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गुरुवार, 8 जुलाई 2021

सोनू सूद, कुछ कही कुछ अनकही

बहुत से ऐसे लोग हैं जो सर्वस्व देकर भी गुमनाम रहना चाहते हैं, बिना किसी अपेक्षा के समाज की  सेवा करते रहते हैं ! अब राजकुमार राव को ही ले लीजिए, फिल्मों में आए उन्हें ज्यादा समय नहीं हुआ ! धन-यश के मामले में सोनू से कोसों पीछे भी हैं पर उन्होंने भी इस आपदा में बिना किसी शोर-शराबे के पांच करोड़ रुपयों का दान किया ! कितने लोगों को पता चला ! कुछ होते हैं जो देते हैं तो बदले में कुछ अपेक्षा भी रखते हैं ! लब्बोलुआब यह है कि किसी ने चाहे कैसे भी, यदि कुछ दिया तो मुसीबत में किसी जरूरतमंद की सहायता तो हुई ही ! फिर चाहे देने वाले की मंशा कुछ भी हो...................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दो-तीन से लगातार चल रही बरसात की झडी आज सोमवार को जा कर कहीं थमी थी। मौसम सुहाना हो गया था। सुबह के ग्यारह बज रहे थे। कल इतवार की छुट्टी के बाद बाजार खुलने लगे थे। वैसे भी पंजाब के इस कस्बाई शहर मोगा में जरुरत के सामान को छोड़ बाकी दुकानें तकरीबन ग्यारह बजे के आस-पास ही खुलती थीं। लाला शक्ति सागर सूद भी अपनी कपडे की दूकान, बॉम्बे क्लॉथ हाउस, की साफ़-सफाई करवा, सामान वगैरह व्यवस्थित कर बैठे ही थे कि एक युवक दौड़ता हुआ आया और दूर से ही चिल्ला कर बोलने लगा, लालाजी बधाई हो ! पुत्तर दे पेओ बण गए ओ !'' लाला शक्ति सूद ने खुशखबरी सुनते ही अपनी मोटरसाइकिल उठाई और उसी क्षण घर की ओर रवाना हो लिए ! दिन था, 30 जुलाई, 1973, घडी दोपहर के बारह बजा रही थी !
लब्बोलुआब यह है कि किसी ने चाहे कैसे भी, यदि कुछ दिया, तो मुसीबत में किसी जरूरतमंद की सहायता तो हुई ही ! फिर देने वाले की मंशा चाहे कुछ भी हो 
व्यवसाई पिता शांति सागर सूद और शिक्षिका सरोज सूद की दूसरी संतान को सब लाड से सोणा पुत्तर, सोणा पुत्तर कह कर बुलाते थे ! समय के साथ वही संबोधन कुछ बदल कर सोनू हो, बच्चे का नाम ही बन गया ! यह संबोधन सबकी जुबान पर ऐसा चढ़ा कि फिर किसी को कुछ और नाम रखने का कभी विचार ही नहीं आया ! स्कूल-कॉलेज-कर्म क्षेत्र सभी जगह इस नाम ने ही पहचान बनाई ! यहां तक कि 2020 की महामारी रूपी आपदा में तो यह बड़े-बड़े दानवीरों को पीछे छोड़ जन-जन का सगा बन गया !
सोनू सूद नागराज के गेटअप में 
बचपन से ही सोनू को लोगों के आकर्षण का केंद्र बनना और किसी भी तरह चर्चा में बने रहना बहुत भाता था। फिल्मों के प्रति भी उसका बहुत रुझान था । उसके प्रिय कलाकार हॉलीवुड के स्टार सिल्वेस्टर स्टैलोन और अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर थे । उनकी बॉडी बिल्डिंग से प्रभावित हो इसने भी अपने शरीर को वैसा ही बनाने की ठान ली, जिसमें वह सफल भी रहा। एक्टिंग में उसके आदर्श सदा से ही अमिताभ बच्चन रहे।सेक्रेड हार्ट स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही सोनू का रुझान फिल्मों की तरफ हो गया था। पर माँ के अनुशासन के कारण उसने अपनी पढ़ाई जारी रखी और स्कूल के बाद नागपुर के यशवंतराव कालेज से अपनी इलेक्ट्रानिक इंजीनियरिंग की डिग्री भी प्राप्त कर ली पर फिल्मों में काम करने की चाहत कम नहीं हुई ! एक्टिंग का कीड़ा उसे लगातार काटे जा रहा था !

