pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: शांति
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मंगलवार, 19 मई 2026

आजकल वो इस तरफ देखता है कम

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! पर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य  को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट बदस्तूर वैसे ही चली आ रही है ! मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती हैं, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! वैसे साख भी तो उन्हीं की दांव पर लगी है.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! उन्होंने तरह-तरह के निर्माण किए ! ऋतुएं बनाईं ! पेड़-पौधे, लता-गुल्म, नदी-पहाड़, जीव-जंतु, पशु-पक्षी और ना जाने क्या-क्या ! फिर उनमें तालमेल भी बैठाया ! उनकी जरूरतों की हर चीज मुहय्या करवाई ! तस्वीर में सारे रंग भरे ! कहीं कोई कमी नहीं ! पर फिर पता नहीं क्या सूझी, एक पुतला बना उसे इंसान नाम दे, धकेल दिया धरती पर ! उन्हें लगा यह मेरी सबसे उत्कृष्ट रचना है और इसके साथ ही एक अलग सा संसार अपनी समय सीमा के साथ अस्तित्व में आ गया ! 

सृष्टि रचना 

दे वलोक के झरोखे पे बैठ इन खिलौनों का वीडियो गेम खेला व देखा जाने लगा ! पर खेल कितना भी मनोरंजक हो, कितनी देर तक देखा जा सकता है ? सो अगला भी कुछ समय पश्चात इसे ''ऑटोपायलट मोड'' पर डाल फारिग हो गया ! इसमें उसके तो कुछ पल ही व्यतीत हुए पर पृथ्वी पर करोड़ों साल निकल गए, सदियां बीत गईं, युग बदलते चले गए ! शुरूआती समय तो अच्छा था, कृतियों को प्रभु ने मन लगा कर बनाया था, वे नेक, समझदार, विवेकी थीं ! पर प्रभु ने समय भी तो बनाया था, जो कहीं भी, कभी भी, किसी को भी एक सा नहीं रहने देता !

मानवातरण 
वैसे नीचे जो भी टूट-फूट या किसी की एक्सपायरी हो, उसका रिप्लेसमेंट और सप्लाई ऊपर से बदस्तूर जारी तो है ! पर वस्तु की क्वालिटी में गिरावट का एहसास दिखने लगा है ! खासकर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट लगातार बढ़ती ही जा रही है ! यदि मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती होंगी, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! ध्यान तो उन्हें ही देना है ! साख तो उन्हीं की दांव पर लगी है !

धरा 
इसी लापरवाही का नतीजा है कि संसार में कोई ऐसी जगह नहीं बची जहां शांति हो ! जहां लोग चैन से रहते हों ! जहां लोगों का जीवन दुश्वार ना हो गया हो ! जहां के रहवासियों के स्वभाव में असहिष्णुता न समा गयी हो ! जहां भाईचारा खत्म ना हो गया हो। लोग बेवजह धर्म-जाति-भाषा-रंग भेद पर मर-मिटने पर उतारू ना हो जाते हों ! जरा-जरा सी बात पर कत्ले-आम न हो जाता हो ! पडोसी एक-दूसरे को दुश्मन ना समझते हों ! ऐसा ही रहा तो क्या ईश्वर की बेहतरीन कृति और सृष्टि ज्यादा समय तक बच पाएंगे ? 

तांडव, हर जगह 
अब तो प्रभु ही कुछ करें तो करें ! निर्माण के दौरान वहीं सुधार हो जाए ! कमियां वहीं दूर कर दी जाएं ! वहां के उत्पादन का परिक्षण धरा पर ना किया जाए  ! कसौटी पर कसने के लिए संसार को परिक्षण केन्द्र ना बनाया जाए ! यदि ऐसा हो सके तो इन विकारों से उपजी व्याधियों, अराजकताओं, विघ्नों, दुखों, कष्टों को दूर करने, मिटाने के लिए, जो बार-बार कभी प्रभू को, कभी जगत जननी माँ को, तो कभी विघ्नेश्वर को इस धरा पर आना पड़ता है, उस आने-जाने से बचने वाले समय का सदुपयोग वे अपनी ही कृतियों की भलाई में कर सकते है ! क्योंकि उनका मकसद और उद्देश्य भी तो अपने बच्चों को खुश रखने का है, ना कि उन्हें दंडित करने का........!

