''पधारो म्हारे घर'', जी हाँ अब राजस्थानी भाषा भी अपना जलवा बिखेरेगी क्रिकेट कमेंट्री के जरिए ! स्वागत के लिए तैयार रहें..........!

#हिन्दी-ब्लॉगिंग 

क्रि केट ! 1877 में शुरू हुए इस अजीबोगरीब नाम वाले खेल को आँखों देखा हाल मिलने करीब पचास साल लग गए ! वह ऐतिहासिक दिन था 14 मई 1927 का ! इंग्लैंड के एक क्रिकेट खिलाड़ी कम चर्च के पादरी  फ़्रैंकगिलिंगहैम से इंग्लैण्ड के लेटन शहर में चल रहे न्यूजीलैंड और मेजबान एसेक्स काउंटी के बीच चल रहे क्रिकेट मैच की कमेंट्री करने को कहा गया ! कारण यह महाशय एक लोकप्रिय वक्ता थे और उनका सेन्स ऑफ ह्यूमर शानदार था ! जब वे अपना भावहीन चेहरा लेकर प्रवचन करते थे तो सुननेवाले लोटपोट हो जाते थे। बीबीसी पर यह पहली क्रिकेट कमेंट्री थी जो चार किस्तों में आधे घंटे के लिए प्रसारित हुई ! कुछ लोगों ने इसका काफी मजाक बनाते हुए इसका काफी मजाक बनाते हुए शतरंज और बिलियर्ड्स की कमेंट्री शुरू करने की बात भी कह दी। 

शुरुआत हुई 

जो भी हो यहां से शुरू हुई क्रिकेट कंमेंट्री ने एक बहुत लंबा सफर तय किया है ! साठ के दशक के हमारे श्रोताओं को टेस्ट मैचों के दौरान उसका ब्यौरा देने वाले विवरण प्रसारकों, सुरेश सरैया, आनंद सीतलवाड़, ए.एफ.एस. तल्यारखान, पियर्सन सुरिटा, विजी, सुभाष मशरूवाला, नरोत्तम पुरी  जैसे नाम भूले नहीं होंगे ! फिर धीरे से यहां प्रवेश हुआ हिंदी का ! इसको लोकप्रिय बनाने में सुशील दोषी और जसदेव सिंह जी को पूरा श्रेय जाता है ! 

आवाज के जादूगर 
स समय रेडिओ पर सुनाया जाने वाला आँखों देखा हाल अलग तरीके का था ! प्रस्तोता को खेल के साथ-साथ ही मैदान पर चल रही एक-एक बात बतानी पड़ती थी, धन्य थे वे लोग, जो सुनने वालों को एक तरह से अपने साथ मैदान में ले आते थे ! समय बदला टी.वी. की सहायता से श्रोता दर्शक बन गए ! अब कथा वाचकों को अपना ढंग बदलना पड़ा, क्योंकि जो वहां हो रहा है, वह सभी देख पा रहे हैं, इसलिए कमेंटेटर को, अपने प्रस्तुतिकरण में इतिहास, कीर्तिमान, हल्की-फुल्की बातें, व्यंग्य जैसी और बहुत कुछ अन्य विषयों का समावेश करना पड़ता है !

मैदान का विकल्प 

इनकी बिक्री बढ़ जाती थी 
स खेल की शुरुआत से अब तक, करोड़ों रन, लाखों चौके, हजारों छक्के लग चुके हैं ! तीन-तीन स्वरूप आ चुके हैं ! नियम-कायदों-पोशाकों, खेलने के समय, तरीकों, उसके उपकरणों, सब में अभूतपूर्व बदलाव आ गए हैं ! तो जाहिर है कमेंट्री में भी कुछ नयापन आना ही था ! हिंदी और बंगला भाषा में तो तकरीबन पचास के दशक में ही शुरुआत हो चुकी थी। पर खेल की निरंतर बढ़ती लोकप्रियता ने इसका आँखों देखा हाल क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध करवा दिया !

आँखों देखा हाल 
भी हाल में ही क्रिकेट के T-20 विश्व कप की कीर्तिमान जीत के साथ ही दर्शकों-श्रोताओं को एक नया अनुभव देते हुए, देश की सात भाषाओं में इस खेल का विवरण सुनने को मिला ! पर जहां अन्य पांच भाषाओं के वक्ता एक चले आ रहे दायरे में ही बात करते थे, जहां गंभीरता कुछ ज्यादा होती है, वहीं हरियाणवी और भोजपुरी ने एक सुखद बयार की तरह इस माध्यम को अपने चुटीले अंदाज में एक नया आयाम दे और भी मनोरंजक बना दिया ! 
रवि किशन 
भो जपुरी को 2023 के IPL के दौरान आजमाया गया, जिसे प्रस्तुत किया भोजपुरी सिनेमा और भाजपा के सांसद रवि किशन के साथ सौरभ यानी रोबिन सिंह, रवि किशन, शिवम सिंह, सत्य प्रकाश, गुलाम अली, मोहम्मद सैफ ! लोगों ने इसका तहे दिल से स्वागत किया। भोजपुरी में कहें तो इसमें सौरभ सिंह ने गर्दा उड़ा कर रख दिया है ! इसी से प्रोत्साहित हो 2025 की चैंपियन ट्रॉफी और उसकी अभूतपूर्व लोकप्रियता के चलते इसने हालिया T-20 में भी अपना स्थान बना लिया ! भोजपुरी की सफलता को देखते हुए साल 2024 के IPL में हरियाणवी ने भी प्रवेश ले लिया और अब अगले IPL में क्रिकेट के दीवाने राजस्थानी भाषा के लिए कहेंगे ''पधारो म्हारे घर'', जी हाँ अब राजस्थानी भाषा भी अपना जलवा बिखेरेगी क्रिकेट कमेंट्री के जरिए ! स्वागत के लिए तैयार रहें !
सौरभ सिंह 
भो जपुरी व हरियाणवी की कंमेट्री का उद्भव न केवल क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक सुखद, आनंदप्रद व रोमांचक अनुभव है, बल्कि दोनों भाषाओं और संस्कृति के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि है। इनको लोकप्रिय बनाने में सबसे बड़ा योगदान इसके प्रस्तुतकर्ताओं का है ! जिस तरह वे जिंदादिली, सकारात्मकता, अपने खिलाडियों के प्रति सम्मान और विश्वास को ले कर चल रहे खेल का वर्णन करते हैं वह अद्भुत है ! किसी विधा के विभिन्न आयामों की आपस में तुलना करना सही नहीं होता ना हीं न्यायोचित ! पर अभी देखा जाए तो #भोजपुरी की प्रस्तुति सबका मन मोह, सबसे लोकप्रिय हो रही है ! जिसका सारा श्रेय इसके प्रस्तुतकर्ताओं को जाता है।  जिया हो बिहार के लाला 😍

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

धोनी के राम बाबू , भारतीय क्रिकेट के सुपरफैन (2)