                            https://www.youtube.com/watch?v=PXLzpVpx12A
                                     (सोनू सूद अभिनीत नागराज की विडिओ क्लिपिंग )
एक्टिंग के कीड़े का इलाज सिर्फ मुंबई में ही संभव था ! सो जाना तो बनता ही था ! पर वहां इलाज इतना आसान भी नहीं था ! कहते हैं मुंबई किसी को भी सफलता देने के पहले उसका कठोर से कठोर इम्तिहान लेती है। जिसमें लियाकत होती है वही सफल होता है ! सोनू ने भी कई पापड बेले ! 1999 में तम‍िल फिल्म कल्लाझागर से एक्ट‍िंग डेब्यू किया था ! साल 2001 में शहीद-ए-आजम फिल्म में भगत सिंह के किरदार से बॉलीवुड में एंट्री की थी ! इसके बाद और भी आधा दर्जन से ऊपर फिल्मों में काम किया पर फिर भी कोई ख़ास पहचान नहीं बन पाई। इसी बीच नागराज कॉमिक्स के प्रमोशन के लिए चमकती आँखों और गहरे हरे रंग के कॉस्ट्यूम में एक विज्ञापन फिल्म भी की, जिसको करने का बाद में अफ़सोस भी बहुत हुआ: पर पेट जो ना करवाए वही कम ! आखिर सफलता की देवी मुस्कुराई और युवा, चंद्रमुखी, आश‍िक बनाया आपने, जोधा अकबर, सिंह इज किंग, एक विवाह ऐसा भी, दबंग, आर राजकुमार, गब्बर इज बैक जैसी एक के बाद एक सफल होती फ़िल्में मिलती चली गईं ! मोगा जिले का वही छोटा सा सोनू नाम चल निकला ! पर जहां शोहरत होती है वहां विवाद भी होता है ! सोनू की बढ़ती शोहरत ने भी विवाद को जन्म देना ही था, दिया ! बहुत से लोगों का मानना था कि महामारी के आपातकाल को सोनू ने अपने हक़ में भुनाया ! नाम कमाने के इस मौके को हाथों-हाथ लपका गया ! 

समय के लिए तो अपने लिए भी समय नहीं होता ! वह निर्बाध रूप से चलता रहता है ! इस दौरान बहुत कुछ बदल जाता है ! आमूल-चूल परिवर्तन हो जाते हैं ! पर सोनू की छुटपन से ही चर्चित होने की लालसा में समय के साथ भी कोई बदलाव नहीं आया ! लाइमलाइट में आने का कोई भी मौका उसने नहीं छोड़ा ! चाहे फिल्मों का कोई सीन हो या फिर अपने सहकर्मियों के साथ विवाद ! कुछ लोगों की नज़र में यह बात थी भी ! तो जब ऐसा ही एक अवसर, कोरोना की महामारी के दौरान उसके हाथ लगा, जिसे खूब भुनाया गया ! प्रचार और प्रसार ऐसा हुआ जैसे इस एक अकेले ने ही लोगों की सहायता की हो ! क्योंकि होती है कुछ लोगों में खबरों में बने रहने की लालसा ! कुछ लोगों को यह बात नागवार गुजरी ! पर क्यों यह तो वही लोग जानें ! 

संसार में हर तरह के लोग होते हैं ! बहुत से ऐसे लोग हैं जो सर्वस्व देकर भी गुमनाम रहना चाहते हैं ! बिना किसी अपेक्षा के समाज और लोगों की सेवा-सहायता करते रहते हैं ! अब राजकुमार राव को ही ले लीजिए, फिल्मों में आए उन्हें ज्यादा समय नहीं हुआ ! धन-यश के मामले में सोनू से कोसों पीछे भी हैं पर उन्होंने भी इस आपदा में बिना किसी शोर-शराबे के पांच करोड़ रुपयों का दान किया ! कितने लोगों को पता चला ! कुछ होते हैं जो देते हैं तो बदले में कुछ अपेक्षा भी रखते हैं और कुछ लोग सिर्फ विघ्नसंतोषी होते हैं जो हर अच्छाई में भी बुराई ढूंढने में खपे रहते हैं। लब्बोलुआब यह है कि किसी ने चाहे कैसे भी, यदि कुछ दिया तो मुसीबत में किसी जरूरतमंद की सहायता तो हुई ही ! फिर चाहे देने वाले की मंशा कुछ भी हो ! लोग कुछ भी कहें ! उनका क्या है, वे तो वैसे भी कहते ही रहते हैं !!

