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सोमवार, 6 मई 2024

सियालकोट भारत में शामिल होते-होते रह गया था

कुछ लोगों की लापरवाही या कहिए आरामपरस्ती ने देशों के नक्शे बदल कर रख दिए ! ऐसे लोगों के कारण सियालकोट का हिन्दू बहुल इलाका भारत में शामिल होते-होते रह गया ! 1941 की जनगणना के अनुसार सियालकोट में हिन्दुओं की तादाद दो लाख इक्कीस हजार थी। उस में से तकरीबन एक लाख लोगों ने वोट नहीं दिया था और पचपन हजार मतों से सियालकोट का भारत में शामिल करने का प्रस्ताव गिर गया था !  वैसे यह आदत या चरित्र अभी भी पूरी तरह बदली नहीं है..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सियालकोट, पकिस्तान का एक शहर ! आज जो लोग अपने एक वोट को लेकर लापरवाह हैं उनको पता होना चाहिए कि 1946 में कुछ लोगों की आरामपरस्ती, लापरवाही या फर्ज के प्रति उदासीनता के कारण यह शहर हिन्दुस्तान का हिस्सा बनते-बनते रह गया था ! 

कतारें 
देश में आजकल चुनाव चल रहे हैं ! वोट की महत्ता, ताकत, उपयोगिता के बारे में लोगों को जागरूक किया जा रहा है। ऐसा करना जरुरी भी है क्योंकि अधिकांश लोग मतदान के दिन मिले अवकाश को एक अतिरिक्त मिली छुट्टी की तरह ले तफरीह में लग जाते हैं ! उन्हें लगता है कि मेरे एक वोट से कौन सी दुनिया बदल जाएगी ! इसी सोच के कारण हर बार हजारों वोट बेकार चले जाते हैं और नतीजा कुछ का कुछ हो जाता है ! देश की सरकारों को तो छोड़िए देशों का नक्शा तक बदल कर रह जाता है ! इसका एक उदाहरण है सियालकोट ! 
प्रतीक्षा 
वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रदीप सिंह जी ने अपने यू-ट्यूब चैनल ''आपका अखबार'' में एक घटना का जिक्र किया है, जिसके अनुसार मतदाताओं की आरामपरस्ती और लापरवाही से सियालकोट जो लाहौर से 135 तथा जम्मू से सिर्फ 42 किमी दूर है और उस समय  भारत का हिस्सा बनते-बनते रह गया था ! बात बंटवारे के पहले की है जब देश के बंटवारे की प्रक्रिया चल रही थी। देश के बड़े नेता गोपीनाथ बोरदोलोई चाहते थे कि सियालकोट भारत का हिस्सा बने क्योंकि उस समय वह हिन्दू बहुल इलाका था ! पर फिर भी यह तय पाया गया की उसका भविष्य जनमत संग्रह से होगा। दिन, तारीख, समय और वोट का तरीका तय हो गया। निश्चित समय पर मतदान शुरू होते ही पोलिंग बूथ के सामने मुसलमानों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं। उन्होंने अपने वोट का हक अदा किया। इधर अधिकांश हिन्दू आराम से उठे, नास्ता-पानी किया और दोपहर तक वहां पहुंच कर लंबी-लंबी कतारों को देखा तो आधे तो ऐसे ही वापस आ गए कि कौन इतनी देर खड़ा रहेगा ! कुछ लोग रुके कि यदि लाइन जल्दी छोटी हो जाए तो वोट डाल ही देते हैं पर वे भी कतारों की सुस्त रफ्तार से तंग या कहिए थक कर वापस हो लिए !
उत्साह 
जनमत संग्रह का जब नतीजा आया तो पता चला कि 55000 वोटों से यह प्रस्ताव पास हो गया कि सियालकोट को पाकिस्तान में शामिल किया जाएगा ! इस तरह एक हिन्दु बहुल इलाका भारत में शामिल होते-होते रह गया ! 1941 की जनगणना के अनुसार सियालकोट में हिन्दुओं की तादाद दो लाख इक्कीस हजार थी। उस में से तकरीबन एक लाख लोगों ने वोट नहीं दिया था और पचपन हजार मतों से सियालकोट का भारत में शामिल करने का प्रस्ताव गिर गया था ! कुछ लोगों की लापरवाही या कहिए आरामपरस्ती ने देशों के नक्शे बदल कर रख दिए ! वैसे यह आदत या चरित्र अभी भी पूरी तरह बदला नहीं है ! 
जोश 
इसके बाद का इतिहास लोगों को मालुम ही होगा जब 1946 के  सोलह अगस्त के जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन का कहर सियालकोट पर भी बरपा, खून-खराबा हुआ ! लूट-खसोट हुई ! वो आराम-तलब लोग भी सदा के लिए आराम के हवाले कर दिए गए जो लंबी कतारें देख घर वापस आ गए थे ! उन्हीं जैसे लोगों की लापरवाही के कारण 1951 की जनगणना के अनुसार वहां हिंदुओं की संख्या सिर्फ दस हजार रह गई थी, इतना ही नहीं 2017 की गणना के अनुसार वहां केवल 500 हिन्दू बचे थे ! आज का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, पता नहीं एक भी हिन्दू बचा भी है कि नहीं ! 
EVM
तो अपने विवेक का प्रयोग कर, देश हित में वोट तो जरूर दें, बिना किसी के बहकावे में आए ! जो आपको सुपात्र लगे ! साफ- सुथरी छवि का हो ! देश, जनहित की बात करता हो ! निष्पक्ष हो ! बेदाग हो और जन-जन का हो ! 
वंदे मातरम ! 