धोनी बेहतरीन खिलाडियों में से एक हैं, इसमें कोई शक नहीं, पर उनका ईगो भी बहुत बड़ा है ! इसी ईगो के चलते कई बार सही-गलत अफवाहें भी सामने आती रही हैं ! अपने सीनियर खिलाडियों से उनकी ''तनातनी'' कोई दबी-छुपी बात भी नहीं है ! हो सकता है कि सुधीर को देख उन्हें भी अपने लिए भी वैसे ही किसी प्रशंसक की जरुरत महसूस होने लगी हो और सामने राम बाबू को पा कर सुधीर की एक रेप्लिका अपने नाम से क्रिकेट जगत में प्रोजेक्ट कर दी  हो ! हो सकता है कि यह गलत हो, पर लगता तो है.......!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पि छले अंक में भारतीय क्रिकेट के एक तरह से सबसे बड़े फैन सुधीर कुमार चौधरी की बात की थी ! जिनके क्रिकेट के प्रति जुनून ने उनकी जिंदगी बदल दी ! आज इस खेल से जुड़ा हुआ तकरीबन हर खेल प्रेमी उनका नाम जानता है ! आज वैसे ही एक और व्यक्ति की बात ! ये भी सुधीर की तरह ही मैदान की दर्शक दीर्घा में तिरंगा फहराते नजर आते हैं ! ये हैं मोहाली, पंजाब के राम बाबू ! धोनी के प्रशंसक हैं,  उनके द्वारा प्रायोजित किए गए हैं, इसीलिए इनके शरीर पर धोनी का नाम और जर्सी नंबर पेंट किया दिखता है ! 

राम बाबू 

सुधीर कुमार चौधरी 

दु निया में बहुत से लोग, सफल और विख्यात लोगों की सफलता से प्रेरित हो उसी तरह का काम या पेशा अपना लेते हैं ! कुछ सफल भी हो जाते हैं, पर शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि प्रेरित व्यक्ति अपने प्रेरक से भी आगे निकल गया हो ! कुछ ऐसा ही यहां भी है ! सुधीर और राम बाबू में कुछ समानताएं भी हैं ! दोनों ने गरीबी का दंश झेला है ! दोनों के परिवार इनके इस ''शौक'' के खिलाफ  रहे हैं ! दोनों को अपना जुनून पूरा करने के लिए दोस्तों-मित्रो से आर्थिक सहायता लेनी पड़ी है ! दोनों क्रिकेट के सबसे मशहूर खिलाडियों के फैन हैं ! पर सुधीर, राम बाबू से बहुत आगे हैं ! शायद इसलिए कि उन्हें BCCI की स्पॉन्सरशिप हासिल है। साथ ही उनके आदर्श साफ-सुथरी-अविवादित छवि वाले सचिन तेंदुलकर हैं ! दूसरी ओर राम बाबू धोनी द्वारा प्रायोजित हैं, जिन पर कई बार विभिन्न तरह की शंकाएं उठ चुकी हैं ! 

राम बाबू 

ऐसा लगता है कि सुधीर को हर मैच में तिरंगा फहराते, लोगों को उनकी बात करते, खिलाड़ियों के साथ उनकी फोटो को देख, राम बाबू के मन में भी आशा जगी होगी कि इस तरह वह भी मशहूरी प्राप्त कर सकते हैं ! क्रिकेट से उनका लगाव था ही ! कई बार, मैदान के बाहर, प्लेयरों को ले जाने वाली बस के नजदीक या अन्य मौकों पर वह धोनी के नारे लगाते उनका ध्यान अपनी रंगी-पुती आकृति की ओर खींच भी चुके थे ! एक बार धोनी के बुलावे पर उनके घर भी जा चुके थे !

मुलाकात 

क्रि केट के बेहतरीन खिलाडियों में से धोनी एक हैं, इसमें कोई शक नहीं ! पर उनका ईगो भी बहुत बड़ा है ! इसी ईगो के चलते कई बार सही-गलत अफवाहें भी सामने आती रही हैं ! अपने सीनियर खिलाडियों से उनकी ''तनातनी'' कोई दबी-छुपी बात भी नहीं है ! हो सकता है कि सुधीर को देख उन्हें भी अपने लिए भी वैसे ही किसी प्रशंसक की जरुरत महसूस होने लगी हो और सामने राम बाबू को पा कर सुधीर की एक रेप्लिका अपने नाम से क्रिकेट जगत में प्रोजेक्ट कर दी  हो ! हो सकता है कि यह गलत हो, पर लगता तो है। 

उपलब्धि 
राम बाबू और सुधीर को कई और बातें भी अलग करती हैं ! सुधीर ने खेल के प्रति लगाव के कारण शादी तक नहीं की ! उधर राम बाबू ने पत्नी और सातवीं में पढ़ने वाले बेटे तथा उससे एक साल छोटी बिटिया को उनके भाग्य के सहारे छोड़ दिया ! उनकी पत्नी किसी तरह घर चलाती रही हैं ! अपनी अलग पहचान बनाने के बावजूद राम बाबू की किसी तरह की कोई कमाई नहीं है, वह अपनी यात्रा, ठहरना और अन्य जरूरतों के लिए लोगों की सहायता पर निर्भर है ! उनके अनुसार मैच देखने के अलावा जीवन में और कोई योजना नहीं है ! अब धोनी उनको स्पांसर कर रहे हैं, तो यथा संभव कभी-कभी परिवार की सहायता कर देते हैं ! 

दर्शक दीर्घा में 
राम बाबू के धोनी के अलावा किसी और खिलाड़ी से कोई दोस्ताना संबंध नहीं हैं। नाहीं किसी से किसी तरह की आर्थिक सहायता मिलती है ! कभी-कभी मैच का टिकट जरूर मिल जाता है ! दोस्तों और शुभचिंतकों की सहायता से इस 40 वर्षीय क्रिकेट फैन के रहने-खाने-यात्रा संबंधित काम पूरे हो जाते हैं ! यह पूछने पर कि टीवी पर आपको देख क्या परिवार खुश होता है, राम बाबू चुप्पी साध लेते हैं ! फिर मायूसी के साथ बतलाते हैं कि सभी का कहना है कि जब इससे परिवार को कोई सहायता नहीं मिलती तो इस सब का क्या मतलब !

चिंतामग्न 

नको इसका भी कहीं मलाल तो है कि सुधीर को एक ट्रैवल एजेंसी के साथ-साथ और भी कई तरह की स्पांसरशिप मिल चुकी है। पर पता नहीं क्यों उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता ! पर उन्हें इस बात का गर्व भी है कि धोनी उन्हें जानते हैं और मैदान में मैचों के दौरान उनको नजरंदाज नहीं किया जाता ! इसीलिए जब तक शरीर साथ देगा तब तक वे भारतीय टीम के मैचों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहेंगे, आगे ऊपर वाले की मर्जी !