शनिवार, 8 मई 2021

...........तो फिर कोरोना का कोई दोष नहीं है

कभी अपने शरीर की  पुकार को सुनने की चेष्टा करें ! उसकी आवाज को समझने की कोशिश करें ! ध्यान रखें कि विश्व में आपके रहने की एकमात्र जगह आपका शरीर ही है ! वही नहीं रहा तो आप भी कहीं के नहीं रहोगे ! अगर आप उसका दस प्रतिशत भी ध्यान रखेंगे, तो उसमें इतनी क्षमता है कि वह आपका सौ प्रतिशत ख्याल रख सके। जिससे आपका वजूद है, जिसकी  वजह से आप दुनिया भर के सुख भोग पा रहे हैं, जिंदगी जी रहे हैं, नाते-रिश्ते निभा पा रहे हैं, तरह-तरह के अनुभव ले पा रहे हैं, उसके साथ ज्यादती ना करें  ! यदि आपने अपने पिछले अनुभवों  से भी कोई सबक नहीं लिया है, तो फिर यदि कुछ होता है तो इसमें कोरोना का कोई दोष नहीं है................!!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दुश्मन यदि जाना-पहचाना हो, उसके तौर-तरीके, शक्ति, आक्रमण शैली आदि का पहले से कुछ आभास हो तो खुद का बचाव तो संभव होता ही है, जीत भी मिल सकती है ! पर दुश्मन पूरी तरह अनजान हो तो यह एक तरह से हमारे ग्रंथों में वर्णित मायावी युद्धों की तरह हो जाता है ! जिससे पार पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है ! यदि पार पा भी लिया जाए तो उसमें इतना समय और जान-माल का नुक्सान होता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज कोरोना वैसे ही मायावी, छल-छद्म से भरपूर खतरनाक दुश्मन की तरह हमारे सामने है। जब तक उसकी कमजोरियों का पता नहीं चल जाता तब तक हमें सौ प्रतिशत सावधान रहने की जरुरत है। पर ऐसा हो नहीं पा रहा ! युवा पीढ़ी के एक बड़े हिस्से की जीवनशैली में आए बदलावों, उनकी लापरवाहियों और कुछ-कुछ गैर जिम्मेदाराना रवैये से हालात काबू में नहीं आ पा रहे हैं ! कारण भी साफ़ हैं ! 

* यदि आप देर रात जागने के आदी हैं ! रात डेढ़-दो बजे के पहले आप को नींद नहीं आती हो ! 
* घर के खाने की बजाय आप रात को एक-डेढ़ बजे मैगी, पास्ता और नूडल्स का सेवन करते हों ! 
* आपकी सुबह दोपहर 11-12 बजे होती हो !
* खाने-नाश्ते का कोई निश्चित समय ना हो ! 
* देर रात चाय कॉफी की लत हो ! 
* आपके 10 x 8 के बंद कमरे में कोई हो न हो फिर भी आपका 45'' टीवी 16-16 घंटे विकिरण फैलाए रखता हो ! 
* आपका मोबाइल सिर्फ नहाते समय आपसे अलग होता हो ! वैज्ञानिकों के अनुसार यह एक नई बिमारी का कारण भी बनने जा रहा है !
* साफ़-सफाई का ध्यान ना रख पाते हों !
* गैर जरुरी चीजों यथा सौंदर्य प्रसाधनों, खिलौनों या विभिन्न कंपनियों की छूट के लालच में आप ऑनलाइन खरीदी करने से खुद को रोक नहीं पाते हों !
* दोस्तों की पार्टियों में जाने से रुक ना पाते हों !
* बिना मतलब बिना काम रात-विरात गाडी में घूमने निकल जाते हों ! 

तो समझ लीजिए कि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कोरोना क्या किसी भी बिमारी को रोकने में सक्षम नहीं होगी ! छोटे-मोटे रोगों के लिए भी आप एक सॉफ्ट टारगेट हैं ! कभी अपने शरीर की  पुकार को समझने की चेष्टा करें ! उसकी आवाज को सुनने की कोशिश करें ! ध्यान रखें कि विश्व में आपके रहने की एकमात्र जगह आपका शरीर ही है ! वही नहीं रहा तो आप भी कहीं के नहीं रहोगे ! उसका आप दस प्रतिशत ध्यान रखेंगे तो उसमें इतनी क्षमता है कि वह आपका सौ प्रतिशत ख्याल रख सके ! जिससे आपका वजूद है जिसकी  वजह से आप दुनिया भर के सुख भोग पा रहे हैं, जिंदगी जी रहे हैं, नाते-रिश्ते निभा पा रहे हैं, तरह-तरह के अनुभव ले पा रहे हैं  उसके साथ ज्यादती ना करें ! यह साबित भी हो चुका है कि अपनी क्षति से हुए नुक्सान की शरीर खुद भरपाई कर सकता है। हल्की-फुल्की कसरत या टहलने से ही रक्तचाप काबू में आ जाता है ! खान-पान सुधरते ही लोग स्वस्थ महसूस करने लगते हैं ! जंकफूड छोड़ते ही पाचन ठीक होने लगता है ! धूम्रपान से दूरी बनाते ही फेफड़े अपनी पूरी ताकत से काम करने लग जाते हैं ! पुरानी आदतें और आरामपरस्ती छूटना आसान काम नहीं है पर यह नामुमकिन भी नहीं है ! सिर्फ दृढ इच्छाशक्ति की जरुरत है ! वह भी अपने भले के लिए !