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

कारनामे सिर्फ एक वोट के

हम व्यवस्था को उसकी नाकामियों की वजह से कोसने में कोई ढिलाई नहीं बरतते पर कभी भी अपने कर्तव्य को नजरंदाज करने का दोष खुद को नहीं देते ! वर्षों बाद आने वाले सिर्फ एक दिन के कुछ पलों के लिए भी हम अपने आराम में खलल डालने से बचते हैं ! कभी विपरीत मौसम, कभी लंबी कतारों का हवाला दे खुद को सही ठहराने लगते हैं ! देश में अनगिनत ऐसे  लोग मिल जाएंगे जो अपनी मौज-मस्ती के लिए वोट वाले दिन मिले इस  अवकाश को, अपने मनोरंजन में खर्च करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

यदि मैं किसी दिन बिजली ना होने की वजह से पानी का पंप न चल पाने के कारण सिर्फ हाथ मुंह पौंछ कर भुनभुनाता हुआ घर से काम पर निकलता हूँ ! बाहर टूटी-फूटी गड्ढों भरी सड़क पर रेंगती गाड़ियां मुझे देर पर देर करवाती हैं ! गर्मी बेहाल करती है ! वातावरण धूँए-गुबार से अटा पड़ा होता है ! सांस लेते ही गले में जलन और खांसी आने लगती है तो मैं आपा खो कर सीधे-सीधे सरकार और व्यवस्था को कोसना शुरू कर देता हूँ ! उस समय मैं यह भूल जाता हूँ कि पिछली बार के चुनाव में मेरी वोटिंग वाले दिन सोमवार था, शनि से सोम तक की उन तीन दिनों की छुट्टियों के सदुपयोग के लिए मैं शुक्रवार की शाम को ही सपरिवार नैनीताल के लिए निकल गया था, बिना अपने और पत्नी के वोट के बेकार हो जाने की परवाह किए ! तो आज यह मेरा हक नहीं बनता कि मैं व्यवस्था को कोसूं ! क्योंकि इस सब की कहीं ना कहीं, किसी ना किसी तरह मेरी गफलत भी तो कारण बनती ही है !   

