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शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

"माले मुफ्त का" ऐंटी रिएक्शन

नासूर बनते इस घाव का उपचार बहुत सोच-समझ कर, बड़ी सूझ-बूझ और सतर्कता से तुरंत करना बेहद जरुरी है नहीं तो जाति, धर्म, आरक्षण के कारण बंटते देश-समाज की सिरदर्दी बढ़ाने के लिए एक और जमात सदा के लिए आ खड़ी होगी ! जिसके मुंह में मुफ्तखोरी का खून लग चुका होगा ! आज देश की हालत और समय का तकाजा है कि मुफ्त में मछली देने के बजाय मछली पकड़ना सिखाया जाए, ताकि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सके ! आबादी के परमाणु बम पर बैठे देश को मुफ्तखोरों, निठठ्लों, परजीवियों की नहीं कर्म-वीरों की जरुरत है..................!     
#हिन्दी_ब्लागिंग 
दृश्य एक :- आठ एकड़ की खेती लायक जमीन के मालिक श्री अमर सिंह जी अपनी सेहत ठीक न होने के कारण, खेत में काम करने के लिए किसी सहायक के न मिलने से परेशान थे।  एक दिन उन्हें अपना पुराना कामदार दिखाई पड़ा तो उन्होंने उसे फिर काम पर रखना चाहा तो उसने साफ मना कर कहा कि वह अब बेगार नहीं करता। एक ही गांव के होने के कारण साहू जी जानते थे कि वह दिन भर निठ्ठला घूमता है, नशे का भी आदी है. पर कर क्या सकते थे. एक दो साल के बाद तंग आकर मजबूरी में उन्होंने दुखी मन से अपनी आधी जमीन एक बिल्डर को बेच डाली। अब वहां गेहूं की जगह कंक्रीट की फसल उगेगी !                 

दृश्य दो :- शहर के करीब रहने वाले श्री गोविंद पटेल जी को अपने घर में बरसात का पानी इकट्ठा होने के कारण उसकी निकासी के लिए एक पांच-सात फुट की छोटी नाली निकलवानी थी। पर इस छोटे से काम  को करने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था। किसी तरह एक पलम्बर राजी हुआ, उतने से काम के लिए उसने हजार रुपयों की मांग की, ले-दे कर नौ सौ रुपये पर राजी हुआ, जबकि सारा काम बेढंगे तरीके से उसके सहयोगी एक किशोर ने किया। सिमित आय वाले पटेल जी कसमसा कर रह गए !  

तीसरा दृश्य :- शर्मा जी के फ्लैट के बाहर के पाइप में दीवाल में उगे एक पौधे ने किसी तरह पाइप के अंदर जगह बना उसे पूरी तरह  "चोक"  कर दिया। नतीजतन ऊपर के फ्लैट के साथ-साथ अपना पानी भी घर के अंदर बहने लगा ! दस फुट की ऊंचाई पर के पाइप के जोड़ को खोल कर साफ करने के लिएन कोई पलम्बर मिल रहा था ना हीं कोई सफाई कर्मचारी ! बड़ी मुश्किल से पांच सौ रुपये दे कर तथा साथ लग कर यह 15 - 20 मिनट का काम करवाया जा सका ! मजबूरी जो थी !  

चौथा दृश्य :- मिश्रा जी को दूध-दही का शौक है।  सो घर पर सदा एक-दो दुधारू पशु बंधे रहते थे। अब मजबूरन सबको हटा, बाजार का मिश्रित दूध लेना पड़ रहा है ! कारण पशुओं के रख-रखाव, दाना-पानी, साफ-सफाई के लिए किसी सहायक का उपलब्ध न हो पाना था ! मजबूरन ऐसे लोगों को या तो ब्रांडेड कंपनियों के उत्पाद खरीदने होंगे या फिर डेयरी वालों के रहमो-करम पर अपना स्वास्थ्य गिरवी रखना होगा !  

पांचवां दृश्य :-  एक गांव में एक कौतुक दिखाने वाला आया ! खेल दिखाने के बाद जब उसे कुछ लोग धान देने लगे तो वह ऐसे बिदका जैसे सांड को लहराता लाल कपड़ा दिखा दिया हो ! कुछ नाराज सा हो बोला, मुझे सिर्फ पैसे चाहिए !  धान कितना चाहिए मुझसे ले लो ! धान की उसको क्या कमी, सरकार भर-भर तसले हर महीने घर जो पहुंचा रही है !

