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शुक्रवार, 22 मई 2026

हल्की आंच पर भुनते खोवे के धुएं ने कइयों के भूत उतार दिए

जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा, तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! फिजा में बदलाव साफ नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! कर्कशता की जगह जुबान में चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां-संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग   

बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी जिसमें पाठशाला के शिक्षक, श्रेष्ठि और रसूखदार लोगों के उद्धंड व बिगड़ैल बच्चों को दंडित ना कर उनके चापलूस, मतलबपरस्त, पिच्छलगु दोस्तों को छड़ियाते थे, इससे वे नवाबजादे भी डर कर सही राह पर आ जाते थे ! आज की राजनीती में भी ऐसी ही सजा की जरुरत थी, पर पता नहीं उसको इतने दिनों तक लागू क्यों नहीं किया गया ! 

ताड़ना भी जरुरी है 
अभी कुछ दिनों पहले तक अलग-अलग दलों के चरणचाटू प्रवक्ताओं के कार्यकलापों और उनकी बेलगाम जुबान से झरते शूलों को देश की जनता बड़ी हैरत से देख-सुन रही थी ! अचंभित इसलिए थी कि अपने झूठे, मक्कार, सत्तालोलुप, सजायाफ्ता आकाओं के बचाव में ये लोग बिना किसी शर्म व लिहाज के दिन-रात तरह-तरह के झूठे निरेटिव गढ़ते रहते थे ! कुछ तो इतने धूर्त और कुटिल थे कि जनता को कुनैन भी चीनी में लपेट कर दिया करते थे ! अपने हित-स्वार्थ और आम जनता को बहकाने के लिए इन बेशउरों ने बड़े-बड़ों की माँ-बहनों की बेइज्जती करने के बाद देश की न्यायपालिका तक की मर्यादा पर भी लांछन लगा दिए थे आम नागरिक जो अपने संस्कारों के साथ जीता है, जिसमें अभी भी बड़े-छोटे की लिहाज है, जो पद की गरिमा, उसकी मर्यादा समझता है, हैरान और अचंभित था कि संबंधित संस्थाएं इतना सब होने पर भी चुप क्यों है ! ऐसा भी क्या धैर्य ? आम और खास के लिए न्याय  मानदंड क्यों ? 
दिनचर्या 
होता क्या था कि जैसे जीभ कुछ भी बकवास कर खुद तो मुंह में दुबक जाती है और इसके परिणाम स्वरूप सिर को जूते खाने पड़ते हैं, वैसे ही कोई भी बड़बोला प्रवक्ता सच की तरफ से आंखें मूंदे कुछ भी अनर्गल बोल खुद तो किनारे हो जाता था, पर उसकी बदजुबानी का दोष कमोबेश उसके आका पर ही लगता था कि उसी की शह पर यह सब कहा जा रहा है ! फिर कुछ विरोध-सिरोध होने पर माफी-वाफी का नाटक होता था और बात आई-गई हो जाती थी ! इससे उन प्यादों की जुर्रत बढ़ती ही चली जाती थी ! 

आंखों पर अंकुश, जुबान बेलगाम 
फिर समय बदला ! पर वे अराजक, उच्श्रृंखल, बदजुबान वाले भूल गए कि अब किसका राज है ! ऐसे में जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! 
 

फिजा में भी जरा-जरा ही सही, बदलाव नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! आवाज में कर्कशता की जगह चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां, संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ! वार्तालाप के विषय बदल गए है ! अच्छा है समय रहते समझ आ गई ! वैसे इतिहास भी यही बताता आया है कि घमंड, अहम, गरूर तो किसी का यानी किसी का भी नहीं रहा ! इससे आम इंसान को भी कुछ तसल्ली मिली है ! खुश तो है वह भी, पर सोच भी रहा है कि "शठे शाठ्यं" समय रहते क्यों नहीं होता.........!