@अंतर्जाल का आभार 

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े सुपरफैन, (1)

देखा जाए तो यह भी एक साधना ही है ! मैच देखने जाने एक एक दिन पहले वह अपने शरीर को भारतीय ध्वज के रंगों से रंग लेते हैं और उस रात को सोते नहीं हैं कि कहीं रंग खराब ना हो जाएं ! वह आमतौर पर अपनी छाती पर तेंदुलकर का नाम लिखते हैं और पीठ पर उनकी जर्सी का नंबर ! वह अपने साथ एक शंख भी रखते हैं, जिसे मैच के खास-खास मौकों पर मैदान में बजाते हैं ! सुद्या के उपनाम से जाने जाने वाले अविवाहित चौधरी सनातनी हिन्दू हैं। अयोध्या राम मंदिर अभिषेक में भी उन्होंने भाग लिया था.......... ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

क्रिकेट से लगाव रखने वाले लोगों ने विदेशी टीमों के साथ हो रहे तकरीबन हर मैच में, तिरंगे रंग में रंगे दो युवकों को बड़ा सा तिरंगा फहराते देखा होगा ! एक की पीठ पर 10 नंबर, जो कभी सचिन की जर्सी का नंबर होता था, और आगे सीने पर तेंदुलकर लिखा होता है। उसी तरह दूसरे की पीठ पर धोनी की जर्सी  का नंबर 7 और आगे धोनी लिखा होता है ! अब तो ये दोनों क्रिकेट के हर मैच  का अभिन्न अंग सा बन गए हैं ! दर्शकों को भी अब इनको देखने की आदत पड़ गई है ! कौन हैं ये दोनों ? इतना जुनून क्यों है इन दोनों का इस खेल के प्रति ? 

 

सुधीर कुमार चौधरी 

राम बाबू 
बिहार के मुज्जफरपुर शहर के ग्रामीण इलाके में 20 फरवरी 1981 में एक अत्यंत गरीब परिवार में एक बालक का जन्म होता है ! नाम रखा गया, सुधीर कुमार चौधरी ! पता नहीं कैसे और क्यों छह साल की छोटी सी उम्र में ही उस पर क्रिकेट का जुनून सवार हो गया और वह सचिन का दीवाना बन गया ! इसी दीवानगी में उसने 14 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी। कहा तो यह भी जाता है कि क्रिकेट के सभी मैच देख सके, इसके लिए उसने अपनी शादी तक स्थगित करवा दी थी ! 
सुद्या 

क्रिकेट की दीवानगी ऐसी थी कि उसके सिवा युवा सुधीर को और कुछ भी ना सूझता था, ना हीं भाता था !भारतीय टीम देश में जहां भी जाती, ये महाशय किसी ना किसी युक्ति से वहां पहुंच ही जाते थे ! अपनी इन सब हरकतों से उसने अपने माता-पिता को बहुत ही नाराज कर दिया था। रोक-टोक जब कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी तो सुधीर ने धमकी तक दे डाली कि अगर उसे मैच देखने से रोका गया तो वह आत्मदाह कर लेगा ! उसने कहा कि उसका जीवन भारतीय क्रिकेट मैच देखने के लिए समर्पित है ! इसके धनार्जन के लिए उसने क्रिकेट प्रेमियों की सहायता ली ! 

समर्पण 

सन 2003 से, चौधरी भारत द्वारा खेले गए हर क्रिकेट मैच को देखते और समर्थन करते आ रहे हैं ! पर यह सब इतना आसान नहीं रहा था ! 28 अक्टूबर 2003 को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सचिन का खेल देखने के लिए उन्होंने 21 दिनों तक साइकिल चलाकर मुजफ्फरपुर से मुंबई तक का सफर तय किया था, और यह त्रिकोणीय सीरीज का पहला मैच था, जहां उन्होंने भारतीय तिरंगा लहराकर भारत का समर्थन करना शुरू किया। पैसों की तंगी के कारण कई बार खतरा मोल लेते हुए ट्रेनों में बिना टिकट यात्रा भी की ! पर मुख्यत: स्टेडियम तक ले जाने के लिए इनकी सायकिल ही साथ निभाती रही ! जैसे कि 2006 में लाहौर और 2007 में बांग्लादेश तक उसी पर चले गए थे ! 2015 में, मीरपुर में इंडिया-बांग्लादेश सीरीज के दौरान, भारत का स्पोर्ट करने खातिर उनकी जान पर बन आई थी, बड़ी मुश्किल से बांग्ला देश की पुलिस ने वहां के उन्मादी दर्शकों से इन्हें बचाया था ! 

वंदे मातरम 

एक बार टीम की जीत का जश्न मनाने के लिए बाड़ फांदने की कोशिश में पुलिस के तेवर झेलने पड़े थे ! ऐसा ही कुछ हुआ, मार्च 2010 में, कानपुर में एक प्रैक्टिस सेशन के दौरान तेंदुलकर से हाथ मिलाने की कोशिश में पुलिस से मार खानी पड़ी ! तेंदुलकर के दखल के बाद उन्हें छोड़ दिया गया, बाद में उन्हें पहचान कर पुलिस ऑफिसर ने उनसे माफी मांगते हुए इस घटना पर अफसोस जताया। अब तक उनकी पहचान बन चुकी थी, लोग जूनून का लोहा मान चुके थे !  इस घटना के बाद, BCCI ने उन्हें इंडियन टीम के हर होम मैच के लिए स्पॉन्सर कर दिया। 

जय हो 
अविस्मरणीय पल 

चौधरी का सपना तब जा कर पूरा हुआ, जब 2, अप्रैल 2011 में, भारत ने मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में फाइनल में श्रीलंका को हराया। तेंदुलकर ने खुद उन्हें, भारतीय ड्रेसिंग रूम में आने और टीम के जश्न में शामिल होने के लिए बुलाया । उन्होंने चौधरी से हाथ मिलाया, उन्हें गले लगाया और अंत में अपने साथ विश्व कप उठाने और फोटो खिंचाने का स्वर्णिम मौका भी दिया ! यह सुधीर के जीवन का सबसे खास समय था।आज भी सचिन उनके ट्रैवल और मैच के टिकट के लिए आर्थिक सहयोग करते हैं ! 

रोहित के साथ 

जीत का जश्न 
देखा जाए तो यह भी एक साधना ही है ! मैच देखने जाने एक एक दिन पहले वह अपने शरीर को भारतीय ध्वज के रंगों से रंग लेते हैं और उस रात को सोते नहीं हैं कि कहीं रंग खराब ना हो जाएं ! वह आमतौर पर अपनी छाती पर तेंदुलकर का नाम लिखते हैं और पीठ पर उनकी जर्सी का नंबर ! वह अपने साथ एक शंख भी रखते हैं, जिसे मैच के खास-खास मौके पर बजाया जाता है ! सुद्या के उपनाम से जाने जाने वाले अविवाहित चौधरी सनातनी हिन्दू हैं। अयोध्या राम मंदिर अभिषेक में उन्होंने भी भाग लिया था ! 

सचिनमय 
सुधीर ने अपनी ज़िंदगी सचिन तेंदुलकर को समर्पित कर दी है ! 2011 के ICC वर्ल्ड कप ट्रॉफी के साथ उनकी और सुपरस्टार की तस्वीरें भारतीय क्रिकेट इतिहास में अपनी जगह बना चुकी हैं। उनकी यात्राएं मशहूर हैं। उन्होंने तेंदुलकर का मैच देखने के लिए 12,000 मील से ज़्यादा साइकिल चलाई है ! फिल्म निर्माता सुश्रुत जैन द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ''बियॉन्ड ऑल बाउंड्रीज'' के तीन प्रमुख किरदारों में से सुधीर भी एक हैं। यह फिल्म भारतीय क्रिकेट के तीन अलग-अलग उन व्यक्तित्वों के निजी जीवन के बारे में जानकारी देती है, जो इस खेल के सबसे बड़े प्रशंसक माने जाते हैं !

