pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: आक्रोश
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गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

असली चेहरा सामने आया, फितरत को भी सामने लाया

दरअसल ऐसे लोग राजनेता हैं ही नहीं ! उन्हें देश, धर्म, जाति, देशवासियों, किसी से भी कुछ लेना-देना नहीं है ! उन्हें मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से ! और इसके लिए वे कुछ भी करने को आतुर रहते हैं ! वे सिर्फ विदेशी ताकतों के मोहरे हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करवा दी गई है और वे अपने आकाओं की बिछाई बिसात पर सिर्फ उनके आदेशानुसार हरकतें करते हैं....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वि देशी ताकतों द्वारा भारत में अपनी कठपुतलियों की असलियत को अब तक ढक-छुपा कर उनकी आड़ में खुद को सत्ता में सुपर पॉवर बनाए रखने का जो षड्यंत्र सालों से किया जाता रहा था, वह खुल कर सामने आ गया है ! आज के माहौल में उन्हें भी यह बात समझ में आ गई है कि अब भारत में इन प्यादों के बल पर अपने मनोनुकूल सरकार बनाना कतई मुमकिन नहीं है ! तो अब खुला खेल फर्रुखाबादी ! 
प्यादे 
पि छले दसेक वर्षों से कुछ तथाकथित राजनितिक लोग सनातन विरोधी, हिंदू विरोधी, धर्म विरोधी ब्यान पर ब्यान दिए जा रहे हैं, कोई कहता है हिन्दू धर्म ग्रंथ जला दो ! कोई देवी-देवताओं को काल्पनिक बताता है ! कोई लोकप्रिय त्योहारों को खतरनाक बता लोगों को भ्रमित करने की कुचेष्टा करता है ! कोई किसी उत्सव पर सवाल खड़े करने की हिमाकत कर देता है ! कोई देवी-देवताओं के बारे में अभद्र टिप्पणियां कर देता है! कोई अपने पर्वों पर होने वाले खर्च को धन की बर्बादी बता, विदेशी धर्मों से सीख लेने की बात करता है ! वह भी तब जब देश की बहुसंख्यक आबादी सनातन की आस्था से जुड़ी हुई है ! यह सब अकारण नहीं हो रहा, सब सोची-समझी साजिशों के तहत क्रियान्वित किया जा रहा है !
बकैती 

आम इंसान को यह सब वर्षों से सत्ता से दूर विपक्षी दलों की छटपटाहट या आक्रोश लग सकता है ! पर सच्चाई किसी और ही दिशा-दशा की ओर इशारा करती है ! आज के देश के माहौल को देखते हुए कोई भी व्यक्ति जो राजनीती से जुड़ा हो और उसे जरा सी भी राजनितिक समझ होगी तो वह कभी भी ऐसे ब्यान दे कर अपने कैरियर को खत्म नहीं करना चाहेगा ! दरअसल ऐसे लोग राजनेता हैं ही नहीं ! उन्हें देश, धर्म, जाति, देशवासियों किसी से भी कुछ लेना-देना नहीं है ! उन्हें मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से ! और इसके लिए वे कुछ भी करने को आतुर रहते हैं ! वे सिर्फ विदेशी ताकतों के मोहरे हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करवा दी गई है और वे अपने आकाओं की बिछाई बिसात पर सिर्फ उनके आदेश के अनुसार ही हरकतें करते हैं ! 
बिसाती मोहरे 
ऐसा नहीं है कि शतरंज की बिसात बिछा उस पर सिर्फ प्यादों की परेड करवा दी जाती हो ! अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिए पूरा ताम-झाम किया जाता है ! अकूत धनराशि खर्च की जाती है ! तरह-तरह के आख्यान-व्याख्यानों का जाल बिछाया जाता है ! प्रचार-प्रसार हेतु सोशल मीडिया का उपयोग-दुरूपयोग किया जाता है ! हर ऐसी शह जो इंसान के ईमान को डगमगा दे उसका उपयोग किया जाता है ! जिस किसी व्यक्ति का जरा सा भी रसूख या पहुँच होती है उसे खरीद कर अपनी दुरभिसंधि का सदस्य बना लिया जाता है ! पैसे का लालच दे कुछ भी बुलवा-लिखवा लिया जाता है ! पैसे को ही सर्वशक्तिमान बना दिया गया है !
सोशल मिडिया 
खरीदफरोख्त 
धन की शक्ति अपरंपार है ! दुनिया का कोई भी कोना उससे सुरक्षित नहीं है ! उसी के बल पर झूठ को सच की शेरवानी पहनवा, सजा-संवार कर उसकी बारात निकाल दी जाती है ! यह तो जग जाहिर है कि जब तक सच अपनी चप्पलें पहनता है, झूठ दुनिया के दस चक्कर लगा आता है और ऐसे लोग तो अपने धन-बल पर झूठ के लिए रॉकेट तक उपलब्ध करवा देते हैं ! लोग बहकावे में आ जाते हैं ! उधर विडंबना यह है कि सच को अपना सच बताने के लिए भी धन की शरण लेनी पड़ती है ! पर समय ने बदलना शुरू कर दिया है !

