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शुक्रवार, 14 जून 2024

शापित है हमारा मध्यम वर्ग, ऐसा क्यूँ ? कोई तो जवाब दे

मध्यम वर्ग गर्व महसूस करता है जब वह सुनता है कि उसके देश में कोई भूखा नहीं सोता, करोड़ों लोगों को मुफ्त में राशन दिया जाता है ! पर जब वह अपने लिए निर्धारित आटे-दाल का भाव सुनता है तो सर पीट लेता है ! इस वर्ग को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, बल्कि वह खुश होता है जब इसे स्कूलों में गरीब बच्चों को मुफ्त में पौष्टिक आहार मिलने की बात पता चलती है ! पर उस पर दूसरे दिन सुबह ही गाज गिर जाती है, जब उसे अपने बच्चे के दूध की कीमतें बढ़ी हुई मिलती हैं ! पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर वह सरकार के अनुरोध पर बस या मेट्रो से अपने काम पर जाना तय करता है, तो पाता है कि उसकी चुनी सरकार ने इन साधनों का किराया बढ़ा दिया है ! तथाकथित गरीबों को लुभाने के लिए सरकारें मुफ्त धार्मिक यात्राओं का इंतजाम करती रहती हैं, पर क्या करे ये दुखिया वर्ग ! जो अपने माता-पिता को चाहते हुए भी किसी यात्रा पर भेजने के पहले सौ बार सोचता है, क्योंकि इसके बुजुर्गों को मिलने वाली कुछ प्रतिशत छूट सरकार वापस ले चुकी होती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पृथ्वी का मानचित्र देखने पर हमें क्षैतिज तथा एक दूसरे के सामानांतर रेखाओं का एक जाल सा नजर आता है। इन काल्पनिक रेखाओं को अक्षांश और देशांतर रेखाएं कहा जाता है। पृथ्वी के विभिन्न जलवायु क्षेत्र के निर्धारण, तापमान, मौसम का आकलन आदि में इन रेखाओं का काफी योगदान रहता है। ये वैज्ञानिकों द्वारा जमीन के धरातल पर खींची गई काल्पनिक रेखाएं हैं ! जिनके अगल-बगल या इस पार और उस पार लोग रहते हैं। 

उन रेखाओं की तर्ज पर एक काल्पनिक रेखा हमारे देश में राजनैतिक नेताओं द्वारा भी बनाई गई है। जिसे गरीबी की रेखा कहा जाता है। इसकी खासियत यह है कि यह धरातल पर नहीं बल्कि हवा में खींची गई है, इसीलिए इसके आर-पार नहीं, बल्कि ऊपर-नीचे आबादी रहती है ! इसके ऊपर रहने वालों को अमीर और नीचे वालों को गरीब माना जाता है ! उच्च वर्ग इसके दायरे में नहीं आता ! इस रेखा का एक खास गुण है कि इसे सरकारों की सहूलियतानुसार ऊपर-नीचे किया जा सकता है ! जिससे नेताओं द्वारा चुनावों के दौरान तरह-तरह के प्रलोभनों, हथकंडों, आश्वासनों तथा  रियायतों से जनता को लुभा, अपने उल्लू को टेढ़ा होने से बचाया जा सके ! 

इस रेखा के नीचे रहने वाले लोग अत्यंत भाग्यशाली और सरकारों के बहुत प्रिय होते हैं। देश में किसी भी दल की सरकार बने, इन लोगों की सदा पौ-बारह रहती है। उधर आम भारतीय जनता जिसे देश का मध्यम वर्ग कहा जाता है, वह भी सदा से बड़े दिल वाला, दयालु, परोपकारी व  भावुक रहा है ! दूसरों के दुःख से पसीज जाता है ! इसीलिए ''इसको'' बार-बार ''उनकी'' याद दिलाई जाती है, लगातार ''उनकी'' तथाकथित दुर्दशा से अवगत कराया जाता है ! ''ये'' भी द्रवित हो जैसे-तैसे उनके लिए अपनी जेब ढीली करते रहते हैं और ऐसा वर्षों से चला आ रहा है !  

पर ऐसा कब तक चलता ! दिनोंदिन की बढ़ती मंहगाई, स्थिर आमदनी, नौकरियों की कमी, छंटनी इन सबने इन्हें कुछ परेशान सा कर दिया ! इसने देखा कि यदि एक दल किसी खास जाति-धर्म का हिमायती है, उसी के बारे में सोचता है, तो दूसरा दल भी उसी की राह पर चल रहा है ! वह भी एक खास वर्ग की ही ज्यादा चिंता करता है ! उन्हीं को ध्यान में रख, ज्यादातर योजनाएं बनाई जाती हैं ! देश की संपदाओं का लाभ सबसे पहले उन्हीं को दिया जाता है और रेखा के ऊपर रहने वाला, भले ही वह तिल भर ही ऊपर हो,  वर्ग सदा से ठगा जाता रहा है !  