@चित्रअंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 19 मार्च 2022

उजड़ता बागीचा और घड़ियाली चमड़े के जूते

वे अपने ठाठ-बाट का, बिना किसी अफसोस या शर्मिंदगी के प्रदर्शन करते हुए अपनी नाकामियों को निर्लज्जता से दूसरों की गलतियों से ढकने की अहमकाना हरकतें करते नजर आने लगे ! ऐसी ही एक जगह किसी ने पूछ लिया, भइया जी, बगीची तो पूरी तहस-नहस हो गई ! भैया जी बोले, क्या फर्क पड़ता है, जमीन तो बाकी है ! तभी एक युवक बोला, भइया जी आपके तो ठाठाम-ठाठ हैं, आपके तो जूतों की रखवाली भी बंदूक वाला करता है ! भैया जी खटिया पर और पसरते हुए बोले, अरे बेवकूफ ये घड़ियाल के चमड़े के जूते हैं, बहुत मंहगे होते हैं, तू तो कीमत का अंदाज भी नहीं लगा सकता ! इतना कह एक जोरदार ठहाका लगा दिया............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बहुत सुंदर बागीचा था। उसमें तरह-तरह के देसी-विदेशी पेड़-पौधे, लता-गुल्म, फूल-पत्तियां करीनेवार लगे हुए थे ! इसका कोई दूसरा उदाहरण देश में कहीं और नहीं था ! इसकी साज-संभार के लिए दसियों निपुण लोग तन-मन-धन से लगे रहते थे। दूर-दूर तक इस बागीचे की सुंदरता और रख-रखाव की ख्याति फैली हुई थी ! पता नहीं कहाँ-कहाँ से लोग इसे देखने के लिए आते थे ! उसकी साज-सज्जा, उसमें उत्पन्न विभिन्न किस्में, उनकी उपयोगिता बागीचे को सदा खास बनाए रखती थीं ! एक तरह से उसको देश की धरोहर माना जाने लगा था ! 
उसकी सुरक्षा और देखभाल के लिए वहाँ काम करने वालों में से ही एक माली को बागीचे के मध्य में एक कक्ष बना कर दे दिया गया था। समय बीतता गया, पुराने लोग एक के बाद एक दिवंगत होते चले गए ! जिसे पहरेदारी के लिए कक्ष दिया गया था, वह भी परलोक सिधार गया पर उसके कुनबे के लोगों ने वह जगह हथिया कर घर और बागीचे दोनों का स्वंय को मालिक और पर्याय घोषित कर दिया ! उनकी दबंगई, अहम, अदूरदर्शिता, अज्ञान देख कर्मठ और समर्पित लोग धीरे-धीरे अलग होते चले गए ! उनकी जगह नाकाबिल, चापलूस, चारण व मतलबपरस्त जैसों का जमावड़ा हो गया ! जो बागीचे का भला चाहते थे उनकी कोई पूछ नहीं थी !
काम उन्हीं लोगों को दिया गया जो जमीन के नहीं, जी-हुजूरी में माहिर थे ! सड़क पर गिट्टी डालने वाले को जमीन पर हल चलाने का काम दे दिया गया ! मच्छर मारने की दवा छिड़कने वाले को पौधों की सुरक्षा संभलवा दी गई ! जिनको काली-पीली दाल का भी फर्क मालुम नहीं था, उन्हें बीजों के अंकुरण की जिम्मेदारी सौंप दी गई  ! बड़बोले मौकापरस्तों को बाड़ की सुरक्षा हेतु तैनात कर दिया गया और तो और जिसके खुद की जमीन उसकी अज्ञानता से बंजर हो गई थी उसे ही बागीचे सौंदर्यीकरण का जिम्मा दे दिया गया  
बागीचे की अब किसी को चिंता नहीं थी ! माली की वर्तमान पीढ़ी इस काम से पूरी तरह नावाकिफ व लापरवाह थी ! खुद तो क्या, वहाँ काम करने वालों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता था ! सिर्फ नाम और दाम की चाहत रह गई थी ! इसका फायदा उठा कुछ भ्रष्ट कर्मचारी लाभ कमाने और अपना घर भरने की ताक में रहने लगे ! कुछ कारिंदों ने तो बागीचे की जमीन के टुकड़े कर उन पर अपना हक जमा लिया ! ऐसे में जो होना था वही हुआ ! बिना उचित रख-रखाव के बागीचे का सौंदर्य नष्ट होने लगा ! बात फैली तो मालिक परिवार ने खुद को बचाते हुए सारी जिम्मेदारी अपने कारिंदों पर डाल दी ! बताया गया कि खाद-पानी ठीक नहीं मिल रहा पर कुछ ही दिनों में हालत सुधर जाएंगे ! बात आई गई हो गई ! कुछ दिनों बाद भी कुछ सुधार ना होता देख, फिर मीटिंग बुलाई गई, कुटिल कारिंदों ने समझा दिया कि औजार वगैरह पुराने हो गए हैं, नए आते ही सब ठीक हो जाएगा ! पर फिर भी सब जस का तस रहा ! समर्पित लोग इस दुर्दशा से परेशान सिर्फ हाथ मलते रह जाते थे ! पर किसी में हिम्मत नहीं थी कि कहे कि मुझे जिम्मेदारी दे दीजिए मैं सुधार ला दूंगा ! ऐसा इसलिए भी क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा कहते ही चरणसेवक व चापलूस यह भ्रम फैला देंगे कि कुछ लोग जिम्मेदारी पा जमीन हड़पना चाहते हैं और कान के कच्चे उनके आका इस बात का विश्वास भी कर लेंगे !  