परंतु यह सब जानने-बूझने के बावजूद यदि आप अपने ही शरीर का ख्याल रखने में कोताही बरतते हैं ! उस पर बदस्तूर ज्यादतियां करने से बाज नहीं आते हैं ! आप बिमारी की गिरफ्त में आ ठीक हो जाते हैं पर ठीक होने के बावजूद अपनी पुरानी आदतों को नहीं छोड़ पाते हैं ! ऐसा कर आप अपने शरीर के प्रति अन्याय तो करते ही हैं साथ ही खुद और अपने परिवार के भी गुनहगार साबित होते हैं ! यदि ऐसा ही रहा तो यह निश्चित मानिए कि आपका शरीर आपके ही विरुद्ध विद्रोह करेगा !  क्योंकि यदि -  

* आपका देर से सोने और उठने का समय अभी भी वैसा ही है ! 
* नहाने-खाने का कोई समय व ठिकाना नहीं है ! 
* सुबह सूर्य कब निकलता है आपको नहीं पता, ना हीं आप उसका कोई फायदा उठाते हैं ! 
* वैसे ही आप दिन भर फोन से चिपके रहते हैं ! 
* टीवी फिर वैसे ही चलता रहता है ! 
* भोजन के समय नाश्ता, शाम चाय के समय भोजन और देर रात कुछ भी उटपटांग अभी भी खाते हैं !
* बाहर से विभिन्न जगहों और जरिये से सामान बदस्तूर अभी भी घर में वैसे ही आ रहा होता है !  
* आपकी दिनचर्या, आपकी लतें, आपके शौक सब पहले की तरह वैसे के वैसे ही हैं ! 
 
जिंदगी की अधिकांश अव्यवस्था का मुख्य कारण सोने-जागने का अनियमित होना ही है ! ऐसे लोगों की दिनचर्या और स्वास्थय तक़रीबन सदा बिगड़ा ही रहता है ! क्योंकि देर रात जागने खर्च हुई ऊर्जा की भरपाई के लिए शरीर कुछ खाने की इच्छा जागृत करता है और उस समय खाया जाने वाले पदार्थ कैसे हो सकते हैं यह कोई भी बता सकता है ! फिर देर से उठने पर जो हड़बड़ाहट रहती है, वह तन-बदन का भरपूर नुक्सान करने से बाज नहीं आती ! 
 
यदि ऐसा है और पिछली बिमारी से भी आपने कोई सबक नहीं लिया है, तो फिर यदि कुछ होता है तो इसमें कोरोना का कोई दोष नहीं है................!!  

शनिवार, 1 मई 2021

क्रिकेट और कोरोना

जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन ही सबसे जरुरी है। आज मीडिया पर हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! ऐसी सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, किसी को भी हार की कगार पर ले जा सकता है.........!

#हिन्दी_ब्लगिंग 

अभी देश में क्रिकेट और कोरोना दोनों का दौर जारी है। कुछ लोग भले ही क्रिकेट को भी एक तरह की बिमारी ही मानते हों पर वैसे इसमें और कोरोना में दूर-दूर का कोई रिश्ता नहीं है ! पर कुछ ऐसी बातें हैं, जो कोरोना से बचाव में  क्रिकेट के खेल से समझी या सीखी जा सकती हैं ! 

क्रिकेट में जीतने के लिए सबसे बड़ी अहमियत रन बनाने की होती है। उन्हीं के कमी-बेशी से हार-जीत निर्धारित की जाती है। रन बनाने के लिए जो दो चीजें सबसे जरुरी होती हैं उनमें पहला है चुस्त शरीर ! जो अपनी तेज निगाहें, दिमाग और बाकी शरीर के अवयवों के ताल-मेल, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता से खेल को अपने पक्ष में करने में अहम् भूमिका  निभाता है। दूसरा है बैट। विशेषज्ञ द्वारा अच्छी तरह तराशा गया हर मानक पर खरा उतरने वाला बेहतरीन मजबूत लकड़ी से बना बल्ला ! बस इन दोनों के अलावा और जो कुछ भी ताम-झाम होता है वह सब गौण है। फिर वह चाहे ग्लव्स हों ! पैड हों ! गार्ड हों ! हेल्मेट हो ! जूते हों या कुछ भी ! यह कोई मायने नहीं रखता कि आपने किस कंपनी के पैड, ग्लव्स या जूते पहने हैं ! उनकी लाइनिंग कैसी है ! उनकी पैडिंग नरम रबर की है या स्पंज की ! यह सब चीजें एक अतिरिक्त आत्मविश्वास जरूर देती हैं जो निश्चिन्त हो खेलने में सहायक होता है ! पर इनके बिना भी रन बनाए जा सकते हैं जो सिर्फ और सिर्फ बल्ले और शरीर के तालमेल से ही संभव है। 

जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन सबसे जरुरी है। इनके अलावा सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, हार की कगार पर ले जा सकता है।आज मीडिया पर कोरोना से लड़ने के सैंकड़ों उपायों की बाढ़ सी आई हुई है ! हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए, डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! आम इंसान इतना डरा और आतंकित है कि वह हर ऐसे इलाज को, बिना उसका परिणाम जाने, बिना उसकी प्रामाणिकता परखे, बिना सोचे-समझे उसे आजमाने को तत्पर हो जाता है ! जबकि ऐसे अभी तक बताए जा रहे नुस्खे, भले ही किसी भी पैथी के हों, रोग को हराने में कारगर नहीं हैं। इनसे शरीर को कुछ अतिरिक्त सुरक्षा भले ही मिल जाती हो ! रोग से लड़ने में सहायक भले ही हो जाते हों, पर रोग मुक्ति दिलाना अभी इनके बस का सिद्ध नहीं हुआ है। आज जब यह भयंकर बिमारी पूरी तरह से अभी तक बेकाबू है तो ऐसे में कुछ भी उपाय कर लेना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। 

इसलिए रोग से मुक्त होने के लिए सरकार और डॉक्टरों द्वारा जारी निर्देश ही एकमात्र उपाय हैं ! यदि आप कोई और भी उपाय कर रहे हैं तो करें, हो सकता है कि उससे आत्मविश्वास में वृद्धि हो पर ''प्रोटोकॉल'' का पालन भी जरूर करते रहें ! किसी भी हालत में उसे दरकिनार ना करें ! क्योंकि यही वह बल्ला है जो इस खेल में आपको जीत दिला सकता है !  

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

लॉयड के एसी के गैरजिम्मेदाराना विज्ञापन में दीपिका-रणवीर

पत्नी रूपी दीपिका अपने ''बेबी पति'' को नया एसी दिखा उसके गुणों का बखान करती है ! बैक्टेरिया वगैरह की बात करते हुए उसके हाथ सेनिटाइज करती है और फिर उसका वह बाहर से आया ''बेबी पति'' अपने जूतों समेत सोफे पर पसर जाता है ! गोयाकि कीटाणु या बैक्टेरिया सिर्फ हाथों में ही रहना पसंद करते हों ! काश दीपिका जी का ध्यान नए एसी के साथ ही बाहर से आए अपने बेबी के जूतों  की तरफ भी जा पाता..............!

https://youtu.be/pi4liCB1O5s

#हिन्दी_ब्लागिंग       

आज जब कोरोना फिर बेकाबू हो कर महामारी का रूप ले रहा है तो ऐसे में सिर्फ सरकार का ही नहीं हर एक देशवासी का फर्ज बनता है कि उस के निरोध के लिए यथासंभव प्रयास किए जाएं। पर ऐसा होता दिखता नहीं ! कुछ लोग, संस्थाएं या उद्योग इसे अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे ! उनके व्यवहार में लापरवाही साफ़ झलकती है ! आज जब हर संभव तरीके और मीडिया के द्वारा लोगों को जागरूक किया जा रहा है, वहीं कुछ ऐसे विज्ञापन भी सामने आ रहे हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि या तो वे इस जागरूकता अभियान को हलके में ले रहे हैं या फिर इसका मजाक सा उड़ा सिर्फ रस्म अदायगी कर रहे हैं ! 

अभी FMEG बनाने वाली एक कंपनी #लॉयड के #एयर_कंडीशनर का विज्ञापन आया है। जिसमें पति रूपी रणवीर घर में घुसते हुए कहता है, ''देखो-देखो मैं आ गया '' ! पत्नी रूपी दीपिका अपने इस ''बेबी पति'' को नया एसी दिखा उसके गुणों का बखान करती है ! बैक्टेरिया वगैरह की बात करते हुए उसके हाथ सेनिटाइज करती है और फिर उसका वह बाहर से आया ''बेबी पति'' अपने जूतों समेत सोफे पर पसर जाता है ! गोयाकि कीटाणु या बैक्टेरिया सिर्फ हाथों में ही रहना पसंद करते हों, कपड़ों-जूतों में नहीं ! काश दीपिका जी का ध्यान नए एसी के साथ ही बाहर से आए अपने बेबी के जूतों  की तरफ भी जा पाता !

यह तो सिर्फ एक बानगी है समाज के एक ऐसे तबके की जिससे जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है। यहां कंपनी ज़रा सी एहतियात बरतअच्छा संदेश दे सकती थी। वहीं ''फिल्मवाले पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं'' वाली छवि को बदल सकते थे दीपिका और रणवीर जरा सी समझदारी दिखा ! संदेश भी अच्छा जाता, लोगों में जागरूकता बढ़ती ! क्योंकि बहुत से घरों में, बाहर या स्कूल से आए, ऐसा करते बच्चों पर ध्यान कम ही दिया जाता है ! बच्चे ही क्यों बहुत से वयस्कों का भी यही हाल है, जूते लेकर पूरे घर में मंडराते रहते हैं ! हो सकता है ऐसों को अपनी गलती का एहसास हो जाता, खासकर इन कठिन दिनों के दौरान ! इसके साथ ही इन दोनों की छवि और लोकप्रियता में भी इजाफा ही होता ! अब क्या कहा जाए ! जो है वह तो हइए है ! सभी को खुद ही अपनी हिफाजत करनी है और करनी पड़ेगी ही !