कभी ना कभी तो तिलमिलाहट होनी ही थी ! जब रेखा के ऊपर वाला समूह यह देखता है कि फलाने-फलाने को तो टैक्स से छूट दे दी जाती है पर मेरी कमाई के हाथ में आने के पहले ही उसमें कटौती हो जाती है ! उस मनहूस रेखा से तिल भर की ऊंचाई, उसको जी.एस.टी. और इनकम टैक्स के इंस्पेक्टरों का निशाना बनवा देती है, जबकि उधर वाले को अपनी आमदनी का कोई हिसाब-किताब ही नहीं रखना पड़ता ! मेरी पीढ़ी दर पीढ़ी किराए के मकान बदलते-बदलते ही कालकल्वित हो जाती है पर उधर के भाग्यशाली लोगों के सदस्यों को सरकारें चुन-चुन कर घर आवंटित कर गंगा नहाती रहती हैं ! मेरा बच्चा दिन-रात एक कर अच्छे नंबर लाता है पर उधर पास लायक अंक ना होने पर भी दाखिला मिल जाता है ! मुझे अपनी लियाकत होने के बावजूद तरक्की नहीं मिलती पर उधर तरक्की पर तरक्की पा कर भी लियाकत सिद्ध नहीं कर पाता ! मेरा सारा बजट राशन-किराए में ही खप जाता है, उधर किसी का मुफ्त, मुफ्त और मुफ्त पा कर भी पेट नहीं भरता !  

वही मध्यम वर्ग गर्व महसूस करता है जब वह सुनता है कि उसके देश में कोई भूखा नहीं सोता करोड़ों लोगों को मुफ्त में राशन दिया जाता है ! पर जब वह अपने लिए निर्धारित आटे-दाल का भाव सुन सर पीट लेता है ! इस वर्ग को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, बल्कि वह खुश होता है जब स्कूलों में गरीब बच्चों को मुफ्त में पौष्टिक आहार मिलने की बात सुनता है, पर उस पर दूसरे दिन सुबह ही गाज गिरती है जब उसे अपने बच्चे के दूध की कीमतें बढ़ी हुई मिलती है ! पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर वह सरकार के अनुरोध पर बस या मेट्रो से अपने काम पर जाना तय करता है तो पाता है कि उसकी चुनी सरकार ने इन साधनों का किराया बढ़ा दिया है ! तथाकथित गरीबों के लिए सरकारें मुफ्त धार्मिक यात्राओं का इंतजाम करती रहती हैं, पर क्या करे ये दुखिया वर्ग, जो अपने माता-पिता को चाहते हुए भी किसी यात्रा पर भेजने के पहले सौ बार सोचता है, क्योंकि बुजुर्गों को मिलने वाली कुछ प्रतिशत छूट भी सरकार वापस ले चुकी होती है ! जबकि यह विडंबना ही तो है कि सारे लाखों-करोड़ों की संपत्ति के स्वामी इन नेताओं के लिए हर सुविधा नि:शुल्क होती है ! यहां तक कि कई तो दो-दो पेंशन तक लेने से नहीं शर्माते ! 

अब तो ऐसा लगता है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी जैसा यह मध्यम वर्ग एक तरह से शापित ही है ! कहां तक गिनाई जाएं इनकी मुसीबतें ! इनकी परेशानियां गिनने लगें तो ग्रंथ बन जाएगा ! टैक्स पर टैक्स पर टैक्स देने वाला, छूट पर छूट पर छूट को लेने वाले को सिर्फ देखता रहता है ! वह सोचता रह जाता है कि  क्या खता है मेरी ! सबको दे-दे कर भी मैं ही क्यूँ भुगतने पर विवश हूँ ? व्यक्ति-समाज-देश क्या इनका जिम्मा सिर्फ मेरा है ? गन्ने की तरह पेर-पेर कर मेरा सारा रस निकाल, मुझे क्यों इस तरह उपेक्षित छोड़ दिया जाता है ? फिर आपदा-विपदा-मुसीबत पड़ने पर सबसे पहले याद भी मुझी को किया जाता है ! 

रियायतें, सहूलियतें जाति-धर्म या किसी विशेष ही को क्यों ? क्यों नहीं यह जरूरतमंदों की पहचान कर या जिन्हें इस सबकी सचमुच जरुरत है, उन्हें दी जातीं ? बहुत सारे, अनगिनत ऐसे लोग हैं, जिन्होंने सरकारी नौकरी नहीं की ! उनको कोई पेंशन नहीं मिलती ! वे आर्थिक तौर असुरक्षित हैं ! ऐसे ही अनेकों लोग जिन्हें आज आर्थिक-मानवीय सहायता की, सरकारी सुरक्षा की अत्यंत ही आवश्यकता है पर वे इन रेखाओं के दायरे में नहीं आते और घुट-घुट कर तरस-तरस कर जीने को मजबूर हैं ! उनका ख्याल कौन रखेगा ? उनकी चिंता कौन करेगा ? वोट तो वे भी देते हैं !

क्यूँ ? ऐसा क्यूँ ? कोई तो जवाब दे........!      