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

अनियमितता, एक अनिश्चितताओं से भरे खेल की

क्रिकेट की एक और दिलचस्प खासियत यह है कि इसकी पिच, जिस पर इसे खेला जाता है, उसकी लंबाई और चौड़ाई (22 गज x 10 फिट) तो तय होती है, पर मैदान का आयाम, जो कहीं गोल होता है तो कहीं अंडाकार यानी ओवल शेप में, तो कहीं अनियमित आकार लिए हुए, उसका कोई निश्चित माप नहीं होता ! हॉकी, फुटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन जैसे दूसरे खेलों के मैदानों के आकार या माप जिस तरह तय रहते हैं, वैसा क्रिकेट में नहीं होता ! इस अनिश्चितताओं से भरे खेल में यह एक ऐसी अनियमितता है, जिस पर शायद ही कभी बात होती हो...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग      

इन दिनों एक दिवसीय क्रिकेट की एक बड़ी या कह सकते हैं महा-प्रतियोगिता चल रही है ! अब क्रिकेट का माहौल है तो जाहिर है, उसकी बातें चहुं-ओर होनी ही हैं ! हमारे देश के लोग तो वैसे भी इस खेल के कुछ अतिरिक्त ही दिवाने हैं ! भारत में क्रिकेट को इसके प्रशंसकों द्वारा एक धर्म ही बना दिया गया है, जहां क्रिकेटरों को भगवान की तरह माना जाने लगा है ! ऐसी प्रतियोगिताओं में हजारों-हजार लोग स्टेडियम में हो-हल्ला मचाने तो पहुंचते ही हैं, उनसे कहीं ज्यादा लोग घर में बैठ अपना रक्तचाप और दिल की धड़कनों को अनियमित बनवाते रहते हैं ! ऐसे ही दीवाने अब्दुल्लों के भरोसे टीवी पर इसका सीधा प्रसारण करने वाले अतिरिक्त कमाई की खातिर अपनी दुकान, खेल शुरू होने के दो घंटे पहले ही खोल कर बैठ जाते हैं ! मजे की बात यह है कि उस दुकान पर कुछ ऐसे लोग भी ज्ञान बेचने का मौका पा जाते हैं जिन्होंने अपने समय में हाई स्कूल की परीक्षा भी पास नहीं की होती ! कुछ सदा के फिस्सडी यहां विशेषज्ञ बने नजर आते हैं ! इस खेल की महानता है कि यह अपने से जुड़े किसी भी बंदे को निराश नहीं करता कुछ ना कुछ उपलब्ध करवा ही देता है !  

बात की बात में बात कहां तक चली गई ! बात हो रही थी खेल की ! तो यह खेल अपनी अनिश्चितताओं के लिए प्रसिद्ध है ! यही विशेषता इसे अन्य खेलों से कुछ अलग भी बनाती है ! यह एक मात्र खेल है, जहां अपनी एक भूल को भी सुधारने का कोई और मौका नहीं मिलता, खास कर बैटर को ! आउट....तो.....आउट ! दुनिया के हर खेल में, खेल के दौरान खिलाडियों को अपनी गलती या कहिए गलतियां सुधारने के और भी अवसर मिल जाते हैं पर इस क्रूर खेल में एक गलती हो गई तो बस, सब खल्लास.......! कई बार तो वह एक गलती खिलाड़ी के जीवन भर के कैरियर को ही बर्बाद कर बैठती है ! पर यही क्रूरता इस खेल को और भी लोकप्रिय बनाती चलती है ! ___________________________________________________________________________

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आपकी आँखें हमारे लिए अनमोल हैं 
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क्रिकेट की एक और दिलचस्प खासियत यह है कि इसकी पिच, जिस पर इसे खेला जाता है, उसकी लंबाई और चौड़ाई (22 गजx10 फिट) तो तय होती है, पर मैदान का आकार, जो कहीं गोल होता है तो कहीं अंडाकार यानी ओवल शेप में, तो कहीं अनियमित आकार लिए हुए, उसका कोई निश्चित माप नहीं होता ! हॉकी, फुटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन जैसे दूसरे खेलों के मैदानों के आकार-आयाम जिस तरह तय रहते हैं, वैसा क्रिकेट में नहीं होता ! इस अनिश्चितताओं से भरे खेल में यह एक ऐसी अनियमितता है, जिस पर शायद ही कभी बात होती हो ! हाँ, बाउंड्री 65 मीटर से कम और 90 मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा पुरुषों के क्रिकेट के लिए मैदान का व्यास आमतौर पर 450 फीट (137 मीटर) से 500 फीट (150 मीटर) के बीच और महिला क्रिकेट के लिए 360 फीट (110 मीटर) से 420 फीट (130 मीटर) के बीच होता है।  

वैसे आजकल यह खेल भी पैसा कमाने के अहम जरिए का रूप लेता जा रहा है ! दर्शकों को आकर्षित और रोमांचित करने की तरकीबें खोजी जाने लगी हैं ! भद्र पुरुषों का खेल कहलवाने वाले क्रिकेट का मूल स्वभाव बदलवाया जा रहा है ! इस खेल का बैटिंग वाला पक्ष वो हिस्सा है जो इस खेल को रफ्तार देता है, यही चीज दर्शकों और क्रिकेट प्रेमियों को ज्यादा पसंद भी है ! इसी कारण इस खेल में बैटर का दबदबा बढ़ता चला जा रहा है और बॉलर धीरे-धीरे गौण होते जा रहे हैं ! आज बैटर को ध्यान में रख नियम-कानून बनते हैं ! बैटिंग के लिहाज से पिचें तैयार करवाई जाने लगी हैं ! नियम बनाने वालों का सारा ध्यान खेल के तीनों रूपों में ज्यादा से ज्यादा रन बनवाने और चौके-छक्के लगवाने में ही रहता है ! चलो, बैटर को अपनी गलती सुधारने का मौका भी तो नहीं मिलता है, ऐसी रियायत ही सही ! इससे रोमांच तो बढ़ा ही है ! ठठ्ठ के ठठ्ठ लोग तमाशा देखने उमड़े भी पड़ रहे हैं ! 

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विडंबना है कि मैदान भले ही छोटा हो, पर दर्शक दीर्घाएं और-और बड़ी होने लगी हैं ! जिससे असीमित लोगों को समेटा जा सके ! टिकटों की कीमतें आकाश छूने लगी हैं ! पैसा बरस रहा है ! खेल व्यवसाय बन गया है  ! खिलाड़ी मशीन ! उन पर अब सर्दी-गर्मी-बरसात-धूप-लू, अँधेरे-उजाले किसी भी व्याधि का कोई असर नहीं पड़ता ! इधर खेल अपनी भावना को ले कर अचंभित सा कहीं दुबका पड़ा है !   