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏 

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

व्यस्त रहें, मस्त रहें

अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा; पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे शरीर चलायमान रहता है। अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग  को उसने घर बनाया है वह स्वस्थ रहे ! बेशक उसकी नीयत ठीक होती है। पर नाम तो उसका बदनाम है, तो वह जो भी करवाता है, वह शैतानियत ही लगती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वैसे तो मनुष्य की आदत है अपने भूतकाल को गौरवान्वित करने की ! पर जब कर्मविहीन इंसान, खासकर सेवानिवृत्त, वेल्ला होता है तो ऐसे में वह बैठे-बैठे अपने अतीत को खंगालने लगता है ! उस समय उसे बीते समय की खुशनुमा बातें तो कम याद आती हैं, उल्टे बुरी यादें, नाकामियां, आधे-अधूरे प्रसंग, कष्ट, अभाव व तकलीफ में गुजरे लम्हों की जैसे फिल्मी रील सी चलने लगती है। ऐसा ना हो तो फिर अनिश्चित भविष्य के खतरे, निर्मूल आशकाएं या अनहोनी घटनाओं का डर उसे घेर लेता है। इस नकारात्मक सोच का दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। जिससे वह अपने को बीमार सा महसूस करने लगता है। 
बेल्लापन 
सीलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने-आप को सदा व्यस्त तथा किसी भी काम में उलझाए रखे। व्यस्तता ही सखा, साथी, सहारा बन जाना चाहिए। इससे नकारात्मक विचारों को दिमाग में घुसने का मार्ग नहीं मिल पाता, ऊल-जलूल बातों पर ध्यान नहीं जाता और सबसे बड़ी बात, शारीरिक और मानसिक रूप से थकने के बाद रात को नींद ना आने की बिमारी से भी मुक्ति मिल जाती है। दिमाग दुरुस्त रहता है और शरीर स्वस्थ। इसलिए हरेक को कुछ भी, कैसा भी, कोई ना कोई शौक, रूचि, ''हॉबी'' जरूर पाल कर रखनी चाहिए। 
कब्जा 
एक कहावत भी है, खाली दिमाग शैतान का घर ! अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे सही-गलत, कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे उसका आवास चलायमान रहे। अब अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग को उसने घर बनाया है, वह स्वस्थ रहे, पर नाम ऐसा बदनाम है कि उसका किया-धरा सब कुछ लोगों को शैतानियत ही लगता है ! 
खुशहाली 
एक सच्चाई यह भी है कि इंसान के व्यस्त व स्वस्थ रहने का सकारात्मक असर उसके परिवार की शांति और सकून पर भी पड़ता है। क्योंकि घर के अन्य लोग, उसकी बेवजह दखलंदाजी, फिजूल के हस्तक्षेप, बिन मांगी सलाहें, बेकार की टोका-टाकी, बार-बार की चाय-पानी की पानी की फरमाइश से बचे रहते हैं, जिसके फलस्वरूप परिवार के सदस्य व आत्मीय-जन सुकून महसूस करते हैं, नतीजतन घर में शांति बनी रहती है। 

विभिन्न रुचियां 
तो लब्बो-लुआब यह है कि यदि हम अपने-आप को व्यस्त रखने का कोई जरिया ढूंढ लेते हैं, जिसमें व्यस्त रहते हुए खुशी और संतुष्टि भी मिले। आनंद महसूस हो। कुछ ज्ञान बढे। सृजनता का आभास हो। समय की बर्बादी न लगे और ना हीं मजबूरी ! ऐसा हो तो यह तय है कि दिमाग दुरुस्त व शरीर चुस्त तो रहेगा ही, साथ-साथ बोनस में घरेलू सुख-शांति-सुकून तो हईए है ! 
  
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

सोमवार, 4 नवंबर 2024

दीपक, दीपोत्सव का केंद्र

अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दोजहद, अंधेरे और उजाले के सदियों से चले आ रहे महा-समर, निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाए रखने की पुरजोर कोशिश ! चिरकाल से चले आ रहे इस संग्राम में उसी आशा की लौ के स्थापन के लिए अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा, अपने महाबली शत्रु तमस से जूझती हैं, चिरागों के रूप में, सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ ! दीपोत्सव के केंद्र में दीपक ही तो होता है.......................!         

#हिन्दी_ब्लागिंग  

दीपोत्सव  फिर आने का वादा कर समय-चक्र पर सवार हो विदा ले गया ! साल की सबसे घनघोर काली रात के भय से उबारने वाला यह त्यौहार सदा याद दिलाता रहता है, अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दोजहद, अंधेरे और उजाले के सदियों से चले आ रहे महा-समर, निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाए रखने की पुरजोर कोशिश की ! चिरकाल से चले आ रहे इस संग्राम में उसी आशा की लौ के स्थापन के लिए अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा, अपने महाबली शत्रु तमस से जूझती हैं, चिरागों के रूप में, सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ ! दीपोत्सव के केंद्र में दीपक ही तो होता है !   

दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पावन पर्व है। हम भारतवासियों का दृढ विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है, झूठ का नाश होता है ! दीपावली भी यही चरितार्थ करती है, असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय ! अंधकार कितना भी गहरा क्यों ना हो, ये छोटे-छोटे दीपक रौशनी के सिपाही बन, अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद, एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके। 

अपनी छोटी सी पर सार्थक जिंदगी के पश्चात दीपक बुझ तो जरूर जाता है पर उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाता ! इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चेहरे पर फैली मुस्कान और खुशी को देख कर अपने-आप हो जाती है। एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है। बाहरी संसार को रौशन करने के उसके इस प्रयास के साथ ही कितना अच्छा हो यदि हमारी यह कोशिश रहे कि जगत में उजास बनाए रखने के साथ ही हम अपने अंतस में छिपे राग-द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, वैमनस्य जैसे तमस को भी दूर कर दें ! जिससे मानव मात्र के भले के साथ ही देश-समाज-जगत में भी सुख-शांति-चैन का माहौल स्थापित हो सके ! 

एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को हृदय की गहराइयों से हार्दिक शुभकामनाएं !परमपिता की असीम कृपा से सब लोग सपरिवार, स्वस्थ, प्रसन्न व सुरक्षित रहें ! सुख-शांति का वास हो ! आने वाला समय सभी के लिए शुभ और मंगलमय हो ! सब का जीवन पथ सदा प्रशस्त व आलोकित रहे ! यही कामना है !    

शनिवार, 11 मार्च 2023

"शांति" का उच्चारण तीन बार क्यों किया जाता है :

शांति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ! यह सब जगह सदा विद्यमान रहती है, जब तक इसे हमारे या हमारे क्रिया-कलापों द्वारा भंग ना किया जाए ! इसका यह भी अर्थ है कि हमारी गति-विधियों से ही शांति का क्षय होता है ! पर जैसे ही यह खत्म होता है, शांति पुन: बहाल हो जाती है ! यह जहां भी होती है, वहाँ सदा खुशियों  का डेरा रहता है ! इसीलिए शांति की प्राप्ति के लिए हम प्रार्थना करते हैं, जिससे हमारी मुसीबतों, दुखों, तकलीफों का अंत होता है और मन को सुख की अनुभूति होती है ...................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज शाम टहलने निकला तो रास्ते में पंडित राम शरण त्रिपाठी मिल गए ! स्नेहवश हम सब उन्हें रामजी कह कर बुलाते हैं ! विद्वान पुरुष हैं ! ग्रंथों का गहन अध्ययन किया हुआ है ! किसी भी बात को प्रमाण के साथ ही प्रस्तुत करते हैं ! उनके साथ बतियाते हुए भोलेनाथ के मंदिर प्रांगण में पहुँच गया।  वहां कुछ लोग शिवलिंग की प्रदक्षिणा कर रहे थे, तो वैसे ही राम जी से पूछ लिया कि हम प्रदक्षिणा क्यों करते हैं ?

रामजी ने बताया कि जिस तरह सूर्य को केंद्र में रख सारे ग्रह उसका चक्कर लगाते हैं जिससे सूर्य की ऊर्जा उन्हें मिलती रहे, उसी तरह प्रभू यानी सर्वोच्च सत्ता, जो सारे विश्व का केंद्र है, उसकी परिक्रमा कर उनकी कृपा प्राप्त करने का विधान है ! वही कर्ता है, वही सारी गतिविधियों का संचालक है, उसी की कृपा से हम अपने नित्य प्रति के कार्य पूर्ण कर पाते हैं, उसी से हमारा जीवन है ! फिर प्रभू समदर्शी हैं, अपने सारे जीवों पर एक समान दया भाव रखते हैं ! इसका अर्थ है कि हम सभी उनसे समान दूरी पर स्थित हैं और उनकी कृपा, बिना भेद-भाव के सब पर बराबर बरसती है। परिक्रमा करना भी उनकी पूजा अर्चना का एक हिस्सा है, जो उनके प्रति अपनी कृतज्ञतायापन का एक भाव है ! उन्हें अपने प्रेम-पाश में बांधने की एक अबोध कामना है ! केवल प्रभू  ही नहीं, जिनका भी हम आदर करते हैं, जो बिना किसी कामना के हमें लाभान्वित करते हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए हम उनकी परिक्रमा करते हैं ! चाहे वे हमारे माता-पिता हों, गुरुजन हों, अग्नि हो या वृक्ष हों ! वैसे ही एक परिक्रमा खुद की भी होती है, जो घर इत्यादि में पूजा की समाप्ति पर एक जगह खड़े होकर घूमते हुए की जाती है, जो याद दिलाती है कि हमारे भीतर भी वही प्रभू, वही शक्ति, वही परम सत्य विराजमान हैं, जिनकी प्रतिमा की हम अभी-अभी पूजा-अर्चना किए हैं !