समय बीतता गया ! बुहाई-चुहाई का मौसम फिर आ गया ! इस बार माली परिवार के एक सदस्य पूरे अहम, दिखावे और ठसक के साथ साज-संभार की जिम्मेदारी ले ली ! सबको बता दिया कि अब मैं ही मुखिया हूँ ! मेरे आते ही आमूलचूल परिवर्तन आ जाएगा ! पर इस भार को संभालने का कारण जमीन की बदहाली की चिंता से ज्यादा उसकी आड़ में अपनी वंश बेल का आधिपत्य बरकरार रखने का भी गुप्त इरादा ही था शायद ! जो भी हो, तन और धन से काम शुरू कर दिया गया ! प्रचार भी खूब किया गया कि इस बार की पैदावार अप्रतिम होगी ! जमीन उर्वरा होते ही सिर्फ स्थानीय लोगों को उसका उपयोग करने दिया जाएगा ! उसकी पैदावार लोगों को मुफ्त दी जाएगी, इत्यादि-इत्यादि ! पर काम उन्हीं लोगों को दिया गया जो जमीन के नहीं, जी-हुजूरी में माहिर थे ! सड़क पर गिट्टी डालने वाले को जमीन पर हल चलाने का काम दे दिया गया ! मच्छर मारने की दवा छिड़कने वाले को पौधों की सुरक्षा संभलवा दी गई ! जिनको काली-पीली दाल का भी फर्क मालुम नहीं था, उन्हें बीजों के अंकुरण की जिम्मेदारी सौंप दी गई ! बड़बोले मौकापरस्तों को बाड़ की सुरक्षा हेतु तैनात कर दिया गया और तो और जिसके खुद की जमीन उसकी अज्ञानता से बंजर हो गई थी उसे ही बागीचे सौंदर्यीकरण का जिम्मा दे दिया गया ! यूं ही नहीं कहा गया कि जिसका काज उसी को साजे और करे तो डंडा बाजे ! सो यहां भी डंडा ही बजता नजर आया......!

कहावत है कि कोई भी काम करते समय नियत भी नेक होनी चाहिए ! आप लोगों को धोखा दे सकते हो पर ईश्वर को नहीं ! और सबसे बड़ी बात, आप जो काम कर रहे हैं उस काम का पूरा इल्म होना चाहिए ! यहां भी यही हुआ ! जुताई-बुताई के दौरान ही एक भयंकर झंझावात आ गया ! अब इन लोगों की अज्ञानता और अदूरदर्शिता के कारण ऐसी परिस्थितियों से निबटने का कोई प्रबंध किया ही नहीं गया था ! लिहाजा बागीचे के दो-तीन पेड़ों को छोड़ बाकी सब कुछ नेस्तनाबूद हो गया ! बिना सोचे-समझे, बिना किसी जानकार के मार्गदर्शन के, बिना परिस्थितियों के आकलन के वही हुआ जो होना था ! सब मटियामेट हो कर रह गया ! 