इन सारे दृश्यों में एक वजह कॉमन है ! वह है, काम करने वालों की कमी और दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाने की प्रवृत्ति और यह बिमारी हमारे नेता-गण ही लाए हैं ! जिन्होंने अपना वोट बैंक पुख्ता करने की लालसा में तरह-तरह के स्वाद की रेवड़ियां जगह-जगह बांटी हैं ! ये सरकारों द्वारा लाई जा रही खुशहाली की तस्वीर नहीं है, यह है मुफ्तखोरी के कारण उपजी जहालत और काम न करने की प्रवृत्ति की ! कुछ लोगों को ये बातें गरीब विरोधी लगेंगी, पर कड़वी सच्चाई है कि मुफ्तखोरी ने आज समाज में निष्क्रिय लोगों का एक अलग तबका बना दिया है ! ! इससे भी भयावह सच्चाई यह है कि अब चाह कर भी ऐसी स्कीमों को तुरंत बंद नहीं किया जा सकता ! क्योंकि जैसे ही ऐसा कोई कदम उठेगा, देश को अस्थिर करने की ताक में बैठी देसी-विदेशी ताकतें, उसका जबरदस्त विरोध करवा अराजकता फैलाने की कोशिश शुरू करवा देंगी !    

हालांकि कुछ ऐसी योजनाओं और उन्हें लागू करने वालों की मंशा समाज के निचले वर्ग की बेहतरी चाहने की ही रही होगी, जैसे कोरोना के दौरान मुफ्त का राशन ! पर महामारी के बाद उसे बंद कर देना चाहिए था ! क्योंकि उसका बोझ भी तो समाज का एक वर्ग ही उठा रहा है ! उस पर सचमुच के गरीब और बने या बनाए हुए ग़रीबों में जमीन-आसमान का फर्क होता है और ऐसी योजनाओं का सर्वाधिक लाभ उन्हीं बने हुए ग़रीबों द्वारा उठाया जाता है, जिन्हें बिना हाथ-पैर हिलाए हराम की खाने की आदत पड़ चुकी होती है ! समाज के ऐसे ही परजीवियों और उनके आकाओं के कारण अच्छी योजनाएं भी अपने लक्ष्य तक न पहुंच आलोचनाओं का शिकार हो अप्रियता को प्राप्त हो जाती हैं।  

नासूर बनते इस घाव का उपचार बहुत सोच-समझ कर, बड़ी सूझ-बूझ और सतर्कता से तुरंत करना बेहद जरुरी है नहीं तो जाति, धर्म, आरक्षण के कारण बंटते देश-समाज की सिरदर्दी बढ़ाने के लिए एक और जमात सदा के लिए आ खड़ी होगी ! जिसके मुंह में मुफ्तखोरी का खून लग चुका होगा ! आज देश की हालत और समय का तकाजा है कि मुफ्त में मछली देने के बजाय मछली पकड़ना सिखाया जाए, ताकि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सके ! आबादी के परमाणु बम पर बैठे देश को मुफ्तखोरों, परजीवियों की नहीं कर्म-वीरों की जरुरत है !

शुक्रवार, 14 जून 2024

शापित है हमारा मध्यम वर्ग, ऐसा क्यूँ ? कोई तो जवाब दे

मध्यम वर्ग गर्व महसूस करता है जब वह सुनता है कि उसके देश में कोई भूखा नहीं सोता, करोड़ों लोगों को मुफ्त में राशन दिया जाता है ! पर जब वह अपने लिए निर्धारित आटे-दाल का भाव सुनता है तो सर पीट लेता है ! इस वर्ग को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, बल्कि वह खुश होता है जब इसे स्कूलों में गरीब बच्चों को मुफ्त में पौष्टिक आहार मिलने की बात पता चलती है ! पर उस पर दूसरे दिन सुबह ही गाज गिर जाती है, जब उसे अपने बच्चे के दूध की कीमतें बढ़ी हुई मिलती हैं ! पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर वह सरकार के अनुरोध पर बस या मेट्रो से अपने काम पर जाना तय करता है, तो पाता है कि उसकी चुनी सरकार ने इन साधनों का किराया बढ़ा दिया है ! तथाकथित गरीबों को लुभाने के लिए सरकारें मुफ्त धार्मिक यात्राओं का इंतजाम करती रहती हैं, पर क्या करे ये दुखिया वर्ग ! जो अपने माता-पिता को चाहते हुए भी किसी यात्रा पर भेजने के पहले सौ बार सोचता है, क्योंकि इसके बुजुर्गों को मिलने वाली कुछ प्रतिशत छूट सरकार वापस ले चुकी होती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पृथ्वी का मानचित्र देखने पर हमें क्षैतिज तथा एक दूसरे के सामानांतर रेखाओं का एक जाल सा नजर आता है। इन काल्पनिक रेखाओं को अक्षांश और देशांतर रेखाएं कहा जाता है। पृथ्वी के विभिन्न जलवायु क्षेत्र के निर्धारण, तापमान, मौसम का आकलन आदि में इन रेखाओं का काफी योगदान रहता है। ये वैज्ञानिकों द्वारा जमीन के धरातल पर खींची गई काल्पनिक रेखाएं हैं ! जिनके अगल-बगल या इस पार और उस पार लोग रहते हैं। 

