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मंगलवार, 19 मई 2026

आजकल वो इस तरफ देखता है कम

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! पर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य  को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट बदस्तूर वैसे ही चली आ रही है ! मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती हैं, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! वैसे साख भी तो उन्हीं की दांव पर लगी है.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! उन्होंने तरह-तरह के निर्माण किए ! ऋतुएं बनाईं ! पेड़-पौधे, लता-गुल्म, नदी-पहाड़, जीव-जंतु, पशु-पक्षी और ना जाने क्या-क्या ! फिर उनमें तालमेल भी बैठाया ! उनकी जरूरतों की हर चीज मुहय्या करवाई ! तस्वीर में सारे रंग भरे ! कहीं कोई कमी नहीं ! पर फिर पता नहीं क्या सूझी, एक पुतला बना उसे इंसान नाम दे, धकेल दिया धरती पर ! उन्हें लगा यह मेरी सबसे उत्कृष्ट रचना है और इसके साथ ही एक अलग सा संसार अपनी समय सीमा के साथ अस्तित्व में आ गया ! 

सृष्टि रचना 

दे वलोक के झरोखे पे बैठ इन खिलौनों का वीडियो गेम खेला व देखा जाने लगा ! पर खेल कितना भी मनोरंजक हो, कितनी देर तक देखा जा सकता है ? सो अगला भी कुछ समय पश्चात इसे ''ऑटोपायलट मोड'' पर डाल फारिग हो गया ! इसमें उसके तो कुछ पल ही व्यतीत हुए पर पृथ्वी पर करोड़ों साल निकल गए, सदियां बीत गईं, युग बदलते चले गए ! शुरूआती समय तो अच्छा था, कृतियों को प्रभु ने मन लगा कर बनाया था, वे नेक, समझदार, विवेकी थीं ! पर प्रभु ने समय भी तो बनाया था, जो कहीं भी, कभी भी, किसी को भी एक सा नहीं रहने देता !

मानवातरण 
वैसे नीचे जो भी टूट-फूट या किसी की एक्सपायरी हो, उसका रिप्लेसमेंट और सप्लाई ऊपर से बदस्तूर जारी तो है ! पर वस्तु की क्वालिटी में गिरावट का एहसास दिखने लगा है ! खासकर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट लगातार बढ़ती ही जा रही है ! यदि मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती होंगी, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! ध्यान तो उन्हें ही देना है ! साख तो उन्हीं की दांव पर लगी है !

धरा 
इसी लापरवाही का नतीजा है कि संसार में कोई ऐसी जगह नहीं बची जहां शांति हो ! जहां लोग चैन से रहते हों ! जहां लोगों का जीवन दुश्वार ना हो गया हो ! जहां के रहवासियों के स्वभाव में असहिष्णुता न समा गयी हो ! जहां भाईचारा खत्म ना हो गया हो। लोग बेवजह धर्म-जाति-भाषा-रंग भेद पर मर-मिटने पर उतारू ना हो जाते हों ! जरा-जरा सी बात पर कत्ले-आम न हो जाता हो ! पडोसी एक-दूसरे को दुश्मन ना समझते हों ! ऐसा ही रहा तो क्या ईश्वर की बेहतरीन कृति और सृष्टि ज्यादा समय तक बच पाएंगे ? 

तांडव, हर जगह 
अब तो प्रभु ही कुछ करें तो करें ! निर्माण के दौरान वहीं सुधार हो जाए ! कमियां वहीं दूर कर दी जाएं ! वहां के उत्पादन का परिक्षण धरा पर ना किया जाए  ! कसौटी पर कसने के लिए संसार को परिक्षण केन्द्र ना बनाया जाए ! यदि ऐसा हो सके तो इन विकारों से उपजी व्याधियों, अराजकताओं, विघ्नों, दुखों, कष्टों को दूर करने, मिटाने के लिए, जो बार-बार कभी प्रभू को, कभी जगत जननी माँ को, तो कभी विघ्नेश्वर को इस धरा पर आना पड़ता है, उस आने-जाने से बचने वाले समय का सदुपयोग वे अपनी ही कृतियों की भलाई में कर सकते है ! क्योंकि उनका मकसद और उद्देश्य भी तो अपने बच्चों को खुश रखने का है, ना कि उन्हें दंडित करने का........!

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏 

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

भाषाएं, हमें गर्व है इन पर

हर स्कूल में शुरूआती दौर से ही उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के अलावा दो अन्य क्षेत्रों की भाषाएं सीखाने का भी प्रावधान निश्चित तौर पर हो ! देशवासी जितना हो सके अपनी भाषा के अलावा दूसरे प्रांतों की भाषा को भी सीखें ! इंसान तो जितनी भाषाएं सीख सके उतना ही अच्छा है ! हिंदी भाषी तमिल सीखे ! कन्नड़ भाषी पंजाबी जाने ! बांग्ला बोलने वाला पंजाबी समझे ! ओड़िसा में रहने वाले के लिए भोजपुरी समझना मुश्किल ना हो, तो एक दूसरे को समझने का मौका और भाईचारा बढ़ने के साथ-साथ रोजगार के अवसरों में भी निश्चित तौर पर बढ़ोत्तरी होगी.............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

