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रविवार, 26 जनवरी 2025

पुलिसिया खौफ

अरे, कैसे बौड़म हो तुम ! जरा सी भी अक्ल नहीं है क्या ? रोज ही कुल्हाड़ी खोज-खोज कर अपना पैर उस पर जा मारने से बाज नहीं आते ! कभी तो दिमाग से काम ले लिया करो ! मैं स्तब्ध ! ऐसा क्या कर दिया मैंने ! धीरे से पूछा कि क्या हो गया ?'' क्या हो गया ?'' अरे, पूछो क्या नहीं हो गया !" कभी सोचा है तुमने कि जो पुलिस कुत्ते को भैंस में तब्दील कर सकती है, भैंस को कुत्ता बता कैद कर सकती है ! उसे तुम्हें भैंस और फिर कुत्ता साबित कर गिरफ्तार करने में कितनी देर लगेगी ! वैसे भी  तुम्हारा रंग काला ना सही, गहरा सांवला तो है ही ना.............!!        

#हिन्दी_ब्लागिंग           

अभी पूरा अँधेरा हुआ नहीं था ! पर ठंड के कारण बाहर इक्का-दुक्का लोग ही नज़र आ रहे थे ! श्रीमती जी उम्र के इस दौर की जरुरत के मुताबिक मंदिर में अर्जी लगाने गईं हुईं थीं। तभी मुख्य द्वार एक झन्नाटेदार आवाज के साथ खुला, लगा कोई भारी-भरकम चीज टकराई हो ! आवाज सुन बाहर निकला तो लॉन में एक भैंस को खड़े पाया, जो शायद गफलत में मुख्य द्वार खुला रहने की वजह से अंदर आ गई थी ! पास जाने की तो हिम्मत नहीं पड़ी सो दूर से ही हुश्शsssहुश्श की आवाज के साथ, हाथ वगैरह हिलाए पर वह जाने की बजाए मेरे और नजदीक आ गई !  

यही थीं 
मुझसे ना अंदर जाते बन रहा था ना हीं वहां खड़े रहते ! खुद को सभ्य, शांतिप्रिय, भाईचारे का हिमायती मानने वाले मुझ जैसे लोग किसी प्रकार का डंडा-लाठी भी अपने घर में नहीं रखते, पर आज अपनी स्वरक्षा के लिए ऐसी किसी चीज की जरुरत शिद्दत से महसूस हो रही थी ! इसी बीच भैंस बोल उठी, भाई साब, मुझे बचा लो ! मुझे एक झटका सा लगा ! पर मैं जैसे किसी दूसरे लोक में सपना देख रहा होऊं ! पता नहीं क्यों उसके इस तरह बोलने पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ, उलटे मैंने उससे पूछा कि क्या बात है, तुम घबराई सी क्यों हो ?

उसने बताना शुरू किया कि सुबह घोसी मोहल्ले में पुलिस आई थी जो किसी काले रंग के कुत्ते को खोज रही थी, जिसने किसी बड़े, रसूखदार आदमी को काट लिया था ! कुत्ता तो उन्हें नहीं मिला पर उनका हवलदार मुझे जैसे देखता हुआ गया, उससे मैं बहुत ही घबड़ा गई ! मैं बहुत ही डरपोक टाइप की भैंस हूं ! रंग भी मेरा काला है ! यदि पुलिस मुझे पकड़ कर ले गई और मेरी कुटाई कर मुझसे कुबुलवा लिया कि मैं भैस नहीं कुत्ता हूँ, तो मेरा क्या होगा ! इसी डर से मैं तबेले से भाग आई और आपका दरवाजा खुला देख अंदर आ गई ! अब आप ही मुझे बचा सकते हैं !