मैंने फिर पूछा कि परिक्रमा प्रतिमा को दाहिने रख कर यानी घड़ी की सूई की चाल के अनुसार ही क्यों की जाती है ?  यह सुन कर वहाँ बैठे एक सज्जन बोले कि इससे आपस में लोग भिड़ने से बचे रहते हैं नहीं तो कोई दाएं से चलेगा और कोई बांए से आएगा तो मार्ग अवरुद्ध होने लगेगा !रामजी मुस्कुरा कर बोले, आपकी बात आंशिक रूप से अपनी जगह ठीक है, पर आराध्य को दाहिने तरफ रख परिक्रमा करने का मुख्य कारण यह है कि हमारे यहाँ दाएं भाग को ज्यादा पवित्र और सकारात्मक माना जाता है ! इसीलिए जो हमारी सदा रक्षा करते हैं, हर ऊँच-नीच से बचाते हैं, सदा हमारा ध्यान रखते हैं, उन प्रभू को हम अपनी दाईं और रख अपने आप को सदा सकारात्मक रहने की याद दिलाते हुए, उनकी परिक्रमा करते हैं।


आज मन में पता नहीं क्यूँ एक के बाद एक प्रश्न अपना सर उठा रहे थे ! ऐसे ही एक सवाल के बारे में मैंने पंडितजी से फिर पूछ लिया कि पूजा समाप्ति पर हम "शांति" का उच्चारण तीन बार क्यों करते हैं ?
रामजी ने बताया कि शांति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह सब जगह सदा विद्यमान रहती है। जब तक इसे हमारे या हमारे क्रिया-कलापों द्वारा भंग ना किया जाए। इसका यह भी अर्थ है कि हमारी गति-विधियों से ही शांति का क्षय होता है पर जैसे ही यह सब खत्म होता है, शांति पुन: बहाल हो जाती है। यह जहां भी होती है वहां सदा खुशियों का डेरा रहता है। इसीलिए शांति की प्राप्ति के लिए हम प्रार्थना करते हैं. जिससे हमारी मुसीबतों, दुखों, तकलीफों का अंत होता है और मन को सुख की अनुभूति होती है ! जीवन में कुछ ऐसी  प्राकृतिक आपदाएं होती हैं जिन पर किसी का वश नहीं चलता, जैसे भूकंप, बाढ़ इत्यादि। कुछ ऐसी विपदाएं होती हैं जो हमारे द्वारा या हमारी गलतियों से घटती हैं जैसे प्रदूषण, दुर्घटना, जुर्म इत्यादि ! कुछ शारीरिक और मानसिक परेशानियां होती हैं ! सारे दुखों, तकलीफों, अड़चनों, परेशानियों या रुकावटों का कारण तीन स्रोत, आदि-दैविक, आदि-भौतिक और आध्यात्मिक या मानसिक हैं ! इसलिए हम प्रभू से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे दुखों, तकलीफों तथा जीवन में आने वाली अड़चनों का शमन करें ! चूँकि ये मुसीबतें तीन ओर से आती हैं, इसीलिए शांति का उच्चारण भी तीन बार किया जाता है। वैसे भी प्राचीन काल से यह मान्यता चली आ रही है कि ''त्रिवरम सत्यमं'' यानी किसी भी बात को तीन बार कहने से वह सत्य हो जाती है, इसलिए अपनी बात को बल देने  के लिए ऐसा किया जाता है !  


 
शाम गहरा गई थी ! पंडितजी को भी मंदिर का अपना कार्य पूरा करना था ! इधर घर पर मेरा इंतजार भी शुरू हो चुका था ! इसलिए उनसे आज्ञा और नई जानकारियां ले मैं भी घर की ओर रवाना हो लिया !

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...