संस्कृत ! हजारों साल पुरानी भाषा ! जिसका अभी भी अस्तित्व है ! पर विडंबना है कि उसी के बारे में तमिलनाडु के उप-मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने कह दिया कि ''संस्कृत एक मृत भाषा है !'' उस कथन को लेकर व्यर्थ सर खपाने से कोई फायदा नहीं है, ऐसे कुंठित और पूर्वाग्रही लोग अपने हित, अपने स्वार्थ के लिए देश, समाज, धर्म, भाषा को बदनाम करते ही रहते हैं ! इनके अलावा दसियों भाषाएं और भी हैं, यदि उनको बोलने वाले भी अपनी-अपनी भाषा को श्रेष्ठ तथा दूसरी को हीन बताने लग जाएं तो ?  उलटे हमें तो गर्व होना चाहिए कि हमारे पास इतनी समृद्ध और सक्षम भाषाएं हैं, जिनमें संसार की सबसे पुरानी तथा जीवित भाषाएं भी सम्मिलित हैं ! 

बात संस्कृत की, जो एक ऐसी “परिमार्जित” भाषा है जिसे भारत के प्राचीन ऋषियों ने अपने विचारों को बेहद सटीक और परिष्कृत तरीके से लोगों तक पहुंचाने के लिए विकसित किया था। संस्कृत वेदों, उपनिषदों और भगवद गीता सहित भारतीय साहित्य के कई महान कार्यों की भाषा रही है। आज वैज्ञानिक इसे कम्प्यूटर और AI के लिए सबसे उपयुक्त भाषा मानते हैं ! ऐसा भी नहीं है कि लोगों ने इसका उपयोग करना बिलकुल बंद कर दिया है, 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में हजारों लोग अभी भी संस्कृत को अपनी मातृभाषा के रूप में प्रयोग करते हैं तथा इसे मुख्य भाषा भी मानते हैं ! 


संसार की सबसे पुरानी दो भाषाएं हैं, पहली संस्कृत तथा दूसरी तमिल ! शोध बताते हैं कि संसार में हाल के वर्षों में संस्कृत के अध्ययन में लोगों की रुचि और ध्यान बढ़ रहा है, क्योंकि दुनिया भर के लोगों में इसके सांस्कृतिक महत्व में दिलचस्पी बढ़ी है। इससे संस्कृत बोलने वालों का एक नया वर्ग उभरा है जो भाषाओं को संरक्षित और बढ़ावा देने का काम कर रहा है ! दूसरी सबसे पुरानी जीवित भाषा है तमिल, जो आज भी करोड़ों लोगों द्वारा उपयोग में लाई जा रही है ! हमें तो इन दोनों पर तो क्या, अपनी हर भाषा पर गर्व है, होना भी चाहिए, इतनी विविधता तथा व्यापकता और कहां है ! 

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पर कुछ लोग इन्हीं बातों को विवादित बना समाज में द्वेष फैलाने का काम करते हैं ! ऐसे लोगों का षड्यंत्र खत्म करने का एक सटीक उपाय यह है कि हर स्कूल में शुरूआती दौर से ही उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के अलावा दो अन्य क्षेत्रों की भाषाएं सीखाने का भी प्रावधान निश्चित तौर पर हो ! देशवासी जितना हो सके अपनी भाषा के अलावा दूसरे प्रांतों की भाषा को भी सीखें ! 

भाषाएं 
इंसान तो जितनी भाषाएं सीख सके, उतना ही अच्छा है ! हिंदी भाषी तमिल सीखें ! कन्नड़ भाषी पंजाबी जाने ! बांग्ला बोलने वाला पंजाबी समझे ! ओड़िसा में रहने वाले के लिए भोजपुरी समझना मुश्किल ना हो ! ऐसा हो जाए तो एक दूसरे को समझने का मौका और भाईचारे के बढ़ने के साथ-साथ रोजगार के अवसरों में भी निश्चित तौर पर बढ़ोत्तरी होगी ! सरकार और शिक्षा विभाग यदि इस बात पर गौर कर कोई ठोस कदम उठाए, तो कई परेशानियां अपने आप खत्म हो जाएंगी !

जय हिंद 
आज भाषा की बात उठी है, तो क्या किसी का ध्यान एक ऐसी विदेशी भाषा की तरफ भी गया है जिसे हमारे देश में कोई नहीं जानता, फिर भी उसका उपयोग धड़ल्ले से डॉक्टरों के नुस्खों में होता है ! जिसे समझना आम इंसान के वश की बात ही नहीं है ! जिसे तकनीकी रूप से एक मृत भाषा मान लिया गया है ! जिसे अब कोई भी अपनी पहली भाषा (mother tongue) के रूप में नहीं बोलता ! जी हाँ ! लैटिन ! इस भाषा का अपने देश में क्या औचित्य है, कोई नहीं बता सकता ! फिर भी जो चला आ रहा है, वह चला आ रहा है ! स्टालिन जैसे लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते ? या फिर अपनी भाषा को दूसरे राज्यों में पढ़वाने के लिए उद्यम क्यों नहीं करते ? 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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