मेरी दबी-ढकी इंसानियत और पशुप्रेम ने अंगड़ाई ली ! मैंने उसे बाल्टी भर पानी पीने को दिया और पिछवाड़े के किचन गार्डन में ले जा कर कहा तुम यहां सुरक्षित महसूस करो, यदि भूख लगी हो तो यह घास वगैरह भी खा सकती हो ! वर्षों की पड़ी हुई मुफ्तखोरी की आदत यहां भी परोपकार के बहाने मुफ्त में झाड़-झंखाड़ की सफाई करवा लेने से बाज नहीं आई !  

अभी अपनी टुच्ची चतुराई पर खुश हो ही रहा था कि श्रीमती जी का आगमन हो गया ! आते ही बरस पड़ीं, बाहर का दरवाजा खुला पड़ा है और तुम यहां बैठे कम्प्यूटर टिपटिपा रहे हो ! कोई जानवर वगैरह घुस आया तो ? इतना भी नहीं कि जरा देख-दाख लिया करो, जनाब को फुरसत ही नहीं रहती ! इतने में उनकी नजर किचन गार्डन में घास चरती भैंसिया पर जा पड़ी, वहीं से चिल्लाईं, मैंने कहा था ना कि पशु-मवेशी घुस आएगा ! लो देखो, भैंस सारा लॉन चर गई है ! निकालो इसे !

मैंने उन्हें शांत करते हुए सारी बात बता कर कहा कि इसीलिए मैंने उसे अंदर लिया है ! मैंने सोचा था कि इस बात पर तो वे मेरी तारीफ करेंगी ही, पर यहां तो सदा की तरह फिर पासा उलटा पड़ गया ! श्रीमती जी ने सारी बात सुन अपना माथा पीट लिया, बोलीं, अरे कैसे बौड़म हो तुम ! जरा सी भी अक्ल नहीं है क्या ?तुमसे अक्लमंद तो ये भैंस है जिसने खतरा भांप लिया ! एक तुम हो जो कुल्हाड़ी खोज-खोज कर अपना पैर उस पर जा मारने से बाज नहीं आते ! कभी तो दिमाग से काम ले लिया करो ! 

मैं स्तब्ध ! ऐसा क्या कर दिया मैंने ! धीरे से पूछा कि क्या हो गया ?'' क्या हो गया ?'' अरे, पूछो क्या नहीं हो गया !" कभी सोचा है तुमने कि जो पुलिस कुत्ते को भैंस में तब्दील कर सकती है, भैंस को कुत्ता बता कैद कर सकती है ! उसे तुम्हें भैंस और फिर कुत्ता साबित कर गिरफ्तार करने में कितनी देर लगेगी ! वैसे भी  तुम्हारा रंग काला ना सही, गहरा सांवला तो है ही ना ! खुद तो अंदर जाओगे ही, मुझे भी परेशानी में डालोगे ! अगले हफ्ते मेरी तीन-तीन किटी पार्टियां हैं, क्या मुंह दिखाउंगी वहां !

अब बदहवास होने की मेरी बारी थी ! करूँ तो क्या करूँ ? मेरा तो कहीं छिपने का ठिकाना भी नहीं है ! कहाँ जाऊं ? ऐसे में AI का ख्याल आया। डूबते को तिनके का सहारा ! कम्प्यूटर खोल, AI के सामने अपनी समस्या रखी और उसका हल पूछा ! एक बार तो लगा कि वह भी सकते में आ गया है ! पर कुछ समय बाद उसका जवाब आया कि संसार में यदि कहीं की भी पुलिस किसी के पीछे पड़ जाए तो वह किसी भी हालत में बच नहीं सकता ! वही हाल आपका है। बचने का एक ही उपाय है ! आप कुत्तों की थोड़ी सी बोली सीख, अपने को कुत्ता डिक्लेयर कर, सरेंडर कर दो ! चकित हो मैंने पूछा इससे क्या होगा ? जवाब आया, इससे आप पुलिस की मार से बच जाएंगे और जब आपको कोर्ट में कुत्ते के रूप में पेश किया जाएगा तो आप भौंक कर दिखा जज को भी अपने श्वानपुत्र होने का विश्वास दिला देंगे ! फिर जो थोड़ी-बहुत सजा होगी उसे पूरा कर वापस आ जाइएगा ! मरता क्या ना करता ! कम्प्यूटर से ही सीखने की कोशिश कर रहा हूँ,