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

आ बैल (कोरोना) हमें मार

कुछ लोगों को सही मायनों में जान की कीमत नहीं पता ! बिमारी की चपेट में आने पर पहले की बंदिशें नहीं सहीं ! नाहीं ऐसे  लोगों को अपनों को खोने के दर्द का एहसास है ! इन्हें सिर्फ अपनी मौज-मस्ती और तफरीह से मतलब है ! लेकिन यह सारा अनुभव तभी संभव है, जब तक इंसान जिंदा है, जिंदगी कायम है ! तमाम सावधानियों और दवा के भी पहले ऐसे लोगों पर लगाम कसना जरुरी है ! कहने में अच्छा नहीं लगता, शब्द भी कटु हैं, पर ऐसे लोग एक तरह से अपने परिवार के अलावा समाज और देश के भी दुश्मन कहे जा सकते हैं.......!!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना ! एक अभूतपूर्व तक़रीबन लाइलाज महामारी, जिससे पूरा विश्व सकते में आ गया, लाखों जाने गयीं, करोड़ों लोग चपेट में आ गए ! अनगिनत लोगों की जीविका नष्ट हो गई ! दसियों देशों की अर्थव्यवस्था भू-लुंठित हो कर रह गई ! उसीका प्रकोप फिर एक बार डराने लगा है ! ऐसा नहीं है कि इस पर काबू नहीं पाया जा सकता, पर हम कुछ लोगों की लापरवाहियां उसको उकसाने से बाज नहीं आ रहीं ! हम उसको हलके में ले अपने पर भारी पड़ने का हर मौका दे रहे हैं ! 

यह सर्वज्ञात है कि कुछ बीमारियों या दवाइयों का सेहत ठीक महसूस होने के बावजूद कोर्स पूरा करना पड़ता है ! बीच में उपचार छोड़ देने से दवा का तब तक का असर भी ख़त्म हो जाता है। वैसा ही कुछ इस कोरोना के साथ भी लागू होता है ! जानकारों के अनुसार दवा के अलावा पूरी सावधानियां तब तक बरतनी हैं जब तक कि इसका पूरा सफाया नहीं हो जाता और यहीं हम सब मात खा रहे हैं ! कुछ विवेकहीन, लापरवाह लोगों की गैरजिम्मेदाराना हरकतों के कारण पूरा देश फिर डर के साये में आ गया है। ऐसे लोग धड़ल्ले से अपनी मनमानी कर रहे हैं, जिसके कारण उन लोगों के घर में भी कोरोना का प्रकोप हो सकता है, जो सुरक्षित रहने की कोशिश में हर संभव उपाय करने में जुटे हुए हैं !

सरकार को देश के तमाम रिसोर्ट वगैरह को नोटिस जारी कर देना चाहिए कि सिर्फ जरुरी वजह के अलावा इस आपाद काल की स्थिति में, सिर्फ पर्यटन के लिए आए लोगों को ठहरने की अनुमति ही ना दें ! इसके अलावा तंत्र भी उनको जवाबदेही के लिए बुलाए 

कायनात ने कोरोना के माध्यम से हमें जो नसीहत देने की कोशिश की उसकी भयावहता से भी कुछ मनचले कोई सबक नहीं ले पा रहे ! कारण यह भी है कि सही मायनों में उन्हें जान की कीमत नहीं पता ! बिमारी की चपेट में आने पर पहले की बंदिशें नहीं सहीं ! नाहीं ऐसे  लोगों को अपनों को खोने के दर्द का एहसास है ! इन्हें सिर्फ अपनी मौज-मस्ती और तफरीह से मतलब है ! लेकिन यह सारा अनुभव तभी संभव है, जब तक इंसान जिंदा है, जिंदगी कायम है ! तमाम सावधानियों और दवा के भी पहले ऐसे लोगों पर लगाम कसना जरुरी है ! कहने में अच्छा नहीं लगता, शब्द भी कटु हैं, पर ऐसे लोग एक तरह से अपने परिवार के अलावा समाज और देश के भी दुश्मन कहे जा सकते हैं !   