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

कारनामे सिर्फ एक वोट के

हम व्यवस्था को उसकी नाकामियों की वजह से कोसने में कोई ढिलाई नहीं बरतते पर कभी भी अपने कर्तव्य को नजरंदाज करने का दोष खुद को नहीं देते ! वर्षों बाद आने वाले सिर्फ एक दिन के कुछ पलों के लिए भी हम अपने आराम में खलल डालने से बचते हैं ! कभी विपरीत मौसम, कभी लंबी कतारों का हवाला दे खुद को सही ठहराने लगते हैं ! देश में अनगिनत ऐसे  लोग मिल जाएंगे जो अपनी मौज-मस्ती के लिए वोट वाले दिन मिले इस  अवकाश को, अपने मनोरंजन में खर्च करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

यदि मैं किसी दिन बिजली ना होने की वजह से पानी का पंप न चल पाने के कारण सिर्फ हाथ मुंह पौंछ कर भुनभुनाता हुआ घर से काम पर निकलता हूँ ! बाहर टूटी-फूटी गड्ढों भरी सड़क पर रेंगती गाड़ियां मुझे देर पर देर करवाती हैं ! गर्मी बेहाल करती है ! वातावरण धूँए-गुबार से अटा पड़ा होता है ! सांस लेते ही गले में जलन और खांसी आने लगती है तो मैं आपा खो कर सीधे-सीधे सरकार और व्यवस्था को कोसना शुरू कर देता हूँ ! उस समय मैं यह भूल जाता हूँ कि पिछली बार के चुनाव में मेरी वोटिंग वाले दिन सोमवार था, शनि से सोम तक की उन तीन दिनों की छुट्टियों के सदुपयोग के लिए मैं शुक्रवार की शाम को ही सपरिवार नैनीताल के लिए निकल गया था, बिना अपने और पत्नी के वोट के बेकार हो जाने की परवाह किए ! तो आज यह मेरा हक नहीं बनता कि मैं व्यवस्था को कोसूं ! क्योंकि इस सब की कहीं ना कहीं, किसी ना किसी तरह मेरी गफलत भी तो कारण बनती ही है !   

EVM
हम व्यवस्था को उसकी नाकामियों की वजह से कोसने में कोई ढिलाई नहीं बरतते पर कभी भी अपने कर्तव्य को नजरंदाज करने का दोष खुद को नहीं देते ! वर्षों बाद आने वाले सिर्फ एक दिन के कुछ पलों के लिए भी हम अपने आराम में खलल डालने से बचते हैं ! कभी विपरीत मौसम, कभी लंबी कतारों का हवाला दे खुद को सही ठहराने लगते हैं ! देश में अनगिनत ऐसे  लोग मिल जाएंगे जो अपनी मौज-मस्ती के लिए वोट वाले दिन मिले अवकाश को, अपने मनोरंजन में खर्च करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते ! उन्हें कभी भी अपनी इस भूल के कारण हो सकने वाले नुक्सान का ख्याल नहीं आता !  

कतारें 
एक वोट की कीमत को कुछ ना समझने वालों को हमें याद दिलाना है कि सिर्फ एक वोट की कमी के कारण क्या से क्या हो चुका है ! एक वोट ने लोगों के साथ-साथ देशों की तकदीर बदल दी है ! यह इतिहास में दर्ज है फिर भी हम सबक नहीं लेते ! 

* 1917 में सरदार पटेल जैसे नेता सिर्फ एक वोट से म्युनिसिपल कार्पोरेशन का चुनाव हार गए थे !

* कर्नाटक विधानसभा के 2004 के चुनाव में जनता दल सेक्युलर के उम्मीदवार  ए.आर.कृष्णमूर्ति विधानसभा चुनाव में एक वोट से हारने वाले पहले शख्स बन गए थे !

*  2008 के राजस्थान विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सी.पी.जोशी सिर्फ एक वोट से हार गए थे। विडंबना यह रही कि उनकी माताजी, उनकी पत्नी तथा उनका ड्राइवर वोट डालने गए ही नहीं थे ! 

* 17 अप्रैल 1999 के उस एक वोट को कौन भूल सकता है, जिसने बाजपेई जी की सरकार को पलट कर रख दिया था ! अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 270 और खिलाफ 269 वोट पड़े थे !

* 2017 में राज्यसभा की सीट के लिए हुए एक कड़े मुकाबले में कांग्रेस के अहमद पटेल सिर्फ आधे वोट से जीते थे !

* अभी कुछ ही दिनों पहले हिमाचल की राज्यसभा सीट का परिणाम, वोट बराबर होने की वजह से लॉटरी से निकाला गया था !

वैसे यह वोट ना देने की बिमारी जगत व्यापी है ! वर्षों-वर्ष से ! विदेशों में भी सिर्फ एक वोट ने कहर बरपाया है !

* 1775 में अमेरिका की राष्ट्रभाषा के लिए जर्मन और इंग्लिश के बीच चुनाव हुआ सिर्फ एक वोट से वहां अंग्रेजी को मान्यता मिल गई, जो आज तक टिकी हुई है !