भौं-भौं....भौं.....भौं-भौं-भौं 

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

मैं, मेरा चश्मा और बंदर कृष्णभूमि के

पर इस बार अपहरणकर्ता की फिल्डिंग कमजोर थी ! हो सकता है नौसिखिया हो ! क्योंकि उसकी ओर जैसे ही फ्रूटी फेंकी गई, उसने चश्मा नीचे फेंक, माल लपकना चाहा और हड़बड़ी में ना माया मिली ना राम ! बेचारे का चेहरा देखने लायक था ! पर यहां कुछ सवाल भी खड़े होते हैं कि यहां के वानरों ने अपने सदा से प्रिय केले और चने जैसे खाद्यों को छोड़ यह फ्रूटी की लत कैसे पाल ली ! जिससे ना तो उनका पेट भरता होगा नाहीं भूख मिटती होगी  ! क्या यह कोई सोची-समझी साजिश तो नहीं .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पिछले दिनों RSCB के सौजन्य से वृन्दावन-मथुरा जाने का सुयोग बना ! संयोगवश ग्रुप की अगुवाई की बागडोर मेरे ही हाथों में थी ! चलने के पहले मिली हिदायतों में सबसे अहम् बात जो बताई गई वह थी, दोनों जगहों के बंदरों से सावधानी बरतने की ! खासकर वृन्दावन के इन स्वच्छंद जीवों से, जहां इनका उत्पात खौफ का रूप ले चुका है ! इनका आतंक मथुरा में भी है पर वृन्दावन की तुलना में कुछ कम !  हम सब ने इस बात की अच्छी तरह गांठ बांध ली थी ! जिसका असर भी रहा ! दोपहर तक पहुंचने के बाद गुफा मंदिर, प्रेम मंदिर और इस्कॉन मंदिर के दर्शनों में रात का पहला पहर बिना किसी विघ्न-बाधा के गुजर गया ! सब लोग निश्चिंतता के बावजूद सावधान भी थे !   

रात के नौ बजे के लगभग, भारी भीड़ के बीच हम सब भी बांके बिहारी जी के दर्शनार्थ, कतारों में लगे हुए थे ! वहां पहली बार वानर-चश्मा प्रेम के दर्शन हुए ! इतनी भीड़, जहां पैर रखने की जगह तक मिलना मुश्किल हो रहा था, उसके बावजूद ये चपल प्राणी, बड़ी सफाई और बिजली की फुर्ती से, बिना किसी को संभलने का मौका दिए, उनके चश्मों को हथिया जा रहे थे ! जिनके साथ यह घट रहा था, उनको छोड़ बाकी सब इस मुफ्त के शो का मजा ले रहे थे ! चश्मा लौटता था पर ''साहब को फ्रूटी'' की रिश्वत देने के बाद ! हम सब सुरक्षित थे !

बांकेबिहारी जी के दर्शनों के बाद हम सब कुछ अलग-थलग पड़ गए थे ! सब को इकठ्ठा करना था ! गलियों में रौशनी कम थी ! रात घिर आई थी ! मैंने सोचा ''भाई लोग'' भी आराम करने चले गए होंगें सो चश्मा कान पर चढ़ा लिया ! जरा सी देर बाद लगा जैसे किसी ने कंधे पर हाथ रखा हो, मैं समझा साथी मनोज जी होंगे...! जब तक पलटा चश्मा सामने के घर की मुंडेर तक जा पहुंचा था ! वहां से गुजर रहे एक दो बच्चों ने कहा, अंकल उसे फ्रूटी दीजिए ! पास ही दूकान बंद होने-होने को थी, वहाँ से फ्रूटी ले, उसी बच्चे को देने को कहा ! बच्चे ने फ्रूटी फेंकी......बंदर ने लपकी और बजाए चश्मा फेंकने के और ऊपर चढ़ गया ! बच्चे ने कहा, अंकल एक और दीजिए ! एक और ले कर दी गई, पर वह तो और आगे खिसक गया और चश्मे की डंडी को चबाना शुरू कर दिया ! अब मुझे परेशानी का अनुभव हुआ ! चश्मा ''प्रोग्रेसिव'' था, यूँही छोड़ते नहीं बन रहा था ! उसी बच्चे ने फिर एक और फ्रूटी देने को कहा, कोई और चारा भी तो नहीं था ! तीसरी भेंट दी गई और आश्चर्य इस बार अगले ने चश्मा जमीन पर दे मारा ! बच गया, उसी बच्चे ने लपक लिया था ! अब जब ऊपर ध्यान गया तो देखा वहां तीन सदस्य विराजमान थे ! जब तक तीनों को ''गिफ्ट'' नहीं मिला बंधक को छोड़ा नहीं गया था ! 