यह भी सही है कि इंसान के ऐसे पचासों जरुरी काम होते हैं जिनके लिए घर से निकलना बहुत आवश्यक होता है, पर सिर्फ तफरीह के लिए खुद की और दूसरों की जान को आफत में डालना कहां की अक्लमंदी है ! पहले लॉक डाउन के समय भी बहुत से लोगों को घर से बाहर सड़कों और माहौल का ''जायजा'' लेते देखा गया था ! अब तो लापरवाही और भी बढ़ गई है ! ऐसा लगता है कि जैसे घूमने-फिरने, खरीदारी या पुण्यार्जन का मौका फिर कभी हाथ आएगा ही नहीं ! प्रकोप के दौरान आईं छुट्टियों को विवेकहीन लोग सैर-सपाटे के काम में लाने लग जाते हैं ! मेरे ख्याल से तो सरकार को देश के तमाम रिसोर्ट वगैरह को नोटिस जारी कर देना चाहिए कि सिर्फ जरुरी वजह के अलावा इस आपाद काल की स्थिति में, सिर्फ पर्यटन के लिए आए लोगों को ठहरने की अनुमति ही ना दें ! इसके अलावा तंत्र भी उनको जवाबदेही के लिए बुलाए ! क्योंकि हम ताड़ना की भाषा ही जल्दी समझते हैं। 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

बसंत आया तो है, पर....

मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? 
उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !
बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ 

#हिन्दी_ब्लागिंग        

बसंत फिर आया तो है ! पर यह कैसा हो गया है, सुस्त, मलिन सा ! जर्जर सी काया ! कांतिहीन चेहरा ! मुखमण्डल पर विषाद की छाया ! पहले कैसे इसके आगमन की सूचना भर से प्रेम-प्यार, हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता था ! सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक मादक अंगड़ाई ले आलस्य त्याग जागने लगती थी ! जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता था ! वृक्ष, पेड़-पौधे सब नए पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते थे ! सारी प्रकृति ही मस्ती में डूब प्रफुल्लित हो जाती थी। पर इस बार तो जैसे मायूसी ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही ! जीव-जंतु-पादप सभी जैसे किसी अज्ञात संकट से डरे, सहमे सदमाग्रस्त हुए से लग रहे हैं ! उन्हें डर है कि जैसे बसंत धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है वैसे ही बाकी मौसम भी मुंह फेर गए तो क्या होगा, इस शस्य-श्यामला का ? ऐसा क्यों !
उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है। मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से सारी ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं। मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता
तभी पिछले वर्ष की वह भोर फिर मेरे मष्तिष्क में कौंध जाती है ! साल गुजर गया इस बात को ! पर अभी भी जब उस पल की याद आती है तो सिहरन तो होती ही है साथ ही विश्वास भी नहीं होता कि उस दिन सचमुच कुछ वैसा भी हुआ था ! आज भी मुझे उस साल भर पहले की सुबह का एक-एक लम्हा अच्छी तरह याद है। जब पौ फटी नहीं थी और मुझे दरवाजे पर कुछ आहट सी सुनाई दी थी। उस दिन रात देर से सोने के कारण अर्द्ध-सुप्तावस्था सी हालत हो रही थी। इसीलिए सच और भ्रम का पता ही नहीं चल पा रहा था। पर कुछ देर बाद फिर लगा बाहर कोई है। इस बार उठ कर द्वार खोला तो एक गौर-वर्ण अजनबी व्यक्ति को खड़े पाया। आजकल के परिवेश से पहनावा कुछ अलग था। धानी धोती पर पीत अंगवस्त्र, कंधे तक झूलते गहरे काले बाल, कानों में कुण्डल, गले में तुलसी की माला, सौम्य-तेजस्वी चेहरा, होठों पर मोह लेने वाली मुस्कान। इसके साथ ही जो एक चीज महसूस हुई वह थी एक बेहद हल्की सुवास !
मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? 
उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !

बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ !
अरे भाई, वही बसंत, जिसके आगमन की ख़ुशी में आप सब पंचमी मनाते हैं !
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! क्या कह रहा है सामने बैठा इंसान !! यह कैसे हो सकता है ?
घबराहट साफ़ मेरे चेहरे पर झलक आई होगी, जिसे देख वह बोला, घबड़ाइये नहीं, मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतया  सत्य है।

मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे नकार भी नहीं पा रहा था। सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में डर की एक सर्द लहर सी  सी उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का। परिस्थिति से उबरने के लिए मैंने आगंतुक को कहा, ठंड है, मैं आपके लिए चाय का इंतजाम करता हूँ, सोचा था इसी बहाने श्रीमती जी को उठाऊंगा, एक से भले दो। पर अगले ने साफ़ मना कर दिया कि मैं कोई भी पदार्थ ग्रहण नहीं करूंगा। आप बैठिए। मेरे पास कोई चारा नहीं था। फिर भी कुछ सामान्य सा दिखने की कोशिश करते हुए मैंने पूछा, कैसे आना हुआ ?