* अमेरिका में 1800, 1824 व 1876 में हुए चुनावों में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सिर्फ एक-एक वोट से जीते थे  !

* अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनावों में करोड़ों वोट पड़ने के बावजूद बुश और कैनेडी कुछ सौ मतों से ही विजयी हुए थे !

* 1875 में फ्रांस की राजशाही एक वोट से खत्म हो गई थी ! जब आराम परस्त शाही परिवार गफलत में पड़ कर्तव्य से चूक गया था ! उस एक भूल के कारण तब से आज तक फ्रांस में लोकतंत्र कायम है !

* 1979 में इंग्लॅण्ड में विपक्ष की नेता थैचर ने एक अविश्वास प्रस्ताव में सत्ताधारी प्रधानमंत्री जेम्स कैलहैन को सिर्फ एक वोट से पदच्युत करवा दिया था !  

अपना प्रत्याशी 
सदा की तरह निष्कर्ष तो यही निकलता है कि हमें अपने एक वोट की ताकत को याद रखना है ! हमारे विचार जिस किसी से भी मिलते हों, हम जिस किसी को भी पसंद करते हों, अपना मत उसे देना ही है ! हमारे अकेले से क्या फर्क पड़ता है इस सोच को खत्म करना ही है, क्योंकि हम अकेले ही नहीं सैंकड़ों लोग इस तरह की सोच की गिरफ्त में हैं और इस तरह सैकड़ों वोटों का विपरीत फर्क हर बार पड़ता रहता है !

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

आँखों पर पट्टी बांधे बैठी कुर्सियां

सच तो यही है कि आँखों पर पट्टी बंधी होने से कभी भी न्याय नहीं हो पाता है ! हमारे हजारों साल पुराने ग्रंथ भी इस बात के गवाह हैं, उनमें भी इस बात की पुष्टि हुई है कि यदि आँखों पर पट्टी ना होती तो संसार का सबसे बड़ा विनाशकारी युद्ध भी शायद ना होता ! कहावत है कि कानों सुनी पर विश्वास नहीं करना चाहिए ! आज भी सत्य के पक्ष में खड़े युधिष्ठिर, अपनी बात ठीक से न रख पाने, सच्चाई को ठीक से उजागर ना कर पाने के कारण, अपना पक्ष कमजोर कर लेते हैं ! दूसरी ओर शकुनि जैसे लोग अपने वाक्चातुर्य से असत्य को सत्य का जामा पहना बंद आखों को धोखा देने में सफल हो जाते हैं.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

स्कूल में, चाहे वह विज्ञान हो, भूगोल हो, गणित हो, पढ़ाए गए विषयों की सत्यता सदा एक सी बनी रहती है ! यह नहीं होता कि स्कूल में पढ़ाया गया हो कि पृथ्वी गोल है और कॉलेज में आ कर वह चपटी हो जाए ! यदि स्कूल में बताया गया है कि पानी, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के संयोग से बनता है तो यह सच्चाई सदा ही बनी रहती है ! दो और दो चार ही होता है ! मनुष्य सामाजिक प्राणी ही बना रहता है, जैसा बताया गया था ! गुरु जी की कुर्सी पर बैठा इंसान विद्वान होता है ! कोई ऐरा-गैरा आ कर उसकी परीक्षा नहीं ले सकता ! ऐसा भी नहीं कि वह कुछ बोले और हेड मास्टर उसकी बात काट दे और उधर प्रिंसिपल हेडमास्टर को गलत करार कर उसकी बात बार-बार पलटता  रहे !

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पर एक विधा ऐसी भी है जिसमें कुछ भी स्थाई नहीं है ! एक कुछ कहता है तो दूसरा उसको गलत सिद्ध कर जाता है तो तीसरा आ कर दूसरे की बात पलट जाता है ! निचले स्थान की कुर्सी को उच्चासीन हेय सिद्ध कर देता है तो इस उच्च को सर्वोच्च सत्ता वाला धरातल पर ला पटकता है ! पता नहीं....! किताबें तो सबने एक जैसी ही पढ़ी होती हैं ! पर हर कोई उनको अपनी मर्जी के अनुसार परभाषित करने लगता है ! यदि उसमें लिखा इतना जटिल है कि अधिकांश को वह समझ ही नहीं आता तो उसे सरल क्यों नहीं बनाया जाता ?  क्यों नहीं उसके ''लूप होल्स'' को सील कर दिया जाता ? उस जटिलता का खामियाजा भुगतना पड़ता है आम, मजलूम जनता को ! आज हालत ऐसे हैं कि बोलने वाला सुनने वाले पर हावी हो गया है ! यह ''सुना'' जाता है कि ''कौन'' बोल रहा है ना कि क्या बोला जा रहा है ! होता भी तो ऐसा ही आया है, जनता ने देखा भी है, दसियों ऐसे उदाहरण हैं जब भारी-भरकम लोग अपनी बात मनवा कर चल देते हैं ! अब तो तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी !

इस विधा के प्रतीक को रोमन देवी जस्टीशिया के रूप में जाना जाता है। जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी हुई है और एक हाथ में तराजू और दूसरे में तलवार है। कहते हैं पहले मूर्ति की आँखों पर पट्टी नहीं होती थी पर 16वीं शताब्दी में उसके सामने होने वाले अन्याय के प्रति उसे अंधा दिखाने के उद्देश्य के तहत, कुछ लोगों ने मूर्ति की आँखों पर पट्टी बाँध दी थी ! पर फिर न्यायालय की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इसे न्याय की निष्पक्षता के प्रतीक के रूप में प्रचारित कर दिया गया ! पर सच तो यही है कि आँखों पर पट्टी बांध कभी भी कोई न्याय नहीं कर पाया है ! हमारे हजारों साल पुराने ग्रंथ भी इस बात के गवाह हैं, उनमें भी इस बात की पुष्टि की हुई है कि यदि आँखों पर पट्टी ना होती तो संसार का सबसे बड़ा विनाशकारी युद्ध भी ना होता ! कहावत है कि कानों सुनी पर विश्वास नहीं करना चाहिए ! सत्य के पक्ष में खड़े युधिष्ठिर, अपनी बात ठीक से न रख पाने, सच्चाई को ठीक से उजागर ना कर पाने के कारण, अपना पक्ष कमजोर कर लेते हैं ! दूसरी ओर शकुनि जैसे लोग अपने वाक्चातुर्य से असत्य को सत्य का जामा पहना बंद आखों को धोखा देने में सफल हो जाते हैं !

चलिए इन गुमानी कुर्सियों की तो आँखें बंद हैं पर हमारे पथ प्रदर्शक, हमारे धर्मगुरु, हमारा समाज यह सब क्यों चुप है ? कहाँ हैं वे लोग जो कहते हैं कि हम इंसान गढ़ते हैं ? उनकी आँखें तो खुली हैं, तो फिर क्या उन्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है कि आज कैसे इंसान घड़े जा रहे हैं ? क्यों है यह चुप्पी ? क्यों है यह उदासीनता ? हमें खुद भी सोचना होगा, क्यों निर्लिप्त हैं हम सब ?

इस विधा के मूल मंत्र को प्रचारित करते समय बार-बार कहा जाता है कि भले ही सौ दोषी छूट जाएं पर निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए ! पर विडंबना यह है कि अधिकांश मामलों में इसका उलट होता है ! पीड़ित अपनी आत्मा पर बोझ लिए मर-मर कर जीता है और अपराधी अपने रसूख, अपने धनबल, अपने बाहुबल और इस विधा की संकरी गलियों का सहारा ले, दुःखित को और दुखी करता, उसकी छाती पर मूंग दलता हुआ स्वच्छंद मंडराता रहता है ! लचर कानून और न्याय व्यवस्था हमेशा से ही आम नागरिक की परेशानी का सबब रही है ! आज भी सीधा-साधा गरब-गुरबा डरता है न्याय की गुहार लगाने को ! जब्त कर जाता है अपने ऊपर हुए अन्याय को ! यदि कोई हिम्मत करता है तो उसकी हालत "रागदरबारी के लंगड़" जैसी हो कर रह जाती है ! ज्यादातर आम नागरिकों को  काले कोट उन काली शक्तियों की तरह भयभीत करते हैं, जिनके चंगुल में एक बार फंस गए तो मौत ही मुक्ति दिला पाती है ! दूसरी तरफ इन्हीं खामियों का फायदा उठा अपराधी अक्सर कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं ! 

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यदि कुर्सी की आँखें खुली हों यानी वह कभी-कभी खुद भी संज्ञान लेने की जहमत उठा ले, तो सामने वाले की भाव-भंगिमा, चाल-ढाल, उसकी कुटिलता का आभास पा वस्तुस्थिति समझने में आसानी हो सकती है ! तब देखा तो जा सकेगा कि कोई बिमारी का बहाना बना जेल से छूट, घर पर तीमारदारी करवाने के बजाए पर्यटन पर कैसे निकल जाता है ! बीमार है पर खेल-कूद में सक्रीय भाग लेने लगता है ! देखा तो जा सकेगा कि करोड़ों के हेर-फेर में किसी के पास कुछ नहीं मिलता पर उसके बगल की खेती कैसे लहलहाने लगी है ! कानों को साक्ष्य ना भी सूझें पर आँखें तो देख पाएंगी कि कैसे डेढ़-डेढ़ दर्जन बच्चों की लाशें नालों में सड़ती हुई मिल रही हैं ! वे खुद तो जा कर मिटटी में दफ़न या नाले में नहीं कूदी होंगी ! कोई तो होगा जिसने ऐसी हैवानियत की होगी और वह ''कोई'' सिर्फ सुनी-सुनाई पर कैसे रिहा हो गया......! 