सच्चाई 
इसी सब के बीच अचानक देश की आजादी से भी पहले से रचा जा रहा, पर अब तक दबा-ढका, एक ऐसा कुचक्र सामने आया है जिससे सभी अचंभित से हो गए हैं ! कोई खुद पाक-साफ रह कर, वर्षों से किसी को किसी और के विरुद्ध बरगला कर, किसी और से मतभेद करवा कर, किसी और  मुद्दे को भड़का कर लोगों को भ्रमित कर, उनका ध्यान कहीं और भटकवा कर, अपना उल्लू सीधा करता रहा ! उसका तरीका इतना प्रेममय,  दोस्ताना,  सौहार्दपूर्ण और स्नेहयुक्त था कि लोग  उसके इरादों  को कभी  भांप ही नहीं पाए ! परंतु वक्त सब का हिसाब करता और रखता है, उसका भी हुआ और उसके क्रियाकलापों की नग्नता सामने आ ही गई और जब आ ही गई तो वह भी खुल कर अब तक छुपे अपने गुर्गों, गणों के साथ सामने आ गया ! उसका नतीजा सबके सामने है और अब हमारी बारी है कि हमें किससे कैसे निपटना है !  
वन्देमातरम।। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी

शिक्षा, चिकित्सा और न्याय ! आम-जन का विश्वास आक्रोश के मारे इन तीनों सर्वाधिक जनहित के क्षेत्रों से उठने लगा है ! लोग अब भगवान से उतना नहीं डरते जितना इन पेशों से जुड़े लोगों से खौफ खाते हैं ! खास कर कानून से जुड़े लोगों से ! कारण भी तो है ! यह जानते हुए भी कि न्याय में देर होने से उसकी अहमियत खत्म सी हो जाती है, इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा अतिकाल होता है ! इसीलिए कभी-कभी आक्रोशित हो सर्वहारा आपे से बाहर हो कानून अपने हाथ में लेने की भयंकर भूल कर बैठता है ! जैसा कि कुछ लोगों ने जेल वैन पर हमला कर किया ! वह भूल जाता है कि समाज ऐसे नहीं चलता ! शुक्र है कि यह दौरा कुछ पल के लिए ही पड़ता है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ दिनों पहले संविधान दिवस पर अपने विचार व्यक्त करती हुई आदरणीय राष्ट्राध्यक्ष द्रौपदी मुर्मू जी आज की न्याय व्यवस्था पर कुछ खिन्न नजर आईं ! उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि उनके बचपन में उनके गांव के लोग गुरु, डॉक्टर और वकील को भगवान मानते थे ! क्योंकि गुरु ज्ञान देकर, डॉक्टर जीवन देकर और वकील न्याय दिला कर लोगों की रक्षा करते थे ! उन्होंने मर्यादा और मेजबान का ख्याल रखते हुए, आजकल की अवस्था पर चिंता व्यक्त की, खासकर जेलों की हालत पर ! महामहिम की बात बिलकुल ठीक थी।     

हालांकि अभी भी इन तीनों क्षेत्रों में अधिकांश लोग अपने काम में पूरी तरह ईमानदारी से समर्पित हैं ! पर जैसा कि होता है, हर क्षेत्र में पैसे के लिए कुछ भी करने वाले लोग होते ही हैं वैसे ही कुछ मुट्ठी भर लोगों की वजह से आम जन का विश्वास इन तीनों सर्वाधिक जनहित के क्षेत्रों से उठने लगा है ! अब वे भगवान से उतना नहीं डरते जितना इन पेशों से जुड़े लोगों से भय खाते हैं ! खास कर कानून से जुड़े लोगों से ! कारण भी तो है ! यह जानते हुए भी कि न्याय में देर होने से उसकी अहमियत खत्म सी हो जाती है, इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा अतिकाल होता है ! इसी से गुनाह करने वाले भी कुछ हद तक बेखौफ हो अपने कुकर्मों को अंजाम देने में नहीं हिचकते ! उनको पता रहता है कि कोई ना कोई आएगा और उन्हें कानून की किसी ना किसी संकरी गली से साफ बचा ले जाएगा ! क्योंकि वहाँ के बारे में एक कहावत है कि "वहाँ यह देखा जाता है कि कौन बोल रहा है ना कि क्या बोला जा रहा है !" होता भी तो ऐसा ही आया है, जनता ने देखा भी है, दसियों ऐसे उदाहरण हैं जब भारी-भरकम लोग अपनी बात मनवा कर चल देते हैं ! अब तो तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी ! इधर आम-जन की यादाश्त मछली की तरह होती है वह बहुत जल्द पिछली बातों को भूल जाता है ! उसे चारे के रूप में नई चटपटी ख़बरें परोस भ्रमित कर दिया जाता है ! पर विगत में घटी किसी घटना की पुनरावृत्ति फिर सब कुछ ताजा कर उसके आक्रोश का वायस बन जाती है !