उन रेखाओं की तर्ज पर एक काल्पनिक रेखा हमारे देश में राजनैतिक नेताओं द्वारा भी बनाई गई है। जिसे गरीबी की रेखा कहा जाता है। इसकी खासियत यह है कि यह धरातल पर नहीं बल्कि हवा में खींची गई है, इसीलिए इसके आर-पार नहीं, बल्कि ऊपर-नीचे आबादी रहती है ! इसके ऊपर रहने वालों को अमीर और नीचे वालों को गरीब माना जाता है ! उच्च वर्ग इसके दायरे में नहीं आता ! इस रेखा का एक खास गुण है कि इसे सरकारों की सहूलियतानुसार ऊपर-नीचे किया जा सकता है ! जिससे नेताओं द्वारा चुनावों के दौरान तरह-तरह के प्रलोभनों, हथकंडों, आश्वासनों तथा  रियायतों से जनता को लुभा, अपने उल्लू को टेढ़ा होने से बचाया जा सके ! 

इस रेखा के नीचे रहने वाले लोग अत्यंत भाग्यशाली और सरकारों के बहुत प्रिय होते हैं। देश में किसी भी दल की सरकार बने, इन लोगों की सदा पौ-बारह रहती है। उधर आम भारतीय जनता जिसे देश का मध्यम वर्ग कहा जाता है, वह भी सदा से बड़े दिल वाला, दयालु, परोपकारी व  भावुक रहा है ! दूसरों के दुःख से पसीज जाता है ! इसीलिए ''इसको'' बार-बार ''उनकी'' याद दिलाई जाती है, लगातार ''उनकी'' तथाकथित दुर्दशा से अवगत कराया जाता है ! ''ये'' भी द्रवित हो जैसे-तैसे उनके लिए अपनी जेब ढीली करते रहते हैं और ऐसा वर्षों से चला आ रहा है !  

पर ऐसा कब तक चलता ! दिनोंदिन की बढ़ती मंहगाई, स्थिर आमदनी, नौकरियों की कमी, छंटनी इन सबने इन्हें कुछ परेशान सा कर दिया ! इसने देखा कि यदि एक दल किसी खास जाति-धर्म का हिमायती है, उसी के बारे में सोचता है, तो दूसरा दल भी उसी की राह पर चल रहा है ! वह भी एक खास वर्ग की ही ज्यादा चिंता करता है ! उन्हीं को ध्यान में रख, ज्यादातर योजनाएं बनाई जाती हैं ! देश की संपदाओं का लाभ सबसे पहले उन्हीं को दिया जाता है और रेखा के ऊपर रहने वाला, भले ही वह तिल भर ही ऊपर हो,  वर्ग सदा से ठगा जाता रहा है !  