यह भी बिलकुल सच है कि आँखों पर पट्टी होने के बावजूद कई कुर्सियां बिना किसी दवाब में आए, अपनी जान तक की परवाह किए बगैर अपने कर्तव्य को अंजाम देती रहती हैं और उन्हीं के कारण आज भी इस व्यवस्था की साख कायम है ! यह भी सही है कि इस विधा में सिर्फ आँख की पट्टी का ही दोष नहीं है ! इसमें कुछ कुर्सियों पर उनका अहम, विचारधारा, परवरिश, दृष्टिकोण यह सब हावी हो जाता है जिससे अपने को श्रेष्ठ समझ एक अलग सोच बना ली जाती है ! पश्चिम की उच्श्रृखंलता, कुत्सित विचार, उनके मानदंड उन्हें सही लगने लगते हैं ! ऐसी कुर्सियां भूल जाती हैं कि हमारी सामाजिक व्यवस्था अलग है ! हमारे समाज की रीढ़ हमारे परिवार हैं ! परिवारों की एकजुटता हमारे संस्कार हैं, जिनमे विवाह का एक विशेष स्थान है ! माँ-बाप की अहमियत है बच्चों के लिए, उनकी परवरिश के लिए ! सिर्फ सुविधाएं जुटा देने से ही कर्तव्य की इति नहीं हो जाती ! खून के रिश्ते परिवारों को एक मजबूती देते हैं ! संस्कार हैं तो परिवार हैं, परिवार हैं तो समाज है और समाज है तभी देश भी है ! 

आजकल कुछ ऐसी ही बंद आँखों वाली कुर्सियां अप्राकृतिक संबंधों की पैरोकार बन जिस तरह वैवाहिक संस्कारों पर चोट करने की कोशिश में हैं उससे वे भविष्य के समाज के कैसे विनाश का आह्वान कर रही हैं, इसका शायद उन्हें गुमान भी नहीं है ! चलिए इन गुमानी कुर्सियों की तो आँखें बंद हैं पर हमारे पथ प्रदर्शक, हमारे धर्मगुरु, हमारा समाज यह सब क्यों चुप है ? कहाँ हैं वे लोग जो कहते हैं कि हम इंसान गढ़ते हैं ? उनकी आँखें तो खुली हैं, तो फिर क्या उन्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है कि आज कैसे इंसान घड़े जा रहे हैं ? क्यों है यह चुप्पी ? क्यों है यह उदासीनता ? हमें खुद भी सोचना होगा, क्यों निर्लिप्त हैं हम सब ?   

बुधवार, 9 अगस्त 2023

सच्चाई का बीज पनपता जरूर है

सच्चाई का बीज ! उसे चाहे कितनी भी  गहराई में क्यों न दबा दिया जाए, परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, सतह चाहे कितनी भी कठोर हो, वह पनपता जरूर है। हो सकता है इसमें समय लग जाए पर वह दफन नहीं होता और असत्य को अपनी करनी का फल भोगना ही पडता है। इसमें कोई शक-ओ-शुब्हा नहीं है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जीवन को तरह-तरह से परिभाषित किया गया है। कोई इसे प्रभू की देन कहता है, कोई सांसों की गिनती का खेल, कोई भूल-भुलैया, कोई समय की बहती धारा तो कोई ऐसी पहेली जिसका कोई ओर-छोर नहीं। कुछ लोग इसे पुण्यों का फल मानते हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो इसे पापों का दंड समझते हैं। 

कोई चाहे कितना भी इसे समझने और समझाने का दावा कर ले, रहता यह अबूझ ही है। यह एक ऐसे सर्कस की तरह है जो बाहर से सिर्फ एक तंबू नज़र आता है पर जिसके भीतर अनेकों हैरतंगेज कारनामे होते रहते हैं। ऐसा ही एक कारनामा है इंसान का सच से आंख मूंद अपने को सर्वोपरि समझना।
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आँख की शल्य-चिकित्सा का बेहतरीन संस्थान 
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इंसान जब पैदा होता है तो अजब-गजब भविष्य-वाणियों के बावजूद कोई नहीं जानता कि वह बडा होकर क्या बनेगा या क्या करेगा, पर यह निर्विवादित रूप से सबको पता रहता है कि उसकी मौत जरूर होगी। इतने बडे सत्य को जानने के बाद भी इंसान इस छोटी सी जिंदगी में तरह-तरह के हथकंडे अपना कर अपने लिए सपनों के महल और दूसरों के लिए कंटक बीजने में बाज नहीं आता। कभी कभी अपने क्षण-भंगुर सुख के लिए वह किसी भी हद तक गिरने से भी नहीं झिझकता। लोभ, लालच, अहंकार, ईर्ष्या उसके ज्ञान पर पर्दा डाल देते हैं। वह अपने फायदे के लिए किसी का किसी भी प्रकार का अहित करने से नहीं चूकता। वह भूल जाता है कि बंद कमरे में बिल्ली भी अपनी जान बचाने के लिए उग्र हो जाती है। मासूम सी चिडिया भी हाथ से छूटने के लिए चोंच मार देती है। नीबूं से ज्यादा रस निकालने की चाहत उसके रस को कडवा बना डालती है। यहां तक कि उसे भगवान की उस लाठी का डर भी नहीं रह जाता जिसमें आवाज नहीं होती। उस समय उसे सिर्फ और सिर्फ अपना हित नजर आता है। असंख्य ऐसे उदाहरण हैं कि ऐसे लोगों को उनके दुष्कर्म का फल मिलता भी जरूर है पर विडंबना यह है कि उस समय उन्हें अपनी करतूतें याद नहीं आतीं। 