EVM
हम व्यवस्था को उसकी नाकामियों की वजह से कोसने में कोई ढिलाई नहीं बरतते पर कभी भी अपने कर्तव्य को नजरंदाज करने का दोष खुद को नहीं देते ! वर्षों बाद आने वाले सिर्फ एक दिन के कुछ पलों के लिए भी हम अपने आराम में खलल डालने से बचते हैं ! कभी विपरीत मौसम, कभी लंबी कतारों का हवाला दे खुद को सही ठहराने लगते हैं ! देश में अनगिनत ऐसे  लोग मिल जाएंगे जो अपनी मौज-मस्ती के लिए वोट वाले दिन मिले अवकाश को, अपने मनोरंजन में खर्च करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते ! उन्हें कभी भी अपनी इस भूल के कारण हो सकने वाले नुक्सान का ख्याल नहीं आता !  

कतारें 
एक वोट की कीमत को कुछ ना समझने वालों को हमें याद दिलाना है कि सिर्फ एक वोट की कमी के कारण क्या से क्या हो चुका है ! एक वोट ने लोगों के साथ-साथ देशों की तकदीर बदल दी है ! यह इतिहास में दर्ज है फिर भी हम सबक नहीं लेते ! 

* 1917 में सरदार पटेल जैसे नेता सिर्फ एक वोट से म्युनिसिपल कार्पोरेशन का चुनाव हार गए थे !

* कर्नाटक विधानसभा के 2004 के चुनाव में जनता दल सेक्युलर के उम्मीदवार  ए.आर.कृष्णमूर्ति विधानसभा चुनाव में एक वोट से हारने वाले पहले शख्स बन गए थे !

*  2008 के राजस्थान विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सी.पी.जोशी सिर्फ एक वोट से हार गए थे। विडंबना यह रही कि उनकी माताजी, उनकी पत्नी तथा उनका ड्राइवर वोट डालने गए ही नहीं थे ! 

* 17 अप्रैल 1999 के उस एक वोट को कौन भूल सकता है, जिसने बाजपेई जी की सरकार को पलट कर रख दिया था ! अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 270 और खिलाफ 269 वोट पड़े थे !

* 2017 में राज्यसभा की सीट के लिए हुए एक कड़े मुकाबले में कांग्रेस के अहमद पटेल सिर्फ आधे वोट से जीते थे !

* अभी कुछ ही दिनों पहले हिमाचल की राज्यसभा सीट का परिणाम, वोट बराबर होने की वजह से लॉटरी से निकाला गया था !

वैसे यह वोट ना देने की बिमारी जगत व्यापी है ! वर्षों-वर्ष से ! विदेशों में भी सिर्फ एक वोट ने कहर बरपाया है !

* 1775 में अमेरिका की राष्ट्रभाषा के लिए जर्मन और इंग्लिश के बीच चुनाव हुआ सिर्फ एक वोट से वहां अंग्रेजी को मान्यता मिल गई, जो आज तक टिकी हुई है !

* अमेरिका में 1800, 1824 व 1876 में हुए चुनावों में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सिर्फ एक-एक वोट से जीते थे  !

* अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनावों में करोड़ों वोट पड़ने के बावजूद बुश और कैनेडी कुछ सौ मतों से ही विजयी हुए थे !

* 1875 में फ्रांस की राजशाही एक वोट से खत्म हो गई थी ! जब आराम परस्त शाही परिवार गफलत में पड़ कर्तव्य से चूक गया था ! उस एक भूल के कारण तब से आज तक फ्रांस में लोकतंत्र कायम है !

* 1979 में इंग्लॅण्ड में विपक्ष की नेता थैचर ने एक अविश्वास प्रस्ताव में सत्ताधारी प्रधानमंत्री जेम्स कैलहैन को सिर्फ एक वोट से पदच्युत करवा दिया था !  

अपना प्रत्याशी 
सदा की तरह निष्कर्ष तो यही निकलता है कि हमें अपने एक वोट की ताकत को याद रखना है ! हमारे विचार जिस किसी से भी मिलते हों, हम जिस किसी को भी पसंद करते हों, अपना मत उसे देना ही है ! हमारे अकेले से क्या फर्क पड़ता है इस सोच को खत्म करना ही है, क्योंकि हम अकेले ही नहीं सैंकड़ों लोग इस तरह की सोच की गिरफ्त में हैं और इस तरह सैकड़ों वोटों का विपरीत फर्क हर बार पड़ता रहता है !

विशिष्ट पोस्ट

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अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...