दूसरे दिन दिन-दहाड़े निधिवन के बाहर रात की नाटिका का रि-मंचन हो गया ! कंधे पर हल्का सा दोस्ताना स्पर्श हुआ और चश्मा इतनी कोमलता और सफाई से उतारा गया, जितने प्यार से मैंने खुद भी कभी नहीं उतारा होगा ! अब गफलत में चूक हो गई थी, खामियाजा तो उठाना पड़ना ही था ! इस बार एहतियातन दो फ्रुटियाँ ले लीं ! फिर एक बच्चे को मुहीम पर लगाया ! पर इस बार ऐनकहरणकर्ता की फिल्डिंग कमजोर थी ! हो सकता है नौसिखिया हो ! क्योंकि उसकी ओर जैसे ही फ्रूटी फेंकी गई, उसने चश्मा नीचे फेंक, माल लपकना चाहा और हड़बड़ी में ना माया मिली ना राम.....! बेचारे का चेहरा देखने लायक था ! इसी बीच हमारे ही ग्रुप के एक और सज्जन भी बिना किसी नुक्सान के इस अनुभव को संजो चुके थे ! एक बार तो इन आतंकियों ने मथुरा के डी. एम. की भी ऐनक उतार पुलिस वालों की जान सांसत में डाल दी थी ! बड़ी मुश्किलों के बाद फ्रुटियों ने ही वापस दिलवाई थी !

इन सब बातों से जो बात सामने आई, वह कुछ सवाल भी खड़े करती है ! सबसे अहम् तो यही है कि वानरों ने अपने सदा से प्रिय केले और चने जैसे खाद्यों को छोड़ यह फ्रूटी की लत कैसे पाल ली ! जिससे ना तो उनका पेट भरता है नाहीं भूख मिटती होगी ! तो क्या दुकानदारों ने अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए इनका दुरोपयोग किया ! क्योंकि मेरे साथ जहां भी छिनताई हुई वहां बगल में ही किराने की दुकान थी ! सदा ही इनका 99 % लक्ष्य चश्मा ही होता है जो शरीर पर कुछ कम सुरक्षित जगह पर रहता है ! हालांकि मोबाईल और हाथ में पकड़े छोटे-छोटे सामान भी जाते हैं पर बहुत ही कम, क्योंकि हाथ से सामान लेने पर कभी ''देने'' भी पड़ सकते हैं ! इसके अलावा वहां के स्थानीय रहवासी तुरंत घटनाग्रस्त इंसान से फ्रूटी ही देने की सिफारिश करता है ! खैर जो भी हो, आप-हम यदि पैक्ड फ्रूटी पिएं तो हो सकता है कि उसमें कुछ द्रव्य बच जाए, पर मजाल है कि एक बूँद भी चिपकी रह जाए, जब डिब्बा इन कपिवंशियों के हाथ में हो !