मंगलवार, 21 मार्च 2023

पंद्रह-सोलह साल का खेल करियर, नो-बॉल एक भी नहीं........ गजबे है भई

आज उत्कृष्ट विशेषज्ञों, उच्च तकनिकी सुविधाओं, दसियों तरह के उपकरणों के बावजूद जब किसी बॉलर द्वारा खेल के तनाव में कभी एक ओवर में दो-दो, तीन-तीन नो-बॉल या वाइड बॉल हो जाती है,  तो कुछ पहले के इसी खेल के महान खिलाड़ियों की याद बरबस ताजा हो आती है ! जो विभिन्न विषम परिस्थियों में भी बिना किसी विशेषज्ञ की सहायता के त्रुटिहीन खेल को अंजाम दिया करते थे ! क्या लगन थी ! क्या समर्पण था ! क्या ही अनुशासन था ! स्तुत्य हैं.........!
 
#हिन्दी_ब्लागिंग 

खेल तो खेल है ! खेल ही होना भी चाहिए ! पर आज कठिन प्रतिस्पर्द्धा के युग में लोगों की आकंक्षाएँ अपने चरम पर हैं ! किसी को भी हार मंजूर नहीं है ! इसीलिए हर खेल का खिलाड़ी अपने साथ तनाव की गठरी लादे चलता है ! उसी का भार आज जब क्रिकेट के उभरते बॉलरों द्वारा कभी-कभी एक ओवर में दो-दो, तीन-तीन नो-बॉल या वाइड बॉल करवा जाता है, तो कुछ पहले के इसी खेल के महान खिलाड़ियों और उनके त्रुटिहीन खेल की याद बरबस ताजा हो आती है ! क्रिकेट के इतिहास में दुनिया में अब तक पांच ऐसे महान बॉलर हुए हैं, जिन्होंने अपने पूरे करियर में एक भी ''नो बॉल'' नहीं डाला है !  ये गर्व की बात है कि इसमें पहला नाम हमारे सर्वकालीन श्रेष्ठ आलराउंडर कपिल देव का है ! 


* कपिल ने 131 टेस्ट और 225 वनडे खेले हैं, पर कभी एक भी नो बॉल नहीं डाला ! ऐसा करने वाले वे अकेले भारतीय हैं ! वैसे भी उनके पांच हजार (+) रन और चार सौ (+) विकेट का रेकार्ड अक्षुण्ण बना हुआ है ! एक बार गावस्कर ने बताया था कि मैच तो मैच, कपिल ने कभी प्रैक्टिस करते हुए भी नो बॉल नहीं फेंका ! यह दर्शाता है कि खेल के प्रति उनका समर्पण, उनकी लगन व उनका अनुशासन किन ऊंचाइयों तक पहुँच चुका था !


* इसमें दूसरे स्थान पर हैं, इंग्लैण्ड के इयान बॉथम ! उन्होंने अपने सोलह साल के करियर में 102 टेस्ट और 116 वन-डे खेले पर कभी अमान्य बॉल नहीं फेंकी !


* तीसरे स्थान पर हमारे पड़ोसी इमरान खान का नाम है ! उन्होंने 88 टेस्ट और 175 वन-डे मैचों में कोई नो बॉल नहीं किया !

* इस कड़ी में चौथे स्थान पर आस्ट्रेलिया के तेज बॉलर डेनिस लिली हैं ! उनके 70 टेस्टों में हर बॉल बेदाग रहा था !

* पांचवें स्थान पर वेस्ट इंडीज के लांस गिब्स हैं, जिन्होंने अपने 79 टेस्ट मैचों और तीन वन डे में अपना कोई भी बॉल, नो बॉल नहीं होने दिया ! टेस्ट में 300 विकेट लेने वाले ये पहले स्पिनर हैं ! रन देने के मामले में उन्हें आज भी दुनिया का सबसे कंजूस गेंदबाज माना जाता है !

एक बात और ऐसा नहीं है कि आज के खिलाड़ी किसी बात में दोयम हैं या उनका समर्पण खेल के प्रति कम है ! पर आज इतनी तकनिकी सुविधाएं, सुरक्षा उपकरण, मैदान पर बेहतरीन चिकित्सा सहायता और विशेषज्ञों के उपलब्ध होने के बावजूद खिलाड़ियों के चोटिल हो मैदान से दूर रहने का प्रतिशत पहले की तुलना में बहुत बढ़ गया है ! हो सकता हो इससे भी खेल में ध्यान भटकता हो ! पर स्तुत्य हैं पहले के खिलाड़ी, जो बिना रक्षा उपकरणों और किसी ताम-झाम के उस समय के एंडी राबर्ट्स, मिशेल स्टार्क, जेफ़ थाम्पसन, ब्रेट ली जैसे तेज बॉलरों की आग उगलती 155-160 की गति की बॉलों का सामना करते थे ! जरुरत है उनकी लियाकत, उनके धैर्य, उनके खेल कौशल से सबक लेने की !

@सभी चित्र अंतर्जाल से, साभार 

बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

भगवान सम्हाले ना रहा है, इत्ते दिनों से

अब बखिया काहे को उधेड़नी वह तो उधड़ती ही चली जाएगी ! सूइयां मिलती रहेंगी भूसा कम पड़ जाएगा ! सो बाल को खाल में ही रहने दें ! देश-खेल-समाज तरक्की कर ही रहे हैं ना ! फिर काहे की सर-फोड़ी ! क्यूँ यह सब बेकार की बहस ! क्यूँ फिजूल की बातों का जिक्र ! भगवान है ना ! चला ही रहा है न ! फिर काहे की चिंता............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बार एक जज साहब ने देश की व्यवस्था पर टिप्पणी की थी कि देश को भगवान ही बचा सकता है ! इस पर कईयों की भृकुटि पर बल पड़ गए थे ! पर कोई माने या ना माने, निष्पक्षता से देखा जाए तो हमारे यहां की बहुत सी चीजों का मालिक भगवान ही है ! अब यह जो भगवान होता है वह बहुत दयालु, क्षमाशील व भक्तवत्सल होता है ! इसीलिए अपने बंदों की लायकी-नालायकी को कभी-कभी नजरंदाज कर उन पर कभी कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो जाता है !   

अभी क्रिकेट का मौसम है उसी को देखें, उसे ''कौन'' चला रहा है ! देश की क्रिकेट टीम की बागडोर एक ऐसे कप्तान के हाथों में है, जो 2011 से 140 बार अपनी घरेलू टीम, बेंगलुरू का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद, एक बार भी उसे ट्राफी नहीं दिला पाया ! पर ऊपर वाले की कृपा से पहलवान है !

भारत की टीम की ''मेंटरिंग'' एक ऐसे इंसान की झोली में जा गिरी जो इस बार केआईपीएल के खात्मे होते तक खुद बड़ी मुश्किल से सौ रनों का आंकड़ा छू पाया है ! भले ही इतिहास कुछ भी हो !

रही कोच की बात, तो शायद उसे खुद भी पता न हो कि उसकी किस उपलब्धि पर इतना मंहगा और जिम्मेदारी भरा पद उसे हासिल हुआ पड़ा है ! 