पर अभी भी किसी ने माली परिवार को गलत नहीं ठहराया ! सारी असफलता का ठीकरा दूसरों के सर फुड़वा दिया गया ! खुद लुटिया डुबोने में अग्रणी रहे गपोड़शखों ने फिर नासमझ आकाओं को आश्वस्त कर दिया कि भविष्य में सब दुरुस्त हो जाएगा ! मालिकों ने भी इस पयाम के साथ बयानवीर सेवकों को गांव-कस्बों की चौपालों पर सैर-सपाटे के लिए भेज दिया ! जहां वे अपने ठाठ-बाट का, बिना किसी अफसोस या शर्मिंदगी के प्रदर्शन करते हुए अपनी नाकामियों को निर्लज्जता से दूसरों की गलतियों से ढकने की अहमकाना हरकतें करते नजर आने लगे ! ऐसी ही एक जगह किसी ने पूछ लिया, भइया जी, बगीची तो पूरी तहस-नहस हो गयी ! भैया जी बोले, क्या फर्क पड़ता है जमीन तो बाकी है ! तभी एक युवक बोला, भइया जी आपके तो ठाठाम-ठाठ हैं, आपके तो जूतों की रखवाली भी बंदूक वाला करता है ! भैया जी खटिया पर और पसरते हुए बोले, अरे बेवकूफ वह घड़ियाल के चमड़े के जूते हैं, बहुत मंहगे होते हैं, तू तो कीमत का अंदाज भी नहीं लगा सकता ! इतना कह जोरदार ठहाका लगा दिया !   

किसी को भी अपनी समझदानी पर ज्यादा जोर डालने की आवश्यकता नहीं है ! शीशे की तरह साफ है कि वे कौन लोग हैं जो अभी भी चाहते हैं कि बागीचे की जिम्मेदारी माली परिवार के पास ही रहे ! घड़ियाली जूते तो सभी को चाहिएं......... और अभी तो बागीचा ही उजड़ा है, जमीन तो बची हुई है ना !    

बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

भगवान सम्हाले ना रहा है, इत्ते दिनों से

अब बखिया काहे को उधेड़नी वह तो उधड़ती ही चली जाएगी ! सूइयां मिलती रहेंगी भूसा कम पड़ जाएगा ! सो बाल को खाल में ही रहने दें ! देश-खेल-समाज तरक्की कर ही रहे हैं ना ! फिर काहे की सर-फोड़ी ! क्यूँ यह सब बेकार की बहस ! क्यूँ फिजूल की बातों का जिक्र ! भगवान है ना ! चला ही रहा है न ! फिर काहे की चिंता............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बार एक जज साहब ने देश की व्यवस्था पर टिप्पणी की थी कि देश को भगवान ही बचा सकता है ! इस पर कईयों की भृकुटि पर बल पड़ गए थे ! पर कोई माने या ना माने, निष्पक्षता से देखा जाए तो हमारे यहां की बहुत सी चीजों का मालिक भगवान ही है ! अब यह जो भगवान होता है वह बहुत दयालु, क्षमाशील व भक्तवत्सल होता है ! इसीलिए अपने बंदों की लायकी-नालायकी को कभी-कभी नजरंदाज कर उन पर कभी कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो जाता है !   

अभी क्रिकेट का मौसम है उसी को देखें, उसे ''कौन'' चला रहा है ! देश की क्रिकेट टीम की बागडोर एक ऐसे कप्तान के हाथों में है, जो 2011 से 140 बार अपनी घरेलू टीम, बेंगलुरू का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद, एक बार भी उसे ट्राफी नहीं दिला पाया ! पर ऊपर वाले की कृपा से पहलवान है !