@ फोटो अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी

शिक्षा, चिकित्सा और न्याय ! आम-जन का विश्वास आक्रोश के मारे इन तीनों सर्वाधिक जनहित के क्षेत्रों से उठने लगा है ! लोग अब भगवान से उतना नहीं डरते जितना इन पेशों से जुड़े लोगों से खौफ खाते हैं ! खास कर कानून से जुड़े लोगों से ! कारण भी तो है ! यह जानते हुए भी कि न्याय में देर होने से उसकी अहमियत खत्म सी हो जाती है, इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा अतिकाल होता है ! इसीलिए कभी-कभी आक्रोशित हो सर्वहारा आपे से बाहर हो कानून अपने हाथ में लेने की भयंकर भूल कर बैठता है ! जैसा कि कुछ लोगों ने जेल वैन पर हमला कर किया ! वह भूल जाता है कि समाज ऐसे नहीं चलता ! शुक्र है कि यह दौरा कुछ पल के लिए ही पड़ता है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ दिनों पहले संविधान दिवस पर अपने विचार व्यक्त करती हुई आदरणीय राष्ट्राध्यक्ष द्रौपदी मुर्मू जी आज की न्याय व्यवस्था पर कुछ खिन्न नजर आईं ! उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि उनके बचपन में उनके गांव के लोग गुरु, डॉक्टर और वकील को भगवान मानते थे ! क्योंकि गुरु ज्ञान देकर, डॉक्टर जीवन देकर और वकील न्याय दिला कर लोगों की रक्षा करते थे ! उन्होंने मर्यादा और मेजबान का ख्याल रखते हुए, आजकल की अवस्था पर चिंता व्यक्त की, खासकर जेलों की हालत पर ! महामहिम की बात बिलकुल ठीक थी।     

हालांकि अभी भी इन तीनों क्षेत्रों में अधिकांश लोग अपने काम में पूरी तरह ईमानदारी से समर्पित हैं ! पर जैसा कि होता है, हर क्षेत्र में पैसे के लिए कुछ भी करने वाले लोग होते ही हैं वैसे ही कुछ मुट्ठी भर लोगों की वजह से आम जन का विश्वास इन तीनों सर्वाधिक जनहित के क्षेत्रों से उठने लगा है ! अब वे भगवान से उतना नहीं डरते जितना इन पेशों से जुड़े लोगों से भय खाते हैं ! खास कर कानून से जुड़े लोगों से ! कारण भी तो है ! यह जानते हुए भी कि न्याय में देर होने से उसकी अहमियत खत्म सी हो जाती है, इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा अतिकाल होता है ! इसी से गुनाह करने वाले भी कुछ हद तक बेखौफ हो अपने कुकर्मों को अंजाम देने में नहीं हिचकते ! उनको पता रहता है कि कोई ना कोई आएगा और उन्हें कानून की किसी ना किसी संकरी गली से साफ बचा ले जाएगा ! क्योंकि वहाँ के बारे में एक कहावत है कि "वहाँ यह देखा जाता है कि कौन बोल रहा है ना कि क्या बोला जा रहा है !" होता भी तो ऐसा ही आया है, जनता ने देखा भी है, दसियों ऐसे उदाहरण हैं जब भारी-भरकम लोग अपनी बात मनवा कर चल देते हैं ! अब तो तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी ! इधर आम-जन की यादाश्त मछली की तरह होती है वह बहुत जल्द पिछली बातों को भूल जाता है ! उसे चारे के रूप में नई चटपटी ख़बरें परोस भ्रमित कर दिया जाता है ! पर विगत में घटी किसी घटना की पुनरावृत्ति फिर सब कुछ ताजा कर उसके आक्रोश का वायस बन जाती है !