फिर लगता है कि यह सब बेकार की बातें हैं ! भगवान हैं ना ऊपर ! उस पर अटूट भरोसा होना चाहिए ! इस सबसे भी कहीं बड़े-बड़े हादसे उसी की मर्जी से हमारे सामने से गुजरे हैं !

याद है, एक नेता ने अपने पर चालीसा लिखने वाले चापलूस चारण को राज्य सभा में जगह दिला दी थी ! 

अपना नाम तक ना लिख पाने के बावजूद सूबे के भविष्य को निर्धारित करने वाले दस्तावेजों पर प्रभु द्वारा अनुग्रहित किसी के ''हस्ताक्षर'' हुआ करते थे !    

अपने नेता की चप्पल उठा उसके पीछे भागने वाले नेता, के सर पर सालों भगवान की मर्जी से ही तो जूते बरसाते रहे थे !  किसकी शह पर !

पद-नाम-दाम हथियाने के लिए आका के इशारे पर झाड़ू-पौंछा लगाने से भी गुरेज ना करने वाले जनता पर वर्षों रोब गालिब किस की शह पर करते थे ! 

कहावत है कि दिल तक पहुंचने वाला रास्ता पेट से हो कर जाता है पर हमारे यहां तो पेट को तृप्ति दिलाने वाले को देश का सिरमौर ही बना दिया गया था ! अब यह सब प्रभुएच्छा से ही तो संभव हुआ होगा !

किसी एक का भविष्य संवारने के लिए जब लाखों का भविष्य दांव पर लगा दिया जाता है, तो वह एक, प्रभु को प्यारा होगा की नहीं ! 

डाका-लूट-मार के व्यवसाई को जनता की सुरक्षा सौंप दी जाती रही है ! यह सब बिना ऊपर वाले की मर्जी से हो सकता है क्या !

उसका वरद-हस्त सर पर आते ही आम से खास बने जीव की बुद्धि यदि बाकी की आबादी को कैटल यानी भेड-बकरी समझने लग जाए तो इसमें उसका क्या दोष !

कुछ पर तो प्रभु कृपा का ऐसा सैलाब आता है कि वे लोग खुद को उसका सिबलिंग ही समझ, उसी की तरह अपनी मूर्तियां भी गढवाने लग जाते हैं ! खुद ऊँचे आसनों पर बैठ अपने ही जैसों को हिकारत की नजर से देखने लगते हैं ! पर वह भी बड़ा राहबर है सबको काट-छांट कर ही रखता है !   

अब बखिया काहे को उधेड़नी वह तो उधड़ती ही चली जाएगी ! सूइयां मिलती रहेंगी भूसा कम पड़ जाएगा ! सो बाल को खाल में ही रहने दें ! देश-खेल-समाज तरक्की कर ही रहे हैं ना ! फिर काहे की सर-फोड़ी ! क्यूँ यह सब बेकार की बहस ! क्यूँ फिजूल की बातों का जिक्र ! भगवान है ना ! चला ही रहा है न ! फिर काहे की चिंता ! 

इतने बड़े ब्रह्मांड की व्यवस्था, संचालन, रख-रखाव कोई हंसी-खेल तो है नहीं ! थोड़ी-बहुत चूक, विलंब, अनदेखी हो ही जाती है ! परिमार्जन भी तो होता है ! जेलें यूं ही तो नहीं भरी हुईं ! इसलिए मस्त हो, झरोखे पर बैठें और तमाशा देखें ! किसी भी चीज/बात को बहुत गंभीरता से ना लें ! दिल बहुत नाजुक होता है, हो सकता है, भगवान को आने में समय ही लग जाए.......!   

सोमवार, 31 मई 2021

अजीब और विवादास्पद नियम, क्रिकेट के

मान लीजिए एक बल्लेबाज बॉल को कवर, प्वाइंट, मिडविकेट या स्क्वायर लेग जैसी किसी एक जगह धकेल कर एक रन चुराने के लिए दूसरी तरफ दौड़ता है ! उधर फील्डर ने तेजी से बॉल विकेटों पर फेंकी ! बॉल से बचने के लिए बल्लेबाज पॉपिंग क्रीज से पहले जोर से कूदा और बिना जमीन छुए ऊपर ही ऊपर विकेटों को पार कर गया ! तब बॉल विकेटों में लगी तो क्या बल्लेबाज आउट होगा या नॉट आउट ?

#हिन्दी_ब्लागिंग    

क्रिकेट ! दुनिया भर में ना सही पर अनेक देशों का लोकप्रिय खेल ! खासकर हमारे देश का ! पर दुनिया की हर चीज की तरह इसमें तरह-तरह के बदलाव आते रहे हैं ! 1877 में टेस्ट के रूप में पदार्पण के पश्चात आज के तीनों प्रारूपों में ढलने तक इसके नियम-कायदों में अनगिनत बदलावों-सुधारों के बावजूद अभी भी कुछ नियम ऐसे हैं जो अजीबोगरीब और विवादास्पद हैं। 2019 का पिछला इग्लैंड और न्यूजीलैंड का वर्ल्डकप इसका जीता-जागता उदाहरण है ! जब ज्यादा बाउंड्री लगाने वाली टीम को विजेता घोषित कर दिया गया था ! 

ज्यादातर बल्लेबाजी को ध्यान में रख उसके लाभ और सहूलियत के लिए बने ऐसे ही कई नियम-कायदे अभी भी चलन में हैं, जो विवाद का विषय तो बन ही चुके हैं, उन पर कई वरिष्ठ खिलाड़ी और कोच भी अपनी असहमति जता चुके हैं ! आज ऐसे ही कुछ नियमों की खोजखबर !

* एक अजीब सा नियम है कि बॉल यदि विकेटों में लग भी जाए पर बेल्स ना गिरें तो बैट्समैन को आउट नहीं माना जाता ! क्यूं भाई ! बॉलर का उद्देश्य है बॉल को विकेट से टकरवाना ! पहले इतने यंत्र या गैजेट्स नहीं होते थे और मानवीय चूक से बचने के लिए विकेटों पर बेल्स लगाई जाती थीं जिनके गिरने पर पुख्ता तौर पर पता चल सके कि बॉल ने बैट्समैन को परास्त कर  विकेट को छू लिया है। इसमें मुख्य बात थी बाल का विकेट को छूना ना कि बेल का गिरना ! पर यह रूल आज भी वैसे ही कायम है, जबकि आज के जमाने में अत्याधुनिक एलईडी लाइट वाले स्टम्प्स प्रयोग में आते हैं, जिनमें बॉल छूते ही लाल रंग की लाइट जल जाती है ! ऐसे में बेल्स वाला नियम हास्यास्पद ही लगता है।

* ऐसा ही एक अजीब नियम है लेगबाई का ! बॉलर अपनी पूरी कुशलता से बेहतरीन बॉल फेंकता है ! बैट्समैन कोशिश कर भी उसे छू तक नहीं पाता ! पर बॉल जरा सा उसके पैड, जूते या शरीर को छू कर सीमा रेखा के पार चली जाती है तो चार रनों का इनाम मिलता है बल्लेबाज को ! बेचारा बॉलर..... !