ऐसे लोगों के कारण मानव निर्मित न्याय व्यवस्था भी अब निरपेक्ष नहीं रह गयी है। कोई कितना भी कह ले कि हम मानव न्याय का सम्मान करते हैं तो सम्मान भले ही करते हों मानते नहीं हैं। उसमें इतने छल-छिद्र बना दिए गये हैं कि आदमी कभी-कभी बिल्कुल बेबस, लाचार हो जाता है अन्याय के सामने। न्याय को पाने के लिए समय के साथ-साथ पैसा पानी की तरह बहता तो है पर मिली-भगत से उसका हश्र भी वैसा ही होता है जैसे शुद्ध पीने का पानी गटर में जा गिरे। यूंही किस्से-कहानियों में या फिल्मों में न्याय व्यवस्था का मजाक नहीं बनाया जाता। ज्यादातर झूठ तेज तर्रार वकीलों की सहायता से सच को गलत साबित करने में सक्षम हो जाता है। सच कहीं दुबक जाता है झूठ के विकराल साये में। सामने वाला इसे अपनी जीत समझने लगता है, भूल जाता है समय चक्र को, भूल जाता है इतिहास को, भूल जाता है अपने ओछेपन को। पर सत्य  रूपी बीज, उसे चाहे कितना भी नीचे क्यों न  दबाया गया हो,  सतह कितनी भी कठोर क्यों ना हो उसे फोड कर पनपता जरूर है। चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों। समय कितना भी लग जाए, असत्य को अपनी करनी का फल भोगना जरूर पडता है। इसमें कोई शक-ओ-शुब्हा नहीं है।
और फिर अंजाम कुछ ऐसा होता है कि..........!

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी

शिक्षा, चिकित्सा और न्याय ! आम-जन का विश्वास आक्रोश के मारे इन तीनों सर्वाधिक जनहित के क्षेत्रों से उठने लगा है ! लोग अब भगवान से उतना नहीं डरते जितना इन पेशों से जुड़े लोगों से खौफ खाते हैं ! खास कर कानून से जुड़े लोगों से ! कारण भी तो है ! यह जानते हुए भी कि न्याय में देर होने से उसकी अहमियत खत्म सी हो जाती है, इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा अतिकाल होता है ! इसीलिए कभी-कभी आक्रोशित हो सर्वहारा आपे से बाहर हो कानून अपने हाथ में लेने की भयंकर भूल कर बैठता है ! जैसा कि कुछ लोगों ने जेल वैन पर हमला कर किया ! वह भूल जाता है कि समाज ऐसे नहीं चलता ! शुक्र है कि यह दौरा कुछ पल के लिए ही पड़ता है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ दिनों पहले संविधान दिवस पर अपने विचार व्यक्त करती हुई आदरणीय राष्ट्राध्यक्ष द्रौपदी मुर्मू जी आज की न्याय व्यवस्था पर कुछ खिन्न नजर आईं ! उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि उनके बचपन में उनके गांव के लोग गुरु, डॉक्टर और वकील को भगवान मानते थे ! क्योंकि गुरु ज्ञान देकर, डॉक्टर जीवन देकर और वकील न्याय दिला कर लोगों की रक्षा करते थे ! उन्होंने मर्यादा और मेजबान का ख्याल रखते हुए, आजकल की अवस्था पर चिंता व्यक्त की, खासकर जेलों की हालत पर ! महामहिम की बात बिलकुल ठीक थी।     

हालांकि अभी भी इन तीनों क्षेत्रों में अधिकांश लोग अपने काम में पूरी तरह ईमानदारी से समर्पित हैं ! पर जैसा कि होता है, हर क्षेत्र में पैसे के लिए कुछ भी करने वाले लोग होते ही हैं वैसे ही कुछ मुट्ठी भर लोगों की वजह से आम जन का विश्वास इन तीनों सर्वाधिक जनहित के क्षेत्रों से उठने लगा है ! अब वे भगवान से उतना नहीं डरते जितना इन पेशों से जुड़े लोगों से भय खाते हैं ! खास कर कानून से जुड़े लोगों से ! कारण भी तो है ! यह जानते हुए भी कि न्याय में देर होने से उसकी अहमियत खत्म सी हो जाती है, इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा अतिकाल होता है ! इसी से गुनाह करने वाले भी कुछ हद तक बेखौफ हो अपने कुकर्मों को अंजाम देने में नहीं हिचकते ! उनको पता रहता है कि कोई ना कोई आएगा और उन्हें कानून की किसी ना किसी संकरी गली से साफ बचा ले जाएगा ! क्योंकि वहाँ के बारे में एक कहावत है कि "वहाँ यह देखा जाता है कि कौन बोल रहा है ना कि क्या बोला जा रहा है !" होता भी तो ऐसा ही आया है, जनता ने देखा भी है, दसियों ऐसे उदाहरण हैं जब भारी-भरकम लोग अपनी बात मनवा कर चल देते हैं ! अब तो तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी ! इधर आम-जन की यादाश्त मछली की तरह होती है वह बहुत जल्द पिछली बातों को भूल जाता है ! उसे चारे के रूप में नई चटपटी ख़बरें परोस भ्रमित कर दिया जाता है ! पर विगत में घटी किसी घटना की पुनरावृत्ति फिर सब कुछ ताजा कर उसके आक्रोश का वायस बन जाती है !