शायद यही कारण था कि वीभत्स हत्याकांड के आरोपी को ले जाती जेल वैन पर कुछ लोग हथियारों के साथ हमला कर देते हैं ! हो सकता है कि यह एक सस्ता प्रचार पाने और मीडिया में दिखने का प्रयास भर हो पर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि लचर न्याय व्यवस्था से परेशान आम-जन की सहानुभूति इनके साथ हो जाए ! क्योंकि आज साधारण नागरिक को कुछ ऐसा एहसास हो गया है कि ऐसे दुष्कर्मियों के पीछे कोई ना कोई हाथ ही नहीं पूरा का पूरा रसूखदार शरीर होता है ! जिसको बिके हुए मिडिया का भी पूरा साथ मिलता है ! वह देखता है कि आए दिन अखबारों में कुछ ऐसी बातें छपवाई जाती हैं जिससे लोगों को भ्रमित कर अपराधी के प्रति सहानुभूति जगाई जा सके ! 

अभी वीभत्स हत्याकांड के आरोपी के बारे में भी ऐसा होना शुरू हो गया है ! उसके पछतावे के नाटक को हवा देने के लिए कभी खबर आती है कि वह मृतक का सर गोदी में ले घंटों बैठा रहता था या फिर रातों को रोता रहता था ! जबकि उन्हीं रातों में उसके अन्य लड़कियों से संबंध भी सामने आ चुके हैं ! इधर पुलिस को अलग समय लग रहा है, सबूत जुटाने में ! इसके अलावा उसे संकरी गलियों के उस्तादों की सहायता भी मिलनी शुरू हो चुकी है जो उसे कभी बीमार कभी मानसिक अस्वस्थ या कभी कोई और कारण बता दिन पर दिन निकलवाते जा रहे हैं ! उद्देश्य एक ही है, ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत कर मामले को हल्का बना, सजा में कटौती करवाना !

सवाल उठने भी लगे हैं कि यदि सारे सबूत मिल भी जाएंगे तो क्या आरोपी को फांसी होगी ? या फिर कोई कोर्ट और किसी कोर्ट के फैसले को पलटते हुए उसे दोष मुक्त कर देगा ? निर्भया काण्ड में ऐसा ही तो हुआ था ! तीनों आरोपी संदेह और अनियमितता का लाभ ले रिहा हो गए थे ! एक पति ने अपनी पत्नी की अरबों की संपत्ति हथियाने के लिए उसकी ह्त्या कर दी पर न्याय ने उसे फांसी नहीं आजीवन कारावास दिया, जब उसने सोलह हत्याओं के दोषियों को रिहाई मिलने की बात सुनी तो उसने भी अपनी रिहाई की अर्जी लगवा दी, जैसे न्याय न हो नौटंकी हो ! कई उदाहरण हैं ऐसे जब हाथी अपनी पूँछ सहित सूई के छेद से निकलवा दिया गया हो !    

नृशंस, संगीन, हैवानियत भरे आपराधिक कांडों पर हुए कुछ फैसलों से जब पुलिस तक हतोत्साहित हो जाती है तो आम नागरिक का क्या हाल होता होगा ? जब वह देखता है कि देश की संपत्ति हड़प जाने वाले, करोड़ों-अरबों का घोटाला करने वाले, नागरिकों को बेवकूफ बना अपना घर भरने वाले, गैर कानूनी हरकतें करने वाले, अपने लाभ के लिए हत्या तक कर देने वाले कभी पैरोल पर, कभी सबूत ना मिलने पर, कभी झूठी दलीलों के सहारे छाती तान बाहर घूमते हैं तो आक्रोश के मारे उसका हरेक व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है ! वह आपे से बाहर हो कानून अपने हाथ में लेने की भयंकर भूल कर बैठता है ! जैसा कि कुछ लोगों ने जेल वैन पर हमला कर किया ! वह भूल जाता है कि समाज ऐसे नहीं चलता ! ऐसे तो अराजकता फैल जाएगी ! कुछ भी हो उसे व्यवस्था पर विश्वास तो रखना ही होगा उसे बनाए रखने का सबसे ज्यादा दायित्व भी तो उसी का है ! उधर उसी व्यवस्था के कर्णधारों को भी समय रहते हवा का रुख पहचान लेना चाहिए इसके पहले कि वह हवा तूफान का रूप ले ले ! क्योंकि हर चीज की एक हद तो होती ही है.............!

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