* इसी तरह की कोई बॉल बाउंसर के रूप में बैट्समैन को डराती हुई उसे और विकेटकीपर को छकाती हुई सीमा रेखा पर कर जाती है तो बैटिंग करने वाली टीम को चार रन मिल हैं ! जबकि बैट्समैन उस बॉल पर पूरी तरह परास्त हो चुका होता है ! इस नियम ने कई मैचों का परिणाम  बदल कर रख दिया है ! इस पर भी गौर करने की जरुरत है।   

* एक ऐसा ही अजीब सा नियम नो बॉल का है ! खासकर इस खेल के 20 बॉलीय संस्करण में ! यदि किसी बॉलर से नो बॉल हो गई तो बैट्समैन को फ्री हिट मिलती है।  जिसमें वह सिर्फ रन आउट ही हो सकता है, सोचने की बात है कि बॉलर, नो बॉल का खामियाजा तो उस बॉल पर दे ही चुका है ! फिर अतिरिक्त बॉल पर और पेनल्टी क्यों ! वह भी बल्लेबाज के आउट ना होने की कीमत पर !  

* इसी तरह का एक नियम 20-20 के मैचों में पूरी तौर से बल्लेबाज के हित को ध्यान में रख कर बनाया गया है, जो खेल के पहले छह ओवर के पॉवर प्ले में फील्डिंग की सजावट पर प्रतिबंध लगाता है। खेल है ! सबको बराबर का मौका मिलना चाहिए ! बैट्समैन को अतिरिक्त सुविधा क्यों ! और बॉलर से क्या दुश्मनी है !

मान लीजिए एक बल्लेबाज बॉल को कवर, प्वाइंट, मिडविकेट या स्क्वायर लेग जैसी किसी एक जगह धकेल कर एक रन चुराने के लिए दूसरी तरफ दौड़ा ! उधर फील्डर ने तेजी से बॉल विकेटों पर फेंकी ! बॉल से बचने के लिए बल्लेबाज पॉपिंग क्रीज से पहले जोर से कूदा और बिना जमीन छुए ऊपर ही ऊपर विकेटों को पार कर गया ! तब बॉल विकेटों में लगी तो क्या बल्लेबाज आउट होगा या नॉट आउट ?जब आपने 22 गज की पिच को एक रन का मानक मान लिया है और बैट्समैन पॉपिंग क्रीज को पूरा पार कर लेता है तो बैट का जमीन को छूना अनिवार्य क्यों ! मुद्दा तो 22 गज को पार करना है, वह हो गया तो फिर भले ही बैट हवा में हो, दूरी तो पूरी कर ही ली गई ना ! शुरूआती दिनों में उपकरणों की अनुपस्थिति में बैट और जमीन के सम्पर्क का मामला समझ में आता है पर आज जब एक-एक मिलीमीटर का हिसाब दिखने-मिलने लगा है तो इस बेतुके नियम को भी आउट कर देना चाहिए ! 

* जबसे क्रिकेट में हेल्मेट का उपयोग होने लगा है तब से खेल में बैट्समैन की बादशाहत सी हो गई है। पर उसी हेल्मेट को खिलाड़ी का एक अंग ही माना जाता है यदि अंपायर को लगता है कि बॉल के विकेटों पर जाने में हेल्मेट बाधक था तो वह बैट्समैन को आउट दे सकता है ! कहते जरूर हैं LBW पर खेल में पूरे शरीर को ही बाधक BBW (body before wicket) मान कर ही निर्णय दिया जाता है।

* शायद बहुत से क्रिकेट प्रेमियों को पता ना हो कि अंपायर बैट्समैन को तब तक आउट घोषित नहीं कर सकता जब तक विपक्षी टीम अपील ना करे ! आज के हो-हल्ले वाले आक्रामक खेल के जमाने में यह नियम बचकाना सा लगता है।   

* आज बैट्समैन की सुरक्षा के लिए तरह-तरह के उपकरण खेल में इस्तेमाल होते हैं ! नजदीकी फिल्डर को भी हेल्मेट पहनने की इजाजत है पर यह जान कर आश्चर्य होता है कि कोई भी फील्डर तेज गति से आती बॉल से अपने हाथों को बचाने के लिए ग्लव्स नहीं पहन सकता ! यदि वह ऐसा करता पाया जाता है तो विपक्षी टीम को पांच रनों से नवाजा जा सकता है ! ऐसा क्यूँ भई ! बैट्समैन की चोट, चोट है बाकियों की.......!

* आजकल वैसे तो रनर का चलन बहुत कम हो गया है, पर उसके लिए भी एक नियम है कि रनर को उतना ही जिरह-बख्तर, यानी बैट्समैन के बराबर के उपकरण धारण करने होंगे, जिनसे समानता बनी रहे ! पर यदि बैट्समैन का वजन 100 किलो हो और उतने भार का कोई अन्य खिलाड़ी ना हो तो ! 

* प्रसंगवश एक अनोखी और सबसे धीमी हैट्रिक की बात। घटना है 1988-89 में ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज के बीच हुए दूसरे टेस्ट मैच की। जिसमें मर्व ह्यूज को बड़े अजीबोगरीब तरीके से अपनी हैट्रिक पूरी करने का मौका मिला था। ह्यूज ने अपने छत्तीसवें ओवर की अंतिम बॉल पर एक विकेट लिया। फिर जब उसे दोबारा बॉलिंग का अवसर मिला तब तक वेस्ट इंडीज का आखिरी विकेट ही बचा था, जिसे ह्यूज ने अपने सैंतीसवें ओवर की पहली बॉल पर आउट कर दिया। फिर दूसरी पारी के अपने पहले ओवर की पहली बॉल पर उसे फिर विकेट मिला ! इस तरह दो पारियों और तीन ओवरों में दुनिया की यह अनोखी हैट्रिक पूरी हुई। क्या अजीब नहीं लगता कि ऐसे मामलों पर कोई ठोस नियम लागू नहीं होते !        

इन सब के अलावा भी कई विवादित नियम हैं, जैसे फेक फिल्डिंग नियम ! बॉल को विकेट पर जाने से रोकने के लिए बैट का उपयोग क्योंकि एक बैट्समैन का मुख्य उद्देश्य अपना विकेट बचाना ही होता है ! टोपी, रुमाल भी विकेट पर गिर जाए तो आउट, इत्यादि, इत्यादि ! जिन्हें आज के समयानुसार बदले या सुधारने की  जरुरत है ! 

शनिवार, 1 मई 2021

क्रिकेट और कोरोना

जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन ही सबसे जरुरी है। आज मीडिया पर हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! ऐसी सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, किसी को भी हार की कगार पर ले जा सकता है.........!

#हिन्दी_ब्लगिंग 

अभी देश में क्रिकेट और कोरोना दोनों का दौर जारी है। कुछ लोग भले ही क्रिकेट को भी एक तरह की बिमारी ही मानते हों पर वैसे इसमें और कोरोना में दूर-दूर का कोई रिश्ता नहीं है ! पर कुछ ऐसी बातें हैं, जो कोरोना से बचाव में  क्रिकेट के खेल से समझी या सीखी जा सकती हैं ! 