शायद यही कारण था कि वीभत्स हत्याकांड के आरोपी को ले जाती जेल वैन पर कुछ लोग हथियारों के साथ हमला कर देते हैं ! हो सकता है कि यह एक सस्ता प्रचार पाने और मीडिया में दिखने का प्रयास भर हो पर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि लचर न्याय व्यवस्था से परेशान आम-जन की सहानुभूति इनके साथ हो जाए ! क्योंकि आज साधारण नागरिक को कुछ ऐसा एहसास हो गया है कि ऐसे दुष्कर्मियों के पीछे कोई ना कोई हाथ ही नहीं पूरा का पूरा रसूखदार शरीर होता है ! जिसको बिके हुए मिडिया का भी पूरा साथ मिलता है ! वह देखता है कि आए दिन अखबारों में कुछ ऐसी बातें छपवाई जाती हैं जिससे लोगों को भ्रमित कर अपराधी के प्रति सहानुभूति जगाई जा सके ! 

अभी वीभत्स हत्याकांड के आरोपी के बारे में भी ऐसा होना शुरू हो गया है ! उसके पछतावे के नाटक को हवा देने के लिए कभी खबर आती है कि वह मृतक का सर गोदी में ले घंटों बैठा रहता था या फिर रातों को रोता रहता था ! जबकि उन्हीं रातों में उसके अन्य लड़कियों से संबंध भी सामने आ चुके हैं ! इधर पुलिस को अलग समय लग रहा है, सबूत जुटाने में ! इसके अलावा उसे संकरी गलियों के उस्तादों की सहायता भी मिलनी शुरू हो चुकी है जो उसे कभी बीमार कभी मानसिक अस्वस्थ या कभी कोई और कारण बता दिन पर दिन निकलवाते जा रहे हैं ! उद्देश्य एक ही है, ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत कर मामले को हल्का बना, सजा में कटौती करवाना !

सवाल उठने भी लगे हैं कि यदि सारे सबूत मिल भी जाएंगे तो क्या आरोपी को फांसी होगी ? या फिर कोई कोर्ट और किसी कोर्ट के फैसले को पलटते हुए उसे दोष मुक्त कर देगा ? निर्भया काण्ड में ऐसा ही तो हुआ था ! तीनों आरोपी संदेह और अनियमितता का लाभ ले रिहा हो गए थे ! एक पति ने अपनी पत्नी की अरबों की संपत्ति हथियाने के लिए उसकी ह्त्या कर दी पर न्याय ने उसे फांसी नहीं आजीवन कारावास दिया, जब उसने सोलह हत्याओं के दोषियों को रिहाई मिलने की बात सुनी तो उसने भी अपनी रिहाई की अर्जी लगवा दी, जैसे न्याय न हो नौटंकी हो ! कई उदाहरण हैं ऐसे जब हाथी अपनी पूँछ सहित सूई के छेद से निकलवा दिया गया हो !    

नृशंस, संगीन, हैवानियत भरे आपराधिक कांडों पर हुए कुछ फैसलों से जब पुलिस तक हतोत्साहित हो जाती है तो आम नागरिक का क्या हाल होता होगा ? जब वह देखता है कि देश की संपत्ति हड़प जाने वाले, करोड़ों-अरबों का घोटाला करने वाले, नागरिकों को बेवकूफ बना अपना घर भरने वाले, गैर कानूनी हरकतें करने वाले, अपने लाभ के लिए हत्या तक कर देने वाले कभी पैरोल पर, कभी सबूत ना मिलने पर, कभी झूठी दलीलों के सहारे छाती तान बाहर घूमते हैं तो आक्रोश के मारे उसका हरेक व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है ! वह आपे से बाहर हो कानून अपने हाथ में लेने की भयंकर भूल कर बैठता है ! जैसा कि कुछ लोगों ने जेल वैन पर हमला कर किया ! वह भूल जाता है कि समाज ऐसे नहीं चलता ! ऐसे तो अराजकता फैल जाएगी ! कुछ भी हो उसे व्यवस्था पर विश्वास तो रखना ही होगा उसे बनाए रखने का सबसे ज्यादा दायित्व भी तो उसी का है ! उधर उसी व्यवस्था के कर्णधारों को भी समय रहते हवा का रुख पहचान लेना चाहिए इसके पहले कि वह हवा तूफान का रूप ले ले ! क्योंकि हर चीज की एक हद तो होती ही है.............!

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