भारत की टीम की ''मेंटरिंग'' एक ऐसे इंसान की झोली में जा गिरी जो इस बार केआईपीएल के खात्मे होते तक खुद बड़ी मुश्किल से सौ रनों का आंकड़ा छू पाया है ! भले ही इतिहास कुछ भी हो !

रही कोच की बात, तो शायद उसे खुद भी पता न हो कि उसकी किस उपलब्धि पर इतना मंहगा और जिम्मेदारी भरा पद उसे हासिल हुआ पड़ा है ! 

फिर लगता है कि यह सब बेकार की बातें हैं ! भगवान हैं ना ऊपर ! उस पर अटूट भरोसा होना चाहिए ! इस सबसे भी कहीं बड़े-बड़े हादसे उसी की मर्जी से हमारे सामने से गुजरे हैं !

याद है, एक नेता ने अपने पर चालीसा लिखने वाले चापलूस चारण को राज्य सभा में जगह दिला दी थी ! 

अपना नाम तक ना लिख पाने के बावजूद सूबे के भविष्य को निर्धारित करने वाले दस्तावेजों पर प्रभु द्वारा अनुग्रहित किसी के ''हस्ताक्षर'' हुआ करते थे !    

अपने नेता की चप्पल उठा उसके पीछे भागने वाले नेता, के सर पर सालों भगवान की मर्जी से ही तो जूते बरसाते रहे थे !  किसकी शह पर !

पद-नाम-दाम हथियाने के लिए आका के इशारे पर झाड़ू-पौंछा लगाने से भी गुरेज ना करने वाले जनता पर वर्षों रोब गालिब किस की शह पर करते थे ! 

कहावत है कि दिल तक पहुंचने वाला रास्ता पेट से हो कर जाता है पर हमारे यहां तो पेट को तृप्ति दिलाने वाले को देश का सिरमौर ही बना दिया गया था ! अब यह सब प्रभुएच्छा से ही तो संभव हुआ होगा !

किसी एक का भविष्य संवारने के लिए जब लाखों का भविष्य दांव पर लगा दिया जाता है, तो वह एक, प्रभु को प्यारा होगा की नहीं ! 

डाका-लूट-मार के व्यवसाई को जनता की सुरक्षा सौंप दी जाती रही है ! यह सब बिना ऊपर वाले की मर्जी से हो सकता है क्या !

उसका वरद-हस्त सर पर आते ही आम से खास बने जीव की बुद्धि यदि बाकी की आबादी को कैटल यानी भेड-बकरी समझने लग जाए तो इसमें उसका क्या दोष !

कुछ पर तो प्रभु कृपा का ऐसा सैलाब आता है कि वे लोग खुद को उसका सिबलिंग ही समझ, उसी की तरह अपनी मूर्तियां भी गढवाने लग जाते हैं ! खुद ऊँचे आसनों पर बैठ अपने ही जैसों को हिकारत की नजर से देखने लगते हैं ! पर वह भी बड़ा राहबर है सबको काट-छांट कर ही रखता है !   

अब बखिया काहे को उधेड़नी वह तो उधड़ती ही चली जाएगी ! सूइयां मिलती रहेंगी भूसा कम पड़ जाएगा ! सो बाल को खाल में ही रहने दें ! देश-खेल-समाज तरक्की कर ही रहे हैं ना ! फिर काहे की सर-फोड़ी ! क्यूँ यह सब बेकार की बहस ! क्यूँ फिजूल की बातों का जिक्र ! भगवान है ना ! चला ही रहा है न ! फिर काहे की चिंता ! 

इतने बड़े ब्रह्मांड की व्यवस्था, संचालन, रख-रखाव कोई हंसी-खेल तो है नहीं ! थोड़ी-बहुत चूक, विलंब, अनदेखी हो ही जाती है ! परिमार्जन भी तो होता है ! जेलें यूं ही तो नहीं भरी हुईं ! इसलिए मस्त हो, झरोखे पर बैठें और तमाशा देखें ! किसी भी चीज/बात को बहुत गंभीरता से ना लें ! दिल बहुत नाजुक होता है, हो सकता है, भगवान को आने में समय ही लग जाए.......!   

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...