कभी ना कभी तो तिलमिलाहट होनी ही थी ! जब रेखा के ऊपर वाला समूह यह देखता है कि फलाने-फलाने को तो टैक्स से छूट दे दी जाती है पर मेरी कमाई के हाथ में आने के पहले ही उसमें कटौती हो जाती है ! उस मनहूस रेखा से तिल भर की ऊंचाई, उसको जी.एस.टी. और इनकम टैक्स के इंस्पेक्टरों का निशाना बनवा देती है, जबकि उधर वाले को अपनी आमदनी का कोई हिसाब-किताब ही नहीं रखना पड़ता ! मेरी पीढ़ी दर पीढ़ी किराए के मकान बदलते-बदलते ही कालकल्वित हो जाती है पर उधर के भाग्यशाली लोगों के सदस्यों को सरकारें चुन-चुन कर घर आवंटित कर गंगा नहाती रहती हैं ! मेरा बच्चा दिन-रात एक कर अच्छे नंबर लाता है पर उधर पास लायक अंक ना होने पर भी दाखिला मिल जाता है ! मुझे अपनी लियाकत होने के बावजूद तरक्की नहीं मिलती पर उधर तरक्की पर तरक्की पा कर भी लियाकत सिद्ध नहीं कर पाता ! मेरा सारा बजट राशन-किराए में ही खप जाता है, उधर किसी का मुफ्त, मुफ्त और मुफ्त पा कर भी पेट नहीं भरता !  

वही मध्यम वर्ग गर्व महसूस करता है जब वह सुनता है कि उसके देश में कोई भूखा नहीं सोता करोड़ों लोगों को मुफ्त में राशन दिया जाता है ! पर जब वह अपने लिए निर्धारित आटे-दाल का भाव सुन सर पीट लेता है ! इस वर्ग को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, बल्कि वह खुश होता है जब स्कूलों में गरीब बच्चों को मुफ्त में पौष्टिक आहार मिलने की बात सुनता है, पर उस पर दूसरे दिन सुबह ही गाज गिरती है जब उसे अपने बच्चे के दूध की कीमतें बढ़ी हुई मिलती है ! पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर वह सरकार के अनुरोध पर बस या मेट्रो से अपने काम पर जाना तय करता है तो पाता है कि उसकी चुनी सरकार ने इन साधनों का किराया बढ़ा दिया है ! तथाकथित गरीबों के लिए सरकारें मुफ्त धार्मिक यात्राओं का इंतजाम करती रहती हैं, पर क्या करे ये दुखिया वर्ग, जो अपने माता-पिता को चाहते हुए भी किसी यात्रा पर भेजने के पहले सौ बार सोचता है, क्योंकि बुजुर्गों को मिलने वाली कुछ प्रतिशत छूट भी सरकार वापस ले चुकी होती है ! जबकि यह विडंबना ही तो है कि सारे लाखों-करोड़ों की संपत्ति के स्वामी इन नेताओं के लिए हर सुविधा नि:शुल्क होती है ! यहां तक कि कई तो दो-दो पेंशन तक लेने से नहीं शर्माते ! 

अब तो ऐसा लगता है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी जैसा यह मध्यम वर्ग एक तरह से शापित ही है ! कहां तक गिनाई जाएं इनकी मुसीबतें ! इनकी परेशानियां गिनने लगें तो ग्रंथ बन जाएगा ! टैक्स पर टैक्स पर टैक्स देने वाला, छूट पर छूट पर छूट को लेने वाले को सिर्फ देखता रहता है ! वह सोचता रह जाता है कि  क्या खता है मेरी ! सबको दे-दे कर भी मैं ही क्यूँ भुगतने पर विवश हूँ ? व्यक्ति-समाज-देश क्या इनका जिम्मा सिर्फ मेरा है ? गन्ने की तरह पेर-पेर कर मेरा सारा रस निकाल, मुझे क्यों इस तरह उपेक्षित छोड़ दिया जाता है ? फिर आपदा-विपदा-मुसीबत पड़ने पर सबसे पहले याद भी मुझी को किया जाता है ! 

रियायतें, सहूलियतें जाति-धर्म या किसी विशेष ही को क्यों ? क्यों नहीं यह जरूरतमंदों की पहचान कर या जिन्हें इस सबकी सचमुच जरुरत है, उन्हें दी जातीं ? बहुत सारे, अनगिनत ऐसे लोग हैं, जिन्होंने सरकारी नौकरी नहीं की ! उनको कोई पेंशन नहीं मिलती ! वे आर्थिक तौर असुरक्षित हैं ! ऐसे ही अनेकों लोग जिन्हें आज आर्थिक-मानवीय सहायता की, सरकारी सुरक्षा की अत्यंत ही आवश्यकता है पर वे इन रेखाओं के दायरे में नहीं आते और घुट-घुट कर तरस-तरस कर जीने को मजबूर हैं ! उनका ख्याल कौन रखेगा ? उनकी चिंता कौन करेगा ? वोट तो वे भी देते हैं !

क्यूँ ? ऐसा क्यूँ ? कोई तो जवाब दे........!      

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