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा, उस समय प्रकृति के सुंदर, अद्भुत बदलाव को ! सृजन ही मेरा कर्म है ! धरा को जीवंत रखना मेरा फर्ज ! जीव-जंतुओं, लता-गुल्म की सुरक्षा मेरा उद्देश्य ! 
इतना कह वह चुप हो गया। जैसे कुछ कहना चाह कर भी कह ना पा रहा हो। मैं भी चुपचाप उसका मुंह देख रहा था। उसके मेरे पास आने की वजह अभी भी अज्ञात थी। वह मेरी ओर देख रहा था। अचानक उसकी आँखों में एक वेदना सी झलकने लगी थी। एक निराशा सी तारी होने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है। मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से सारी ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं। मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता। आज मेरा आपके पास आने का यही मकसद था कि अब वक्त आ गया है, गहन चिंतन का ! लोगों को अपने पर्यावरण, अपने परिवेश, अपनी प्रकृति, अपने माहौल के प्रति जागरूक होने का ! अपनी धरोहरों को बचाने का ! जिससे आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें। अवाम को अपनी गफलतों से किनारा करना ही होगा ! नहीं तो कुछ ऐसी अनहोनी ना घट जाए जिस पर बाद में पछताने का कोई लाभ ना हो ! हाथ मलते रहने के सिवा कोई चारा ना हो ! 

कमरे में पूरी तरह निस्तबधता छा गयी। विषय की गंभीरता के कारण मैं पता नहीं कहाँ खो गया ! पता नहीं ऐसे में कितना वक्त निकल गया ! तभी श्रीमती जी की आवाज सुनाई दी कि रात सोने के पहले तो अपना सामान संभाल लिया करो। कंप्यूटर अभी भी चल रहा है, कागज बिखरे पड़े हैं, फिर कुछ इधर-उधर होता है तो मेरे पर चिल्लाते हो। हड़बड़ा कर उठा तो देखा आठ बज रहे थे। सूर्य निकलने के बावजूद धुंध, धुएं, कोहरे के कारण पूरी तरह रौशनी नहीं हो पा रही थी। मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कमरे में हम दोनों के सिवाय और कोई नहीं था। पर जो भी घटित हुआ था, वह सब मुझे अच्छी तरह याद था। मन यह मानने को कतई राजी नहीं था कि मैंने जो देखा, महसूस किया, बातें कीं, वह सब भ्रम था ! कमरे में फैली वह सुबह वाली हल्की सी सुवास मुझे अभी भी किसी की उपस्थिति महसूस जो करवा रही थी !!
पर जो भी हुआ था, जैसे भी हुआ था ! जिस तरह उस दिन जिस गंभीर समस्या की ओर ध्यान गया या दिलाया गया था ! सचेत किया गया था ! उसको हल्के में ले, उसके निवारण हेतु कुछ भी तो सकारात्मक नहीं किया था हमने ! एक सपने की तरह भूला दिया था ! गैस चैंबर में घुट-घुट कर जीते रहने के बावजूद हम सदा की  की तरह निश्चिन्त थे कि प्रकृति खुद ब खुद अपने में सुधार ले आएगी ! हम उसी प्रकृति का दम घोंटने में लगे रहे, उसी कायनात की ऐसी की तैसी कर रख दी, जिसने सिर्फ हमें छह-छह ऋतुओं की नेमत सौंपी है ! वह हमें बार-बार चेताती रही ! उसके संदेशे आते रहे ! पर हम अपने गुमान में ही जीते रहे ! फिर धीरे-धीरे ऋतुएं बदलने लगीं ! मौसम क्रूर होने लगे ! ऋतु चक्र डांवाडोल होने लगा ! पर हम कानों में तेल और आँखों पर पट्टी बांध अपनी कुटिल कारगुजारियों में मशगूल रहे ! 

नतीजतन एक अनजान, लाइलाज, विश्वव्यापी महामारी ने हमें अपने पंजों में धर दबोचा। सारी दुनिया में हाहाकार मचा दिया ! लोग बेतहाशा काल के गाल में समाने लगे ! ना कोई इलाज, ना कोई दवा ! इंसान अपने ही घरों में कैद हो कर रहने को मजबूर हो गया ! पूरी जिंदगी थम कर रह गई ! मानव के अमूल्य जीवन का एक साल पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया ! अभी भी संकट टला नहीं है ! पर पता नहीं इंसान ने सीख ली या नहीं !  

यदि नहीं तो अब कब हम अपने दायित्वों को समझेंगे ? यदि हमारे पूर्वज भी हमारी तरह सिर्फ मैं और मेरा करते रहे होते तो क्या कभी हम स्वर्ग जैसी इस धरा पर रहने का सौभाग्य पा सकते थे ? फिर मैं सोचता हूँ कि मैंने ही क्या किया इस विषय को ले कर ! सरकार का मुंह तकने, दूसरों से पहल की अपेक्षा रखने और सिवा नुक्ताचीनी के ! किसी की ओर उंगली उठाने से पहले मैंने कोई पहल की इस ओर ? कोई जागरूकता फैलाई ? अपनी तरफ से कोई कदम उठाया इस समस्या के निवारण हेतु ? पर अब इस विपदा से सबक लेते हुए सुधरना तो होगा ही, नहीं तो अब बसंत नहीं आने वाला फिर चेताने के लिए !! 

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