शायद यही कारण था कि वीभत्स हत्याकांड के आरोपी को ले जाती जेल वैन पर कुछ लोग हथियारों के साथ हमला कर देते हैं ! हो सकता है कि यह एक सस्ता प्रचार पाने और मीडिया में दिखने का प्रयास भर हो पर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि लचर न्याय व्यवस्था से परेशान आम-जन की सहानुभूति इनके साथ हो जाए ! क्योंकि आज साधारण नागरिक को कुछ ऐसा एहसास हो गया है कि ऐसे दुष्कर्मियों के पीछे कोई ना कोई हाथ ही नहीं पूरा का पूरा रसूखदार शरीर होता है ! जिसको बिके हुए मिडिया का भी पूरा साथ मिलता है ! वह देखता है कि आए दिन अखबारों में कुछ ऐसी बातें छपवाई जाती हैं जिससे लोगों को भ्रमित कर अपराधी के प्रति सहानुभूति जगाई जा सके ! 

अभी वीभत्स हत्याकांड के आरोपी के बारे में भी ऐसा होना शुरू हो गया है ! उसके पछतावे के नाटक को हवा देने के लिए कभी खबर आती है कि वह मृतक का सर गोदी में ले घंटों बैठा रहता था या फिर रातों को रोता रहता था ! जबकि उन्हीं रातों में उसके अन्य लड़कियों से संबंध भी सामने आ चुके हैं ! इधर पुलिस को अलग समय लग रहा है, सबूत जुटाने में ! इसके अलावा उसे संकरी गलियों के उस्तादों की सहायता भी मिलनी शुरू हो चुकी है जो उसे कभी बीमार कभी मानसिक अस्वस्थ या कभी कोई और कारण बता दिन पर दिन निकलवाते जा रहे हैं ! उद्देश्य एक ही है, ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत कर मामले को हल्का बना, सजा में कटौती करवाना !

सवाल उठने भी लगे हैं कि यदि सारे सबूत मिल भी जाएंगे तो क्या आरोपी को फांसी होगी ? या फिर कोई कोर्ट और किसी कोर्ट के फैसले को पलटते हुए उसे दोष मुक्त कर देगा ? निर्भया काण्ड में ऐसा ही तो हुआ था ! तीनों आरोपी संदेह और अनियमितता का लाभ ले रिहा हो गए थे ! एक पति ने अपनी पत्नी की अरबों की संपत्ति हथियाने के लिए उसकी ह्त्या कर दी पर न्याय ने उसे फांसी नहीं आजीवन कारावास दिया, जब उसने सोलह हत्याओं के दोषियों को रिहाई मिलने की बात सुनी तो उसने भी अपनी रिहाई की अर्जी लगवा दी, जैसे न्याय न हो नौटंकी हो ! कई उदाहरण हैं ऐसे जब हाथी अपनी पूँछ सहित सूई के छेद से निकलवा दिया गया हो !    

नृशंस, संगीन, हैवानियत भरे आपराधिक कांडों पर हुए कुछ फैसलों से जब पुलिस तक हतोत्साहित हो जाती है तो आम नागरिक का क्या हाल होता होगा ? जब वह देखता है कि देश की संपत्ति हड़प जाने वाले, करोड़ों-अरबों का घोटाला करने वाले, नागरिकों को बेवकूफ बना अपना घर भरने वाले, गैर कानूनी हरकतें करने वाले, अपने लाभ के लिए हत्या तक कर देने वाले कभी पैरोल पर, कभी सबूत ना मिलने पर, कभी झूठी दलीलों के सहारे छाती तान बाहर घूमते हैं तो आक्रोश के मारे उसका हरेक व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है ! वह आपे से बाहर हो कानून अपने हाथ में लेने की भयंकर भूल कर बैठता है ! जैसा कि कुछ लोगों ने जेल वैन पर हमला कर किया ! वह भूल जाता है कि समाज ऐसे नहीं चलता ! ऐसे तो अराजकता फैल जाएगी ! कुछ भी हो उसे व्यवस्था पर विश्वास तो रखना ही होगा उसे बनाए रखने का सबसे ज्यादा दायित्व भी तो उसी का है ! उधर उसी व्यवस्था के कर्णधारों को भी समय रहते हवा का रुख पहचान लेना चाहिए इसके पहले कि वह हवा तूफान का रूप ले ले ! क्योंकि हर चीज की एक हद तो होती ही है.............!

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जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

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