क्रिकेट में जीतने के लिए सबसे बड़ी अहमियत रन बनाने की होती है। उन्हीं के कमी-बेशी से हार-जीत निर्धारित की जाती है। रन बनाने के लिए जो दो चीजें सबसे जरुरी होती हैं उनमें पहला है चुस्त शरीर ! जो अपनी तेज निगाहें, दिमाग और बाकी शरीर के अवयवों के ताल-मेल, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता से खेल को अपने पक्ष में करने में अहम् भूमिका  निभाता है। दूसरा है बैट। विशेषज्ञ द्वारा अच्छी तरह तराशा गया हर मानक पर खरा उतरने वाला बेहतरीन मजबूत लकड़ी से बना बल्ला ! बस इन दोनों के अलावा और जो कुछ भी ताम-झाम होता है वह सब गौण है। फिर वह चाहे ग्लव्स हों ! पैड हों ! गार्ड हों ! हेल्मेट हो ! जूते हों या कुछ भी ! यह कोई मायने नहीं रखता कि आपने किस कंपनी के पैड, ग्लव्स या जूते पहने हैं ! उनकी लाइनिंग कैसी है ! उनकी पैडिंग नरम रबर की है या स्पंज की ! यह सब चीजें एक अतिरिक्त आत्मविश्वास जरूर देती हैं जो निश्चिन्त हो खेलने में सहायक होता है ! पर इनके बिना भी रन बनाए जा सकते हैं जो सिर्फ और सिर्फ बल्ले और शरीर के तालमेल से ही संभव है। 

जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन सबसे जरुरी है। इनके अलावा सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, हार की कगार पर ले जा सकता है।आज मीडिया पर कोरोना से लड़ने के सैंकड़ों उपायों की बाढ़ सी आई हुई है ! हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए, डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! आम इंसान इतना डरा और आतंकित है कि वह हर ऐसे इलाज को, बिना उसका परिणाम जाने, बिना उसकी प्रामाणिकता परखे, बिना सोचे-समझे उसे आजमाने को तत्पर हो जाता है ! जबकि ऐसे अभी तक बताए जा रहे नुस्खे, भले ही किसी भी पैथी के हों, रोग को हराने में कारगर नहीं हैं। इनसे शरीर को कुछ अतिरिक्त सुरक्षा भले ही मिल जाती हो ! रोग से लड़ने में सहायक भले ही हो जाते हों, पर रोग मुक्ति दिलाना अभी इनके बस का सिद्ध नहीं हुआ है। आज जब यह भयंकर बिमारी पूरी तरह से अभी तक बेकाबू है तो ऐसे में कुछ भी उपाय कर लेना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। 

इसलिए रोग से मुक्त होने के लिए सरकार और डॉक्टरों द्वारा जारी निर्देश ही एकमात्र उपाय हैं ! यदि आप कोई और भी उपाय कर रहे हैं तो करें, हो सकता है कि उससे आत्मविश्वास में वृद्धि हो पर ''प्रोटोकॉल'' का पालन भी जरूर करते रहें ! किसी भी हालत में उसे दरकिनार ना करें ! क्योंकि यही वह बल्ला है जो इस खेल में आपको जीत दिला सकता है !  

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

बॉक्सिंग डे, जिसका बॉक्सिंग के खेल से कोई लेना-देना नहीं है

बॉक्सिंग डे को मनाने का कोई बहुत ही कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो  इसे अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है.......................!

भारत ने अब तक 14 बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच खेले हैं और इनमें से दस में उसे हार का सामना करना पड़ा. उसने केवल एक मैच जीता है जबकि तीन अन्य ड्रॉ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में वह सात बॉक्सिंग डे टेस्ट का हिस्सा रहा और इनमें से पांच मैचों में उसे हार झेलनी पड़ी. जबकि दो मैच का कोई रिजल्‍ट नहीं निकला.
#हिन्दी_ब्लागिंग    
बॉक्सिंग डे, यानी अवकाश दिवस ! इसका बॉक्सिंग के खेल से दूर-दूर का भी संबंध नहीं है। इसे एक धर्मनिरपेक्ष उत्सव कहा जा सकता है। जो 26 दिसम्बर को मनाया जाता है। पर इस दिन कई देशों में तरह-तरह के खेलों की शुरुआत होने और मिलते-जुलते नाम की वजह से ऐसा लगता है कि शायद बॉक्सिंग के खेल से इसका नाता हो। जबकी ऐसा नहीं है ! ब्रिटेन और उसके शासित देशों में इसकी परंपरा रही है। जो अब अन्य जगहों पर भी फ़ैल गयी है।  पहले इस दिन क्रिसमस के दूसरे दिन  जरूरतमंदों, बेसहारा सर्वहारा लोगों के लिए आवश्यक वस्तुओं को डिब्बे में बंद कर चर्चों के सामने रख देने की परंपरा थी। जिससे किसी को किसी के सामने शर्मिंदगी का एहसास ना हो। पर समय के साथ-साथ अब उस परंपरा के साथ-साथ इसने खरीदारी के उत्सव का रूप ले लिया है। इस दिन लोग जम कर सामान खरीदते हैं इसलिए दुकानदार भी लुभावने प्रस्ताव पेश करने में पीछे नहीं रहते। एक तरह से यह दिन  शॉपिंग डे में तब्दील हो गया है।  

तक़रीबन रोमन काल से चली आ रही इस परिपाटी के बारे में कुछ ज्यादा स्पष्ट नहीं है, पर इस दिन हर जगह ग़रीबों, जरूरतमंदों को धन या अन्य दान दे कर उनकी सहायता करने का चलन रहा है। इस दिन चर्चों के बाहर जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुओं को डिब्बों में बंद कर उन्हें जरुरतमंद-बेसहारा लोगों के लिए रख दिए जाता था। इन्हीं के साथ वहीं कुछ खाली बॉक्स भी सेंट स्टीफेन की दावत के नाम पर कुछ रकम इकट्ठी करने के लिए रख दिए जाते थे। इन्हीं बॉक्सों या डिब्बों के लेन-देन के कारण इस दिन को बॉक्सिंग डे के नाम से जाना जाने लगा है। 

इसको मनाने का कोई बहुत ही अनिवार्य या कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो बॉक्सिंग दिवस अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है।
इस दिन कई खेलों के शुरू होने का चलन रहा है। उसी में क्रिकेट भी शामिल है। इस बार भी हम आस्ट्रेलिया के दौरे पर हैं और बॉक्सिंग डे पर ही, एक मैच से पीछे चल रही हमारी टीम को दूसरा टेस्ट मैच खेलना है। हमारा इस दिन खेले गए मैचों का रेकॉर्ड बहुत ही "गरीब" रहा है !  हमने अब तक इस दिन आस्ट्रेलिया के साथ आठ, द. अफ्रीका के खिलाफ पांच और न्यूजीलैंड के साथ एक मैच खेला है। जिसमें दो में ही जीत मिल पाई हैं ! नौ में हार तथा तीन बेनतीजा रहे हैं। इस बार अपने देश के क्रिकेट प्रेमी यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। 
आमीन !!

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